
अपने समाज के कुछ उच्च शिक्षित, उच्च पदस्थ लोग डॉ आंबेडकर साहब की बातों का अर्थ अपनी सुविधानुसार निकाल कर व्यवहार करते देखे जा रहे हैं। कुछ अपने आप को डॉ आंबेडकर साहब से भी विद्वान (कथित) समझने का भ्रम पाल बैठे हैं।
कुछ ऐसी परंपराएं होती हैं जो किसी नियमों से नहीं बंधी होती। इनका सीधा संबंध व्यक्ति के सामाजिक संस्कार, चरित्र और सम्मान करने से जुड़ा होता है। और व्यक्ति स्वत: ही अपना आचरण गरिमानुकूल करने लगता है। यह सब किसी के निर्देशों के अध्याधीन नहीं होता।
विश्व में मानवीय सभ्यता के संपन्न होने की पहली पहचान ही वहां के लोगों का आचरण व्यवहार से की जाती है। भारत की परंपराएं, आचरण, संस्कार बौद्धकालीन समय से ही विश्व में अपनी विशेष पहचान रखते रहे हैं। यह भारत के हर नागरिक के गौरव की बात है।
हमारे सामाजिक जीवन में गुरु, माता-पिता और महापुरुषों का विशेष स्थान रहा है और उनका विशेष स्थान है यह अपने आचरण, दैनिक व्यवहार में नज़र आता है। इसमें स्वच्छ शरीर, स्वच्छ वेशभूषा, स्वच्छ स्थान और स्वच्छ मन महत्वपूर्ण हैं। आचरण विहीन व्यवहार करने वालों को समाज सम्मान की नजरों से कभी नहीं देखता।
भारत सहित विश्व में महापुरुषों का सम्मान और उनके प्रति कृतज्ञता पूर्वक आचरण “मानव” होने की पहचान है। अपने से बड़ों का सम्मान का भाव पशु-पक्षियों में भी दृढ़ता पूर्वक दिखाई देता है। आप अपने आस-पास कुत्तों को भी देख सकते हैं।
परंतु कुछ कथित उच्च शिक्षित, उच्च पदस्थ आर्थिक संपन्न लोग अपने आचरण से सम्मान और संस्कारों की गरिमा को ध्वस्त करते नजर आ रहे हैं।
जब भी हम किसी सामाजिक, धार्मिक, महापुरुषों, उत्सवों में आयोजित कार्यक्रम में जाते हैं तो उस स्थान अवसर की अपनी मर्यादा होती है और उस मर्यादा का पालना हम करते हैं। जो नहीं करते उनके साथ व्यवहार के प्रति आमजन का व्यवहार उचित तो नहीं रहता।
डॉ आंबेडकर साहब, तथागत बुद्ध और ऐसे ही महापुरुषों – महिलाओं की प्रतिमाओं/फोटो पर माल्यार्पण और समारोह के शुभारंभ पर दीप प्रज्ज्वलित करने के अवसर पर उस वक्त अतिथियों का आचरण दर्शकों, उपस्थित आमजन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है, उनका मार्गदर्शन करता है। भारत में सामान्य परंपरा रही है कि महापुरुषों की प्रतिमा/फोटो पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन के समय अतिथियों को स्वच्छता, पवित्रता और अच्छे आचरण एवं पारिवारिक संस्कारों का परिचय देना चाहिए। भौतिक आचरण की बात की जाये तो ऐसे अवसरों पर (माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन) हमारे हाथ साफ हों और अपने जूते-चप्पल उतार कर ही कार्य संपादित करें। यह आचरण किसी धर्म, संप्रदाय , महापुरुषों के दर्शन की परिधि में नहीं रहते। यह सब व्यक्ति की स्वयं की इच्छाशक्ति, आचरण, पारिवारिक संस्कार और सम्मान भाव में ही निहित होते हैं। इन आचरणों की पालना डंडों से नहीं कराई जाती है। (कोई नहीं समझता तो डंडे का इस्तेमाल होता है)
समाज के कुछ बुद्धिजीवी (उच्च शिक्षित उच्च पदस्थ) लोग महापुरुषों की प्रतिमा/फोटो पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन के समय अतिथि का पद ग्रहण करे हुए जूते-चप्पल पहने हुए रहते हैं। उनके तर्क भी अजीबो-गरीब होते हैं। यह तर्क डॉ आंबेडकर साहब की प्रतिमा फोटो पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलित करते समय विशेष रूप से देखे जाते हैं।
दुखद स्थिति यह है कि डॉ आंबेडकर साहब की बातों का तर्क देते समय यह लोग बाबा साहेब द्वारा कही अन्य बातों को कैसे भूल जाते हैं ?
बाबा साहेब ने क्या कहा था, उनका अभिप्राय क्या था, यह सब समझने की कोशिश ही नहीं करते।
डॉ आंबेडकर साहब ने कहां पर जूते-चप्पल नहीं खोलने की बात रखी उसे समझें (न्यायपालिका/विधायिका/कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र)। उनके जीवन के आचरण को देखें और पढ़ें।
क्या बाबा साहेब गंदगी, अनुचित आचरण की बात करते थे ?
डॉ आंबेडकर साहब ने सुस्पष्ट कहा था कि ‘ऐ मेरे लोगों यह हर छोटे-बड़े के पैर छूने की परंपरा को ढोना बंद करो, यह गुलामी की निशानी है।’ लेकिन बाबा साहेब ने यह कभी नहीं कहा कि अपने माता-पिता के चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।
क्या हमारे ऐसे लोग जो जूते-चप्पल पहनकर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलित करते हैं, और तर्क देते हैं कि बाबा साहेब ने कहा है कि जूते-चप्पल नहीं खोलने चाहिए और किसी के पैर नहीं छूने और किसी से चरण स्पर्श नहीं कराना चाहिए की बात का पालना करते हैं ?
- क्या आपको पता है कि बाबा साहेब ने जूते-चप्पल नहीं खोलने की बात किस संदर्भ में और कहां के लिए और क्यों कही थी, पता है ?
(न्यायपालिका/विधायिका/कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र) - क्या आपके घरों की आवासीय व्यवस्था में बाबा साहेब द्वारा कही बातों का आचरण होता है ?
- क्या आपको अन्य कहीं सामाजिक/धार्मिक समारोह में जब अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया जाता है तब भी आप माल्यार्पण दीप प्रज्ज्वलित के समय जूते-चप्पल पहने ही रहते हैं ?
- क्या आप किसी की मृत्यु पर आयोजित शोक सभा/उठावना कार्यक्रम में जाते हैं उस वक्त स्थान पर बैठते समय, श्रध्दांजलि देते समय,जूते-चप्पल नहीं खोलते हैं ?
- क्या आप किसी समारोह में, अपने घर पर नीचे बैठकर भोजन करते समय जूते-चप्पल नहीं खोलते ?
डॉ आंबेडकर साहब ने माथे पर तिलक/टीका नहीं लगाने की बात की है, क्या आप ऐसा करते हैं ?
बाबा साहेब की प्रतिमा, फोटो पर तिलक नहीं लगाया जाता है।
गत 26 नवंबर (76 वें संविधान दिवस) को सर्वोच्च न्यायालय के परिसर में बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर जी की बहुत बड़ी प्रतिमा लगाई गई थी। प्रतिमा का अनावरण भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू जी ने किया तथा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंदरचूड़ एवं भारत सरकार के कानून और न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने पुष्प अर्पित किए थे और तीनों ने ही अपने जूते-चप्पल खोलकर दूर रखे थे।
क्या अपने समाज के कुछ न्यायाधीश, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस के आला अफसर, राजनेता उपरोक्त तीनों से अधिक बड़े हैं और नियमों की अधिक जानकारी रखते हैं ?
- क्या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चन्दरचूड़़ जी को यह नहीं पता कि जूते-चप्पल नहीं खोलने चाहिए ?
भारत के सभी नौकरशाह, न्यायाधीश, पुलिस अफसरों की सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू जब बाबा साहेब के सम्मान में जूते-चप्पल खोलकर अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहीं हैं तो आप अपना स्तर जांच लें।
डॉ आंबेडकर साहब किसी भी धार्मिक स्थल, बुद्ध विहार में जाते थे तब जूते-चप्पल खोलकर ही जाते थे। डॉ आंबेडकर साहब ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था लेकिन वो किसी भी बौद्ध विहार के धम्म स्थल पर जूते-चप्पल पहनकर नहीं गये हैं।
पवित्र परिसरों में और दीप प्रज्ज्वलित करते समय जूते-चप्पल खोलकर रहना सबसे पहले स्वच्छता का परिचायक होता है।
बाबा साहेब ने एक व्यक्ति की पीठ पर डंडा मारा था यह कहते हुए कि ‘ पैर छूना, पैरों में गिरना, पगड़ी पैरों में रखना बंद करो। भारत का संविधान तुम्हारे सम्मान की रक्षा करेगा।’
बाबा साहेब ने जूते-चप्पल कब नहीं खोलने के निर्देश दिए हैं यह पढ़ना और समझना होगा। बाबा साहेब के सम्मान में कुतर्क करते हुए अपने आचरण, संस्कारों में कोताही नहीं बरतें।
अगर हम ही बाबा साहेब डॉ आंबेडकर साहब का सम्मान नहीं करेंगे तो फिर किसी और से आशा करना बेमानी है।
डॉ आंबेडकर साहब ने भारत की न्यायिक व्यवस्था के लिए स्पष्ट कहा था कि न्याय हो यह जरूरी है लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि न्याय किया जा रहा है यह सभी को दिखना भी चाहिए।
डॉ आंबेडकर साहब का सम्मान कर रहे हैं, सम्मान किया जा रहा है यह दिखना भी चाहिए।
हमारे महापुरुषों की बातों, दर्शन की व्याख्या सही करें।
प्रत्येक महापुरुष के दर्शन में चरित्र, आचरण, शिक्षा, पारिवारिक संस्कार, और स्वच्छता का स्थान सर्वोपरि रहा है।
महापुरुषों की प्रतिमा/फोटो माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के समय अतिथियों को महापुरुषों के प्रति सम्मान, स्वच्छता सर्वोपरि रहे यह अनिवार्य है। बाबा साहेब की प्रतिमा फोटो पर माल्यार्पण के समय माला सही साइज़ की और गरिमानुकूल हो यह जवाबदेही अतिथियों की है। यह भी अतिथियों को ध्यान रखना चाहिए।
अच्छा आचरण किसी पद, आर्थिक स्थिति, नियमों का मोहताज नहीं होता।
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जय भारत 🇮🇳
डॉ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’
उप निदेशक (से.नि.) पशुपालन विभाग अजमेर राजस्थान
केरियर काउंसलर
अजमेर
9460180510
