भूमिका
पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेशों में बनती इमेज (छवि) तेजी से बदली है। कभी मेहनत और योग्यता से पहचाने जाने वाले प्रवासी भारतीय अब कई जगह राजनीतिक बहस और सामाजिक तनाव के केंद्र में दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की आक्रामक राष्ट्रवादी सियासत (राजनीति) ने देश के भीतर ध्रुवीकरण बढ़ाया, लेकिन उसका असर सीमाओं के पार भी गया। जब धार्मिक प्रतीकों, नारों और घरेलू मुद्दों को ग्लोबल (वैश्विक) मंचों पर शक्ति प्रदर्शन की तरह पेश किया जाता है, तो स्थानीय समाज असहज होता है। इससे भारतीय समुदाय के खिलाफ नफ़रत (घृणा) और तअस्सुब (पूर्वाग्रह) को हवा मिलती है। डिजिटल दौर में फैला नैरेटिव (कथा-विन्यास) भी यही छवि मजबूत करता है कि भारतीय समुदाय केवल बसने नहीं, असर जमाने आया है। नतीजा यह कि भरोसे की जगह शंका ले रही है, और रिश्ते सम्मान से नहीं, दूरी से परिभाषित हो रहे हैं।
मुद्दा क्या है?
अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोप के कई हिस्सों में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ हमलों, नस्लीय गालियों और सामाजिक दूरी की खबरें बढ़ रही हैं। जो समुदाय कभी “मॉडल माइनॉरिटी” (आदर्श अल्पसंख्यक) माना जाता था, उसे अब कई जगह “ओवर-पॉलिटिकल” (अत्यधिक राजनीतिक), “लाउड” (शोरगुल वाला) और आक्रामक समझा जा रहा है। यह बदलाव केवल रेसिज़्म (नस्लभेद) की पुरानी बीमारी का नतीजा नहीं, बल्कि बदलते तसव्वुर (धारणा) और बनती हुई छवि से भी जुड़ा है। प्रवासी भारतीयों की मौजूदगी अब सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि असरअंदाज़ (प्रभाव डालने वाली) उपस्थिति के रूप में देखी जाने लगी है, जिससे फिज़ा (माहौल) में असहजता बढ़ रही
क्या बदला है?
- सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से शक्ति प्रदर्शन तक!
त्योहार मनाना, मंदिर बनाना और सांस्कृतिक कार्यक्रम करना प्रवासी जीवन का सामान्य हिस्सा है। यह पहचान बचाने की स्वाभाविक कोशिश होती है। लेकिन जब यही गतिविधियाँ बार-बार विशाल जुलूसों, ऊँचे नारों और सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन में बदलने लगती हैं, तो स्थानीय अवाम (जनता) के ज़ेहन (मन) में असहजता पैदा होती है। बहुसंख्यक समाज इसे केवल सांस्कृतिक विविधता नहीं, बल्कि डेमोग्राफिक (जनसांख्यिकीय) दबाव और बढ़ते प्रभाव के संकेत की तरह देखने लगता है। धीरे-धीरे महफ़ूज़ (सुरक्षित) महसूस करने की जगह उन्हें अपनी पहचान पर ख़तरा महसूस होने लगता है, और यहीं से गलतफ़हमियाँ जन्म लेती है!
- भारत की घरेलू सियासत (राजनीति) का वैश्वीकरण!
विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के कुछ हिस्से खुलकर भारतीय दलों, नेताओं और विवादित मुद्दों के पक्ष या विरोध में प्रोटेस्ट (विरोध प्रदर्शन) करते दिखाई देते हैं। यह सक्रियता कई बार स्थानीय समाज के ज़ेहन (मन) में सवाल खड़ा करती है—“जो लोग यहाँ रह रहे हैं, वे अपने मूल देश की सियासी (राजनीतिक) लड़ाइयाँ हमारी ज़मीन पर क्यों लड़ रहे हैं?” धीरे-धीरे यह परसेप्शन (धारणा) बनता है कि भारतीय डायस्पोरा सिर्फ आर्थिक या पेशेवर प्रवासी नहीं, बल्कि वैचारिक असर फैलाने वाला समूह भी है। इससे भरोसे की जगह शुबहा (संदेह) पैदा होता है और सामाजिक दूरी बढ़ने लगती है, जिससे इमेज (छवि) प्रभावित होती है।
- धार्मिक प्रतीकों की आक्रामक दृश्यता!
2014 के पश्चात90 फीट ऊँची मूर्तियाँ, विशाल शोभायात्राएँ और बार-बार होने वाली धार्मिक रैलियाँ भारत में सामान्य लग सकती हैं, लेकिन पश्चिमी देशों में यह असामान्य पैमाने पर दिखाई देती हैं। स्थानीय समाज इसे केवल आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कल्चरल असर्टशन (सांस्कृतिक प्रभुत्व जताना) के रूप में देखने लगता है। जब सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक पहचान का इतना उभार दिखता है, तो लोगों के ज़ेहन (मन) में असहजता घर करने लगती है। धीरे-धीरे यह परसेप्शन (धारणा) बनता है कि नई आबादी अपनी मान्यताओं को प्रमुखता देना चाहती है। यहीं से तअस्सुब (पूर्वाग्रह) पनपता है और सामाजिक फासले बढ़ने लगते हैं।
- सोशल मीडिया और डिजिटल नैरेटिव(कथा-विन्यास)।
सोशल मीडिया के दौर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय मूल के कुछ समूह 2014 के पश्चात खुलेआम इस्लामोफोबिया, बहुसंख्यकवादी सोच और आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रोपेगेंडा (प्रचार) फैलाते नज़र आते हैं। ऐसे पोस्ट और वीडियो तेज़ी से वायरल (तेज़ी से फैलने वाले) होते हैं, जिससे पूरी कम्युनिटी की इमेज (छवि) प्रभावित होती है। स्थानीय लोग कुछ व्यक्तियों के बयान को पूरे समुदाय का रवैया (व्यवहार) मान लेते हैं। इससे ग़लतफ़हमी (भ्रम) और पूर्वाग्रह बढ़ता है। डिजिटल दुनिया की यह बेपरवाह एक्टिविटी (सक्रियता) अनजाने में सामाजिक दूरी पैदा कर देती है, और भरोसे की जगह शुबहा (संदेह) ले लेता है।
- “मॉडल माइनॉरिटी” से “पॉलिटिकल माइनॉरिटी”?
2014 से पहले कभी भारतीय प्रवासियों की पहचान डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और आईटी प्रोफेशनल (पेशेवर विशेषज्ञ) के रूप में होती थी। उन्हें मेहनती, काबिल और क़ानूनपसंद समझा जाता था। अब 2014 के पश्चात तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह पहचान रैलियों, नारों और विदेशी धरती पर घरेलू सियासत (राजनीति) की बहसों से जुड़ने लगी है। यह बदलाव अचानक नहीं, मगर असरअंदाज़ (प्रभाव डालने वाला) है। स्थानीय समाज के ज़ेहन (मन) में यह परसेप्शन (धारणा) बनता है कि समुदाय पेशेवर से ज़्यादा राजनीतिक रूप ले रहा है। यही तसव्वुर (कल्पना) आगे चलकर शुबहा (संदेह) और सामाजिक दूरी को जन्म देता है। यह बदलाव सूक्ष्म है, मगर अंजाम (परिणाम) गंभीर हो सकते हैं।
- स्थानीय समाज का डर — वास्तविक या काल्पनिक?
हर समाज बाहरी आबादी के बढ़ते असर से बेचैन हो उठता है। जब बड़ी तादाद (संख्या) में लोग अपनी भाषा, धार्मिक प्रतीक और राजनीतिक वफ़ादारी (निष्ठा) को खुले पब्लिक डिस्प्ले (सार्वजनिक प्रदर्शन) में दिखाते हैं, तो स्थानीय लोगों के ज़ेहन (मन) में असुरक्षा घर करने लगती है। धीरे-धीरे 2014 के पश्चात यह तसव्वुर (कल्पना) बनता है कि नई आबादी सिर्फ बस नहीं रही, बल्कि इन्फ्लुएंस (प्रभाव) बढ़ा रही है। यहीं से साज़िश (षड्यंत्र) की कहानियाँ जन्म लेती हैं—“कल ये हमारी सियासत (राजनीति) भी बदल देंगे।” डर वास्तविक हो या काल्पनिक, असर समाजी फासलों (सामाजिक दूरियों) में साफ दिखने लगता है।
- प्रतिक्रिया: इंडोफोबिया का उभार!
नफ़रत (घृणा) अक्सर तर्क नहीं, बल्कि डर और अफ़वाह से चलती है। एक बार यह परसेप्शन (धारणा) बन जाए कि “भारतीय समुदाय आक्रामक है”, तो फिर शांत और मेहनती लोग भी उसी शक की निगाह से देखे जाते हैं। 2014 के बाद में कुछ घटनाएँ पूरे समुदाय की इमेज (छवि) पर साया डाल देती हैं। स्थानीय समाज में तअस्सुब (पूर्वाग्रह) बढ़ता है और ग़लतफ़हमी (भ्रम) गहरी होती जाती है। नतीजा यह कि आम भारतीय भी बेवजह टारगेट (निशाना) बनने लगते हैं। इसी माहौल को आज कई लोग “इंडोफोबिया” यानी भारतीयों के प्रति बढ़ती नफ़रत का नाम दे रहे हैं।
सबसे बड़ा विरोधाभास!?
2014 के पश्चात भारत में हम अक्सर कहते हैं, “बाहरी लोग हमारी संस्कृति बदल देंगे,” और इस डर को हक़ीक़त (सच्चाई) मानते हैं। लेकिन जब यही बात यूरोप या अमेरिका के लोग कहते हैं, तो हमें तुरंत रेसिज़्म (नस्लभेद) नज़र आता है। यहाँ सबसे बड़ा तज़ाद (विरोधाभास) यही है—अपना डर वाजिब, दूसरों का डर ग़लत। यह डबल स्टैंडर्ड (दोहरा मापदंड) सोच भरोसे की बुनियाद (नींव) को कमज़ोर करती है। जब हम दूसरों की आशंकाओं को नज़रअंदाज़ (अनदेखा) करते हैं, तो दूरी बढ़ती है, संवाद घटता है, और रिश्तों में तल्ख़ी (कड़वाहट) घर कर जाती है। यही रवैया (व्यवहार) वैश्विक स्तर पर 2014 के पश्चात गलतफ़हमियों को गहरा करता है।
गलती किसकी?
✔ पूरी तरह विदेशों की नहीं
✔ पूरी तरह भारतीयों की भी नहीं
मगर यह हक़ीक़त (सच्चाई) है कि हाल के वर्षों में 2014 के बाद कुछ रुझानों ने स्थिति को पेचीदा बनाया है। आक्रामक राजनीतिक प्रोटेस्ट (विरोध प्रदर्शन), धार्मिक शक्ति प्रदर्शन और ऑनलाइन एक्सट्रीमिज़्म (कट्टरता) ने भारतीय डायस्पोरा की सॉफ्ट पावर (मृदु प्रभाव) को कमजोर किया है। जहाँ पहले पहचान मेहनत, इल्म (ज्ञान) और पेशेवर कामयाबी से जुड़ती थी, वहाँ अब शोरगुल और टकराव की इमेज (छवि) उभरने लगी है। इससे स्थानीय समाज में शुबहा (संदेह) और फासला बढ़ता है, जिसका खामियाज़ा (नुकसान) आम, शांत प्रवासी भारतीयों को भी उठाना पड़ता है।
समाधान क्या हो सकता है?
सांस्कृतिक उत्सव केवल खुशियों और परंपरा (रिवाज़) का जश्न होना चाहिए, राजनीतिक प्रोटेस्ट (विरोध प्रदर्शन) नहीं। धार्मिक पहचान व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर सम्माननीय है, लेकिन इसे सार्वजनिक प्रभुत्व (डोमिनेंस) दिखाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जबकि 2014 से पहले ऐसा नहीं होता था। प्रवासी जीवन का असली मकसद संतुलन (बैलेंस) बनाना है—अपने कल्चर को जीना, लेकिन स्थानीय समाज के माहौल को भी समझना। सम्मान कमाया जाता है, थोपे जाने से नहीं। डिजिटल और वास्तविक दुनिया में संयम, समझदारी और संवेदनशीलता ही भारतीय डायस्पोरा की सॉफ्ट पावर (मृदु प्रभाव) को मजबूत कर सकती है और रिश्तों में भरोसा कायम रख सकती है।
समापन
2014 से पिछले वर्षों में भारत में दक्षिणपंथी सरकार की नीतियाँ अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु (इंटॉलरेंट) और पक्षपाती रुख़ को बढ़ावा देती दिख रही हैं। धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर भेदभाव (डिस्क्रिमिनेशन), अवमानना और उत्पीड़न का सामना करते हैं। सरकारी और राजनीतिक बयानबाज़ियाँ कभी-कभी नफ़रत (घृणा) को बढ़ावा देती हैं, जिससे समाज में असुरक्षा और भय का माहौल बनता है। इस नफ़रत और कट्टरता का असर विदेशों में बसे भारतीयों की छवि पर भी पड़ता है—वे विदेशी समाज में अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए आलोचना और संदेह का सामना करते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाले कट्टर और आक्रामक संदेश स्थानीय समाज में तसव्वुर (धारणा) को और गहरा कर देते हैं। नतीजा यह है कि विदेशों में 2014 के बाद से भारतीयों के प्रति भरोसा और सम्मान कम होने लगा है।
संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 3 0 966
स्रोत और संदर्भ:
न्यू यॉर्क टाइम्स, दुर्गेश कुमार, समर अनार्य की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं, विदेशों में भारतीय डायस्पोरा रिपोर्ट, डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स, समाचार पत्र।
