भूमिका

वर्ष 2014 में देश की जनता ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़े राजनीतिक परिवर्तन का समर्थन किया था। लोगों को उम्मीद थी कि नई सरकार प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करेगी। “न खाऊँगा, न खाने दूँगा” जैसे नारों ने आम नागरिक, किसान, मजदूर और युवाओं के भीतर नई आशा पैदा की। जनता चाहती थी कि सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी, दलाली और राजनीतिक संरक्षण की सियासत (राजनीति) समाप्त हो तथा प्रशासन जनसेवा का माध्यम बने।

किन्तु वर्षों बाद भी आम आदमी की परेशानियाँ कम नहीं हुईं। सरकारी कार्यालयों में फाइलें अटकना, अधिकारियों का अनुपस्थित रहना और कर्मचारियों द्वारा अवैध धन माँगना सामान्य स्थिति बन चुकी है। लोकतंत्र के चारों स्तंभों पर जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। व्यवस्था में बढ़ता फ़साद (अव्यवस्था) आम नागरिक को मानसिक पीड़ा दे रहा है। डिजिटल सिस्टम (प्रणाली) और प्रशासनिक मैनेजमेंट (प्रबंधन) के बड़े दावे ज़मीन पर प्रभावी दिखाई नहीं देते, जिससे जनता के भीतर निराशा बढ़ती जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत की जनभावना अपने आप को ठगा हुआ महसूस करने लगा है!

  1. भ्रष्टाचार का बदलता स्वरूप : सड़क से सिस्टम तक

आज भ्रष्टाचार केवल नकद रिश्वत लेने तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। सरकारी फाइलों को जानबूझकर रोकना, ऑनलाइन सेवाओं में तकनीकी बाधाएँ पैदा करना, दलालों को संरक्षण देना तथा योजनाओं में कमीशनखोरी जैसी प्रवृत्तियाँ आम नागरिक को लगातार परेशान कर रही हैं। भर्ती, ठेके और तबादलों में बढ़ती अपारदर्शिता ने व्यवस्था की हक़ीक़त (सच्चाई) जनता के सामने उजागर कर दी है।सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के वादे के साथ सत्ता में आई सरकार भी उसी नौकरशाही ढाँचे पर निर्भर दिखाई देती है, जिसे बदलने की बात कही गई थी। जनता के मन में अब यह गुमान (विश्वास) कमजोर पड़ने लगा है कि केवल नारे और भाषण व्यवस्था को बदल सकते हैं। आधुनिक नेटवर्क (संपर्क तंत्र) और डिजिटल पोर्टल (ऑनलाइन प्रवेश मंच) बनने के बावजूद आम आदमी को राहत नहीं मिल पा रही है। इससे लोकतंत्र और प्रशासन के प्रति लोगों की निराशा लगातार बढ़ती जा रही है। देश की अधिकतर जनता में इस सरकार के प्रति विश्वास खत्म होना देश के लिए शुभ नहीं माना जा सकता है।

  1. सरकारी कार्यालयों की अनुपस्थित संस्कृति

देश के अनेक सरकारी कार्यालयों में “साहब मीटिंग में हैं”, “साहब दौरे पर हैं” या “आज फाइल नहीं मिलेगी” जैसे वाक्य सामान्य प्रशासनिक व्यवहार बन चुके हैं। यह अनुपस्थिति केवल कुर्सी खाली रहने तक सीमित नहीं, बल्कि जनता के प्रति नैतिक जिम्मेदारी के अभाव को भी दर्शाती है। जब उच्च अधिकारी आम नागरिक की समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहते, तब नीचे का पूरा तंत्र मनमानी करने लगता है।

आम आदमी जन्म प्रमाण पत्र, भूमि रिकॉर्ड, पेंशन, बिजली कनेक्शन, पुलिस सत्यापन और सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाता है, किन्तु उसे राहत के स्थान पर रुसवाई (अपमान) और बेबसी (लाचारी) का सामना करना पड़ता है। कई स्थानों पर दलाल और रिश्वतखोर कर्मचारी जनता की मजबूरी का लाभ उठाते हैं। आधुनिक ऑफिस (कार्यालय) व्यवस्था और डिजिटल सर्विस (सेवा) के दावों के बावजूद आम नागरिक को समय पर न्याय नहीं मिल पाता। यह स्थिति लोकतंत्र को जनसेवा के बजाय शोषणकारी तंत्र में बदलती दिखाई देती है। सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता पता नहीं मेरे वतन भारत को कहां पहुंचा कर दम लेगी सोचने विषय है?

  1. पाँच दिवसीय कार्यप्रणाली और जनता की कठिनाई

सरकारी कार्यालयों में पाँच दिन का कार्यसप्ताह महानगरों में बैठे उच्च अधिकारियों के लिए सुविधाजनक हो सकता है, किन्तु ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के नागरिकों के लिए यह गंभीर समस्या बनता जा रहा है। एक किसान या मजदूर यदि दूर-दराज़ से तहसील, बैंक या किसी सरकारी दफ्तर तक पहुँचता है और वहाँ अधिकारी अनुपस्थित मिलते हैं, तो उसका पूरा दिन, मजदूरी और यात्रा खर्च व्यर्थ हो जाता है। यह स्थिति आम नागरिक के भीतर व्यवस्था के प्रति नाराज़गी (असंतोष) और मायूसी (निराशा) को बढ़ा रही है।

जहाँ असंगठित क्षेत्र का श्रमिक सप्ताह के सातों दिन कठिन परिश्रम करता है, वहीं सरकारी तंत्र में लगातार बढ़ती छुट्टियाँ जनता के मन में असमानता की भावना पैदा करती हैं। इसका सीधा लाभ बिचौलियों और रिश्वतखोर तत्वों को मिलता है, जो “जल्दी काम करवाने” के नाम पर अवैध धन वसूलते हैं। आधुनिक कैंपस (परिसर) आधारित प्रशासनिक ढाँचे और डिजिटल प्रोसेस (प्रक्रिया) के बावजूद गरीब नागरिक का भय और परेशानी कम नहीं हो रही है।
जनसाधारण के चेहरे पर निराशा के भाव पढ़ने वाली सरकार लगता है उनके भाग्य में नहीं लिखी हुई है।

  1. लोकतंत्र के चार स्तंभों पर गिरता विश्वास

लोकतंत्र की मजबूती उसके चार प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—पर जनता के विश्वास से निर्धारित होती है। किन्तु जब राजनीतिक दल सत्ता में आने से पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़े वादे करें और बाद में वही प्रवृत्तियाँ जारी रहें, तब जनता राजनीति को सेवा नहीं, बल्कि सत्ता संचालन का माध्यम समझने लगती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

कार्यपालिका में बढ़ती जवाबदेहीहीनता और जनता से दूर होती नौकरशाही ने प्रशासनिक व्यवस्था को कठोर बना दिया है। न्यायपालिका में मामलों की लंबी प्रतीक्षा और महंगी कानूनी प्रक्रिया गरीब व्यक्ति के भीतर इंसाफ़ (न्याय) के प्रति शिकायत (असंतोष) की भावना उत्पन्न करती है। दूसरी ओर जब मीडिया का एक वर्ग सत्ता या कॉर्पोरेट प्रभाव में दिखाई देता है, तब सूचना तंत्र की निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठने लगते हैं। आधुनिक मीडिया (जनसंचार तंत्र) और राजनीतिक कैंपेन (प्रचार अभियान) के बढ़ते प्रभाव के बावजूद जनता का भरोसा लगातार कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान इस मुल्क को बनाना रिपब्लिक होने के का कागार पर देख रही है!

  1. गरीब जनता और कल्याणकारी योजनाओं की विडंबना

सरकार द्वारा करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराना यह भी दर्शाता है कि देश की बड़ी आबादी आज भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन सकी है। यदि विकास के दावे वास्तव में मजबूत होते, तो नागरिकों को स्थायी रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ सहज रूप से प्राप्त होतीं। केवल मुफ्त अनाज से कुछ समय के लिए भूख शांत की जा सकती है, किन्तु इससे गरीबी और सामाजिक असमानता का स्थायी समाधान संभव नहीं होता।

गरीब नागरिक की सबसे बड़ी आवश्यकता सम्मानजनक रोजगार, पारदर्शी प्रशासन, भ्रष्टाचार मुक्त सेवाएँ और सस्ती न्याय व्यवस्था है। आज भी अनेक परिवार रोज़गार और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे उनके भीतर तकलीफ़ (पीड़ा) और उम्मीद (आशा) दोनों साथ-साथ जीवित हैं। सरकारी स्कीम (योजना) और आर्थिक बजट (आय-व्यय योजना) के बड़े दावों के बावजूद आम जनता के जीवन में अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद सामाजिक असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन मेरे देश की महान गरीब जनता सरकार द्वारा सुविधा को एहसान मानकर इस सरकार को लगातार जीत कर सत्ता का सुख भोगने की सुविधा देने को अभिशप्त है।

  1. भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए आवश्यक नीतिगत परिवर्तन

भ्रष्टाचार केवल कानून बनाने से समाप्त नहीं होगा, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता को व्यवहार में लागू करना आवश्यक है। सबसे पहले सरकारी अधिकारियों की डिजिटल उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए, जिससे जनता ऑनलाइन देख सके कि अधिकारी कार्यालय में उपलब्ध हैं या नहीं। निर्धारित समय में कार्य पूरा न होने पर संबंधित अधिकारी पर आर्थिक दंड और नागरिक को स्वतः मुआवजा देने की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। सरकारी परिसरों से दलालों और निजी एजेंटों को हटाने के लिए कठोर कानूनी अभियान चलाना आवश्यक है।

लोकपाल, सतर्कता आयोग और जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त कर स्वतंत्र अधिकार दिए जाएँ। न्यायपालिका में लंबित मामलों को कम करने के लिए निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाए तथा भ्रष्टाचार मामलों हेतु विशेष अदालतें बनाई जाएँ। राजनीतिक चंदों और चुनावी फंडिंग में पूर्ण पारदर्शिता लाना भी आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत स्तर तक नागरिक सेवा केंद्र स्थापित किए जाएँ ताकि गरीब जनता को शहरों के चक्कर न लगाने पड़ें। शिक्षा संस्थानों में नैतिकता, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और सामाजिक ईमानदारी (सच्चरित्रता) को बढ़ावा देना होगा। प्रशासनिक मॉनिटरिंग (निगरानी व्यवस्था) और जनसुनवाई प्रणाली मजबूत किए बिना भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। कोई भी सार्थक प्रयास नहीं करके पुरानी सरकारों को दोष देकर अपना कर्तव्य मान लेती है।

  1. क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?

भ्रष्टाचार केवल सरकार या प्रशासन की विफलता नहीं है, बल्कि यह सामाजिक स्वीकृति और नैतिक गिरावट का भी परिणाम बन चुका है। जब समाज स्वयं “काम जल्दी कराने” या नियमों से बचने के लिए रिश्वत को सामान्य व्यवहार मानने लगता है, तब भ्रष्टाचार धीरे-धीरे एक स्थायी संस्कृति का रूप ले लेता है। अनेक लोग सुविधा और निजी लाभ के लिए गलत तरीकों को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे व्यवस्था में फैली बेईमानी (धोखाधड़ी) और लालच (अत्यधिक लोभ) को अप्रत्यक्ष समर्थन मिलने लगता है।

इस स्थिति को बदलने के लिए सुधार केवल सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी आवश्यक है। प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता, कठोर जवाबदेही और निष्पक्ष कार्रवाई लागू करनी होगी। साथ ही समाज में नैतिक जागरूकता, ईमानदारी और नागरिक कर्तव्यों के प्रति सम्मान विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। आधुनिक कल्चर (संस्कृति) और सामाजिक स्टैंडर्ड (मानदंड) यदि नैतिक मूल्यों से दूर होते गए, तो भ्रष्टाचार समाप्त करना कठिन हो जाएगा। इसलिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर जवाबदेह और न्यायपूर्ण व्यवस्था निर्माण की दिशा में कार्य करना होगा।
पूरे विश्व में आजकल सामाजिक मूल्य बदल गए हैं उसके प्रभाव से भारतीय जनता भी अछूती नहीं रही है।

समापन

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने या सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता के विश्वास, न्याय और जवाबदेही को निरंतर बनाए रखने की प्रक्रिया है। यदि आम नागरिक अपने ही देश की सरकारी व्यवस्था से भयभीत, अपमानित और असहाय महसूस करने लगे, तो यह किसी भी राष्ट्र के लिए गंभीर चेतावनी बन जाती है। आज देश को केवल भ्रष्टाचार विरोधी नारों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, संवेदनशील शासन और कठोर जवाबदेही की आवश्यकता है। जनता अब भाषणों से अधिक वास्तविक परिणाम चाहती है।

जब तक सरकारी कार्यालय वास्तव में जनसेवा केंद्र नहीं बनते और अधिकारी स्वयं को जनता का ख़ादिम (सेवक) नहीं मानते, तब तक लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती रहेगी। संस्थागत भ्रष्टाचार पर समय रहते निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता के भीतर बढ़ती नाइंसाफी (अन्याय की भावना) सामाजिक असंतोष को और गहरा कर देगी। आधुनिक डेमोक्रेसी (लोकतांत्रिक व्यवस्था) और प्रशासनिक रिफॉर्म (सुधार प्रक्रिया) तभी सफल माने जाएँगे, जब आम नागरिक बिना भय और रिश्वत के सम्मानपूर्वक अपने अधिकार प्राप्त कर सके। जब भारत की अशिक्षित और भोली जनता जब धर्म की राजनीति में उलझकर सरोबार हो गई है तो लगता है वह अपने हक और कर्तव्य भी भी भूल गई है। तो फिर इस व्यवस्था को झेलने ने को अभिशप्त हो गई है।

शेर
व्यवस्था के महलों में सच की आवाज़ दबा दी गई,
रिश्वत की धूल ने जनता की उम्मीदें बुझा दी गई।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक, निवासी अजमेर,हाल मुकाम जामनगर गुजरात।
98292 30966

स्रोत एवं संदर्भ:

सौम्या मिश्रा की थ्रेड्स पर पोस्ट से प्रेरित एवं भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था, जनअनुभव, लोकतांत्रिक जवाबदेही, संस्थागत भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और नागरिक पीड़ा पर आधारित समकालीन विश्लेषण।

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