अप्प दीपो भव-अपने दीपक स्वयं बनो।

जब पूरा विश्व अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और मानसिक दासता के अंधकार में डूबा था, तब भारत की धरती पर तथागत बुद्ध ने तर्क, विज्ञान और मानवीय गरिमा का जो सूर्य उगाया, उसकी किरणों से केवल पूर्व ही नहीं, बल्कि पश्चिम का यूनान भी आलोकित हुआ था।

मानव इतिहास में सत्य और न्याय की खोज कोई बिखरी हुई घटना नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर बहती हुई वैचारिक धारा है। आज बहुजन समाज को अपनी ही सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के उस वैश्विक शिखर को पहचानने की जरूरत है, जिसने पूरी दुनिया के चिंतन को बदला।

जब हम वैश्विक दर्शन के कालक्रम को देखते हैं, तो पूर्व के सूर्य तथागत बुद्ध (563 ई.पू. – 483 ई.पू.) इस धारा के शीर्ष पर सबसे प्रदीप्त आदि-स्रोत के रूप में दिखाई देते हैं।

बुद्ध ने जिस समय ज्ञान, तर्क और मध्यमा प्रतिपदा (संतुलन) के सूत्रों की खोज की, उसके बाद ही पश्चिम में सुकरात, प्लेटो और अरस्तू की महान यूनानी त्रयी का उदय हुआ।

ऐसा प्रतीत होता है कि तथागत बुद्ध ने जिस ‘सत्य और तर्क के महावृक्ष’ को रोपा था, पश्चिम की इन तीनों विभूतियों ने उसी वृक्ष की अलग-अलग शाखाओं को पकड़कर अपने दर्शन का महल खड़ा किया।

आइए गहराई से समझते हैं कि कैसे बुद्ध के महान सूत्रों का अनजाने में या वैचारिक प्रवाह के रूप में इन तीनों पश्चिमी विचारकों ने अनुसरण किया

  1. बुद्ध का ‘विवेक और प्रश्न’ का सूत्र सुकरात की प्रश्नावती का आधार

तथागत बुद्ध ने समाज को सबसे पहला क्रांतिकारी सूत्र दिया था—’कालाम सुत्त’ में।
उन्होंने कहा था कि किसी भी बात को केवल इसलिए मत मानो क्योंकि वह किसी ग्रंथ में लिखी है, या किसी परंपरा से आ रही है, बल्कि उसे अपने विवेक की कसौटी पर जांचो-परखो।

  • पश्चिमी अनुसरण
    बुद्ध के इसी तार्किक सूत्र को सुकरात (469 ई.पू. – 399 ई.पू.) ने पश्चिम में अपनी ‘प्रश्नोत्तर पद्धति’ के रूप में अपनाया।

वैचारिक साम्य
सुकरात ने एथेंस के लोगों को वही सिखाया जो बुद्ध भारत में स्थापित कर चुके थे—कि सत्य को बाहर के पाखंडों में मत खोजो, अपने भीतर विवेक को जगाओ और हर स्थापित रूढ़िवादी मान्यता पर सवाल उठाओ।

बुद्ध का ‘विभज्जवाद’
(विश्लेषण का सिद्धांत) ही पश्चिम में सुकरात की द्वंद्वात्मक शैली बनकर उभरा, जिसने यूरोपीय पुनर्जागरण की नींव रखी।

2 बुद्ध का ‘अनित्यता और निर्वाण’ का सूत्र–प्लेटो की अमूर्त दुनिया

बुद्ध का दूसरा महान वैज्ञानिक सूत्र था, अनिच्चा/क्षणभंगुरता।

बुद्ध ने घोषणा की थी कि यह दृश्यमान भौतिक संसार निरंतर परिवर्तनशील है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है। इस अनित्यता और नश्वरता से परे जो परम सत्य है, वही ‘निर्वाण’ है।

पश्चिमी अनुसरण प्लेटो
(427 ई.पू. – 347 ई.पू.)
ने बुद्ध के इसी सूत्र को अपनी ‘प्रत्ययों की दुनिया में ढाला।

वैचारिक साम्य
प्लेटो ने भी माना कि यह भौतिक संसार केवल एक ‘परछाईं और नश्वर है, जो बुद्ध के ‘संसार अनित्य है’ के विचार से पूरी तरह मेल खाता है।

बुद्ध जिसे ‘निर्वाण’ या परम सत्य कहते हैं, प्लेटो उसे ही आदर्श विचार कहकर पुकारते हैं।

3 बुद्ध का ‘प्रतीत्यसमुत्पाद और मध्यमा प्रतिपदा
अरस्तू का विज्ञान
तथागत बुद्ध के दर्शन के दो सबसे व्यावहारिक और वैज्ञानिक स्तंभ हैं—’प्रतीत्यसमुत्पाद’
(कार्य-कारण का सिद्धांत)
यानी ‘ऐसा होने पर वैसा होता है’—हर घटना के पीछे कोई न कोई ठोस कारण होता है; और ‘मध्यमा प्रतिपदा’ यानी जीवन में किसी भी प्रकार की अति का त्याग और संतुलन का मार्ग।

कार्य-कारण
बुद्ध का सूत्र था कि बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। अरस्तू
(384 ई.पू. – 322 ई.पू.)
ने इसी को अपना प्रसिद्ध ‘कॉज़ेशन थ्योरी’ कहा, जिससे आगे चलकर आधुनिक विज्ञान का जन्म हुआ।

मध्यम मार्ग
बुद्ध ने वीणा के तारों का कालजयी उदाहरण देकर जो ‘मध्यमा प्रतिपदा’ सिखााई थी कि तारों को न इतना ढीला छोड़ो कि सुर न निकले और न इतना खींचो कि तार टूट जाएं, अरस्तू ने ठीक उसी सूत्र को अपने नीतिशास्त्र में ‘गोल्डन मीन’ का नाम दिया।

उन्होंने माना कि अति और कमी के बीच का संतुलन ही सबसे बड़ा सद्गुण है।

वैचारिक अनुगामी सार
बुद्ध के एक पूर्ण और संप्रभु दर्शन को यूनान के इन तीनों मनीषियों ने क्रमबद्ध तरीके से किस प्रकार आगे बढ़ाया

निष्कर्ष
आदि-स्रोत के रूप में बुद्ध
इस ऐतिहासिक और वैचारिक विश्लेषण से यह पूरी तरह स्पष्ट होता है कि वैश्विक दार्शनिक चेतना की इस महान यात्रा में भगवान बुद्ध ‘आदि-स्रोत’ हैं।

बुद्ध ने ज्ञान, तर्क, यथार्थ, करुणा और संतुलन को एक ही संपूर्ण जीवन-दर्शन (धम्म) में समाहित कर दिया था।

पश्चिम में जब दर्शन का विकास हुआ, तो वह टुकड़ों में हुआ

सुकरात केवल आचरण और सवाल तक सीमित रहे, प्लेटो कल्पना के आकाश में उड़ गए, और अरस्तू यथार्थ की जमीन पर आए।

लेकिन इन तीनों ने जिन अलग-अलग रास्तों को अपनाया, वे सभी रास्ते अंततः उन्हीं वैश्विक सूत्रों की ओर जाते हैं जिन्हें तथागत बुद्ध सदियों पहले खोजकर एक सुगठित ‘वैचारिक राजमार्ग’ बना चुके थे।

यूनानी दर्शन की यह त्रिवेणी वास्तव में पूर्व के बुद्ध-विचार रूपी महासागर से ही निकले हुए ज्ञान के तीन प्रपात (Waterfalls) हैं, जिन्होंने अपने-अपने ढंग से दुनिया को आलोकित किया।

बहुजन समाज के लिए संदेश: जाग्रति ही प्रगति का मार्ग है
आज हमारे बहुजन समाज को मानसिक और वैचारिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए इतिहास के इस महान गौरव को छिपाया गया।

हमें पाखंड, अंधविश्वास और भाग्यवादिता के गड्ढे में धकेला गया, जबकि हमारे पुरखा तथागत बुद्ध का दर्शन आज भी आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्र और मानवाधिकारों का वैश्विक आधार है।

बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने हमें बुद्ध की ओर लौटने का मार्ग इसीलिए दिखाया था, क्योंकि वे जानते थे कि जब तक समाज में वैज्ञानिक चेतना (Scientific Temper) और तार्किक सोच पैदा नहीं होगी, तब तक सामाजिक और आर्थिक समानता का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

आइए, हम अपने बच्चों को काल्पनिक कथाओं के बजाय बुद्ध के इस तार्किक और वैज्ञानिक इतिहास से परिचित कराएं।

अंधविश्वास को नकारें, शिक्षा और तर्क को अपना हथियार बनाएं और इस देश को पुनः समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के ‘प्रबुद्ध भारत’ के रूप में स्थापित करने का संकल्प लें।

अपने भीतर के विवेक को जगाएं और गर्व से कहें कि हम उस महान वैचारिक विरासत के वारिस हैं जिसने पूरी दुनिया को सोचना सिखाया।

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक एवं विचारक, ब्यावर, राजस्थान

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *