
दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय, समता और आत्म-सम्मान की अलख जगाने वाले युगपुरुष पंडित अयोथी थास जी का जन्म 20 मई 1845 को मद्रास (अब चेन्नई) के ‘थाउजेंड लाइट्स’ नामक क्षेत्र में एक अत्यंत ज्ञानी परंतु तत्कालीन दमनकारी व्यवस्था द्वारा शोषित पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था।
उनके माता-पिता ने उन्हें ‘काथावरयान’ नाम दिया, जो आगे चलकर सामाजिक क्रांति का पर्याय बना।
उनके दादा, बटलर कंदप्पन, नीलगिरी में जॉर्ज हैरिंगटन के यहाँ कार्यरत थे। कंदप्पन जी एक बेहद जागरूक, स्वाभिमानी और दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने तमिल के प्राचीन और अमूल्य ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ की ताड़पत्र प्रतियों को नष्ट होने से बचाया और ब्रिटिश विद्वान फ्रांसिस व्हाइट एलिस को सौंपा, जिससे तमिल साहित्य को एक नया जीवन मिला।
पिता के कार्यक्षेत्र के चलते उनका परिवार बाद में नीलगिरी स्थानांतरित हो गया। बचपन से ही काथावरयान को पारिवारिक संस्कारों और दादा के माध्यम से एक समृद्ध बौद्धिक तथा साहित्यिक माहौल मिला, जिसने उनके बाल-मन में सामाजिक असमानता और अन्याय के खिलाफ लड़ने के बीज बो दिए।
- शिक्षा और अद्भुत विद्वता
अयोथी थास जी की शिक्षा परंपरा और आधुनिकता का एक ऐसा बेहतरीन समन्वय थी, जिसने उन्हें रूढ़ियों को तार्किक रूप से काटने की शक्ति दी।
उन्होंने काशी मेदु सदावथानी वैराक्कम वेलायुथम पिल्लई और वल्लक्कालाथी वी. अयोथी थास पंडित जैसे मूर्धन्य विद्वानों से पारंपरिक तमिल साहित्य, दर्शन और स्वदेशी चिकित्सा पद्धति की गहन शिक्षा ली।
गुरुभक्ति और नाम परिवर्तन
अपने गुरु ‘अयोथी थास पंडित’ के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान था। गुरु के प्रति इसी अनन्य निष्ठा को प्रकट करने के लिए उन्होंने अपना मूल नाम ‘काथावरयान’ बदलकर हमेशा के लिए ‘अयोथी थास’ रख लिया।
बहुभाषी और बहुआयामी विद्वता
वे न केवल तमिल भाषा के प्रकांड विद्वान थे, बल्कि उन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और पालि जैसी जटिल भाषाओं पर भी असाधारण पकड़ बनाई, ताकि वे प्राचीन ग्रंथों का मूल रूप में अध्ययन कर सकें।
उच्च शिक्षा व ज्ञान साधना
किसी औपचारिक विश्वविद्यालय की डिग्रियों से परे, उनका निरंतर स्वाध्याय ही उनकी वास्तविक उच्च शिक्षा थी।
उन्होंने प्राचीन बौद्ध साहित्य, दार्शनिक ग्रंथों और सिद्ध चिकित्सा (Siddha Medicine) का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया, जिससे वे समाज में एक प्रतिष्ठित ‘पंडित’ और अत्यंत कुशल चिकित्सक के रूप में स्थापित हुए।
- जीवन के महान और युगांतकारी कार्य
पंडित अयोथी थास जी का संपूर्ण जीवन बहुजन समाज की मुक्ति, उनके मानवाधिकारों की बहाली और एक वर्गविहीन, समतामूलक समाज के निर्माण के लिए समर्पित रहा। उनके द्वारा किए गए मुख्य ऐतिहासिक कार्य आज भी हमारे आंदोलनों की रीढ़ हैं
(क) ‘ओरु पैसा तमिलन’ द्वारा वैचारिक क्रांति
वर्ष 1907 में उन्होंने ‘ओरु पैसा तमिलन’ नामक एक युगांतकारी साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया।
इस पत्र के माध्यम से उन्होंने तत्कालीन रूढ़िवादी ताकतों, ब्राह्मणवाद, जातिवाद और छुआछूत की कुप्रथा पर तीखे वैचारिक प्रहार किए।
यह अखबार शोषित समाज के लिए केवल सूचना का साधन नहीं था, बल्कि उनकी सोई हुई चेतना को जगाने और आत्म-सम्मान की लड़ाई का सबसे धारदार हथियार बना।
ख) अद्वैतानंद सभा और पंचमर महाजन सभा की स्थापना
वंचितों और जनजातीय समाज को संगठित करने के लिए उन्होंने धरातल पर अनवरत संगठनात्मक प्रयास किए:
1876 में उन्होंने नीलगिरी के जनजातीय लोगों को एकजुट कर ‘अद्वैतानंद सभा’ की स्थापना की और उनके हक-हकूक की आवाज उठाई।
1891 में महान समाज सुधारक रत्तामलाई श्रीनिवासन के साथ मिलकर उन्होंने ‘पंचमर महाजन सभा’ की मजबूत नींव रखी।
इस सभा के माध्यम से उन्होंने शोषित बच्चों के लिए मुफ्त स्कूलों की स्थापना करवाई और भूमिहीन गरीबों के लिए बुनियादी अधिकारों की पुरजोर मांग उठाई।
(ग) ‘पंचमी भूमि’ की ऐतिहासिक बहाली
अयोथी थास जी देश के उन शुरुआती दूरदर्शी राजनेताओं में से थे जिन्होंने यह भली-भांति समझ लिया था कि शोषित समाज की वास्तविक स्वतंत्रता और स्वाभिमान तब तक संभव नहीं है, जब तक उनके पास आर्थिक संसाधन और खुद की जमीन न हो।
उनके अथक संघर्ष, आंदोलनों और ब्रिटिश सरकार के समक्ष अकाट्य तर्कों के साथ की गई वकालत के कारण ही शोषित, भूमिहीन अछूतों के लिए हजारों एकड़ जमीन आवंटित की गई, जिसे आज भी इतिहास में ‘पंचमी भूमि’ के नाम से जाना जाता है.
(घ) बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान और सांस्कृतिक अस्मिता
युगपुरुष डॉ. बी.आर. आंबेडकर के ऐतिहासिक धम्म दीक्षा आंदोलन से लगभग 50 वर्ष पहले, अयोथी थास जी ने इतिहास, धर्म और संस्कृति का मानवतावादी व वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन कर दिया था।
उनका यह दृढ़ और अकाट्य मत था कि भारत के मूल निवासी जिन्हें अछूत कहकर हाशिए पर धकेला गया, वास्तव में प्राचीन बौद्ध थे, जिन्हें एक सोची-समझी सामाजिक व धार्मिक साजिश के तहत मुख्यधारा से अलग कर दिया गया था।
इस ऐतिहासिक पहचान को वापस पाने के लिए उन्होंने वर्ष 1898 में मद्रास में ‘शाक्य बुद्धिस्ट सोसाइटी’ की स्थापना की और स्वयं बौद्ध धम्म अंगीकार कर आधुनिक भारत में बौद्ध पुनरुत्थान आंदोलन की ऐतिहासिक शुरुआत की।
उन्होंने शोषित समाज को हीनता की भावना से बाहर निकालने के लिए उन्हें ‘जातिविहीन द्रविड़ और ‘आदि-तमिलर’ के रूप में अपनी नई, स्वतंत्र और गौरवमयी सांस्कृतिक पहचान अपनाने का आह्वान किया।
- बहुजन समाज के लिए संदेश
5 मई 1914 को 69 वर्ष की आयु में इस महान सामाजिक क्रांतिकारी का महापरिनिर्वाण हुआ।
परंतु उनके द्वारा जलाई गई वैचारिक मशाल आज भी उतनी ही प्रखर है।
दक्षिण भारत में बाद में चले आत्म-सम्मान आंदोलन और द्रविड़ चेतना की जो बुलंद व मजबूत इमारत आज हमें दिखाई देती है, उसकी सबसे पहली और बुनियादी ईंट पंडित अयोथी थास जी ने ही रखी थी।
निश्चित रूप से उनका जीवन आज के बहुजन समाज को यह स्पष्ट संदेश देता है कि जब तक हमारे पास वैचारिक चेतना, उच्च शिक्षा, अपने गौरवशाली इतिहास का बोध और अपनी अस्मिता के प्रति अटूट गर्व नहीं होगा, तब तक हम राजनीतिक या सामाजिक रूप से कभी स्वतंत्र नहीं हो सकते।
आज 20/05/2026 जन्म जयंती के इस पावन अवसर पर, आइए हम सब मिलकर प्रतिज्ञा करें कि यदि हमें मानसिक और सामाजिक गुलामी की अदृश्य कड़ियों को पूरी तरह तोड़ना है, तो हमें अयोथी थास जी के ‘शिक्षा, समानता, स्वाभिमान और न्याय’ के मार्ग को अपने जीवन और आचरण में पूरी निष्ठा के साथ उतारना होगा।
यही उस महान राष्ट्रनायक के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक:
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिंतक
ब्यावर, राजस्थान
