भूमिका
मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। जब किसी परिवार का प्रिय सदस्य इस संसार से विदा हो जाता है, तब शोक सभा का आयोजन उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा परिजनों को सांत्वना देने के उद्देश्य से किया जाता है। भारतीय समाज में यह परंपरा सदियों से संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों का प्रतीक रही है। किंतु समय के साथ शोक सभाओं का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। पहले यह दिखावा मुख्यतः तथाकथित उच्च वर्ग और संपन्न परिवारों तक सीमित माना जाता था, परंतु अब बहुजन और वंचित समाज के कुछ सक्षम वर्ग भी इस प्रवृत्ति से प्रभावित हो रहे हैं। जहां इस समाज में 40 पर्सेंट लोग गरीबी रेखा से नीचे जीते हो वहां यह सामाजिक चिंतन का विषय है।
- शोक सभा का मूल उद्देश्य और उसका परिवर्तन।
शोक सभा का वास्तविक उद्देश्य दुःख में डूबे परिवार को मानसिक संबल प्रदान करना, उनके दुख को साझा करना और दिवंगत व्यक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना होता है। यह वह अवसर होता है जब समाज परिवार को यह विश्वास दिलाता है कि वह अकेला नहीं है। लेकिन वर्तमान समय में इस उद्देश्य में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। शोक सभा का केंद्र संवेदना से हटकर बाहरी प्रदर्शन पर अधिक केंद्रित होता जा रहा है। कई स्थानों पर व्यवस्थाओं और सजावट पर इतना ध्यान दिया जाता है कि शोक की भावना गौण हो जाती है। अदब (सम्मान) की जगह स्टेटस (सामाजिक प्रतिष्ठा) दिखाने की प्रवृत्ति प्रमुख होती जा रही है। जबकि इस समाज में ऐसे लोग भी हैं जो लोकसभा की बैठक में आए हुए लोगों को चाय पिलाने में भी आर्थिक परेशानी होती है।
- उच्च वर्ग की परंपरा का अन्य वर्गों में प्रसार।
कभी शोक सभाओं में भव्य आयोजन करना केवल अमीर और प्रभावशाली वर्ग की पहचान माना जाता था। बड़े उद्योगपति, राजनेता और प्रतिष्ठित परिवार अपने सामाजिक प्रभाव को प्रदर्शित करने के लिए विशाल स्तर पर आयोजन करते थे। दुर्भाग्य से अब यही प्रवृत्ति अन्य सामाजिक वर्गों में भी दिखाई देने लगी है। आर्थिक रूप से मजबूत हुए बहुजन और वंचित समाज के कुछ लोग भी इसी पद्धति को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने लगे हैं। वे यह समझने लगे हैं कि बड़ा आयोजन ही सामाजिक सम्मान का आधार है। इस मानसिकता में रस्म (परंपरा) का स्वरूप बदल गया है और इमेज (छवि) निर्माण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जबकि इस परिवार के कई अन्य रिश्तेदार उनकी नकल करने में बिल्कुल असमर्थ होते हैं तो फिर ऐसे लोगों को क्या कहा जा सकता है?
- मंडपों और बैंक्वेट हॉलों की बढ़ती संस्कृति?
आज अनेक स्थानों पर शोक सभाओं के लिए विशाल मंडप लगाए जाते हैं। सफेद कपड़ों से सजावट, महंगे कालीन, वातानुकूलित व्यवस्था और आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग किया जाता है। कई परिवार तो बैंक्वेट हॉल या बड़े सभागार भी किराए पर लेते हैं। इन व्यवस्थाओं को देखकर आगंतुकों को कई बार ऐसा अनुभव होता है मानो वे किसी विवाह या उत्सव में आए हों। शोक की गंभीरता कहीं खो जाती है और भव्यता का वातावरण प्रमुख बन जाता है। इस प्रकार शोक सभा की मूल कैफ़ियत (स्थिति) बदल जाती है और पूरा इवेंट (विशेष आयोजन) सामाजिक प्रदर्शन का मंच बनकर रह जाता है। जहां शोक प्रकट करने का आयोजन त्योहार जैसी आभा बिखेरता हो तो फिर इससे बढ़कर नैतिक पतन किसे कहेंगे?
- श्रद्धांजलि या प्रदर्शन का मंच?
मृतक के बड़े चित्र को फूलों और आकर्षक सजावट के बीच मंच पर स्थापित करना सामान्य बात हो गई है। श्रद्धांजलि देना एक सकारात्मक परंपरा है, किंतु जब इसका उद्देश्य श्रद्धा से अधिक भव्यता प्रदर्शित करना बन जाए तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कई स्थानों पर मंच की सजावट इतनी विस्तृत होती है कि वह किसी सार्वजनिक समारोह जैसी प्रतीत होती है। कुछ लोग तो ऐसे अवसरों पर भी औपचारिक फोटो और वीडियो बनवाने में रुचि लेते हैं। जबकि ऐसे समय में ख़ुलूस (निष्कपट अपनापन) और आत्मीयता अपेक्षित होती है, न कि प्रेजेंटेशन (प्रस्तुतीकरण) की चमक-दमक। पता नहीं मेरे समाज का मानसिक सोच का दिवाला निकल गया है इसके बारे में कहने वाले को भी शर्म आती है।
- भीड़ और प्रभाव का नया पैमाना।
अब शोक सभा में कितने लोग आए, कितनी गाड़ियाँ लगीं, कितने नेता और अधिकारी पहुँचे, इसकी चर्चा विशेष रूप से होने लगी है। कई बार परिवारजन भी इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि उनकी सभा में बड़ी संख्या में प्रभावशाली लोग उपस्थित हुए। इससे शोक सभा सामाजिक प्रभाव मापने का माध्यम बनती जा रही है। वास्तविक दुःख और संवेदना पीछे छूट जाते हैं। लोगों की उपस्थिति को मानवीय सहयोग की दृष्टि से देखने के बजाय प्रतिष्ठा के पैमाने के रूप में देखा जाता है। परिणामस्वरूप हमदर्दी (सहानुभूति) का स्थान नेटवर्क (संपर्क तंत्र) लेने लगता है, जो चिंता का विषय है। जब संवेदना का आकलन आने वाले लोगों की अमीरी से झलकता हो तो फिर उस समाज के नैतिक पतन से कोई रोक नहीं सकता है।
- मध्यमवर्ग पर बढ़ता आर्थिक दबाव।
इस दिखावे की सबसे बड़ी कीमत मध्यमवर्गीय और सीमित आय वाले परिवार चुकाते हैं। वे जानते हैं कि इतना खर्च करना उनकी क्षमता से बाहर है, फिर भी सामाजिक दबाव के कारण ऐसा करने को विवश हो जाते हैं। समाज में तुलना और प्रतिस्पर्धा का वातावरण उन्हें मानसिक तनाव में डाल देता है। कई बार परिवार ऋण लेकर भी शोक सभा का आयोजन करते हैं ताकि लोग उनकी आलोचना न करें। दुःख के समय आर्थिक संकट और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थिति में मजबूरी (विवशता) का भाव स्पष्ट दिखाई देता है और कम्पटीशन (प्रतिस्पर्धा) की मानसिकता समाज को गलत दिशा में ले जाती है। बच्चों को आगे पढाने के लिए आर्थिक मजबूरी का हवाला दिया जाता है लेकिन ऐसे दुख के समय भी दिखावे से बाज नहीं आते हैं लोग,?
- भोजन व्यवस्था का बढ़ता महत्व।
आज शोक सभाओं में भोजन और पेय पदार्थों की व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। चाय, कॉफी, शीतल पेय, मिनरल वाटर और विभिन्न प्रकार के नाश्ते सामान्य बात बन गए हैं। कुछ स्थानों पर तो भोजन की गुणवत्ता और विविधता चर्चा का विषय बन जाती है। इससे आयोजन का केंद्र शोक न रहकर आतिथ्य बन जाता है। दुःख की घड़ी में भी लोग व्यवस्था का मूल्यांकन करने लगते हैं। यह स्थिति शोक सभा की आत्मा के विपरीत है। ऐसे अवसरों पर तवज्जो (विशेष ध्यान) मृतक और परिवार पर होना चाहिए, न कि कैटरिंग (भोजन प्रबंधन सेवा) की भव्यता पर। समाज का वार्तालाप शौक संदेश के बजाय जहां आडंबर ले लेता हो लानत है ऐसी प्रगति पर।
- सामाजिक उन्नति और अनुकरण की समस्या।
बहुजन और वंचित समाज ने कठिन संघर्षों के बाद शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है। यह परिवर्तन सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन यदि उन्नति का अर्थ केवल संपन्न वर्ग की हर परंपरा का अनुकरण करना हो जाए, तो यह चिंतन का विषय बन जाता है। समाज को यह समझना होगा कि प्रगति का अर्थ विवेकपूर्ण चयन भी है। अच्छी बातों को अपनाना और बुरी प्रवृत्तियों से बचना ही वास्तविक उन्नति है। इस संदर्भ में शऊर (समझदारी) की आवश्यकता है। केवल फैशन (चलन) के कारण किसी प्रवृत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं कहा जा सकता। जहां ऐसी परंपराएं समाज को असंवेदनशील और बेगैरत की ओर ढकेलती हो इन्हें कैसे उचित कहा जा सकता है।
- संपन्न वर्ग की सामाजिक जिम्मेदारी।
जो परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हैं, उनके ऊपर समाज के प्रति विशेष जिम्मेदारी भी होती है। यदि वे शोक सभाओं को सादगीपूर्ण बनाएँ, तो समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। अनावश्यक खर्च करने के बजाय शिक्षा, चिकित्सा, छात्रवृत्ति या सामाजिक संस्थाओं को सहयोग दिया जा सकता है। इससे दिवंगत व्यक्ति की स्मृति भी सार्थक बनेगी और समाज का कल्याण भी होगा। वास्तविक सम्मान उसी में निहित है जिससे लोगों का जीवन बेहतर बने। ऐसी सोच को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। यही सच्ची ख़िदमत (सेवा) है और यही समाज के लिए आदर्श लीडरशिप (नेतृत्व) का परिचायक भी है। साधन संपन्न लोग कोई को ही आगे आना होगा समाज को आगे बढ़ाने के लिए और ऐसे प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए सबसे पहल इन लोगों को ही करनी होगी? अन्यथा यह बीमारी और बढ़ती जाएगी और समाज गर्त में चलता जाएगा।
- सादगी ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि।
समाज को इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। शोक सभा का उद्देश्य दुःख को साझा करना और परिवार को भावनात्मक सहारा देना है, न कि प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करना। यदि समाज सामूहिक रूप से सादगीपूर्ण परंपराओं को अपनाए, तो आर्थिक बोझ भी कम होगा और संवेदनाओं की गरिमा भी बनी रहेगी। सेवा संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। नए दिखावटी रिवाजों के बजाय मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यही इंसानियत (मानवता) का तकाज़ा है और यही आदर्श सामाजिक मॉडल (अनुकरणीय व्यवस्था) बन सकता है।जिस समाझ में दिखावा ज्यादा किया जाता है वह समाज आर्थिक और नैतिक रूप से खोखला होता चला जाता है और आने वाली पीढी का भविष्य संदिग्ध हो जाता है।
समापन
शोक सभा जीवन की नश्वरता का स्मरण कराने और दुःख की घड़ी में एक-दूसरे का सहारा बनने का माध्यम है। इसे प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। चाहे कोई भी वर्ग हो, मृत्यु जैसे गंभीर अवसर को आडंबर से मुक्त रखना ही समाज और संस्कृति के हित में है। संपन्न परिवारों को सादगी का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि मध्यमवर्गीय परिवार अनावश्यक दबाव में न आएँ। यदि शोक सभाएँ पुनः अपने मूल उद्देश्य—संवेदना, सहानुभूति और मानवीय सहयोग—की ओर लौटें, तो समाज अधिक संवेदनशील, समानतामूलक और मानवीय बन सकेगा।
शेर
मय्यत भी आज दौलत की नुमाइश का सबब बनी,
आँसू रहे किनारे, महफ़िल सजी तो शोक हार गया।
संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात।
9 8292 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
बहुजन और वंचित समाज में
भारतीय सामाजिक परंपराएँ, ग्रामीण-शहरी अनुभव, समाजशास्त्रीय अवलोकन, लोक व्यवहार, शोक संस्कारों की बदलती प्रवृत्तियों का विश्लेषण।
“बहुजन और वंचित समाज में बढ़ता शोक सभाओं का आडंबर : एक सामाजिक चिंता!”
भूमिका
मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। जब किसी परिवार का प्रिय सदस्य इस संसार से विदा हो जाता है, तब शोक सभा का आयोजन उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा परिजनों को सांत्वना देने के उद्देश्य से किया जाता है। भारतीय समाज में यह परंपरा सदियों से संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों का प्रतीक रही है। किंतु समय के साथ शोक सभाओं का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। पहले यह दिखावा मुख्यतः तथाकथित उच्च वर्ग और संपन्न परिवारों तक सीमित माना जाता था, परंतु अब बहुजन और वंचित समाज के कुछ सक्षम वर्ग भी इस प्रवृत्ति से प्रभावित हो रहे हैं। जहां इस समाज में 40 पर्सेंट लोग गरीबी रेखा से नीचे जीते हो वहां यह सामाजिक चिंतन का विषय है।
- शोक सभा का मूल उद्देश्य और उसका परिवर्तन।
शोक सभा का वास्तविक उद्देश्य दुःख में डूबे परिवार को मानसिक संबल प्रदान करना, उनके दुख को साझा करना और दिवंगत व्यक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना होता है। यह वह अवसर होता है जब समाज परिवार को यह विश्वास दिलाता है कि वह अकेला नहीं है। लेकिन वर्तमान समय में इस उद्देश्य में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। शोक सभा का केंद्र संवेदना से हटकर बाहरी प्रदर्शन पर अधिक केंद्रित होता जा रहा है। कई स्थानों पर व्यवस्थाओं और सजावट पर इतना ध्यान दिया जाता है कि शोक की भावना गौण हो जाती है। अदब (सम्मान) की जगह स्टेटस (सामाजिक प्रतिष्ठा) दिखाने की प्रवृत्ति प्रमुख होती जा रही है। जबकि इस समाज में ऐसे लोग भी हैं जो लोकसभा की बैठक में आए हुए लोगों को चाय पिलाने में भी आर्थिक परेशानी होती है।
- उच्च वर्ग की परंपरा का अन्य वर्गों में प्रसार।
कभी शोक सभाओं में भव्य आयोजन करना केवल अमीर और प्रभावशाली वर्ग की पहचान माना जाता था। बड़े उद्योगपति, राजनेता और प्रतिष्ठित परिवार अपने सामाजिक प्रभाव को प्रदर्शित करने के लिए विशाल स्तर पर आयोजन करते थे। दुर्भाग्य से अब यही प्रवृत्ति अन्य सामाजिक वर्गों में भी दिखाई देने लगी है। आर्थिक रूप से मजबूत हुए बहुजन और वंचित समाज के कुछ लोग भी इसी पद्धति को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने लगे हैं। वे यह समझने लगे हैं कि बड़ा आयोजन ही सामाजिक सम्मान का आधार है। इस मानसिकता में रस्म (परंपरा) का स्वरूप बदल गया है और इमेज (छवि) निर्माण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जबकि इस परिवार के कई अन्य रिश्तेदार उनकी नकल करने में बिल्कुल असमर्थ होते हैं तो फिर ऐसे लोगों को क्या कहा जा सकता है?
- मंडपों और बैंक्वेट हॉलों की बढ़ती संस्कृति?
आज अनेक स्थानों पर शोक सभाओं के लिए विशाल मंडप लगाए जाते हैं। सफेद कपड़ों से सजावट, महंगे कालीन, वातानुकूलित व्यवस्था और आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग किया जाता है। कई परिवार तो बैंक्वेट हॉल या बड़े सभागार भी किराए पर लेते हैं। इन व्यवस्थाओं को देखकर आगंतुकों को कई बार ऐसा अनुभव होता है मानो वे किसी विवाह या उत्सव में आए हों। शोक की गंभीरता कहीं खो जाती है और भव्यता का वातावरण प्रमुख बन जाता है। इस प्रकार शोक सभा की मूल कैफ़ियत (स्थिति) बदल जाती है और पूरा इवेंट (विशेष आयोजन) सामाजिक प्रदर्शन का मंच बनकर रह जाता है। जहां शोक प्रकट करने का आयोजन त्योहार जैसी आभा बिखेरता हो तो फिर इससे बढ़कर नैतिक पतन किसे कहेंगे?
- श्रद्धांजलि या प्रदर्शन का मंच?
मृतक के बड़े चित्र को फूलों और आकर्षक सजावट के बीच मंच पर स्थापित करना सामान्य बात हो गई है। श्रद्धांजलि देना एक सकारात्मक परंपरा है, किंतु जब इसका उद्देश्य श्रद्धा से अधिक भव्यता प्रदर्शित करना बन जाए तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कई स्थानों पर मंच की सजावट इतनी विस्तृत होती है कि वह किसी सार्वजनिक समारोह जैसी प्रतीत होती है। कुछ लोग तो ऐसे अवसरों पर भी औपचारिक फोटो और वीडियो बनवाने में रुचि लेते हैं। जबकि ऐसे समय में ख़ुलूस (निष्कपट अपनापन) और आत्मीयता अपेक्षित होती है, न कि प्रेजेंटेशन (प्रस्तुतीकरण) की चमक-दमक। पता नहीं मेरे समाज का मानसिक सोच का दिवाला निकल गया है इसके बारे में कहने वाले को भी शर्म आती है।
- भीड़ और प्रभाव का नया पैमाना।
अब शोक सभा में कितने लोग आए, कितनी गाड़ियाँ लगीं, कितने नेता और अधिकारी पहुँचे, इसकी चर्चा विशेष रूप से होने लगी है। कई बार परिवारजन भी इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि उनकी सभा में बड़ी संख्या में प्रभावशाली लोग उपस्थित हुए। इससे शोक सभा सामाजिक प्रभाव मापने का माध्यम बनती जा रही है। वास्तविक दुःख और संवेदना पीछे छूट जाते हैं। लोगों की उपस्थिति को मानवीय सहयोग की दृष्टि से देखने के बजाय प्रतिष्ठा के पैमाने के रूप में देखा जाता है। परिणामस्वरूप हमदर्दी (सहानुभूति) का स्थान नेटवर्क (संपर्क तंत्र) लेने लगता है, जो चिंता का विषय है। जब संवेदना का आकलन आने वाले लोगों की अमीरी से झलकता हो तो फिर उस समाज के नैतिक पतन से कोई रोक नहीं सकता है।
- मध्यमवर्ग पर बढ़ता आर्थिक दबाव।
इस दिखावे की सबसे बड़ी कीमत मध्यमवर्गीय और सीमित आय वाले परिवार चुकाते हैं। वे जानते हैं कि इतना खर्च करना उनकी क्षमता से बाहर है, फिर भी सामाजिक दबाव के कारण ऐसा करने को विवश हो जाते हैं। समाज में तुलना और प्रतिस्पर्धा का वातावरण उन्हें मानसिक तनाव में डाल देता है। कई बार परिवार ऋण लेकर भी शोक सभा का आयोजन करते हैं ताकि लोग उनकी आलोचना न करें। दुःख के समय आर्थिक संकट और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थिति में मजबूरी (विवशता) का भाव स्पष्ट दिखाई देता है और कम्पटीशन (प्रतिस्पर्धा) की मानसिकता समाज को गलत दिशा में ले जाती है। बच्चों को आगे पढाने के लिए आर्थिक मजबूरी का हवाला दिया जाता है लेकिन ऐसे दुख के समय भी दिखावे से बाज नहीं आते हैं लोग,?
- भोजन व्यवस्था का बढ़ता महत्व।
आज शोक सभाओं में भोजन और पेय पदार्थों की व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। चाय, कॉफी, शीतल पेय, मिनरल वाटर और विभिन्न प्रकार के नाश्ते सामान्य बात बन गए हैं। कुछ स्थानों पर तो भोजन की गुणवत्ता और विविधता चर्चा का विषय बन जाती है। इससे आयोजन का केंद्र शोक न रहकर आतिथ्य बन जाता है। दुःख की घड़ी में भी लोग व्यवस्था का मूल्यांकन करने लगते हैं। यह स्थिति शोक सभा की आत्मा के विपरीत है। ऐसे अवसरों पर तवज्जो (विशेष ध्यान) मृतक और परिवार पर होना चाहिए, न कि कैटरिंग (भोजन प्रबंधन सेवा) की भव्यता पर। समाज का वार्तालाप शौक संदेश के बजाय जहां आडंबर ले लेता हो लानत है ऐसी प्रगति पर।
- सामाजिक उन्नति और अनुकरण की समस्या।
बहुजन और वंचित समाज ने कठिन संघर्षों के बाद शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है। यह परिवर्तन सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन यदि उन्नति का अर्थ केवल संपन्न वर्ग की हर परंपरा का अनुकरण करना हो जाए, तो यह चिंतन का विषय बन जाता है। समाज को यह समझना होगा कि प्रगति का अर्थ विवेकपूर्ण चयन भी है। अच्छी बातों को अपनाना और बुरी प्रवृत्तियों से बचना ही वास्तविक उन्नति है। इस संदर्भ में शऊर (समझदारी) की आवश्यकता है। केवल फैशन (चलन) के कारण किसी प्रवृत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं कहा जा सकता। जहां ऐसी परंपराएं समाज को असंवेदनशील और बेगैरत की ओर ढकेलती हो इन्हें कैसे उचित कहा जा सकता है।
- संपन्न वर्ग की सामाजिक जिम्मेदारी।
जो परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हैं, उनके ऊपर समाज के प्रति विशेष जिम्मेदारी भी होती है। यदि वे शोक सभाओं को सादगीपूर्ण बनाएँ, तो समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। अनावश्यक खर्च करने के बजाय शिक्षा, चिकित्सा, छात्रवृत्ति या सामाजिक संस्थाओं को सहयोग दिया जा सकता है। इससे दिवंगत व्यक्ति की स्मृति भी सार्थक बनेगी और समाज का कल्याण भी होगा। वास्तविक सम्मान उसी में निहित है जिससे लोगों का जीवन बेहतर बने। ऐसी सोच को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। यही सच्ची ख़िदमत (सेवा) है और यही समाज के लिए आदर्श लीडरशिप (नेतृत्व) का परिचायक भी है। साधन संपन्न लोग कोई को ही आगे आना होगा समाज को आगे बढ़ाने के लिए और ऐसे प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए सबसे पहल इन लोगों को ही करनी होगी? अन्यथा यह बीमारी और बढ़ती जाएगी और समाज गर्त में चलता जाएगा।
- सादगी ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि।
समाज को इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। शोक सभा का उद्देश्य दुःख को साझा करना और परिवार को भावनात्मक सहारा देना है, न कि प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करना। यदि समाज सामूहिक रूप से सादगीपूर्ण परंपराओं को अपनाए, तो आर्थिक बोझ भी कम होगा और संवेदनाओं की गरिमा भी बनी रहेगी। सेवा संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। नए दिखावटी रिवाजों के बजाय मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यही इंसानियत (मानवता) का तकाज़ा है और यही आदर्श सामाजिक मॉडल (अनुकरणीय व्यवस्था) बन सकता है।जिस समाझ में दिखावा ज्यादा किया जाता है वह समाज आर्थिक और नैतिक रूप से खोखला होता चला जाता है और आने वाली पीढी का भविष्य संदिग्ध हो जाता है।
समापन
शोक सभा जीवन की नश्वरता का स्मरण कराने और दुःख की घड़ी में एक-दूसरे का सहारा बनने का माध्यम है। इसे प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। चाहे कोई भी वर्ग हो, मृत्यु जैसे गंभीर अवसर को आडंबर से मुक्त रखना ही समाज और संस्कृति के हित में है। संपन्न परिवारों को सादगी का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि मध्यमवर्गीय परिवार अनावश्यक दबाव में न आएँ। यदि शोक सभाएँ पुनः अपने मूल उद्देश्य—संवेदना, सहानुभूति और मानवीय सहयोग—की ओर लौटें, तो समाज अधिक संवेदनशील, समानतामूलक और मानवीय बन सकेगा।
शेर
मय्यत भी आज दौलत की नुमाइश का सबब बनी,
आँसू रहे किनारे, महफ़िल सजी तो शोक हार गया।
संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात।
9 8292 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
बहुजन और वंचित समाज में
भारतीय सामाजिक परंपराएँ, ग्रामीण-शहरी अनुभव, समाजशास्त्रीय अवलोकन, लोक व्यवहार, शोक संस्कारों की बदलती प्रवृत्तियों का विश्लेषण।
भूमिका
मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। जब किसी परिवार का प्रिय सदस्य इस संसार से विदा हो जाता है, तब शोक सभा का आयोजन उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा परिजनों को सांत्वना देने के उद्देश्य से किया जाता है। भारतीय समाज में यह परंपरा सदियों से संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों का प्रतीक रही है। किंतु समय के साथ शोक सभाओं का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। पहले यह दिखावा मुख्यतः तथाकथित उच्च वर्ग और संपन्न परिवारों तक सीमित माना जाता था, परंतु अब बहुजन और वंचित समाज के कुछ सक्षम वर्ग भी इस प्रवृत्ति से प्रभावित हो रहे हैं। जहां इस समाज में 40 पर्सेंट लोग गरीबी रेखा से नीचे जीते हो वहां यह सामाजिक चिंतन का विषय है।
- शोक सभा का मूल उद्देश्य और उसका परिवर्तन।
शोक सभा का वास्तविक उद्देश्य दुःख में डूबे परिवार को मानसिक संबल प्रदान करना, उनके दुख को साझा करना और दिवंगत व्यक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना होता है। यह वह अवसर होता है जब समाज परिवार को यह विश्वास दिलाता है कि वह अकेला नहीं है। लेकिन वर्तमान समय में इस उद्देश्य में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। शोक सभा का केंद्र संवेदना से हटकर बाहरी प्रदर्शन पर अधिक केंद्रित होता जा रहा है। कई स्थानों पर व्यवस्थाओं और सजावट पर इतना ध्यान दिया जाता है कि शोक की भावना गौण हो जाती है। अदब (सम्मान) की जगह स्टेटस (सामाजिक प्रतिष्ठा) दिखाने की प्रवृत्ति प्रमुख होती जा रही है। जबकि इस समाज में ऐसे लोग भी हैं जो लोकसभा की बैठक में आए हुए लोगों को चाय पिलाने में भी आर्थिक परेशानी होती है।
- उच्च वर्ग की परंपरा का अन्य वर्गों में प्रसार।
कभी शोक सभाओं में भव्य आयोजन करना केवल अमीर और प्रभावशाली वर्ग की पहचान माना जाता था। बड़े उद्योगपति, राजनेता और प्रतिष्ठित परिवार अपने सामाजिक प्रभाव को प्रदर्शित करने के लिए विशाल स्तर पर आयोजन करते थे। दुर्भाग्य से अब यही प्रवृत्ति अन्य सामाजिक वर्गों में भी दिखाई देने लगी है। आर्थिक रूप से मजबूत हुए बहुजन और वंचित समाज के कुछ लोग भी इसी पद्धति को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने लगे हैं। वे यह समझने लगे हैं कि बड़ा आयोजन ही सामाजिक सम्मान का आधार है। इस मानसिकता में रस्म (परंपरा) का स्वरूप बदल गया है और इमेज (छवि) निर्माण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जबकि इस परिवार के कई अन्य रिश्तेदार उनकी नकल करने में बिल्कुल असमर्थ होते हैं तो फिर ऐसे लोगों को क्या कहा जा सकता है?
- मंडपों और बैंक्वेट हॉलों की बढ़ती संस्कृति?
आज अनेक स्थानों पर शोक सभाओं के लिए विशाल मंडप लगाए जाते हैं। सफेद कपड़ों से सजावट, महंगे कालीन, वातानुकूलित व्यवस्था और आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग किया जाता है। कई परिवार तो बैंक्वेट हॉल या बड़े सभागार भी किराए पर लेते हैं। इन व्यवस्थाओं को देखकर आगंतुकों को कई बार ऐसा अनुभव होता है मानो वे किसी विवाह या उत्सव में आए हों। शोक की गंभीरता कहीं खो जाती है और भव्यता का वातावरण प्रमुख बन जाता है। इस प्रकार शोक सभा की मूल कैफ़ियत (स्थिति) बदल जाती है और पूरा इवेंट (विशेष आयोजन) सामाजिक प्रदर्शन का मंच बनकर रह जाता है। जहां शोक प्रकट करने का आयोजन त्योहार जैसी आभा बिखेरता हो तो फिर इससे बढ़कर नैतिक पतन किसे कहेंगे?
- श्रद्धांजलि या प्रदर्शन का मंच?
मृतक के बड़े चित्र को फूलों और आकर्षक सजावट के बीच मंच पर स्थापित करना सामान्य बात हो गई है। श्रद्धांजलि देना एक सकारात्मक परंपरा है, किंतु जब इसका उद्देश्य श्रद्धा से अधिक भव्यता प्रदर्शित करना बन जाए तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कई स्थानों पर मंच की सजावट इतनी विस्तृत होती है कि वह किसी सार्वजनिक समारोह जैसी प्रतीत होती है। कुछ लोग तो ऐसे अवसरों पर भी औपचारिक फोटो और वीडियो बनवाने में रुचि लेते हैं। जबकि ऐसे समय में ख़ुलूस (निष्कपट अपनापन) और आत्मीयता अपेक्षित होती है, न कि प्रेजेंटेशन (प्रस्तुतीकरण) की चमक-दमक। पता नहीं मेरे समाज का मानसिक सोच का दिवाला निकल गया है इसके बारे में कहने वाले को भी शर्म आती है।
- भीड़ और प्रभाव का नया पैमाना।
अब शोक सभा में कितने लोग आए, कितनी गाड़ियाँ लगीं, कितने नेता और अधिकारी पहुँचे, इसकी चर्चा विशेष रूप से होने लगी है। कई बार परिवारजन भी इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि उनकी सभा में बड़ी संख्या में प्रभावशाली लोग उपस्थित हुए। इससे शोक सभा सामाजिक प्रभाव मापने का माध्यम बनती जा रही है। वास्तविक दुःख और संवेदना पीछे छूट जाते हैं। लोगों की उपस्थिति को मानवीय सहयोग की दृष्टि से देखने के बजाय प्रतिष्ठा के पैमाने के रूप में देखा जाता है। परिणामस्वरूप हमदर्दी (सहानुभूति) का स्थान नेटवर्क (संपर्क तंत्र) लेने लगता है, जो चिंता का विषय है। जब संवेदना का आकलन आने वाले लोगों की अमीरी से झलकता हो तो फिर उस समाज के नैतिक पतन से कोई रोक नहीं सकता है।
- मध्यमवर्ग पर बढ़ता आर्थिक दबाव।
इस दिखावे की सबसे बड़ी कीमत मध्यमवर्गीय और सीमित आय वाले परिवार चुकाते हैं। वे जानते हैं कि इतना खर्च करना उनकी क्षमता से बाहर है, फिर भी सामाजिक दबाव के कारण ऐसा करने को विवश हो जाते हैं। समाज में तुलना और प्रतिस्पर्धा का वातावरण उन्हें मानसिक तनाव में डाल देता है। कई बार परिवार ऋण लेकर भी शोक सभा का आयोजन करते हैं ताकि लोग उनकी आलोचना न करें। दुःख के समय आर्थिक संकट और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थिति में मजबूरी (विवशता) का भाव स्पष्ट दिखाई देता है और कम्पटीशन (प्रतिस्पर्धा) की मानसिकता समाज को गलत दिशा में ले जाती है। बच्चों को आगे पढाने के लिए आर्थिक मजबूरी का हवाला दिया जाता है लेकिन ऐसे दुख के समय भी दिखावे से बाज नहीं आते हैं लोग,?
- भोजन व्यवस्था का बढ़ता महत्व।
आज शोक सभाओं में भोजन और पेय पदार्थों की व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। चाय, कॉफी, शीतल पेय, मिनरल वाटर और विभिन्न प्रकार के नाश्ते सामान्य बात बन गए हैं। कुछ स्थानों पर तो भोजन की गुणवत्ता और विविधता चर्चा का विषय बन जाती है। इससे आयोजन का केंद्र शोक न रहकर आतिथ्य बन जाता है। दुःख की घड़ी में भी लोग व्यवस्था का मूल्यांकन करने लगते हैं। यह स्थिति शोक सभा की आत्मा के विपरीत है। ऐसे अवसरों पर तवज्जो (विशेष ध्यान) मृतक और परिवार पर होना चाहिए, न कि कैटरिंग (भोजन प्रबंधन सेवा) की भव्यता पर। समाज का वार्तालाप शौक संदेश के बजाय जहां आडंबर ले लेता हो लानत है ऐसी प्रगति पर।
- सामाजिक उन्नति और अनुकरण की समस्या।
बहुजन और वंचित समाज ने कठिन संघर्षों के बाद शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है। यह परिवर्तन सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन यदि उन्नति का अर्थ केवल संपन्न वर्ग की हर परंपरा का अनुकरण करना हो जाए, तो यह चिंतन का विषय बन जाता है। समाज को यह समझना होगा कि प्रगति का अर्थ विवेकपूर्ण चयन भी है। अच्छी बातों को अपनाना और बुरी प्रवृत्तियों से बचना ही वास्तविक उन्नति है। इस संदर्भ में शऊर (समझदारी) की आवश्यकता है। केवल फैशन (चलन) के कारण किसी प्रवृत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं कहा जा सकता। जहां ऐसी परंपराएं समाज को असंवेदनशील और बेगैरत की ओर ढकेलती हो इन्हें कैसे उचित कहा जा सकता है।
- संपन्न वर्ग की सामाजिक जिम्मेदारी।
जो परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हैं, उनके ऊपर समाज के प्रति विशेष जिम्मेदारी भी होती है। यदि वे शोक सभाओं को सादगीपूर्ण बनाएँ, तो समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। अनावश्यक खर्च करने के बजाय शिक्षा, चिकित्सा, छात्रवृत्ति या सामाजिक संस्थाओं को सहयोग दिया जा सकता है। इससे दिवंगत व्यक्ति की स्मृति भी सार्थक बनेगी और समाज का कल्याण भी होगा। वास्तविक सम्मान उसी में निहित है जिससे लोगों का जीवन बेहतर बने। ऐसी सोच को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। यही सच्ची ख़िदमत (सेवा) है और यही समाज के लिए आदर्श लीडरशिप (नेतृत्व) का परिचायक भी है। साधन संपन्न लोग कोई को ही आगे आना होगा समाज को आगे बढ़ाने के लिए और ऐसे प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए सबसे पहल इन लोगों को ही करनी होगी? अन्यथा यह बीमारी और बढ़ती जाएगी और समाज गर्त में चलता जाएगा।
- सादगी ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि।
समाज को इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। शोक सभा का उद्देश्य दुःख को साझा करना और परिवार को भावनात्मक सहारा देना है, न कि प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करना। यदि समाज सामूहिक रूप से सादगीपूर्ण परंपराओं को अपनाए, तो आर्थिक बोझ भी कम होगा और संवेदनाओं की गरिमा भी बनी रहेगी। सेवा संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। नए दिखावटी रिवाजों के बजाय मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यही इंसानियत (मानवता) का तकाज़ा है और यही आदर्श सामाजिक मॉडल (अनुकरणीय व्यवस्था) बन सकता है।जिस समाझ में दिखावा ज्यादा किया जाता है वह समाज आर्थिक और नैतिक रूप से खोखला होता चला जाता है और आने वाली पीढी का भविष्य संदिग्ध हो जाता है।
समापन
शोक सभा जीवन की नश्वरता का स्मरण कराने और दुःख की घड़ी में एक-दूसरे का सहारा बनने का माध्यम है। इसे प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। चाहे कोई भी वर्ग हो, मृत्यु जैसे गंभीर अवसर को आडंबर से मुक्त रखना ही समाज और संस्कृति के हित में है। संपन्न परिवारों को सादगी का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि मध्यमवर्गीय परिवार अनावश्यक दबाव में न आएँ। यदि शोक सभाएँ पुनः अपने मूल उद्देश्य—संवेदना, सहानुभूति और मानवीय सहयोग—की ओर लौटें, तो समाज अधिक संवेदनशील, समानतामूलक और मानवीय बन सकेगा।
शेर
मय्यत भी आज दौलत की नुमाइश का सबब बनी,
आँसू रहे किनारे, महफ़िल सजी तो शोक हार गया।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात।
9 8292 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
बहुजन और वंचित समाज में
भारतीय सामाजिक परंपराएँ, ग्रामीण-शहरी अनुभव, समाजशास्त्रीय अवलोकन, लोक व्यवहार, शोक संस्कारों की बदलती प्रवृत्तियों का विश्लेषण।
