भारत में बड़े बांधों को कभी राष्ट्र-निर्माण का प्रतीक माना गया था, लेकिन आज वही ढांचे इंसानियत (मानवता) के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। देश में लगभग 5200 से अधिक बड़े बांध हैं, जिनमें से अधिकांश 1950 से 1980 के बीच बने। इनकी एजिंग (पुराना हो जाना) अब एक बड़ा रिस्क (जोखिम) बन चुकी है। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी (कर्तव्य) और फ़र्ज़ (नैतिक दायित्व) का प्रश्न है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें हक़ीक़त (सच्चाई) उजागर करती हैं कि 2025 तक हजारों बांध 50 वर्ष से अधिक पुराने हो जाएंगे। इसके बावजूद व्यवस्था की ख़ामोशी (चुप्पी) चौंकाने वाली है। यह स्थिति उस डार्क साइड को दिखाती है, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत ढांचा) तो बना, पर उसकी दीर्घकालिक सुरक्षा उपेक्षित रही।
पुराने बांधों में संरचनात्मक कमजोरी, गाद भराव और तकनीकी जर्जरता बढ़ रही है। बांधों की डिज़ाइन (रूपरेखा) एक निश्चित लाइफस्पैन (कार्यकाल) के लिए होती है, लेकिन समय पर मेंटेनेंस (रखरखाव) न होने से वे खतरे का कारण बन जाते हैं। सेफ्टी (सुरक्षा) के मानक कागजों तक सीमित रह गए हैं और नियमित मॉनिटरिंग (निरंतर निगरानी) का अभाव साफ दिखता है। ऊपर से क्लाइमेट (जलवायु) चेंज (परिवर्तन) ने स्थिति और गंभीर बना दी है—भारी बारिश, बाढ़ और भूकंपीय गतिविधियां उन बांधों पर दबाव डाल रही हैं, जो इसके लिए तैयार ही नहीं थे। यह बदइंतज़ामी (कुप्रबंधन) केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नीतिगत है, जिसमें सियासत (राजनीति) अक्सर जन-सुरक्षा से ऊपर रखी जाती है।

इतिहास गवाह है कि बांध टूटने की कीमत कितनी भयावह हो सकती है। मोरबी, तिवरे और टीस्टा जैसे हादसे केवल दुर्घटनाएं नहीं थे, बल्कि व्यवस्था की लापरवाही (उपेक्षा) का परिणाम थे। यदि कोई बड़ा बांध फेलियर (विफलता) का शिकार होता है, तो नीचे बसे शहरों और गांवों पर तबाही की बाढ़ टूट पड़ती है। मुल्लापेरियार जैसे बांध लाखों लोगों के लिए ख़तरा (जोखिम) बने हुए हैं, फिर भी निर्णय टलते जा रहे हैं। यह स्थिति अमानत (सौंपे गए दायित्व) के साथ विश्वासघात है, क्योंकि बांधों की हिफ़ाज़त (सुरक्षा) सीधे मानव जीवन से जुड़ी है।

समाधान असंभव नहीं हैं, बशर्ते नीयत साफ हो। हर बांध के लिए नियमित ऑडिट (सुरक्षा जांच), पारदर्शी निरीक्षण और आधुनिक चेतावनी सिस्टम (व्यवस्था) अनिवार्य होने चाहिए। आपात स्थिति में समय पर अलर्ट (चेतावनी) और स्पष्ट कार्ययोजना जान बचा सकती है। Dam Safety Act 2021 का कठोर पालन, आवश्यक रिहैबिलिटेशन और असुरक्षित बांधों का चरणबद्ध निष्कासन जरूरी है। अंततः यह सवाल तकनीक का नहीं, बल्कि जवाबदेही (उत्तरदायित्व) का है—क्या हम विकास के नाम पर संभावित तबाही (विनाश) को स्वीकार कर लेंगे, या समय रहते चेतकर मानव जीवन को प्राथमिकता देंगे। यही इस दौर का सबसे बड़ा इम्तिहान (परीक्षा) है, और इसका उत्तर टालना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा।

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