भूमिका
भारतीय लोकतंत्र केवल चुनावों की प्रक्रिया नहीं बल्कि विविधताओं के सम्मान की एक ऐतिहासिक व्यवस्था है। संविधान निर्माताओं ने भारत को पंथनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते समय यह कल्पना की थी कि यहां धर्म, जाति और भाषा के आधार पर किसी नागरिक के अधिकार सीमित नहीं होंगे। लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य में यह प्रश्न लगातार गहरा होता जा रहा है कि क्या भारतीय राजनीति वास्तव में सभी समुदायों को समान प्रतिनिधित्व दे रही है? आज जब चुनावी रणनीतियां धार्मिक ध्रुवीकरण पर आधारित दिखाई देती हैं, तब लोकतंत्र की रूह (आत्मा) और डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) की वास्तविक परिभाषा पर गंभीर मंथन आवश्यक हो गया है।

2014 में भारतीय जनता पार्टी ने “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देकर देश की जनता का विश्वास जीता। यह नारा केवल चुनावी वाक्य नहीं बल्कि सामाजिक विश्वास का प्रतीक माना गया। लेकिन समय के साथ यह प्रश्न उठने लगा कि यदि भारत में लगभग 15 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है, तो फिर भाजपा लगातार मुस्लिम समुदाय को टिकट देने से क्यों बचती है? क्या किसी लोकतंत्र में इतने बड़े समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व समाप्त कर देना सामान्य बात मानी जा सकती है? यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक सवालिया (प्रश्नवाचक) चिन्ह बनती जा रही है। आज राजनीति में नैरेटिव (विचारधारा आधारित प्रचार) वास्तविक मुद्दों पर भारी पड़ता दिखाई देता है।

मई 2026 के पश्चिम बंगाल चुनावों ने इस बहस को और अधिक तीखा बना दिया है। भाजपा 206 सीटें प्राप्त कर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच चुकी है, जबकि राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 27 प्रतिशत है। इसके बावजूद पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। दूसरी ओर कांग्रेस ने सीमित संसाधनों के बावजूद मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी प्रक्रिया में शामिल किया। प्रश्न यह नहीं कि कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र केवल बहुमत की सत्ता का नाम रह गया है? यह स्थिति समाज में एक प्रकार की बेचैनी (अशांति) उत्पन्न करती है। चुनावी कैम्पेन (प्रचार अभियान) अब सामाजिक संतुलन से अधिक भावनात्मक ध्रुवीकरण पर आधारित होते जा रहे हैं।

असम का उदाहरण भी कम चिंताजनक नहीं है। वहां लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के बावजूद भाजपा ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया। दूसरी ओर कांग्रेस ने 99 में से 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। इसके बावजूद सार्वजनिक विमर्श में सवाल भाजपा से कम और कांग्रेस से अधिक पूछे जाते हैं कि वह मुसलमानों को टिकट क्यों देती है। यह लोकतांत्रिक विमर्श की दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। क्या किसी समुदाय को चुनाव लड़ने का अवसर देना अपराध माना जाने लगा है? राजनीति का यह वातावरण एक प्रकार की तफ़रीक़ (भेदभाव) को जन्म देता दिखाई देता है। मीडिया का फ्रेमवर्क (ढांचा) भी कई बार बहस को वास्तविक मुद्दों से भटका देता है।

आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा और असहज प्रश्न यही खड़ा है कि आखिर सवाल हमेशा कांग्रेस से ही क्यों पूछा जाता है कि वह मुसलमानों को टिकट क्यों दे रही है, जबकि मुख्यधारा का मीडिया, बड़े बुद्धिजीवी और तथाकथित निष्पक्ष विश्लेषक भाजपा से यह सवाल पूछने से बचते हैं कि वह करोड़ों मुस्लिम नागरिकों में एक भी व्यक्ति को चुनाव लड़ने योग्य क्यों नहीं मानती? क्या पंथनिरपेक्षता केवल संविधान की किताबों तक सीमित एक मुफ़ाहमत (समझौता) बनकर रह गई है? क्या भारतीय समाज भीतर से हमेशा सांप्रदायिक था और धर्मनिरपेक्षता केवल एक कवरिंग (आवरण) थी, जिसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार ओढ़ा और उतारा जाता रहा? यह प्रश्न केवल राजनीति का नहीं बल्कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा की सच्ची परीक्षा है।

भारतीय संविधान सभा में डॉ. भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अनेक नेताओं ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें धर्म के आधार पर नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी सीमित नहीं की जानी थी। संविधान की पंथनिरपेक्षता केवल मंदिर और मस्जिद के बीच दूरी बनाए रखने का सिद्धांत नहीं बल्कि सभी समुदायों को समान अवसर देने का वादा भी है। यदि कोई दल चुनाव जीतने के लिए एक बड़े समुदाय को प्रतिनिधित्व से बाहर रखता है और फिर भी जनता उसे प्रचंड बहुमत देती है, तो यह समाज के भीतर बदलती मानसिकता की ओर संकेत करता है। यह लोकतंत्र की फ़िक्र (चिंता) का विषय है। आज का पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) केवल राजनीति नहीं बल्कि सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित कर रहा है।

समाज के प्रबुद्ध वर्ग, संविधान विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों की भूमिका ऐसे समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि लोकतंत्र केवल संख्या बल का खेल बनकर रह जाए और प्रतिनिधित्व का प्रश्न अप्रासंगिक हो जाए, तो भविष्य में अन्य समुदाय भी इसी प्रकार हाशिये पर धकेले जा सकते हैं। लोकतंत्र का अर्थ विरोधी विचारों और विविध समुदायों की उपस्थिति से ही मजबूत होता है। लेकिन दुर्भाग्य से आज बहसें मुद्दों से अधिक पहचान पर केंद्रित होती जा रही हैं। सोशल मीडिया और टीवी स्टूडियो ने राजनीतिक संवाद को शोर में बदल दिया है। इस माहौल में इंसाफ़ (न्याय) की आवाज़ कमजोर पड़ती जा रही है। चुनावी इंजीनियरिंग (रणनीतिक संरचना) अब सामाजिक न्याय से अधिक प्रभावशाली हो चुकी है।

यह भी विचारणीय है कि भारतीय जनता पार्टी को लगातार चुनावी सफलता क्यों मिल रही है। इसका उत्तर केवल धार्मिक ध्रुवीकरण में नहीं बल्कि विपक्ष की कमजोर रणनीति, संगठनात्मक बिखराव और वैचारिक भ्रम में भी छिपा है। भाजपा ने राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत नेतृत्व की छवि को बहुत व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया। दूसरी ओर विपक्ष अक्सर प्रतिक्रियात्मक राजनीति करता दिखाई दिया। लेकिन इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता कि क्या लोकतंत्र में किसी समुदाय की राजनीतिक अनुपस्थिति सामान्य मानी जानी चाहिए? यह स्थिति लोकतंत्र की शिनाख़्त (पहचान) को प्रभावित करती है। आज की राजनीति में इमेज-बिल्डिंग (छवि निर्माण) वास्तविक प्रतिनिधित्व से कहीं अधिक प्रभावशाली हो चुकी है।

इस बाबत राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा उठाया गया प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लोकतंत्र के मूल ढांचे को चुनौती देता है। यदि किसी राज्य में बड़ी मुस्लिम आबादी है और फिर भी उन्हें टिकट नहीं दिया जाता, तो यह केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि एक वैचारिक संदेश भी बन जाता है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि राजनीति अब प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का माध्यम बनती जा रही है। लोकतंत्र में बहुमत का शासन आवश्यक है, लेकिन बहुमत की संवेदनशीलता उससे भी अधिक आवश्यक होती है। अन्यथा लोकतंत्र केवल चुनावी मशीन बनकर रह जाएगा। यह स्थिति सामाजिक मायूसी (निराशा) को जन्म देती है। वर्तमान सिस्टम (व्यवस्था) पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होने लगी है।

भारतीय समाज को यह समझना होगा कि पंथनिरपेक्षता किसी एक धर्म की सुरक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र की स्थिरता का आधार है। यदि आज एक समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर रखना सामान्य मान लिया जाएगा, तो कल यही प्रवृत्ति अन्य वर्गों के साथ भी दोहराई जा सकती है। लोकतंत्र केवल मतदान करने का अधिकार नहीं बल्कि सत्ता संरचना में सम्मानजनक भागीदारी का अधिकार भी है। इसलिए यह समय भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर गंभीर आत्ममंथन का है। संविधान की हिफाज़त (सुरक्षा) केवल अदालतों या नेताओं की जिम्मेदारी नहीं बल्कि जनता की भी जिम्मेदारी है। भारतीय रिपब्लिक (गणराज्य) की मजबूती इसी जागरूकता पर निर्भर करेगी।

समापन

आज भारत एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहां चुनावी विजय और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन खोजने की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। बहुमत प्राप्त करना लोकतंत्र की सफलता हो सकती है, लेकिन विविध समाज को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देना लोकतंत्र की आत्मा है। यदि राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्ति की रणनीति तक सीमित रहेंगे और सामाजिक सहभागिता को महत्व नहीं देंगे, तो संविधान की पंथनिरपेक्ष अवधारणा धीरे-धीरे खोखली होती जाएगी। लोकतंत्र की आबरू (गरिमा) तभी सुरक्षित रहेगी जब हर नागरिक स्वयं को सत्ता संरचना का समान भागीदार महसूस करे। यही भारतीय कॉन्स्टिट्यूशन (संविधान) की सबसे बड़ी शक्ति और पहचान है।

लानत है उन संविधान विशेषज्ञों और तथाकथित प्रबुद्ध नागरिकों पर, जो भाजपा से मुसलमानों को टिकट न देने का सवाल पूछने के बजाय उल्टे कांग्रेस से जवाब मांगते हैं। यह बौद्धिक ईमानदारी नहीं बल्कि लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता की रियाकारी (पाखंड) है, जिसने संविधान की आत्मा को कमजोर किया है।

शेर :

नफ़रत की आग में रिश्तों का शहर जलता रहा,
मज़हब पूछकर इंसान यहां हर रोज़ बंटता रहा।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

स्रोत और संदर्भ :
नीरज झा (मोलिटिक्स के एडिटर) के विचारों से उत्प्रेरित एवं भारतीय संविधान, चुनावी आंकड़े, पश्चिम बंगाल और असम चुनाव विश्लेषण, राजनीतिक टिप्पणियां तथा नीरज झा के सार्वजनिक वक्तव्य आधारित।

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