प्रिय जीवनसंगिनी,

आज फिर शाम की चाय कप में रखे-रखे ठंडी हो गई। खिड़की के बाहर डूबते सूरज की लालिमा धीरे-धीरे अंधेरे में बदल रही थी और मेरे मन में भी उदासी की परतें उसी तरह गहरी होती जा रही थीं। मैंने कमरे के चारों ओर नजर दौड़ाई। सब कुछ अपनी जगह पर था, लेकिन फिर भी कुछ भी पहले जैसा नहीं था। मेज पर रखी आधी पढ़ी किताब, अलमारी के ऊपर रखा तुम्हारा पुराना पर्स, दीवार पर टंगी घड़ी की लगातार चलती टिक-टिक और वह कुर्सी जिस पर बैठकर तुम शाम को मुझसे दिनभर की बातें किया करती थीं—सब जैसे मुझे तुम्हारी याद दिलाने की साजिश कर रहे थे।

अजीब बात है, इंसान जब घर छोड़कर चला जाता है तो उसका शरीर भले दूर हो जाए, लेकिन उसकी उपस्थिति घर की दीवारों, वस्तुओं और हवाओं में बसी रहती है। तुम्हारे जाने के बाद मैंने यह बात पहली बार इतनी गहराई से महसूस की है। सुबह उठता हूँ तो लगता है जैसे दिन शुरू हो गया है, लेकिन जीवन नहीं। रसोई में जाता हूँ तो तुम्हारे हाथों की बनी रोटी की खुशबू याद आती है। कभी तुम्हारी चूड़ियों की खनक सुनाई देती थी, अब वहाँ एक ऐसा सन्नाटा है जो कानों में चुभता रहता है।

तुम जानती हो, हम उस समाज से आते हैं जिसे जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ाया जाता है। हमारे हिस्से में विरासत के नाम पर जमीन-जायदाद कम और संघर्ष अधिक आया है। बचपन से हमने सीखा कि दूसरों के बराबर खड़े होने के लिए हमें उनसे कई गुना अधिक मेहनत करनी पड़ती है। स्कूल में उपेक्षा, समाज में भेदभाव, नौकरी में संघर्ष और सम्मान के लिए लगातार लड़ाई—यह सब हमारी जिंदगी का हिस्सा रहा है। ऐसे में विवाह केवल दो लोगों का साथ नहीं होता, बल्कि दो संघर्षशील आत्माओं का गठबंधन होता है। मैंने सोचा था कि हम दोनों मिलकर दुनिया की हर कठिनाई का सामना करेंगे। लेकिन शायद मैं यह समझ नहीं पाया कि जीवन की सबसे कठिन लड़ाई बाहर के लोगों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार और गलतफहमियों से होती है।

मुझे आज भी वह दिन याद है जब हमारी शादी हुई थी। हमारे पास धन नहीं था, लेकिन उम्मीदें बहुत थीं। तुमने मेरे साथ सुख के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष में साथ निभाने के लिए जीवन का निर्णय लिया था। हमने मिलकर कितनी कठिन रातें काटीं। कभी जेब में पैसे कम होते थे, कभी बच्चों की फीस की चिंता होती थी, कभी घर का किराया और कभी बीमारी का खर्च। लेकिन उन दिनों भी तुम्हारे चेहरे पर एक विश्वास दिखाई देता था कि हम हारेंगे नहीं। जब समाज के कुछ लोग हमें कमतर समझते थे, तब तुम्हारी आंखों में मुझे अपना सम्मान दिखाई देता था। तुमने मुझे केवल पति का दर्जा नहीं दिया, बल्कि एक इंसान होने का आत्मविश्वास भी दिया।

फिर पता नहीं कब हमारे बीच छोटी-छोटी बातों ने बड़ी दूरियाँ पैदा कर दीं। जो बातें कभी हँसकर टाल दी जाती थीं, वे विवाद का कारण बनने लगीं। जो चुप्पियाँ कभी समझदारी की निशानी थीं, वे गलतफहमियों का कारण बन गईं। शायद हम दोनों ही अपनी-अपनी पीड़ा में इतने उलझ गए कि एक-दूसरे की पीड़ा को समझना भूल गए। मैं स्वीकार करता हूँ कि कई बार मेरी आवाज़ में कठोरता रही होगी। कई बार मैंने तुम्हारी बातों को गंभीरता से नहीं लिया होगा। जिम्मेदारियों के बोझ में मैं यह भूल गया कि जीवनसाथी को केवल सुविधाएँ नहीं, बल्कि सम्मान, संवाद और अपनापन भी चाहिए होता है।

जब तुम रूठकर मायके चली गईं, तब शुरू में मुझे लगा कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। लेकिन दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदल गए। घर का हर कोना मुझे तुम्हारी याद दिलाने लगा। मैं बाहर से सामान्य दिखाई देता हूँ, लोगों से मिलता हूँ, काम पर जाता हूँ, मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ, लेकिन भीतर एक खालीपन लगातार साथ चलता है। जैसे किसी किताब का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अचानक गायब हो गया हो। जैसे किसी गीत की सबसे मधुर पंक्ति अधूरी रह गई हो।

कोर्ट-कचहरी में चल रहा यह मामला मेरे मन को और भी बेचैन कर देता है। जब हमारे रिश्ते की बातें फाइलों और तारीखों में बदल जाती हैं, तब लगता है कि कहीं हम अपनी सबसे बड़ी पूंजी खो रहे हैं। कानून अधिकार तय कर सकता है, लेकिन प्यार नहीं लौटा सकता। अदालत फैसला सुना सकती है, लेकिन टूटे हुए विश्वास को जोड़ नहीं सकती। मुझे हर तारीख पर यह एहसास होता है कि हम दोनों किसी मुकदमे के पक्षकार नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी के पात्र हैं।

बहुजन और वंचित समाज के लोगों के लिए जीवन वैसे ही आसान नहीं होता। समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी हमें बराबरी की नजर से देखने में संकोच करता है। ऐसे में पति-पत्नी का रिश्ता केवल निजी रिश्ता नहीं रह जाता, बल्कि वह संघर्ष की साझेदारी बन जाता है। जब बाहर की दुनिया तिरस्कार देती है, तब घर वह जगह होना चाहिए जहाँ सम्मान मिले। जब दुनिया हतोत्साहित करे, तब जीवनसाथी वह व्यक्ति होना चाहिए जो टूटते हुए मन को संभाल ले। तुमने यह भूमिका वर्षों तक निभाई है और शायद मैं उसके महत्व को समय रहते समझ नहीं पाया।

कई रातों से मैं पुरानी यादों के सहारे जी रहा हूँ। मुझे याद है वह बरसात की शाम जब हमारे घर की छत टपक रही थी और हम दोनों बाल्टी रखते हुए भी हँस रहे थे। मुझे याद है वह दिन जब बच्चों की सफलता पर तुम्हारी आंखों में खुशी के आँसू थे। मुझे याद है कि जब मैं किसी अपमान या असफलता से टूट जाता था, तब तुम्हारे दो शब्द मुझे फिर से खड़ा कर देते थे। आज वही शब्द सुनने के लिए मेरा मन तरसता है।

मैं यह पत्र तुम्हें किसी आरोप या शिकायत के लिए नहीं लिख रहा। मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि जीवन बहुत छोटा है और रिश्ते उससे भी अधिक अनमोल। हम दोमंदिरों ने मिलकर जो संसार बनाया था, वह कुछ गलतफहमियों के कारण बिखर जाए, यह सोचकर ही मन कांप उठता है। यदि मेरी किसी बात ने तुम्हें दुख पहुँचाया है तो मैं उसके लिए हृदय से क्षमा चाहता हूँ। मैं यह नहीं कहता कि सारी गलती मेरी थी या तुम्हारी थी। मैं केवल इतना कहता हूँ कि हमारा रिश्ता किसी एक गलती से बड़ा है।

आज जब अंधेरा पूरी तरह घिर चुका है, मैं खिड़की के पास बैठा तुम्हें याद कर रहा हूँ। फोन हाथ में है। तुम्हारा नाम स्क्रीन पर चमकता है और मेरी उंगलियाँ बार-बार कुछ लिखकर मिटा देती हैं। बहुत कुछ कहना चाहता हूँ, लेकिन अंत में दिल केवल एक ही बात कहता है—

“मैंने जीवन की कठिनाइयों से लड़ना सीख लिया है। समाज के तानों को सहना सीख लिया है। अभावों में जीना सीख लिया है। लेकिन तुम्हारी कमी के साथ जीना अभी तक नहीं सीख पाया। यदि कहीं तुम्हारे मन में हमारे पुराने दिनों की कोई छोटी-सी लौ अभी भी जल रही हो, तो उसे बुझने मत देना। बहुत वक्त बीत गया है। अब हो सके तो लौट आओ। आओ, हम फिर से शुरुआत करें। इस बार जीतने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने के लिए। इस बार बहस करने के लिए नहीं, बल्कि साथ चलने के लिए। क्योंकि इस संघर्ष भरी दुनिया में मुझे आज भी तुम्हारे साथ की जरूरत है।”

तुम्हारी प्रतीक्षा में,

तुम्हारा अपना

हगामी लाल मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक, (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात।
98292 30966

“संघर्ष की राह में बिछड़ा साथ: एक बहुजन वंचित पति का अपनी पत्नी के नाम खुला पत्र”प्रिय जीवनसंगिनी,आज फिर शाम की चाय कप में रखे-रखे ठंडी हो गई। खिड़की के बाहर डूबते सूरज की लालिमा धीरे-धीरे अंधेरे में बदल रही थी और मेरे मन में भी उदासी की परतें उसी तरह गहरी होती जा रही थीं। मैंने कमरे के चारों ओर नजर दौड़ाई। सब कुछ अपनी जगह पर था, लेकिन फिर भी कुछ भी पहले जैसा नहीं था। मेज पर रखी आधी पढ़ी किताब, अलमारी के ऊपर रखा तुम्हारा पुराना पर्स, दीवार पर टंगी घड़ी की लगातार चलती टिक-टिक और वह कुर्सी जिस पर बैठकर तुम शाम को मुझसे दिनभर की बातें किया करती थीं—सब जैसे मुझे तुम्हारी याद दिलाने की साजिश कर रहे थे।अजीब बात है, इंसान जब घर छोड़कर चला जाता है तो उसका शरीर भले दूर हो जाए, लेकिन उसकी उपस्थिति घर की दीवारों, वस्तुओं और हवाओं में बसी रहती है। तुम्हारे जाने के बाद मैंने यह बात पहली बार इतनी गहराई से महसूस की है। सुबह उठता हूँ तो लगता है जैसे दिन शुरू हो गया है, लेकिन जीवन नहीं। रसोई में जाता हूँ तो तुम्हारे हाथों की बनी रोटी की खुशबू याद आती है। कभी तुम्हारी चूड़ियों की खनक सुनाई देती थी, अब वहाँ एक ऐसा सन्नाटा है जो कानों में चुभता रहता है।तुम जानती हो, हम उस समाज से आते हैं जिसे जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ाया जाता है। हमारे हिस्से में विरासत के नाम पर जमीन-जायदाद कम और संघर्ष अधिक आया है। बचपन से हमने सीखा कि दूसरों के बराबर खड़े होने के लिए हमें उनसे कई गुना अधिक मेहनत करनी पड़ती है। स्कूल में उपेक्षा, समाज में भेदभाव, नौकरी में संघर्ष और सम्मान के लिए लगातार लड़ाई—यह सब हमारी जिंदगी का हिस्सा रहा है। ऐसे में विवाह केवल दो लोगों का साथ नहीं होता, बल्कि दो संघर्षशील आत्माओं का गठबंधन होता है। मैंने सोचा था कि हम दोनों मिलकर दुनिया की हर कठिनाई का सामना करेंगे। लेकिन शायद मैं यह समझ नहीं पाया कि जीवन की सबसे कठिन लड़ाई बाहर के लोगों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार और गलतफहमियों से होती है।मुझे आज भी वह दिन याद है जब हमारी शादी हुई थी। हमारे पास धन नहीं था, लेकिन उम्मीदें बहुत थीं। तुमने मेरे साथ सुख के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष में साथ निभाने के लिए जीवन का निर्णय लिया था। हमने मिलकर कितनी कठिन रातें काटीं। कभी जेब में पैसे कम होते थे, कभी बच्चों की फीस की चिंता होती थी, कभी घर का किराया और कभी बीमारी का खर्च। लेकिन उन दिनों भी तुम्हारे चेहरे पर एक विश्वास दिखाई देता था कि हम हारेंगे नहीं। जब समाज के कुछ लोग हमें कमतर समझते थे, तब तुम्हारी आंखों में मुझे अपना सम्मान दिखाई देता था। तुमने मुझे केवल पति का दर्जा नहीं दिया, बल्कि एक इंसान होने का आत्मविश्वास भी दिया।फिर पता नहीं कब हमारे बीच छोटी-छोटी बातों ने बड़ी दूरियाँ पैदा कर दीं। जो बातें कभी हँसकर टाल दी जाती थीं, वे विवाद का कारण बनने लगीं। जो चुप्पियाँ कभी समझदारी की निशानी थीं, वे गलतफहमियों का कारण बन गईं। शायद हम दोनों ही अपनी-अपनी पीड़ा में इतने उलझ गए कि एक-दूसरे की पीड़ा को समझना भूल गए। मैं स्वीकार करता हूँ कि कई बार मेरी आवाज़ में कठोरता रही होगी। कई बार मैंने तुम्हारी बातों को गंभीरता से नहीं लिया होगा। जिम्मेदारियों के बोझ में मैं यह भूल गया कि जीवनसाथी को केवल सुविधाएँ नहीं, बल्कि सम्मान, संवाद और अपनापन भी चाहिए होता है।जब तुम रूठकर मायके चली गईं, तब शुरू में मुझे लगा कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। लेकिन दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदल गए। घर का हर कोना मुझे तुम्हारी याद दिलाने लगा। मैं बाहर से सामान्य दिखाई देता हूँ, लोगों से मिलता हूँ, काम पर जाता हूँ, मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ, लेकिन भीतर एक खालीपन लगातार साथ चलता है। जैसे किसी किताब का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अचानक गायब हो गया हो। जैसे किसी गीत की सबसे मधुर पंक्ति अधूरी रह गई हो।कोर्ट-कचहरी में चल रहा यह मामला मेरे मन को और भी बेचैन कर देता है। जब हमारे रिश्ते की बातें फाइलों और तारीखों में बदल जाती हैं, तब लगता है कि कहीं हम अपनी सबसे बड़ी पूंजी खो रहे हैं। कानून अधिकार तय कर सकता है, लेकिन प्यार नहीं लौटा सकता। अदालत फैसला सुना सकती है, लेकिन टूटे हुए विश्वास को जोड़ नहीं सकती। मुझे हर तारीख पर यह एहसास होता है कि हम दोनों किसी मुकदमे के पक्षकार नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी के पात्र हैं।बहुजन और वंचित समाज के लोगों के लिए जीवन वैसे ही आसान नहीं होता। समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी हमें बराबरी की नजर से देखने में संकोच करता है। ऐसे में पति-पत्नी का रिश्ता केवल निजी रिश्ता नहीं रह जाता, बल्कि वह संघर्ष की साझेदारी बन जाता है। जब बाहर की दुनिया तिरस्कार देती है, तब घर वह जगह होना चाहिए जहाँ सम्मान मिले। जब दुनिया हतोत्साहित करे, तब जीवनसाथी वह व्यक्ति होना चाहिए जो टूटते हुए मन को संभाल ले। तुमने यह भूमिका वर्षों तक निभाई है और शायद मैं उसके महत्व को समय रहते समझ नहीं पाया।कई रातों से मैं पुरानी यादों के सहारे जी रहा हूँ। मुझे याद है वह बरसात की शाम जब हमारे घर की छत टपक रही थी और हम दोनों बाल्टी रखते हुए भी हँस रहे थे। मुझे याद है वह दिन जब बच्चों की सफलता पर तुम्हारी आंखों में खुशी के आँसू थे। मुझे याद है कि जब मैं किसी अपमान या असफलता से टूट जाता था, तब तुम्हारे दो शब्द मुझे फिर से खड़ा कर देते थे। आज वही शब्द सुनने के लिए मेरा मन तरसता है।मैं यह पत्र तुम्हें किसी आरोप या शिकायत के लिए नहीं लिख रहा। मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि जीवन बहुत छोटा है और रिश्ते उससे भी अधिक अनमोल। हम दोमंदिरों ने मिलकर जो संसार बनाया था, वह कुछ गलतफहमियों के कारण बिखर जाए, यह सोचकर ही मन कांप उठता है। यदि मेरी किसी बात ने तुम्हें दुख पहुँचाया है तो मैं उसके लिए हृदय से क्षमा चाहता हूँ। मैं यह नहीं कहता कि सारी गलती मेरी थी या तुम्हारी थी। मैं केवल इतना कहता हूँ कि हमारा रिश्ता किसी एक गलती से बड़ा है।आज जब अंधेरा पूरी तरह घिर चुका है, मैं खिड़की के पास बैठा तुम्हें याद कर रहा हूँ। फोन हाथ में है। तुम्हारा नाम स्क्रीन पर चमकता है और मेरी उंगलियाँ बार-बार कुछ लिखकर मिटा देती हैं। बहुत कुछ कहना चाहता हूँ, लेकिन अंत में दिल केवल एक ही बात कहता है—”मैंने जीवन की कठिनाइयों से लड़ना सीख लिया है। समाज के तानों को सहना सीख लिया है। अभावों में जीना सीख लिया है। लेकिन तुम्हारी कमी के साथ जीना अभी तक नहीं सीख पाया। यदि कहीं तुम्हारे मन में हमारे पुराने दिनों की कोई छोटी-सी लौ अभी भी जल रही हो, तो उसे बुझने मत देना। बहुत वक्त बीत गया है। अब हो सके तो लौट आओ। आओ, हम फिर से शुरुआत करें। इस बार जीतने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने के लिए। इस बार बहस करने के लिए नहीं, बल्कि साथ चलने के लिए। क्योंकि इस संघर्ष भरी दुनिया में मुझे आज भी तुम्हारे साथ की जरूरत है।”तुम्हारी प्रतीक्षा में,तुम्हारा अपनाहगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक, (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात। 98292 30966

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *