वर्तमान में भारत की केंद्र सरकार दक्षिण पंथी है किसी से छुपा हुआ नहीं है। इस सरकार और विगत वर्षों में पुराने सरकारों के काम करने का ढंग कैसा है अंतर देखिए
लोकतंत्र में समय-समय पर सरकारें बदली हैं और नीतियों में भी बदलाव आया है, लेकिन गरीब-विरोधी नीयत इस तरह सुनियोजित और स्मार्ट (चतुर) ढंग से पहले कभी सामने नहीं आई। आज सत्ता ऊपर से स्माइल (मुस्कान) दिखाती है, जबकि नीचे से आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालती है। कानूनों का डिज़ाइन ऐसा बनाया जा रहा है कि वे जनता की सुरक्षा के बजाय पूँजी की सेफ्टी (सुरक्षा) सुनिश्चित करें। यही विरोधाभास इस लेख का केंद्र है, जहाँ नीति और नीयत के बीच का फर्क साफ दिखाई देता है।
पिछले 11 वर्षों में बनाए गए अधिकतर कानूनों का सीधा और गहरा असर किसान, मज़दूर और बेरोज़गार वर्ग पर पड़ा है। खेती से जुड़े कानूनों ने किसान की ज़मीन और मेहनत को रिस्क (जोखिम) में डाला, जबकि लेबर कोड ने मज़दूर की मज़दूरी और सुरक्षा को वीक (कमज़ोर) किया। रोज़गार के क्षेत्र में ठोस प्लान (योजना) की जगह केवल वादा दिए गए। इन नीतियों ने आम जनता की आर्थिक हालत को और ज़्यादा प्रेशर (दबाव) में डाल दिया।
कृषि कानूनों ने धीरे-धीरे ऐसी संरचना तैयार की, जिसमें खेती किसान के हाथ से निकलकर कॉरपोरेट के कंट्रोल (नियंत्रण) में जाती दिखी। इन कानूनों से किसान की फसल, मंडी और दाम तय करने की पावर कमजोर हुई। बड़े उद्योगों को खुली एंट्री (प्रवेश) मिली, जबकि छोटे किसान रिस्क (जोखिम) में चले गए। सरकार ने इसे रिफॉर्म (सुधार) कहा, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में किसान की स्वतंत्रता और सुरक्षा दोनों पर असर पड़ा।
लेबर कोड के ज़रिये मज़दूर की मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा और संगठन की ताक़त को धीरे-धीरे कमज़ोर किया गया। पहले जहाँ काम के घंटे, यूनियन और सुरक्षा के साफ़ नियम थे, वहाँ अब फ्लेक्सिबिलिटी (लचीलापन) के नाम पर अनिश्चितता बढ़ी। ठेके और अस्थायी काम को प्रोमोट (बढ़ावा) मिला, जिससे मज़दूर की नौकरी सुरक्षा) घट गई। सरकार ने इसे रिफॉर्म (सुधार) बताया, लेकिन मज़दूर के अधिकार सीमित होते चले गए।
बेरोज़गारी जैसे गंभीर सवाल पर सरकार ने ठोस पॉलिसी देने के बजाय एक भावनात्मक नैरेटिव (कथानक) खड़ा किया। रोज़गार सृजन के स्पष्ट प्लान की जगह मंचों से जोशीली स्पीच दी गईं। आँकड़ों और ज़मीनी सच्चाई से ध्यान हटाकर जनता को उम्मीदों और नारों में उलझाया गया। इससे बेरोज़गार युवाओं की समस्या जस की तस बनी रही, जबकि समाधान केवल काग़ज़ी वादों और भाषणों तक सीमित रह गए।
“वीबीजीरामजी” जैसे जुमले आज की राजनीति के सिंबल (प्रतीक) बन गए हैं। इनके नाम धार्मिक भावना से जुड़े होते हैं, ताकि जनता भावनात्मक रूप से जुड़ जाए, लेकिन इनका असली फोकस पूँजी के हितों पर रहता है। ऐसे शब्दों के ज़रिये नीतियों को पैकेज (आकर्षक रूप) में पेश किया जाता है, जिससे असली असर छिप जाए। आस्था और विश्वास का इस्तेमाल कर ऐसे क़दम उठाए जाते हैं, जिनका लाभ आम जनता को नहीं, बल्कि बड़े कारोबारी वर्ग को मिलता है।
सूचना माँगने पर आरटीआई को जानबूझकर कमज़ोर किया गया, ताकि सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत कम हो जाए। पहले यह क़ानून इंसाफ़ और जवाबदेही का मज़बूत टूल (औज़ार) था, लेकिन अब प्रक्रियाएँ इतनी कॉम्प्लेक्स (जटिल) बना दी गई हैं कि आम आदमी निराश हो जाए। इसका नतीजा यह हुआ कि ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) घटी और सरकार को बिना जवाबदेही के काम करने की फ्रीडम (छूट) मिल गई।
भ्रष्टाचार पर निगरानी के लिए बने लोकपाल को धीरे-धीरे निष्क्रिय कर दिया गया, जिससे इंसाफ़ की उम्मीद कमज़ोर हुई। जिस संस्था से सत्ता पर निगरानी होनी थी, वही आज साइलेंट (मौन) दिखाई देती है। नियुक्ति, अधिकार और कामकाज में जानबूझकर ऐसी डिले (देरी) की गई कि लोकपाल केवल नाम का रह गया। इसका नतीजा यह हुआ कि करप्शन पर अंकुश ढीला पड़ा और जवाबदेही की कल्पना भी धुंधली होती चली गई।
Prevention of Corruption Act में किए गए बदलावों ने घूसखोरी को लगभग। सुरक्षित बना दिया। पहले यह क़ानून इंसाफ़ और सख़्त कार्रवाई का सिंबल माना जाता था, लेकिन संशोधनों के बाद जाँच और सज़ा की प्रक्रिया कठिन हो गई। अफ़सरों को बचाने के लिए मंज़ूरी और अनुमति की कंडीशन (शर्त) जोड़ दी गई। इससे करप्शन पर डर कम हुआ और ईमानदारी का तसव्वुर (कल्पना) कमजोर पड़ गया।
इलेक्टोरल बॉन्ड की स्कीम ने राजनीतिक चंदे को पूरी तरह ग़ैर-पारदर्शी बना दिया। जनता यह जानने से वंचित रह गई कि पैसा किसने दिया और किसे मिला। इस व्यवस्था ने सत्ता और पूँजी के बीच डील को आसान किया और लूट को क़ानूनी कवर (आड़) दे दी। नतीजतन डेमोक्रेसी की जवाबदेही कमजोर हुई और चुनावी प्रक्रिया पर शक़ गहराता चला गया।
आज कानून शासन चलाने का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि सत्ता की ढाल बनते जा रहे हैं। नियमों का इस्तेमाल जनता को राहत देने के बजाय सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए हो रहा है। सवाल उठाने वालों पर कार्रवाई की रणनीति बनाई जाती है, जबकि जवाबदेही से बचने के रास्ते खोजे जाते हैं। इससे इंसाफ़ का तसव्वुर कमजोर पड़ता है और लोकतंत्र केवल फॉर्मैलिटी (औपचारिकता) बनकर रह जाता है।
इसके उलट मनमोहन सिंह सरकार के दौर में हक़ को नीति का सेंटर बनाया गया। सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार और रोज़गार के लिए मनरेगा जैसे कानून जनता की ज़रूरत से जुड़े थे। इन क़दमों का मक़सद (उद्देश्य) राहत नहीं, बल्कि नागरिक को सशक्त बनाना था। इन कानूनों ने डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) में जवाबदेही बढ़ाई और आम आदमी को सवाल पूछने की पावर दी।
उन कानूनों का असली मक़सद गरीब को केवल रिलीफ़ (राहत) देना नहीं, बल्कि उसे उसका हक़ दिलाना था। इन व्यवस्थाओं ने दया पर आधारित सिस्टम (प्रणाली) की जगह अधिकार आधारित सोच को प्रोमोट किया। इससे गरीब नागरिक सरकार पर निर्भर असहाय नहीं रहा, बल्कि सवाल पूछने वाला एक्टिव (सक्रिय) नागरिक बना। यही सोच लोकतंत्र को मज़बूत करती है और सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाती है।
वर्तमान दक्षिणपंथी सरकार ने पिछले वर्षों में एक भी नया अधिकार आधारित कानून पेश नहीं किया। सत्ता ने कानूनों को जनता की सुरक्षा या हक़ दिलाने के बजाय नियंत्रण और पूँजी वादियों के इंटरेस्ट के लिए मोड़ा। नए कानूनों की कमी ने आम नागरिक को सवाल पूछने और अपने हक़ की डिमांड (मांग) करने से महरूम रखा। इसका सीधा असर लोकतंत्र की ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) और जवाबदेही पर पड़ा, जिससे सरकार केवल सत्ता संरचना (पावर स्ट्रक्चर) की रक्षा करती दिखी।
इस स्थिति में समस्या केवल सरकार की क़ाबिलियत (क्षमता) की नहीं, बल्कि उसकी नीयत की है। फैसलों और नीतियों का फोकस जनता की भलाई पर नहीं, बल्कि मित्रों और पूँजीपतियों के इंटरेस्ट ( पर रहा। नियम और कानून जनता की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और धन की प्रोटेक्शन (सुरक्षा) के लिए बनाए गए।
यही वजह है कि गरीब और मजदूर वर्ग लगातार प्रेशर में हैं, जबकि वास्तविक जवाबदेही कहीं दिखाई नहीं देती।
नीति बिल्कुल साफ़ ( दिखाई देती है—गरीब से लिया जाए, और उसे सत्ता के दोस्तों में बाँट दिया जाए। आर्थिक फैसलों का फोकस (ध्यान) जनकल्याण नहीं, बल्कि चुनिंदा लोगों के इंटरेस्ट पर रहा। वहीं मंचों से भावनात्मक नैरेटिव (कथानक) और राष्ट्रवाद का शो (प्रदर्शन) बेचा गया। इस स्ट्रेटेजी ने असली मुद्दों से ध्यान हटाया और जनता को नारों में उलझाए रखा, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त लगातार कठिन होती चली गई।
इसलिए जब विपक्ष कहता है कि यह सरकार गरीब-विरोधी है, तो यह केवल आरोप नहीं, बल्कि फैक्ट-बेस्ड (तथ्यात्मक) हिसाब है। पिछले वर्षों में बनाए गए कानूनों और नीतियों का असर सीधे गरीब, किसान और मज़दूर पर पड़ा है।
आंकड़े और ज़मीनी हक़ीक़त स्पष्ट रूप से दिखाती हैं कि सत्ता का फोकस (ध्यान) जनता की भलाई पर नहीं, बल्कि कॉरपोरेट (बड़े उद्योगपतियों) और मित्रों के हितों पर रहा। यही वजह है कि यह निष्कर्ष जस्टिफ़ाइड है।
समापन
भारत की वर्तमान दक्षिणपंथी सरकार का यह दौर इतिहास में डेवलपमेंट (विकास) के लिए नहीं, बल्कि वैध की गई लूट के लिए याद किया जाएगा। देश चलाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर थी, वे केवल कॉरपोरेट (बड़े उद्योगपतियों) के हितों के गॉर्डियन (रक्षक) बनकर रह गए। नीति और कानून जनता की भलाई के बजाय सत्ता और मित्रों के लाभ के लिए इस्तेमाल किए गए। जब आने वाली पीढ़ियाँ इस समय को देखेंगी, तो उनका सवाल केवल इतना होगा—सरकार जनता के लिए थी या दोस्तों के बिज़नेस (धंधे) के लिए? यही सवाल इस युग की नैरेटिव (कथानक) को निर्धारित करेगा।
संकलन कर्ता

हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत और संदर्भ
हनी श्रीवास्तव की फेसबुक पोस्ट, 2025; राहुल गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वक्तव्य; भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियाँ; सरकारी रिपोर्ट्स एवं समाचार प्रकाशन।
