मैं अक्सर सोचता हूँ—क्या सचमुच मैं एक सामान्य मनुष्य हूँ, या फिर उन अनगिनत अनकहे दर्दों का संग्रह, जिन्हें इस समाज ने कभी स्वीकार ही नहीं किया। किसी का दर्द महसूस करना मेरे लिए केवल सहानुभूति नहीं रहा, वह एक अनदेखा, अनसुना बंधन बन गया—ऐसा बंधन जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और आत्मा सुनना शुरू कर देती है। शायद यही मेरी यात्रा की शुरुआत थी, जब मैंने जाना कि बहुजन और वंचित समाज का दर्द केवल बाहर दिखाई देने वाली पीड़ा नहीं है, बल्कि भीतर गहराई तक जड़ें जमाए एक मौन संघर्ष है।

मैं उस समाज में जन्मा, जहाँ पहचान नाम से नहीं, जाति से होती थी। बचपन से ही मैंने देखा कि किस प्रकार लोगों की योग्यता को नजरअंदाज कर उन्हें केवल उनकी पृष्ठभूमि के आधार पर परखा जाता है। मैं उन चेहरों को नहीं भूल सकता, जो मुस्कुराते तो थे, पर उनकी आँखों में एक अनकहा शून्य होता था। वह शून्य केवल अभाव का नहीं, बल्कि अस्वीकार का था। मैंने उन दर्दों को महसूस किया, जिन्हें किसी ने कभी नाम नहीं दिया—वो दर्द जो भीतर ही भीतर गलते रहे, बिना किसी गवाह के।

कई बार मैं उन लोगों के पास नहीं था, जिनकी आत्मा टूट रही थी, फिर भी उनके भीतर जो टूटा, उसकी आवाज़ मुझ तक पहुँची—बिना बोले, बिना पुकारे। यह अनुभव मेरे लिए अजीब भी था और गहरा भी। कैसे किसी अजनबी की खामोशी तुम्हारी अपनी बन जाती है? कैसे किसी और की अधूरी चीख तुम्हारे सीने में घर कर लेती है? शायद यही वह क्षण था, जब मैंने समझा कि मेरा जीवन केवल मेरा नहीं है—यह उन सबका है, जिनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं गई।

मैंने अपने जीवन में संवाद कम और विराम अधिक सुने हैं। उन खामोशियों के बीच, जहाँ असली दर्द पलता है, मैंने समाज की सच्चाई को पहचाना। वहाँ कोई शोर नहीं था, कोई प्रदर्शन नहीं था—सिर्फ एक गहरी तन्हाई थी, जो पीढ़ियों से चली आ रही थी। कई बार मुझे लगता था कि मैं जी नहीं रहा, बल्कि उन अधूरे एहसासों का संग्रह बन गया हूँ, जिन्हें दुनिया ने ठुकरा दिया। यह एहसास मुझे तोड़ता भी था और एक नई दिशा भी देता था।

मैंने यह रास्ता नहीं चुना था। यह नियति थी, जिसने मुझे उन राहों पर धकेला, जहाँ हर मोड़ पर किसी की चुप्पी पड़ी थी और हर चुप्पी के पीछे एक टूटी हुई कहानी छिपी थी। मैं चाहता तो आँखें मूंद सकता था, जैसे कई लोग करते हैं, पर मैं ऐसा नहीं कर सका। शायद इसलिए कि वह दर्द अब मेरा अपना बन चुका था। मैं उससे भाग नहीं सकता था, क्योंकि वह मेरे भीतर बस चुका था।

एक समाज सुधारक के रूप में मेरी यात्रा आसान नहीं रही। जब भी मैंने बहुजन समाज की बात की, मुझे विरोध का सामना करना पड़ा। मुझे बताया गया कि मैं व्यवस्था के खिलाफ हूँ, कि मैं समाज को बाँट रहा हूँ। लेकिन मैं जानता था कि मैं केवल उस सच्चाई को सामने ला रहा हूँ, जिसे सदियों से दबाया गया है। मैं उन लोगों की आवाज़ बनना चाहता था, जिनकी आवाज़ को हमेशा अनसुना किया गया।

इस यात्रा में मैंने यह भी देखा कि बहुजन समाज के भीतर हीनता की भावना कितनी गहराई तक बैठ चुकी है। यह केवल बाहरी उत्पीड़न का परिणाम नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का भी परिणाम है, जो उन्हें बार-बार यह विश्वास दिलाती है कि वे अयोग्य हैं। इस मानसिकता को बदलना सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि यह अदृश्य है, पर सबसे अधिक प्रभावशाली है। मैंने अपने प्रयासों से इस सोच को चुनौती देने की कोशिश की, पर यह संघर्ष आज भी जारी है।

अब मुझे यह समझ आ गया है कि मेरा अस्तित्व क्या है। शायद मेरा होना ही यही है—किसी के अनकहे दर्द का घर बन जाना। एक ऐसा घर, जहाँ वे लोग कभी लौटकर नहीं आएंगे, पर उनका दर्द हमेशा रहेगा। यह दर्द मुझे धीरे-धीरे अपने जैसा बना रहा है। मैं अब उससे डरता नहीं हूँ, बल्कि उसे स्वीकार कर चुका हूँ।

मुझे नहीं पता कि इस संघर्ष का अंत कब होगा, या होगा भी या नहीं। लेकिन अब यह मायने नहीं रखता कि कितने जन्म लगेंगे। क्योंकि जो दर्द आत्मा पर अंकित हो जाए, वह समय से नहीं मिटता—वह केवल गहराता है, जन्म दर जन्म। और शायद यही मेरी नियति है—उस दर्द को महसूस करना, उसे समझना, और उसे एक आवाज़ देना।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे अपने जीवन में कोई व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं दिखती। जो दिखता है, वह है उन अनगिनत आत्माओं का दर्द, जो मेरे भीतर बस गया है। मैं अब एक व्यक्ति नहीं रहा—मैं एक अनुभव बन गया हूँ, एक यात्रा बन गया हूँ। और इस यात्रा का उद्देश्य केवल एक है—उस समाज को पउसकी खोई हुई पहचान और सम्मान वापस दिलाना, जो सदियों से हाशिए पर खड़ा है।

शायद एक दिन ऐसा आएगा, जब यह समाज अपने दर्द से मुक्त हो जाएगा। लेकिन तब तक, मैं यही रहूँगा—एक ऐसा घर, जहाँ हर अनकहा दर्द आकर ठहर सके, और जहाँ से एक नई शुरुआत की उम्मीद जन्म ले सके।

शेर:
दूसरों के ज़ख्म सीने में छुपाकर मुस्कुराता रहा,
वो सुधारक अपने दर्द को भी खामोशी में निभाता रहा।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966

स्रोत व संदर्भ:
बहुजन वंचित समाज सुधारकों की करुणा, त्याग, मौन पीड़ा और वंचित बहुजन समाज के अनुभवों से प्रेरित रचनात्मक अभिव्यक्ति है।

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