
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया
- प्रस्तावना:
आदिवासी’ एवं ‘मूलनिवासी’ की दर्शनशास्त्रीय व समाजशास्त्रीय अवधारणा
‘आदिवासी’ शब्द दो प्राचीन पदों के समन्वय से निष्पन्न हुआ है—‘आदि’ (अनादि/प्रारंभिक) तथा ‘वासी’ (अधिवासी/रहने वाला)। मानवशास्त्रीय एवं समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में, मूलनिवासी उन जनसमुदायों को निर्दिष्ट करते हैं जो किसी विशिष्ट भू-पर्यावरणीय परिधि में आधुनिक औपनिवेशिक, भाषाई अथवा सांस्कृतिक धाराओं के विस्तार से पूर्व से निरन्तर निवास करते आ रहे हैं।
पश्चिमी समाजशास्त्र में इन्हें ‘इंडीजीनस पीपल्स’,फर्स्ट नेशंस’ या ‘एबोरिजिनल’ (Aboriginal) कहा गया है, जबकि भारतीय संवैधानिक ढांचे में इन्हें ‘अनुसूचित जनजाति’ (Scheduled Tribes – ST) की संज्ञा दी गई है।
इनकी मूल चेतना का मुख्य आधार भूमि, वन, जल और जैव-विविधता के साथ तादात्म्य स्थापित करना है।
औद्योगिक सभ्यता जहाँ प्रकृति को केवल उपभोग्य वस्तु मानती है, वहीं आदिवासी दर्शन प्रकृति को ‘जीवंत सत्ता’ तथा ‘मातृ-स्वरूपा’ के रूप में स्वीकार करता है।
- विश्व मूलनिवासी/आदिवासी दिवस (9 अगस्त): ऐतिहासिक विकासक्रम, वैश्विक घोषणापत्र एवं व्यापक उद्देश्य
विश्व आदिवासी दिवस मात्र एक वार्षिक उत्सव नहीं, बल्कि भूमंडलीकृत दुनिया में मूलनिवासियों की स्वायत्तता, जल-जंगल-जमीन पर उनके अधिकारों और उनकी संकटापन्न सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का एक वैश्विक संकल्प-पत्र है।
ऐतिहासिक विकासक्रम
UNWGIP की स्थापना (1982)
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के मानवाधिकार आयोग के उप-आयोग के अंतर्गत UNWGIP (United Nations Working Group on Indigenous Populations) की प्रथम ऐतिहासिक बैठक 9 अगस्त 1982 को जेनेवा में आयोजित की गई थी।
अंतर्राष्ट्रीय दशक एवं घोषणा (1994)
1993 में UNWGIP के 11वें अधिवेशन में स्वीकृत मूलनिवासी घोषणा-प्रारूप के उपरांत, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 दिसंबर 1994 को संकल्प पारित कर प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘अंतर्राष्ट्रीय विश्व मूलनिवासी दिवस’
(International Day of the World’s Indigenous Peoples) के रूप में मनाना निश्चित किया।
UNDRIP (2007)
13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र ने ‘मूलनिवासियों के अधिकारों पर घोषणापत्र’ (United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples) स्वीकार किया, जो इनके स्व-निर्णय और सांस्कृतिक संरक्षण का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय कानूनी स्तंभ बना।
मुख्य उद्देश्य:
संवैधानिक एवं मानव अधिकारों का संरक्षण: वैश्विक स्तर पर मूलनिवासियों पर हो रहे नस्लीय भेदभाव, बेदखली और मानवाधिकार हनन को रोकना।
पारंपरिक ज्ञान प्रणाली (TEK) का सम्मान: जलवायु परिवर्तन,
जैव-विविधता क्षरण और पर्यावरण संकट से निपटने में उनके ‘पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान’ (Traditional Ecological Knowledge) को मान्यता देना।
भाषाई व सांस्कृतिक पुनरुद्धार
विलुप्त हो रही जनजातीय भाषाओं, वाचिक आख्यानों और लोक-परंपराओं को लिपिबद्ध व संरक्षित करना।
- वैश्विक एवं भारतीय जनजातीय परिदृश्य: नस्लीय वर्गीकरण, भौगोलिक विस्तार व आजीविका
दुनिया भर में लगभग 90 से अधिक देशों में 47 करोड़ से अधिक मूलनिवासी रहते हैं।
भारत में इनकी आबादी लगभग 10.43 करोड़ (कुल जनसंख्या का 8.6%) है, जिसमें 705 से अधिक अधिकृत जनजातीय समूह शामिल हैं।
(क) वैश्विक स्तर पर प्रमुख मूलनिवासी समूह
इनुइट एवं एस्किमो
आर्कटिक और उप-आर्कटिक क्षेत्र (कनाडा, अलास्का, ग्रीनलैंड) — बर्फ के घरों (इग्लू) में निवास, सील व व्हेल का शिकार तथा मत्स्य पालन।
माओरी
न्यूजीलैंड — समृद्ध वाचिक परंपरा, ‘हाका’ नृत्य शैली और भूमि संरक्षण का संघर्ष।
एबोरिजिनल्स
ऑस्ट्रेलिया — संसार की प्राचीनतम जीवित संस्कृतियों में से एक, जो शिकार और कंद-मूल एकत्रीकरण पर निर्भर रही हैं।
रेड इंडियन्स (नेटिव अमेरिकन्स)
उत्तर व दक्षिण अमेरिका — औपनिवेशिक काल में भारी विस्थापन का शिकार हुए ऐतिहासिक समुदाय।
(ख) भारत का जनजातीय व नस्लीय वर्गीकरण:
प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉइड समूह (Proto-Australoid Group)
प्रमुख जनजातियां: संताल, गोंड, भील, मुंडा, ओरांव, हो, खड़िया आदि।
भौगोलिक विस्तार
मध्य एवं पूर्वी भारत के अंतर्गत आने वाले राज्य—झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल।
आजीविका एवं आर्थिक संरचना
यह समूह मुख्य रूप से वर्षा आधारित पारंपरिक कृषि, लघु वनोपज संग्रहण (जैसे महुआ, तेंदू पत्ता, हरड़, बहड़ा, गोंद), पशुपालन और स्थानीय पत्थर व खनन मजदूरी पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है।
मंगोलॉयड समूह (Mongoloid Group)
प्रमुख जनजातियां
नागा, मिज़ो, खासी, गारो, बोडो, भुटिया, लेप्चा, चकमा आदि।
भौगोलिक विस्तार
उत्तर-पूर्वी भारत के राज्य—असम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और मणिपुर।
आजीविका एवं आर्थिक संरचना
इस समूह का जीवन यापन झूम (स्थानांतरित) कृषि, पहाड़ी बागवानी (अदरक, मिर्च, चाय), बांस व काष्ठ शिल्पकला और हाथ से की जाने वाली पारंपरिक बुनाई पर आधारित है।
नेग्रिटो समूह (Negrito Group)
प्रमुख जनजातियां: जारवा, ओंगे, सेंटिनलीज, ग्रेट अंडमानी, शोम्पेन आदि।
भौगोलिक विस्तार
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह का दुर्गम क्षेत्र।
आजीविका एवं आर्थिक संरचना
इनका जीवन यापन पूर्णतः वनाश्रित है, जो पारंपरिक आखेट (शिकार), तीर-धनुष से समुद्र व नदियों में मछली पकड़ने तथा कंद-मूल व जंगली फलों के एकत्रीकरण पर टिका है।
द्रविड़ियन समूह
प्रमुख जनजातियां: टोडा, कादर, चेंचू, इरुला, उराली, कुरुम्बा आदि।
भौगोलिक विस्तार
दक्षिण भारत के अंतर्गत आने वाले तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के नीलगिरी व पूर्वी-पश्चिमी घाट क्षेत्र।
आजीविका एवं आर्थिक संरचना
इनका मुख्य आर्थिक आधार पारंपरिक भैंस पालन व दुग्ध व्यवसाय, दुर्लभ जड़ी-बूटियों का एकत्रीकरण और पारंपरिक मधुमक्खी पालन है।
- सांस्कृतिक सूक्ष्मताएं: खान-पान, वास्तुकला, पहनावा, कला और सामाजिक व्यवस्था
जनजातीय संस्कृति कोई बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि उनकी दैनिक जीवन-प्रणाली का स्वतःस्फूर्त प्रवाह है। उनके जीवन से जुड़ी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विशेषताएं इस प्रकार हैं - खान-पान एवं पोषण विज्ञान:
अनाज एवं मोटा अनाज (Millets)
कुटकी, कोदो, रागी, बाजरा, मक्का और ज्वार इनके पारंपरिक मुख्य आहार हैं, जो अत्यधिक पौष्टिक और सुखाड़-रोधी होते हैं।
वनस्पति व साग
कंद-मूल (जैसे जिमीकंद, अरवी), सेमल के फूल, बांस के कोपल (Bamboo Shoots) और विभिन्न प्रकार की जंगली भाजियां (जैसे चेच भाजी, मुनगा)।
पारंपरिक पेय पदार्थ:
महुआ: मध्य भारत में महुआ के फूलों से निर्मित पेय धार्मिक और सामाजिक अवसरों का अभिन्न अंग है।
हाँडिया/पेज: चावल या कोदो को किण्वित करके बनाया गया पौष्टिक पेय, जो गर्मी में शरीर को ठंडा रखता है।
ताड़ी व सल्फी: खजूर और ताड़ के वृक्षों से प्राप्त प्राकृतिक पेय।
- वास्तुकला व रहन-सहन:
पर्यावरण-अनुकूल आवास
घर पूरी तरह से स्थानीय उपलब्ध सामग्रियों—मिट्टी, बांस, घास-फूस, लकड़ी और खपरैल से बनते हैं। ये घर ग्रीष्मकाल में ठंडे और शीतकाल में गर्म रहते हैं।
दीवारों की लोक-कला
घरों की लीपी-पोती दीवारों पर वरली (महाराष्ट्र), पिथोरा (गुजरात व राजस्थान), सोहराई व कोहबर (झारखंड) और गोंड आर्ट जैसी भव्य चित्रकलाएं उकेरी जाती हैं, जिनमें शिकार, नृत्य, सूर्य, वृक्ष और पशु-पक्षियों के दृश्य होते हैं।
- पहनावा, सौंदर्य एवं आभूषण
वस्त्र
प्राकृतिक धागों से बने सादे वस्त्र। उत्तर-पूर्व की जनजातियों में जटिल ज्यामितीय पैटर्न वाले रंग-बिरंगे शॉल्स (जैसे नागा शॉल्स) सामाजिक स्थिति के प्रतीक हैं।
आभूषण
चांदी, तांबा, गिलट, कांसा, पीतल के अलावा सीप, कौड़ियां, मूंगा, बीजों और पक्षियों के पंखों से बने आभूषण।
गोदना (Tattooing)
गोदना जनजातीय समाज में केवल सौंदर्य प्रसाधन नहीं, बल्कि शरीर पर उकेरी गई स्थाई सांस्कृतिक पहचान और आत्मा का आभूषण माना जाता है।
- सामाजिक संरचना एवं मूल्य:
समतामूलक समाज
पारंपरिक आदिवासी समाज में जातिगत ऊंच-नीच या जन्म आधारित विषमता नहीं होती।
लैंगिक समानता
कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां अनुपस्थित हैं। जीवनसाथी चुनने में युवक-युवतियों को स्वायत्तता प्राप्त रही है।
सामूहिक निर्णय एवं न्याय प्रणाली
प्रशासनिक एवं कानूनी प्रक्रियाओं से इतर ‘माझी हड़ाम’, ‘पड़ा व्यवस्था’ या ‘परहा पंचायत’ के माध्यम से विवादों का समाधान आपसी सहमति और सामूहिकता के आधार पर होता है।
- आदिवासी समाज की जटिल समस्याएं एवं प्रताड़ना का यथार्थ
आज आदिवासी समाज विकास के आधुनिक मॉडल और अपने अस्तित्व के संरक्षण के बीच एक अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है
(क) विस्थापन एवं संसाधनों का दोहन
भारत के अधिकांश खनिज भंडार (कोयला, बॉक्साइट, लौह अयस्क) और जल स्रोत जनजातीय बहुल वनों में स्थित हैं।
खनन, बड़े बांधों, राष्ट्रीय उद्यानों और औद्योगिक गलियारों के निर्माण के नाम पर करोड़ों आदिवासियों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल किया गया, जिससे वे अपनी ही भूमि पर शरणार्थी बनने को मजबूर हुए।
(ख) नक्सलवाद और दोहरी हिंसा की विडंबना
आदिवासी मूलतः हिंसक या उग्रवादी नहीं हैं: जनजातीय समाज का मूल स्वभाव शांतिप्रिय, सहिष्णु और प्राकृतिक नियमों का पालन करने वाला है।
8ओशोषण से उपजा असंतोष
जल-जंगल-जमीन छीनने, स्थानीय ठेकेदारों व साहूकारों के शोषण और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण उपजे असंतोष का लाभ उग्रवादी विचारधाराओं ने उठाया।
दोहरी मार का शिकार
दुर्गम वन क्षेत्रों में जारी हिंसा में आम आदिवासी पिस रहा है।
एक तरफ उग्रवादी गुट उन्हें पुलिस का ‘मुखबिर’ समझकर प्रताड़ित करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा बल संदेह के आधार पर निर्दोष आदिवासियों पर कानूनी कार्रवाई कर बैठते हैं।
(ग) सांस्कृतिक व भाषाई क्षरण
आधुनिक शिक्षा और औद्योगीकरण के दबाव में कई जनजातीय बोलियां लुप्तप्राय हो रही हैं। उनकी सांस्कृतिक पहचान को मुख्यधारा में विलीन करने के प्रयास भी उनकी अस्मिता के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।
- संवैधानिक सुरक्षा कवच एवं वर्तमान सरकारी योजनाएं
भारत सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों ने आदिवासियों के संरक्षण व उत्थान हेतु व्यापक संवैधानिक, कानूनी और योजनागत ढांचा तैयार किया है
(क) संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान
अनुच्छेद 342: राष्ट्रपति द्वारा जनजातियों को ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में अधिसूचित करने की शक्ति।
पांचवीं अनुसूची
असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम को छोड़कर अन्य राज्यों के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण पर रोक और विशेष प्रशासनिक स्वायत्तता।
छठी अनुसूची: उत्तर-पूर्वी राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से स्वशासन का अधिकार।
पेसा अधिनियम (PESA Act, 1996): ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम’ के तहत ग्राम सभाओं को प्राकृतिक संसाधनों, लघु वनोपज और भूमि विवादों के प्रबंधन का सर्वोच्च अधिकार।
वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006): वनाश्रित समुदायों को वनों में रहने, खेती करने और लघु वनोपज एकत्र करने का व्यक्तिगत व सामुदायिक कानूनी अधिकार।
(ख) प्रमुख केंद्रीय कल्याणकारी योजनाएं
प्रधानमंत्री जनमन (PM-JANMAN): ₹24,000 करोड़ से अधिक के बजट के साथ 75 विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (PVTGs) तक पक्के मकान, सड़क, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की एकीकृत योजना।
एकलव्य मॉडल आवासीय
विद्यालय (EMRS): दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों के मेधावी विद्यार्थियों को कक्षा 6 से 12 तक निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा प्रदान करना।
प्रधानमंत्री वन धन योजना (TRIFED के अंतर्गत): लघु वनोपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना, मूल्य संवर्धन हेतु स्वयं सहायता समूहों का गठन और बाजार उपलब्ध कराना।
राष्ट्रीय सकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन: जनजातीय आबादी में अनुवांशिक रूप से फैली ‘सिकल सेल’ बीमारी की व्यापक जांच, कार्ड वितरण और उपचार की पहल।
- समस्याओं के स्थायी समाधान हेतु व्यावहारिक एवं नीतिगत सुझाव
आदिवासियों को उनकी अस्मिता नष्ट किए बिना विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने आवश्यक हैं
‘FPIC’ (फ्री, प्रायर एंड इंफॉर्मड कंसेंट) का कड़ाई से पालन
किसी भी विकास, खनन या औद्योगिक परियोजना को मंजूरी देने से पूर्व स्थानीय ग्राम सभाओं की स्वतंत्र और सूचित पूर्व सहमति को अनिवार्य बनाया जाए।
वनाधिकार दावों का त्वरित निस्तारण
निरस्त किए गए लाखों व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार दावों की समीक्षा की जाए और पात्र आदिवासियों को तुरंत भूमि पट्टे दिए जाएं।
मातृभाषा-आधारित एवं संस्कृति-अनुकूल शिक्षा: प्राथमिक विद्यालयों में जनजातीय मातृभाषाओं में अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हो। पाठ्यक्रम में उनके स्थानीय इतिहास, लोक-कथाओं और पर्यावरण संरक्षण पद्धतियों को शामिल किया जाए।
स्वास्थ्य सेवाओं का स्थानीयकरण
आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ आदिवासियों के पारंपरिक जड़ी-बूटी ज्ञान और वैद्य-प्रणाली को मान्यता देकर एकीकृत स्वास्थ्य मॉडल बनाया जाए।
संवेदनशील प्रशासन एवं सुरक्षा बल
जनजातीय क्षेत्रों में नियुक्त प्रशासनिक अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों को स्थानीय भाषा, संस्कृति और संवेदनाओं का अनिवार्य प्रशिक्षण दिया जाए ताकि निर्दोष आदिवासियों पर उत्पीड़न रुके और विश्वास बहाली हो।
- निष्कर्ष
आदिवासी समाज केवल बीती हुई सदियों का अवशेष नहीं, बल्कि मानव जाति के सुरक्षित भविष्य का मार्गदर्शन करने वाला दीपस्तंभ है। वर्तमान वैश्विक संकट—चाहे वह ग्लोबल वार्मिंग हो, वनोन्मूलन हो या पारिस्थितिक असंतुलन—का समाधान उस सह-अस्तित्व और पर्यावरण-हितैषी जीवन-दर्शन में निहित है जिसे मूलनिवासियों ने हजारों वर्षों से संजोकर रखा है।
विकास का अर्थ केवल कंक्रीट के जंगल और औद्योगीकरण नहीं हो सकता; सच्चा विकास वह है जिसमें अंतिम पंक्ति में खड़े आदिवासी के स्वाभिमान, जल-जंगल-जमीन और संस्कृति की रक्षा सुनिश्चित हो। नीति-निर्माताओं और संपूर्ण नागरिक समाज का यह दायित्व है कि हम उन्हें केवल दया का पात्र न समझकर, उन्हें समानता, न्याय और सम्मान का अधिकार दें।

लेखक संकलन एवं प्रस्तुति
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक-94622-60179
ब्यावर-09-08-2026

