भूमिका

भारतीय समाज की सबसे जटिल और पीड़ादायक सच्चाइयों में से एक जाति आधारित विभाजन है, जो केवल पहचान नहीं बल्कि अवसर, सम्मान और न्याय से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। यह स्थिति हमारे सामाजिक ज़मीर (अंतरात्मा) को झकझोरती है और इंसाफ (न्याय) की मूल भावना को चुनौती देती है। सदियों पुरानी संरचनाएँ आज की डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) और समान अधिकारों की सोच से टकरा रही हैं। अनेक नीतियाँ बराबरी लाने के उद्देश्य से बनीं, पर सिस्टम (प्रणाली) की कमज़ोरियों के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए। अब ज़रूरत है कि समाज इज़्ज़त (सम्मान) और बराबरी (समानता) के आधार पर नए संवाद शुरू करे। हर नागरिक को अपॉर्च्युनिटी (अवसर) मिले, यह केवल नीति नहीं बल्कि रिस्पॉन्सिबिलिटी (जिम्मेदारी) है। साथ ही ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) और नैतिक प्रतिबद्धता से ही विश्वास मजबूत होगा और समाज मानवीय गरिमा की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

  1. जाति मानवता से बड़ी नहीं हो सकती !?

कोई भी सामाजिक निज़ाम (व्यवस्था) जो जन्म के आधार पर इंसान की क़ीमत तय करे, वह नैतिक तौर पर नाइंसाफ़ी (अन्याय) को बढ़ावा देता है। ऐसी सोच इंसानियत (मानवता) के उसूल (सिद्धांत) के खिलाफ है, जो बराबरी और गरिमा की बात करते हैं। आधुनिक डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) में हर व्यक्ति को इक्वल (समान) अधिकार मिलना चाहिए, चाहे उसका जन्म किसी भी पृष्ठभूमि में हुआ हो।

व्यक्ति की असली पहचान उसकी मेहनत, योग्यता और नागरिक जिम्मेदारी से बनती है, न कि खानदान या जातिगत लेबल से। समाज को ऐसा प्लेटफॉर्म (मंच) देना होगा जहाँ टैलेंट (प्रतिभा) और कैपेसिटी (क्षमता) के आधार पर अवसर मिलें। तभी सच्ची प्रोग्रेस (प्रगति) संभव है और मानव गरिमा सुरक्षित रह सकती है। लेकिन निम्न वर्गों को बराबर लेवल फील्ड मिलना भी तो चाहिए यह कौन दिलवाएगा यही समाज। इतना होने अरे यह निम्न वर्ग प्रतिभा और कैपेसिटी में बराबर होगा।

  1. समान अवसर का अर्थ है वास्तविक पहुँच।

समान अवसर का मतलब केवल काग़ज़ी एलान नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने वाली हक़ीक़त (वास्तविकता) है। शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय सहायता और रोजगार जैसे क्षेत्रों में इंसाफ़ तभी संभव है जब हर व्यक्ति को बराबर मौक़ा (अवसर) सचमुच मिले। केवल पॉलिसी बना देने से बराबरी नहीं आती, उसे ईमानदारी से लागू करना भी ज़रूरी होता है। सिस्टम की जवाबदेही और पारदर्शिता से ही भरोसा पैदा होता है।

सामाजिक रूप से वंचित तबकों को सहारा देना रहमत (कृपा) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। लेकिन इन उपायों का मकसद स्थायी निर्भरता नहीं, बल्कि सशक्तिकरण होना चाहिए। स्किल (कौशल) विकास, क्वालिटी (गुणवत्ता) शिक्षा और आत्मविश्वास के जरिए उन्हें इस काबिल बनाया जाए कि वे प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़े हो सकें। यही रास्ता इज़्ज़त (सम्मान) और असली बराबरी की ओर ले जाता है। लेकिन यह खा रही है व्यवस्था और सरकार के जिम्मे नहीं छोड़कर तथाकथित उच्च समाज को अपने ऊपर लेनी होगी।

  1. आरक्षण: साधन, समाधान नहीं।

आरक्षण ऐतिहासिक नाइंसाफ़ी (अन्याय) की आंशिक भरपाई का एक संवैधानिक ज़रिया (माध्यम) है, जिसका मकसद वंचित तबकों को आगे बढ़ने का मौक़ा (अवसर) देना है। यह इंसाफ़ की दिशा में उठाया गया अहम कदम है, लेकिन इसे अंतिम हल मान लेना सही नहीं। सामाजिक सोच और रवैये में बदलाव केवल कानून से नहीं आता; इसके लिए इंसानियत (मानवता) और बराबरी की समझ तथाकथित उच्च वर्ग में विकसित करनी होती है।

अगर शिक्षा की क्वालिटी (गुणवत्ता) मजबूत न हो, पोषण पर्याप्त न मिले और डिजिटल एक्सेस (डिजिटल पहुँच) सीमित रहे, तो बराबरी अधूरी रह जाती है। सही गाइडेंस (मार्गदर्शन) और स्किल (कौशल) विकास के बिना अवसर टिकाऊ नहीं बनते। इसलिए ज़रूरी है कि आरक्षण के साथ ऐसे व्यापक कदम उठाए जाएँ जिसके लिए तथाकथित उच्च समाज की मंशा के बगैर संभव नहीं है जो आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और प्रतिस्पर्धी क्षमता को स्थायी रूप से मजबूत करें।

  1. अक्षम्यता का संरक्षण नहीं, जवाबदेही का विस्तार हो।

किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति, चाहे उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, अपने काम के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। जिम्मेदारी से भागना या लापरवाही को नज़रअंदाज़ करना पूरे निज़ाम (व्यवस्था) को कमज़ोर करता है। असली इंसाफ़ (न्याय) तब होता है जब हर कर्मचारी की कार्यकुशलता का ईमानदार हिसाब लिया जाए और क़ाबिलियत (योग्यता) को तरजीह (प्राथमिकता) दी जाए। लेकिन तथाकथित उच्च समाज निम्न वर्ग को यह सुविधा तो उपलब्ध करवाई ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।

पारदर्शिता और नियमित मूल्यांकन से सिस्टम (प्रणाली) में भरोसा बढ़ता है और काम की क्वालिटी (गुणवत्ता) सुधरती है। जाति को ढाल बनाकर न अक्षम्यता छिपनी चाहिए और न ही किसी के साथ पूर्वाग्रह रखा जाना चाहिए। प्रोफेशनल (व्यावसायिक) आचरण, स्पष्ट नियम और समान मापदंड ही संस्थाओं को मजबूत बनाते हैं तथा समाज में इज़्ज़त (सम्मान) और भरोसे का माहौल तैयार करते हैं। लेकिन तथाकथित निम्न वर्ग को यह सुविधा देने का दायित्व तथा कथित उच्च समाज पर है।

  1. संस्थागत सुधार जाति विमर्श से अलग नहीं ।

संस्थाओं की मजबूती केवल नारों से नहीं, ठोस सुधार से आती है। भर्ती, पदोन्नति और मूल्यांकन की प्रक्रियाएँ साफ़, पारदर्शी और टेक्नोलॉजी (तकनीक) आधारित हों, ताकि इंसाफ़ (न्याय) दिखे भी और महसूस भी हो। जब नियम स्पष्ट होते हैं तो सिफ़ारिश (पक्षपात) और पूर्वाग्रह की गुंजाइश कम हो जाती है, और जिसे उच्च वर्ग मेरिट कहता है (योग्यता) को सही जगह मिलती है।

शिकायत निवारण तंत्र आज़ाद (स्वतंत्र) और समयबद्ध होना चाहिए, ताकि किसी भी कर्मचारी को अपनी बात रखने में डर न लगे। साथ ही नियमित ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) और स्किल (कौशल) उन्नयन सभी के लिए ज़रूरी हो, जिससे कार्यकुशलता बढ़े और सिस्टम (प्रणाली) आधुनिक जरूरतों के अनुरूप ढल सके। यही रास्ता संस्थागत भरोसा मजबूत करता है और समान अवसर की भावना को व्यवहार में उतारता है। लेकिन समान अवसर की निगरानी कौन करेगा सरकार और समाज दोनों लेकिन तथाकथित उच्च समाज साथ देता कहां है ?

  1. युवा पीढ़ी को जाति नहीं, क्षमता जोड़ती है!

एक छोटे शहर का लड़का आरव बड़े सपनों के साथ नए शहर पढ़ने जाता है। वहाँ उसकी मुलाक़ात अलग पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों से होती है। शुरुआत में सब चुप रहते हैं, पर धीरे-धीरे बातों का सिलसिला शुरू होता है। कोई तकनीक में तेज, कोई रचनात्मक काम में निपुण, कोई नेतृत्व में आगे। उन्हें समझ आता है कि असली पहचान जाति नहीं, हुनर और मेहनत है। लेकिन निम्न वर्ग को उच्च वर्ग यह देता कहां है?

कैंपस का माहौल उन्हें रूह (आत्मा) से जोड़ता है। आपसी एतबार (विश्वास) बढ़ता है और तालीम किताबों से आगे जीवन में उतरती है। वे साथ मिलकर प्रोजेक्ट (परियोजना) बनाते हैं, टीमवर्क (साझा काम) सीखते हैं और अपने टैलेंट (प्रतिभा) को निखारते हैं। यही तजुर्बा (अनुभव) उनके जज़्बा (उत्साह) को मजबूत करता है।

जब वे करियर (व्यवसायिक जीवन) की राह पर बढ़ते हैं, तो समझते हैं—नई पीढ़ी को जोड़ने वाली ताकत क्षमता है, जाति नहीं। ऐसी सद्भावना तथाकथित उच्च जाति को दिखानी होगी।

  1. नागरिक बोध बनाम जाति बोध।

एक बस्ती में लोग बरसों से साथ रहते थे, फिर भी दिलों में दूरी थी। हर शख़्स (व्यक्ति) पहले अपनी बिरादरी (समुदाय) बताता, बाद में पड़ोसी बनता। धीरे-धीरे यह फ़ासला (दूरी) आदत बन गया। किसी काम में मदद से पहले पहचान पूछी जाती, जिससे आपसी एतबार (विश्वास) कमज़ोर पड़ता गया।

लोकतंत्र तभी मज़बूत होता है जब लोग खुद को सिर्फ समूह का हिस्सा नहीं, पूरे देश का जिम्मेदार नागरिक मानें। नागरिक बोध का मतलब है—सबको बराबर हक़ (अधिकार), बराबर फ़र्ज़ (कर्तव्य) और बराबर सम्मान मिले। यही सोच समाज को जोड़ती है। लेकिन यह पहल तथाकथित स्वर्ण समाज को करनी होगी।

सच यह है कि कई बार पावरफुल (शक्तिशाली) लोग इस भावना को अपनाने में पीछे रह जाते हैं। मगर असली चेंज (परिवर्तन) तब आता है जब हर तथाकथित उच्च समाज का व्यक्ति अपने बिहेवियर (व्यवहार) से इक्वलिटी (समानता) निभाता है। तभी इंसानियत (मानवता) और नागरिकता साथ चलती हैं।

  1. डेटा आधारित ईमानदार समीक्षा आवश्यक।

किसी भी समाज की तरक़्क़ी (प्रगति) केवल भावनाओं से नहीं, सच्ची जानकारी से होती है। शिक्षा, प्रशासन और न्याय व्यवस्था जैसे अहम क्षेत्रों में हक़ीक़त (वास्तविकता) को समझने के लिए भरोसेमंद डेटा (आँकड़े) ज़रूरी हैं। जब प्रतिनिधित्व, प्रदर्शन और अवसरों पर साफ़ तस्वीर सामने आती है, तभी सही फ़ैसला (निर्णय) लिया जा सकता है। लेकिन तथाकथित उच्च वर्ग इसको स्वीकार करेगा जब यह संभव है।

ऐसी समीक्षा का मकसद इल्ज़ाम लगाना नहीं, बल्कि कमज़ोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करना होना चाहिए। लेकिन तथाकथित उच्च समाज इसको स्वीकार तो करें।ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) से विश्वास बढ़ता है और पॉलिसी (नीति) बेहतर बनती है। अगर एनालिसिस (विश्लेषण) ईमानदारी से हो, लेकिन तथाकथित उच्च समाज इसे मानने का प्रयास तो करे तो सुधार की राह खुलती है और सिस्टम (प्रणाली) अधिक न्यायपूर्ण बनता है। यही तरीका समाज को आगे ले जाता है।

समापन

भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, लेकिन यही ताकत कमजोरी बन जाती है जब पहचान इंसानियत (मानवता) से ऊपर रख दी जाती है। जाति का महिमामंडन हो या तौहीन (अपमान), दोनों रास्ते मसले (समस्या) का हल नहीं देते। क्योंकि तथाकथित उच्च समाज इसको मानने से ही गुरेज करता है। सही राह इंसाफ़ वाले अवसर, मजबूत शिक्षा, सख़्त जवाबदेही और जागरूक नागरिक सोच से निकलती है।

हमें ऐसी नस्ल (पीढ़ी) तैयार करनी है जो पूरे एतबार (विश्वास) से कहे—मैं पहले इंसान हूँ, फिर देश का सिटिजन (नागरिक)। लेकिन यह सारी जिम्मेदारी तो तथाकथित उच्च समाज पर है,बाकी पहचानें बाद में आएँ। यही सोच समाज में असली तब्दीली (परिवर्तन) ला सकती है।

जब यह भावना मज़बूत होगी, तब मुल्क (देश) ऐसा बनेगा जहाँ इज़्ज़त (सम्मान) जन्म से नहीं, कर्म से मिलेगी; और डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) केवल सिस्टम (व्यवस्था) नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाएगी।

शेर
जन्म की जंजीरों से इंसान को तौलते रहे लोग,
हमने कर्म की रोशनी में हर चेहरा बराबर देखा।

संकलनकर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिकचिंतक। 9829 230 966

स्रोत और संदर्भ

जगदीश्वर चतुर्वेदी की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं
भारतीय संविधान, समानता के प्रावधान, सामाजिक न्याय अध्ययन, मानवाधिकार रिपोर्टें, शिक्षा सर्वेक्षण, लोकतांत्रिक मूल्यों पर शोध आधारित विचार, समकालीन विश्लेषण।

अस्वीकरण :

यह रचना किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, सामाजिक भेदभाव की प्रवृत्ति की आलोचना और समान गरिमा के समर्थन में है।

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