✍️ ✍️के आर पारीक की कलम से ✍️✍️
आजकल सोशल मीडिया में एक ट्रैंड चल पड़ा है, जिसमें छोटे भाई की पत्नी अपने पिता तुल्य ज्येष्ठ जी से पानी का मटका अपने सिर पर रखवाती है तथा नीचे उतरवाती है । उसके बाद उस मटके में से लौटा भरकर पानी पिलाने के लिए थमाती है, फिर पॉंवों को स्पर्श करके आशीर्वाद लेती है । इस प्रक्रिया को अपने मोबाइल में रील के रूप में बनवाती हैं और दुनिया को दिखाने के लिए शेयर कर देती है कि हमने हमारे ज्येष्ठ जी को ठंडा जल पिलाकर दया मॉंग ली ।
क्या एक हिन्दी मास के बढ़ने से बेचारे इंसान रूपी ज्येष्ठ की किरकिरी नहीं हो रही है?
क्या इस तरह का दिखावा बनकर रह गये हैं, – हमारे संस्कार और रिश्ते ?
मित्रों, चार साल के अंतराल पर एक हिन्दी महीना बढ़ाया जाता है, ताकि प्रतिवर्ष के तीन सौ सवा पैंसठ दिनों का गणित न बिगड़े ।
अमूमन अधि-वर्ष के दौरान वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ और श्रावण महीनों में से किसी एक माह को दोहराया जाता है । इस वर्ष संवत 2083 में ज्येष्ठ माह को दोहराया जा रहा है, तो लोग इंसानी ज्येष्ठ को लेकर नौटंकी पर उत्तर आएं हैं । उनका मानना है कि बेचारे ज्येष्ठ पर आफ़त आ पड़ी है, रहम दिखाई जाए, उनकी सेवा की जाए, ठण्डे मटके का जल पिलाया जाए ताकि अधिक गर्मी न दिखाए ।
इस सारी कहानी को सोशल मीडिया पर डालकर व्यूज तथा फोलोवर बटोरे जाने का ढोंग सरेआम किया जा रहा है। देखते ही देखते सभी ने इसे सिर-ऑंखों पर ले लिया, ऐसा लगता है कि मानों सारे कुॅंओं में भांग घोल रखी हो । बड़े-बूढ़े, छोटे-नाटे सब जबरदस्ती पर उतर आए हैं, बेचारे ज्येष्ठ जी भी शर्मींदा है कि ये क्या हो रहा है ? जो कभी उल्टे मुॅंह चला करती थी, वह आज किस स्वार्थ में जल पिलाने की नौटंकी कर रही है ? जिसका रहस्य उसकी समझ से परे हैं ।
आमतौर पर देखा गया है कि जब कोई चीज़ बाज़ार में कम बिक रही हो तो लोग ऐसा ट्रेंड इज़ाद करते हैं या फिर वफादार पशु घोड़ी असहज रूप से अपने बच्चे को जन्म देती है तो उसका मालिक कोई नया ट्रेंड इज़ाद करवाता है । जिसका लोग अनुसरण करके अंध परम्पराओं की कड़ी में जोड़ देते हैं । जिसे आम लोग परिपाटी के रूप में अपना लेते हैं ।
मित्रों, किसी महीने के बढ़ने से इंसान के व्यावहारिक रिश्तों से कोई संबंध नहीं है । यह केवल प्राकृतिक संतुलन बिठाने के उद्देश्य से किया गया । मानव जीवन से उसका न तो कोई संबंध है और न ही कभी किसी पर बुरा प्रभाव दिखता है । अतः अपने दिमाग की बत्ती जलाओ और अंध-विश्वास को भगाओ।
आज के इस शिक्षित समाज में आप इस तरह के तरीके अपनाकर अपने आपको मूर्ख बनाने से बाज आओ । अब वो ज़माना नहीं रहा, जब लोग भेड़-चाल चला करते थे । हॉं, यह जरूर कीजिए कि अपने मन-मुटाव भुलाकर सभी भाइयों के साथ प्रेम बनाकर रखिए ।

लेखक
कानाराम पारीक “कल्याण” सांचौर
