BJP का मुस्लिम जनसंख्या भय फैलाने वाला नॉरेटिव आंकड़ों से बिल्कुल मेल नहीं खाता !!

भूमिका भारत में अक्सर यह प्रचार सुना जाता है कि मुस्लिम समुदाय आने वाले समय में हिंदुओं से आगे बढ़ जाएगा और हिंदू अल्पमत बन जाएंगे। यह दावे केवल डर…

“मौन से आंदोलन तक: नई पीढ़ी और सामाजिक न्याय की दस्तक”

भूमिकादेश बदल रहा है — धीरे, चुपचाप, लेकिन गहराई से। आज का युवा सिर्फ़ नौकरी या डिग्री के लिए नहीं लड़ रहा, वह हक़ (अधिकार), इज़्ज़त (सम्मान) और बराबरी की…

साधु-समाज का वास्तविक चेहरा और मोह-माया के भीतर छुपा असली स्वभाव!?

(“एकांत के अनुभव और समाज की वास्तविकता पर आधारित जागरूकता और जीवन दर्शन प्रस्तुत करने वाला व्यक्तिगत विचार संग्रह”) भूमिका साधु-समाज को नज़दीक से देखना अक्सर भ्रम और सच का…

परोपकार तकनीक और महामारी के बीच बिल गेट्स क्यों अंधविश्वास नहीं विवेक मांगते हैं आज?

जब आदर्श टूटते हैं: बिल गेट्स, विश्वास और विवेक का प्रश्न – भूमिका एक समय था जब बिल गेट्स को भविष्यदृष्टा, परोपकारी और आधुनिक युग का आदर्श माना गया। गरीबी…

कबीर रैदास असफल नहीं थे, उनका विचार समय से पहले था, जिसे अंबेडकर ने पूरा किया!

भूमिका इतिहास व्यक्तियों से नहीं, पीढ़ियों में पककर सफल हुई विचारधाराओं से सभ्यताओं का निर्माण करता है।जब व्यक्ति असफल हुआ, पर विचारधारा इतिहास बन गई इतिहास अक्सर केवल विजेताओं का…

संपादकीय

सपनों का भारत, अपमानित श्रम और विश्वगुरु बनने की अधूरी और खोखली महत्वाकांक्षा? भारतीय समाज को आईना दिखाने के लिए किसी विदेशी उदाहरण की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन इतिहास…

उच्च माध्यमिक विद्यालय नूवां में संस्कृति कार्यक्रम के लिए भामाशाह सुगनाराम मेघवाल ने साउंड सिस्टम दिया

रतनगढ़। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय नूवां में आज भामाशाह ने संस्कृति कार्यक्रम के लिए साउंड सिस्टम दिया।भामाशाह प्रेरक अशोक आलडिया ने बताया सुगना राम मेघवाल ने 11000 रुपए साउंड सिस्टम…

सम्पादकीय बारह वर्षों में बदली इंसानियत: लोकतंत्र, तर्क और भाईचारे के क्षरण की भारतीय कथा आज!

बीते बारह वर्षों में देश के सार्वजनिक जीवन में जो सबसे बड़ा बदलाव दिखता है, वह हमारी इंसानियत (मनुष्यता) का क्षरण है। लोकतांत्रिक परंपराओं से उपजा संवाद और सह-अस्तित्व कमजोर…

अनुभव, अपमान और असमानता: डर के जाल में फंसे वंचित समाज के जीवन की सच्चाई!?

भूमिकाडर एक प्राकृतिक भावना है, जो हर मनुष्य के जीवन में कभी न कभी प्रकट होती है। वंचित समाज के लोगों के जीवन में यह भावना अधिक गहराई और स्थायित्व…

सम्पादकीय “** विकास के नाम पर बने बांध और इंसानियत के लिए उभरता जानलेवा संकट का मौन यथार्थ!*”

भारत में बड़े बांधों को कभी राष्ट्र-निर्माण का प्रतीक माना गया था, लेकिन आज वही ढांचे इंसानियत (मानवता) के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। देश में लगभग 5200…