जब सवाल पूछना “देशद्रोह” बन जाए — तब समझिए लोकतंत्र खतरे में है।
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यह वही देश है जहाँ संविधान ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी, जहाँ शिक्षा को अधिकार माना गया और जहाँ लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं बल्कि सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार भी समझा गया। लेकिन आज देश के सामाजिक और राजनीतिक माहौल को देखकर एक भयावह प्रश्न खड़ा होता है—क्या इस देश में अब सचमुच सवाल पूछने की आज़ादी बची है? प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में भारत का 157वाँ स्थान केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उस गिरते हुए वातावरण का आईना है जहाँ मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता से जवाब मांगने के बजाय जनता की भावनाओं को भड़काने और आलोचना करने वालों को खलनायक बनाने में व्यस्त दिखाई देता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया यदि जनता की आवाज़ बनने के बजाय सत्ता का प्रचारक बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की आत्मा धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।
2.इस गिरते हुए माहौल की सबसे दर्दनाक मिसाल है कक्षा 12वीं का छात्र वेदांत। एक साधारण विद्यार्थी, जिसने न सरकार गिराने की बात की, न किसी धर्म के खिलाफ कुछ कहा, न देश तोड़ने की कोई भाषा बोली। उसने केवल इतना कहा कि सीबीएसई द्वारा भेजी गई उसकी आंसर शीट उसकी नहीं लग रही। उसने X पर अपना अकाउंट बनाकर पूरे मामले का थ्रेड पोस्ट किया। उसने कहा कि हैंडराइटिंग उसकी नहीं है, जवाब उसके नहीं हैं और कॉपी संदिग्ध लग रही है। यह कोई छोटा आरोप नहीं था। अगर किसी छात्र की उत्तरपुस्तिका बदल जाए या गलत कॉपी भेज दी जाए, तो यह केवल एक बच्चे का मामला नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न है। एक ऐसे देश में जहाँ करोड़ों युवा अपने भविष्य के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर हैं, वहाँ इस तरह का आरोप बेहद संवेदनशील और चिंताजनक माना जाना चाहिए था।
3.लेकिन देश में हुआ क्या? क्या मीडिया ने निष्पक्ष जांच की मांग की? क्या बड़े एंकरों ने सीबीएसई से जवाब माँगा? क्या शिक्षा मंत्रालय से पारदर्शिता पर सवाल पूछे गए? नहीं। इसके बजाय वही पुरानी फैक्ट्री सक्रिय हो गई—“देशद्रोही खोजो अभियान।” कुछ ट्रोल अकाउंट्स ने उस बच्चे को “पाकिस्तानी”, “विदेशी एजेंट” और “जॉर्ज सोरोस का आदमी” घोषित करना शुरू कर दिया। कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी एंकरों ने बिना किसी जांच के माहौल ऐसा बना दिया जैसे कोई राष्ट्रीय साजिश पकड़ी गई हो। सोचिए, एक स्कूली छात्र जिसने केवल अपनी कॉपी पर सवाल उठाया, उसे देशद्रोही साबित करने की कोशिश होने लगी। यह केवल सोशल मीडिया की भीड़ नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिबिंब था जो आज हर असहमति को राष्ट्रविरोध मानने लगी है।
4.सबसे दुखद बात यह है कि एक बच्चा, जो शायद अपने भविष्य को लेकर पहले से डरा हुआ होगा, जो उम्मीद कर रहा होगा कि कोई उसकी बात सुनेगा, वही बच्चा हजारों गालियाँ सुनने को मजबूर हो गया। उसका अपराध केवल इतना था कि उसने सिस्टम को भगवान मानने से इनकार कर दिया। आज इस देश में सबसे बड़ा अपराध भ्रष्टाचार नहीं रह गया है, बल्कि सवाल पूछना बनता जा रहा है। अगर छात्र झूठ बोल रहा था, तो सीबीएसई के पास पूरा रिकॉर्ड मौजूद था। एक मिनट में सच्चाई सामने लाई जा सकती थी। लेकिन अगर छात्र सच बोल रहा हो, तो यह शिक्षा व्यवस्था के चेहरे पर एक बहुत बड़ा तमाचा है। इसलिए शायद जांच से ज्यादा जरूरी यह समझा गया कि बच्चे की आवाज को ही दबा दिया जाए। यह वही मानसिकता है जिसमें संस्थाओं से जवाब मांगने वाले को “देशद्रोही” और आँख बंद करके हर बात मान लेने वाले को “देशभक्त” कहा जाने लगता है।
5.आज भारत का युवा केवल परीक्षाओं से नहीं लड़ रहा, बल्कि एक असंवेदनशील व्यवस्था से भी जूझ रहा है। नीट, एसएससी, यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक लगातार सामने आते हैं। लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं और फिर सिस्टम की गड़बड़ियों के कारण टूट जाते हैं। कई छात्र आत्महत्या तक कर लेते हैं। लेकिन इन घटनाओं पर कुछ दिनों की औपचारिक बहस के बाद सब शांत हो जाता है। कोई स्थायी सुधार नहीं होता। किसी की जवाबदेही तय नहीं होती। शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे एक ऐसे तंत्र में बदलती जा रही है जहाँ छात्रों से केवल सहन करने की उम्मीद की जाती है। उन्हें कहा जाता है—चुप रहो, सहते रहो, सवाल मत पूछो। क्योंकि अगर तुमने सवाल पूछा, तो तुम्हें ट्रोल किया जाएगा, बदनाम किया जाएगा और राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाएगा।
6.यह स्थिति केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। आज बेरोज़गारी पर सवाल पूछना असुविधाजनक माना जाता है। महँगाई पर बोलना “नकारात्मकता फैलाना” कहलाता है। गैस, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर चर्चा कम और भावनात्मक मुद्दों पर बहस ज्यादा होती है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध, दहेज के कारण होने वाली आत्महत्याएँ, किसानों की समस्याएँ, युवाओं की निराशा—ये सब असली मुद्दे हैं। लेकिन मीडिया का बड़ा हिस्सा इन सवालों पर गंभीर चर्चा करने के बजाय स्टूडियो में चीखते हुए राष्ट्रवाद का तमाशा दिखाने में लगा रहता है। टीवी स्क्रीन पर ऐसा माहौल बनाया जाता है जैसे देश का सबसे बड़ा खतरा बेरोज़गारी या भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले नागरिक हों। यही कारण है कि धीरे-धीरे जनता भी असली मुद्दों से भटकने लगती है।
7.आज युवाओं को एक खतरनाक संदेश दिया जा रहा है—“चुप रहो।” पेपर लीक पर चुप रहो। भ्रष्टाचार पर चुप रहो। अन्याय पर चुप रहो। अगर आवाज उठाओगे, तो आईटी सेल तुम्हारी नागरिकता तय करेगा। यह स्थिति केवल लोकतंत्र के लिए ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। जब बच्चे सवाल पूछने से डरने लगते हैं, तब शिक्षा मरने लगती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि सोचने और तर्क करने की क्षमता पैदा करना होता है। लेकिन अगर हर सवाल को “एंटी-नेशनल” और हर आलोचना को “षड्यंत्र” कहा जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ डरी हुई भीड़ बनकर रह जाएँगी। इतिहास गवाह है कि हर तानाशाही ने सबसे पहले सवाल पूछने वालों को निशाना बनाया, क्योंकि सवाल जवाबदेही मांगते हैं और जवाबदेही से डरने वाली व्यवस्था प्रचार को सच से ज्यादा महत्व देने लगती है।
8.आज भारत का बड़ा मीडिया वर्ग जनता का प्रहरी कम और सत्ता का प्रवक्ता अधिक दिखाई देता है। जब पत्रकार बेरोज़गारी पर सवाल नहीं पूछता, जब छात्र आत्महत्या की खबरें टीआरपी का हिस्सा बनकर रह जाती हैं, जब स्टूडियो में बैठे एंकर किसी बच्चे को बिना जांच “देशद्रोही” घोषित करने लगते हैं, तब समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता अपने मूल धर्म से भटक चुकी है। पत्रकारिता का काम सत्ता से जवाब मांगना होता है, जनता को डराना नहीं। लेकिन आज स्थिति ऐसी हो गई है कि कुछ मीडिया संस्थान खुद को अदालत और एंकर खुद को न्यायाधीश समझने लगे हैं। वे जांच एजेंसियों से पहले फैसला सुना देते हैं। यह केवल पत्रकारिता का पतन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का भी पतन है।
9.सबसे दुखद बात यह है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा अब इस माहौल को सामान्य मानने लगा है। लोग तथ्यों से ज्यादा नारों पर भरोसा करने लगे हैं। चरित्र हत्या अब “राष्ट्रवाद” के पैकेट में बेची जा रही है और अंधभक्ति को देशभक्ति कहा जा रहा है। लेकिन यह याद रखना होगा कि देश किसी सरकार या पार्टी से बड़ा होता है। संविधान हर नागरिक को सवाल पूछने और जवाब मांगने का अधिकार देता है। वेदांत सही था या गलत, यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन उसे सवाल पूछने का अधिकार है—यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। अगर आज एक छात्र को केवल इसलिए ट्रोल किया जा सकता है क्योंकि उसने अपनी कॉपी पर सवाल उठाया, तो कल कोई भी नागरिक अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ बोलने से डरेगा।
10.आज जरूरत केवल वेदांत के समर्थन की नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ खड़े होने की है जो हर असहमति को देशद्रोह बना देना चाहती है। मीडिया का काम जनता को जागरूक करना है, भीड़ को उकसाना नहीं। पत्रकारिता का धर्म सच की खोज है, सत्ता की पूजा नहीं। अगर इस देश का छात्र सवाल पूछने से डर गया, तो आने वाले समय में शिक्षा नहीं बचेगी, केवल प्रचार बचेगा। और जिस समाज में प्रचार सच पर भारी पड़ जाए, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है। हमें तय करना होगा कि हम एक जागरूक लोकतांत्रिक समाज बनना चाहते हैं या डर और अंधभक्ति से चलने वाली भीड़। क्योंकि जिस दिन इस देश के बच्चों ने सवाल पूछना छोड़ दिया, उसी दिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार होगी।
शेर :
सवाल पूछ लिया तो गुनहगार ठहरा दिया गया,
इस दौर में सच बोलना भी देशद्रोह बना दिया गया।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर )हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात !
9829 230966
स्रोत एवं संदर्भ :
शुभम शांडिल्य मिश्रा की थ्रेड्स पोस्ट से प्रेरित एवं
प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक, छात्र आंदोलनों, मीडिया बहसों, शिक्षा व्यवस्था संकट और सोशल मीडिया ट्रोल संस्कृति पर आधारित विश्लेषण।
