सुबह-सुबह घूमने के एक नहीं अनेक फायदे हैं। घूमना दिनचर्या का हिस्सा रहा है लेकिन आजकल कम ही घूमता हूं। कई दिन पहले की बात है तो देपालसर रोड की तरफ घूमने निकला ही था कि पीछे से आवाज़ आई…मास्टर जी मास्टर जी… मैं पीछे मुड़ा तो झुग्गी झोंपड़ियों के पास एक गरीब मजूदर मुझे पुकार रहा था। मैंने सोचा ये कौन है ? मैं तो इन्हें जानता ही नहीं ये कैसे पहचानता है। पास आया और आते ही मेरे चरण स्पर्श किए और बोला ” मास्टर जी पहचाना नहीं क्या ? मैं प्रभु ! मैं सोच में पड़ गया कि प्रभु ओर चरणों में…? मैंने कोशिश की पहचानने की लेकिन असफल रहा..। उसने कहा मास्टर जी मैं वही प्रभु हूं जो आपके मकान पर मजदूरी करने आता था। 11 साल पुरानी स्मृति अब लौट चुकी थी। मैं पहचान गया। 2015 में जब मेरा घर बन रहा था तब प्रभु वहां एक मजदूर के रूप में काम करने आता था। हालांकि पूरा काम ठेकेदार को दे रखा था लेकिन काम संभालने के लिए मैं रोज सुबह शाम आता था। कई मजदूर काम करते थे तो मुझे सीधा मजदूरों से कोई मतलब नहीं था फिर भी मैं उनके पास बैठ जाता था। उनसे बातें करना, उनके काम करने का तरीका देखना।

कभी-कभी उनके पास बैठकर चाय पीना…चाय पीकर मैं जब कप साफ करने लगता तो अन्य मजदूर तो नहीं लेकिन प्रभु मेरे हाथ से कप ले लेता और कहता मास्टरजी आपसे साफ थोड़ी करवाएंगे मुझे दे दो। प्रभु! शक्ल से भी भोला और मन का एकदम सरल। ईमानदारी से अपना कार्य करता। मैंने उस समय नोटिस किया कि “ये केवल एक नारा ही था कि दुनियां के मजदूरों एक हो जाओ” लेकिन मजदूर भी मजदूरों का शोषण करते है। प्रभु यहां का नहीं था।वह मध्यप्रदेश का था, तो यहां के मजदूर उनके साथ भेदभाव करते। मैंने देखा कि कठिन काम प्रभु को दिया जाता। प्रभु के साथ अन्य मजदूरों का व्यवहार भी अच्छा नहीं था, उनसे मजाक करते, फब्तियां कसते। वो बेचारा मजबूरन उन्हें सहन करता। बाकी सब मजदूर एक साथ खाना खाते और प्रभु एक कोने में बैठकर अकेला। कभी-कभी मैं पूछ लेता प्रभु क्या पकवान लाये हो मुझे भी खिलाओ तो वह संकोच करता। लेकिन मैं एक दो कौर खा ही लेता। इस तरह प्रभु मेरे से काफी घुल मिल गया था। मैं उसके दुख दर्द, घर परिवार के बारे में पूछता…कभी-कभी उन्हें मिठाई भी ला देता था कि बच्चों के लिए ले जाना। घर बन जाने पर प्रभु चला गया था मैं बाजार की दुनियां में व्यस्त हो गया। जाते-जाते सजल आंखों से मुझे कहा मास्टर जी कोई काम हो तो बता देना..वर्षों बाद प्रभु आज फिर मिला। मैंने पूछा इतने दिन कहां थे ? उसने कहा अब मैं यहां नहीं रहता, कभी-कभी आता हूं अब गाँव में ही रहेंगे। मजदूरी के पैसे बकाया थे वो लेने आया था, ठेकेदार दे नहीं रहा। हमारी इंसानियत इसी में है कि मजदूर को उसका पसीना सूखने से पहले उसकी हथेली में पैसे आ जाने चाहिए लेकिन…फिर भी लोग गरीबों का पैसा खा जाते है। पास में ही प्रभु की झुग्गी थी। मैंने कहा प्रभु आपके घर (झुग्गी पर) चले! वो बोला मास्टर जी मेरे पास कैसा घर ? प्रभु ने अनजाने में बड़ी बात कह दी कि प्रभु का कैसा घर..? मैंने सोचा बात तो गहरी लेकिन पूरे संसार में प्रभु के तो न जाने कितने ही घर है। खैर ! मैं उसकी झुग्गी में चला ही गया। दरवाजा छोटा होने कारण सर झुकाकर अन्दर जाना पड़ा। वैसे भी प्रभु के दर पर सर झुकाकर ही जाना पड़ता है। बांस की लकड़ियों के ऊपर तरपाल लगाकर बनाया हुआ एक घर..फटे पुराने अस्तव्यस्त कपड़े बिखरे पड़े थे। हर चीज गरीबी और बेबसी को बयां कर रही थी…लेकिन मुझे कक्षा 10 में वियोगी हरि के लिखे पाठ “दीनों पर प्रेम” की वे चंद पंक्तियां स्मरण हो आई…किसानों और मज़दूरों की टूटी फूटी झोंपड़ियों में ही प्यारा गोपाल बंसी बजाता मिलेगा। वहां जाओ उनकी मोहिनी छवि को निरखो।जेठ बैसाख की कड़ी धूप में मजदूर के पसीने की टपकती हुई बूंदों में उस प्यारे राम को देखो। दीन दुर्बलों की निराशा भरी आंखों में उस प्यारे कृष्ण को देखो…… मैं सोच में डूबा ही हुआ था कि प्रभु मेरे लिए पानी का गिलास ले आया। बोला चाय बनाऊं गुरूजी आपके लिए.. मैं आजकल चाय पीता नहीं लेकिन ये सोचकर कि प्रभु ये न सोच ले कि हम झोपड़पट्टी वालों की चाय कौन पीता है, मैंने कहा प्रभु मैं सौभाग्यशाली हूं जो मुझे तेरे हाथों से बनाई चाय पीने को मिलेगी….. मैंने कहा -काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी। वो मेरी तरफ देखता रहा, बेचारा क्या जाने रसखान की इन पंक्तियों का भावार्थ… …घर परिवार की बातें करते-करते मैंने कहा अब मैं चलता हूं प्रभु…सोशल मीडिया और कैमरे का जमाना है, तो मैने मोबाइल निकाला और कहा प्रभु तेरे साथ एक सेल्फी हो जाये…वह समझा नहीं मैंने कहा एक फोटो…प्रभु ने शर्माते हुए कहा मेरी कैसी फोटो मास्टर जी….बहुत गहरी बात कही प्रभु में कि प्रभु की कैसी तस्वीर वो तो कण कण में व्याप्त है, हर जीव में व्याप्त है, तुम में भी और मेरे में भी…निराकार, अदृश्य। उसने मेरी तरफ पीठ कर ली। कैमरे में सिर्फ चेहरा मेरा (सांवरे) आया, प्रभु का नहीं….
सांवरमल बरोड़(अध्यापक)
गांव – दूधवाखारा
संपर्क सूत्र – 9929423085

