लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
प्रस्तावना
वैचारिक दासता से मुक्ति का मार्ग
किसी भी समाज को गुलाम बनाए रखने का सबसे सशक्त हथियार ‘शारीरिक बेड़ियाँ’ नहीं, बल्कि ‘मानसिक बेड़ियाँ’ होती हैं।
जब शोषक वर्ग शोषित को यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाता है कि उसकी बदहाली का कारण उसकी अपनी ‘अयोग्यता’ या ‘क्षमता की कमी’ है, तब वह समाज अपने अधिकारों के लिए लड़ना छोड़ देता है।
भारतीय सामाजिक संदर्भ में ‘मेरिट‘ (योग्यता) वह मायावी शब्द है, जिसे एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया गया है ताकि सदियों से चले आ रहे विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखा जा सके।
वी. टी. राजशेखर की लघु किन्तु तीक्ष्ण कृति “मेरिट, माई फुट, इसी वैचारिक छल का पर्दाफाश करती है। यह पुस्तक केवल एक लेख नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की आवाज़ है जिन्हें ‘मेरिट’ के नाम पर मुख्यधारा से बाहर रखा गया।
यह लेख इसी पुस्तक के दर्शन को आधार बनाकर आज के सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बहुजन समाज के लिए एक वैचारिक दिशा-निर्देश प्रस्तुत करता है।
1. मेरिट का मिथक
क्या योग्यता जन्मजात होती है?
अभिजात वर्ग का सबसे बड़ा तर्क यह होता है कि “प्रतियोगिता निष्पक्ष होनी चाहिए और केवल योग्य व्यक्ति को ही अवसर मिलना चाहिए।
सुनने में यह तर्क बहुत आकर्षक और न्यायपूर्ण लगता है, लेकिन इसकी गहराई में उतरते ही इसका खोखलापन उजागर हो जाता है।
सामाजिक संसाधनों का संचय
क्या हम एक ऐसे धावक की तुलना उस धावक से कर सकते हैं जिसने अपनी दौड़ की शुरुआत दूसरों से 50 मीटर आगे से की हो? जिसे ‘मेरिट’ कहा जाता है, वह वास्तव में ‘संचित सामाजिक पूंजी’ है।
एक उच्चवर्गीय बालक के पास जन्म से ही शिक्षित माता-पिता, आर्थिक सुरक्षा, अंग्रेजी माध्यम की उत्कृष्ट शिक्षा, इंटरनेट, लाइब्रेरी और सबसे महत्वपूर्ण—एक ऐसा सामाजिक वातावरण होता है जो उसे विश्वास दिलाता है कि वह ‘जीतने के लिए ही पैदा हुआ है।
दूसरी ओर,बहुजन समाज का बच्चा उन गलियों से आता है जहाँ दोवक्त की रोटी का संघर्ष प्राथमिक है।
उसके पास न तो महंगे ट्यूशन हैं, न ही वह ‘नेटवर्किंग’ जो करियर के द्वार खोलती है। इसके बावजूद, यदि वह बच्चा विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए 60% अंक लाता है, तो वह उस सुविधाभोगी बच्चे के 90% अंकों से कहीं अधिक ‘मेरिटोरियस’ है।
राजशेखर ठीक ही कहते हैं,मेरिट कोई दैवीय उपहार नहीं है; यह अनुकूल परिस्थितियों और अवसरों की फसल है।
2. ऐतिहासिक अन्याय और प्रतिनिधित्व का सवाल
भारतीय समाज में हज़ारों वर्षों तक ज्ञान और सत्ता पर एक खास समूह का एकाधिकार रहा।
शिक्षा के द्वार एक बड़े वर्ग के लिए पूरी तरह बंद थे। जब देश आज़ाद हुआ और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से आरक्षण की व्यवस्था की, तो इसका उद्देश्य केवल ‘नौकरी देना’ नहीं था, बल्कि शासन-प्रशासन में उस वर्ग की ‘भागीदारी’ सुनिश्चित करना था जिसे हज़ारों वर्षों तक अछूत और अयोग्य माना गया।
आरक्षण दया नहीं, अधिकार है
आरक्षण के विरुद्ध सबसे बड़ा प्रहार ‘मेरिट’ के नाम पर ही किया जाता है। कहा जाता है कि इससे दक्षता’ (Efficiency) कम होती है।
लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जिन विभागों में कोई आरक्षण नहीं है, क्या वे भ्रष्टाचार और अक्षमता से मुक्त हैं?
वास्तव में, प्रतिनिधित्व लोकतंत्र की पहली शर्त है। यदि एक पुलिस थाने में, एक कचहरी में या एक कलेक्ट्रेट में समाज के हर तबके का व्यक्ति नहीं होगा, तो वह संस्थान कभी भी निष्पक्ष नहीं हो सकता।
3. ब्राह्मणवाद और बौद्धिक वर्चस्व का औजार
राजशेखर अपनी पुस्तक में स्पष्ट करते हैं कि ‘मेरिट’ का शोर दरअसल ‘ब्राह्मणवाद’ का आधुनिक संस्करण है।
पुराने समय में जो स्थान ‘शास्त्रों’ का था, आज वही स्थान ‘प्रतियोगी परीक्षाओं’ और ‘प्रवेश परीक्षाओं’ ने ले लिया है।
परीक्षा की पद्धति भी इस तरह से डिजाइन की जाती है कि वह उस खास वर्ग के कौशल (जैसे अंग्रेजी बोलना या रटंत विद्या) को तो मापती है, लेकिन बहुजन समाज के शारीरिक श्रम, जमीनी अनुभव और संघर्ष की क्षमता को नकार देती है।
सांस्कृतिक पूंजी की चोरी
बहुजन समाज के पास हुनर है, कला है, कृषि का ज्ञान है और श्रम की शक्ति है। लेकिन इस पूंजी को कभी ‘मेरिट’ की श्रेणी में नहीं रखा गया।
मेरिट की परिभाषा केवल उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित कर दी गई जहाँ संसाधनों का वर्चस्व था। यह एक बौद्धिक चालाकी है जिसके माध्यम से बहुजन युवाओं के मन में हीन भावना भरी जाती है ताकि वे ऊंचे पदों के सपने देखना ही छोड़ दें।
4. वर्तमान चुनौतियां: निजीकरण और डिजिटल डिवाइड
आज हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ ‘मेरिट’ के नाम पर एक नया खेल खेला जा रहा है, निजीकरण।
जब सरकारी नौकरियां खत्म की जा रही हैं और सब कुछ निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, तो वहां आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां केवल ‘मेरिट’ और ‘पर्सनालिटी’ की बात होती है।
डिजिटल डिवाइड
आज की मेरिट ‘डिजिटल साक्षरता’ और ‘महंगे संस्थानों’ की मोहताज हो गई है। कोरोना काल के बाद हमने देखा कि कैसे गरीब तबके के बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रह गए।
क्या अब भी हम कह सकते हैं कि जो बच्चा पिछड़ गया, वह अयोग्य था? नहीं, वह व्यवस्था का शिकार था।
निजीकरण के इस दौर में ‘मेरिट’ शब्द का प्रयोग बहुजन समाज को आर्थिक गुलामी की ओर धकेलने के लिए किया जा रहा है।
5. बहुजन समाज के लिए कार्ययोजना
अब हमें क्या करना चाहिए?
केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं है कि मेरिट एक पाखंड है; हमें इस पाखंड को चुनौती देने के लिए खुद को तैयार करना होगा।
(क) शिक्षा का वि-उपनिवेशीकरण
हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की मांग करनी चाहिए जो केवल किताबी ज्ञान न दे, बल्कि हमारे महापुरुषों, महात्मा जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बाबा साहेब और पेरियार के विचारों पर आधारित हो। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि वे अयोग्य नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक असमान दौड़ में दौड़ाया जा रहा है।
(ख) आत्मनिर्भर आर्थिक ढांचा
जैसा कि मैं (लेखक) हमेशा जोर देता हूँ, आर्थिक मजबूती के बिना सामाजिक न्याय अधूरा है। हमें उद्यमिता (Entrepreneurship) की ओर बढ़ना होगा।
हमें केवल ‘नौकरी मांगने वाला’ नहीं, बल्कि ‘नौकरी देने वाला समाज बनना होगा।
जब हमारे पास आर्थिक शक्ति होगी, तो हम अपनी संस्थाएं खड़ी कर पाएंगे जहाँ ‘मेरिट’ का अर्थ ‘अवसर की समानता’ होगा।
(ग) वैचारिक चेतना का विस्तार
प्रत्येक बहुजन युवा को राजशेखर, डॉ. आंबेडकर और कांशीराम जी के साहित्य को पढ़ना चाहिए।
जब आप शिक्षित होते हैं, तो आप तर्कों से बात करते हैं। जब कोई आपसे कहे कि “आरक्षण से मेरिट गिरती है,” तो उसे डेटा और तथ्यों के साथ जवाब दीजिए कि कैसे विविधता (Diversity) किसी भी संस्थान की कार्यक्षमता को बढ़ाती है।
6. भावी पीढ़ी को संदेश
तुम ‘मेरिट’ से ऊपर हो
बहुजन समाज के मेरे प्रिय युवाओं, तुम उस समाज के वंशज हो जिसने हज़ारों वर्षों के दमन के बाद भी अपनी अस्मिता को बचाए रखा। तुम्हारी सहनशक्ति, तुम्हारा संघर्ष और तुम्हारी जिजीविषा ही तुम्हारी वास्तविक ‘मेरिट’ है।
अंकों के किसी छोटे से कागज के टुकड़े को अपनी योग्यता का पैमाना मत बनने दो।
बाबा साहेब डॉ. बी आर आंबेडकर ने कहा था, शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।
आज ‘शिक्षित’ होने का अर्थ केवल साक्षर होना नहीं, बल्कि इस व्यवस्था के षड्यंत्रों को समझना है।
संगठित’ होने का अर्थ केवल भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि एक वैचारिक गठबंधन बनाना है।
और ‘संघर्ष’ का अर्थ केवल सड़कों पर उतरना नहीं, बल्कि बौद्धिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपनी जगह बनाना है।
निष्कर्ष
एक नए भारत का सपना
“मेरिट, माई फुट” हमें यह संकल्प लेने के लिए प्रेरित करती है कि हम एक ऐसा भारत बनाएंगे जहाँ ‘मेरिट’ का अर्थ किसी का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक की ‘समान संभावना’ होगा।
हम एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहाँ एक सफाईकर्मी का बच्चा और एक बड़े उद्योगपति का बच्चा एक ही मेज पर बैठकर परीक्षा दे सके, और उनके पास वहां तक पहुँचने के संसाधन भी समान हों।
याद रखिये, न्याय वह नहीं जो शक्तिशाली अपनी सुविधा के अनुसार तय करे; न्याय वह है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सिर उठाकर जीने का हक दे।
जय संविधान, जय भीम, जय भारत!

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
ब्यावर, राजस्थान
