
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
आज हम सूचना क्रांति के उस दौर में जी रहे हैं जहाँ जानकारी हमारी उंगलियों पर उपलब्ध है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस गति से ज्ञान का प्रसार होना चाहिए था, उसी गति से अंधविश्वास’ और ‘भ्रामक सूचनाओं’ (Fake News) का जहर हमारे समाज की रगों में घोला जा रहा है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक प्रमुख राजनेता के नाम से वायरल हो रहा यह दावा—कि “जेब में प्याज रखने से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और कार में AC की जरूरत नहीं पड़ती”—हमारी सामूहिक समझ और तार्किक शक्ति पर एक बड़ा प्रहार है।
अंधविश्वास: प्रगति की राह में रोड़ा
जब हम बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के ऐसी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरी वैज्ञानिक प्रगति को पीछे धकेलते हैं।
एक तरफ हम मंगल और चंद्रमा पर बस्तियाँ बसाने की बात कर रहे हैं, और दूसरी तरफ ‘जेब में प्याज’ जैसे टोटकों को विज्ञान के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। यह न केवल हास्यास्पद है, बल्कि खतरनाक भी है।
फर्जी पोस्ट का मनोविज्ञान
और सामाजिक दुष्प्रभाव
ऐसी भ्रामक पोस्ट्स अक्सर किसी प्रभावशाली व्यक्तित्व के चेहरे का सहारा लेकर फैलाई जाती हैं ताकि लोग बिना सोचे-समझे उन पर भरोसा कर लें।
इसके पीछे दो मुख्य उद्देश्य होते हैं
जनता को दिग्भ्रमित करना
लोगों को तर्कहीन बनाकर उन्हें भीड़ का हिस्सा बनाना।
वैज्ञानिक चेतना को कमजोर करना
जब समाज तर्क करना छोड़ देता है, तो उसे नियंत्रित करना आसान हो जाता है।
एक ‘सामाजिक-आर्थिक चिंतक’ के रूप में मैं यह देख पा रहा हूँ कि यह केवल एक स्वास्थ्य संबंधी गलत सलाह नहीं है, बल्कि यह हमारे बौद्धिक विकास के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को भी नुकसान पहुँचाती है।
एक तर्कहीन समाज कभी भी नवाचार (Innovation) और आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सकता।
सत्य और विज्ञान का मार्ग हमें यह समझने की आवश्यकता है कि:
तापमान और विज्ञान
मानव शरीर का तापमान नियंत्रित करना एक जटिल जैविक प्रक्रिया है। प्याज को जेब में रखना किसी भी भौतिक या जैविक नियम के तहत शरीर को ठंडा नहीं कर सकता।
सतर्कता ही बचाव है
सोशल मीडिया पर आने वाली हर चमकती चीज सोना नहीं होती। किसी भी पोस्ट को आगे बढ़ाने (Forward) से पहले उसकी सत्यता की जांच अवश्य करें।
जागरूकता का आह्वान
मेरे ब्यावर और भारत देश के प्रबुद्ध साथियों, हमारा कर्तव्य है कि हम अपने संविधान में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) के मूल कर्तव्य का पालन करें।
किसी भी भ्रामक दावे को अपनी तर्कशक्ति की कसौटी पर कसें।
याद रखें
अंधविश्वास की जड़ें तभी फैलती हैं जब तर्क की धूप कम हो जाती है। आइए, हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें जो सूचनाओं का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उनका परीक्षक बने।
फर्जी खबरों के इस वायरस को ‘जागरूकता’ के एंटी-वायरस से खत्म करना ही आज के समय की सबसे बड़ी सामाजिक सेवा है।
शिक्षित बनें, तर्कशील बनें और जागरूक समाज की नींव रखें।
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक ब्यावर राजस्थान
