भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बच्चों से जुड़े एक वीडियो के बाद राजनीतिक भाषा, संस्कार और लोकतांत्रिक मर्यादा पर बहस तेज हो गई है। “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंतर-मंतर की घटना का उल्लेख करते हुए बच्चों द्वारा बोले गए आपत्तिजनक शब्दों पर चिंता व्यक्त की और कहा कि बच्चों से ऐसी भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती। उन्होंने माफी की भावना को स्वीकार करते हुए क्षमा करने की बात कही। इसके बाद देश में यह बहस शुरू हुई कि क्या केवल बच्चों की भाषा पर सवाल उठाना पर्याप्त है, जबकि राजनीतिक जीवन में नेताओं और सार्वजनिक मंचों पर लंबे समय से तीखी और अपमानजनक भाषा का प्रयोग होता रहा है।” विवेक (बुद्धि) से देखने की आवश्यकता है कि बच्चों के शब्द अचानक पैदा नहीं होते, वे समाज और सार्वजनिक जीवन से सीखते हैं। वर्ष 1988 में पटना आकाशवाणी के बाल कार्यक्रम में एक बच्ची द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए नारागली गली में शोर है राजीव गांधी चोर है बोलना हो या इंदिरा गांधी के दौर के तीखे राजनीतिक नारे, यह इतिहास बताता है कि कटु भाषा राजनीति में पहले भी मौजूद रही है। डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) में प्रश्न यह है कि क्या नैतिकता के मापदंड सभी नेताओं और सभी परिस्थितियों में समान रहेंगे। आज का नैरेटिव बिल्डिंग (कहानी बनाने की प्रक्रिया) भी यह तय करता है कि किस घटना पर कितना शोर होगा। सियासत (राजनीति) में ईमानदार समीक्षा जरूरी है।

  1. बच्चे समाज की भाषा का आईना होते हैं

बच्चों के मुंह से निकले शब्दों को समझने के लिए उस वातावरण को देखना होगा जिसमें वे पलते हैं। मर्यादा (सीमा और शालीनता) केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी आवश्यक है। वर्ष 1988 में पटना आकाशवाणी के बाल कार्यक्रम में एक बच्ची द्वारा राजीव गांधी के लिए नारा बोलने की घटना ने भी यही बताया था कि बच्चे अपने आसपास सुनी हुई बातें दोहराते हैं। मीडिया (संचार माध्यम) ने उस समय भी घटना को जनता तक पहुँचाया था। आज का वायरलिटी (तेजी से फैलने की प्रवृत्ति) दौर ऐसी घटनाओं को तुरंत बहस बना देता है। ज़मीर (अंतरात्मा) से प्रश्न है कि बच्चों को दोष देने से पहले बड़ों की भाषा पर भी विचार होना चाहिए।

  1. राजनीतिक इतिहास और दोहरे मापदंड का प्रश्न

राजनीतिक भाषा में तीखापन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का हिस्सा रहा है। न्याय (उचित निर्णय) की कसौटी यही होनी चाहिए कि हर व्यक्ति और हर दल के लिए समान दृष्टि अपनाई जाए। इंदिरा गांधी के दौर में “चार चवन्नी थाली में, इंदिरा गांधी नाली में” जैसे नारे लगाए गए और राजीव गांधी के विरुद्ध “गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है” जैसे राजनीतिक नारे भी सुनाई दिए। उस समय भी सत्ता की आलोचना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा थी। फैक्ट (तथ्य) के आधार पर इतिहास को समझना जरूरी है। आज का इको चैंबर (एक जैसी सोच का बंद दायरा) कई बार चयनात्मक दृष्टिकोण पैदा करता है। इख़्तिलाफ़ (मतभेद) लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन भाषा की मर्यादा सभी के लिए समान होनी चाहिए।

  1. सत्ता की आलोचना और पत्रकारिता की भूमिका

भारतीय लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है जितनी राजनीतिक आलोचना की। प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता) यही कहती है कि लोकतंत्र में असहमति को दुश्मनी नहीं माना जाना चाहिए। बोफोर्स कांड के समय इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता जैसे समाचार पत्रों ने सत्ता से कठिन सवाल पूछे। अरुण शौरी और प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने स्वतंत्र पत्रकारिता की मिसाल प्रस्तुत की। उस दौर में सरकार की आलोचना को लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा माना जाता था। कैंपेन (अभियान) आधारित राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप बढ़ते हैं। आज का ट्रोल आर्मी (ऑनलाइन हमला करने वाला समूह) वातावरण बहस को प्रभावित करता है। फ़िक्र (चिंता) यह है कि आलोचना और अपमान के बीच अंतर बना रहे।

  1. चयनात्मक विरोध और नैतिकता का प्रश्न

राजनीतिक भाषा पर बहस करते समय समत्व (समानता) की भावना जरूरी है। यदि किसी नेता या दल के समर्थकों द्वारा अपमानजनक शब्दों का प्रयोग गलत है, तो वही कसौटी सभी पक्षों पर लागू होनी चाहिए। राजीव गांधी, इंदिरा गांधी, मनमोहन सिंह और अन्य नेताओं के विरुद्ध बोले गए कठोर शब्दों को भी उसी दृष्टि से देखना होगा। फैक्ट (तथ्य) के आधार पर चर्चा होनी चाहिए, केवल भावनाओं के आधार पर नहीं। आज गैसलाइटिंग (भ्रम पैदा करने की प्रवृत्ति) के कारण कई बार वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। रवैया (व्यवहार) सुधारना लोकतंत्र की आवश्यकता है।

  1. लोकतंत्र में भाषा की जिम्मेदारी और नेतृत्व की भूमिका

बच्चों की भाषा पर चिंता करना उचित है, लेकिन नेताओं की भाषा पर भी समान रूप से विचार होना चाहिए। प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता) यही कहती है कि समाज में आदर्श प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी सबसे पहले नेतृत्व की होती है। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बच्चों की भाषा पर संदेश देते हैं, तो यह भी अपेक्षित है कि राजनीतिक जीवन में सभी नेताओं द्वारा बोले गए शब्दों की समान समीक्षा हो। जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा बोले गए कई शब्दों का हवाला दिया जा सकता है। तीखे शब्द, व्यक्तिगत टिप्पणियाँ और अपमानजनक संबोधन किसी भी पक्ष से उचित नहीं माने जा सकते। ट्रेंड (प्रचलन) के दौर में शब्द तेजी से फैलते हैं। इन्फ्लुएंसर (प्रभाव डालने वाला व्यक्ति) संस्कृति युवाओं को प्रभावित करती है। फ़िक्र (चिंता) यही है कि लोकतंत्र में मर्यादा व्यक्ति देखकर नहीं बदलनी चाहिए।

समापन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बच्चों की भाषा और संस्कार को लेकर कही गई बात पर बहस होना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी समझना होगा कि राजनीतिक कटुता और तीखे शब्द आज की नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही परंपरा का हिस्सा रहे हैं। समन्वय (मेल-जोल) की भावना से देखें तो किसी एक घटना के आधार पर पूरी पीढ़ी या समाज को दोषी ठहराना उचित नहीं है। राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और अन्य नेताओं के समय भी कठोर नारे और टिप्पणियाँ राजनीति में सुनाई देती रही हैं। डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) में सुधार का रास्ता समान मानदंडों से निकलता है। आज का नैरेटिव बिल्डिंग (कहानी निर्माण की प्रक्रिया) कई बार घटनाओं को अलग-अलग रूप देता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम भाषा की मर्यादा का मूल्यांकन व्यक्ति देखकर नहीं, बल्कि सिद्धांत देखकर करें। ज़मीर (अंतरात्मा) यही मांग करता है कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार भी रहे और सम्मान की संस्कृति भी बनी रहे।

शेर (दोहरे मापदंड पर)

जो कल तलवारों से खेलते थे, आज आईना दिखाने लगे,
सियासत के रंग बदलते ही, अपने उसूल छिपाने लगे।

संकलनकर्ता हगामीलाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
98292 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर। (राजस्थान)

स्रोत और संदर्भ :
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बच्चों की भाषा संबंधी वीडियो, भारतीय राजनीतिक नारों के इतिहास, राजीव गांधी–इंदिरा गांधी दौर की घटनाओं और लोकतांत्रिक भाषा बहस के संदर्भ में।

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