भूमिका
भारतीय समाज में समानता, शिक्षा और न्याय की नींव रखने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने अपने जीवन को वंचितों, महिलाओं और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उनकी 199वीं जयंती हमें उनके विचारों और कार्यों को पुनः समझने का अवसर देती है। उनका जीवन सामाजिक इंकलाब (क्रांति) का प्रतीक है, जिसने अन्यायपूर्ण परंपराओं को चुनौती दी। उन्होंने समाज में डेमोक्रेसी (जनतंत्र) की भावना को मजबूत करते हुए हर व्यक्ति को सम्मान और अधिकार दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया, जो आज भी प्रेरणास्रोत है।

प्रारंभिक जीवन और प्रेरणा
11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे महात्मा ज्योतिराव फुले एक साधारण माली परिवार से थे, किंतु उनके विचार असाधारण थे। बचपन से ही उन्होंने जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता का सामना किया, जिसने उनके भीतर परिवर्तन की गहरी चेतना जगाई।
पुणे के स्कॉटिश मिशनरी स्कूल में शिक्षा के दौरान उन्हें थॉमस पेन की पुस्तक ‘द राइट्स ऑफ मैन’ से प्रेरणा मिली, जिसने उनके मन में समानता और मानवाधिकारों के प्रति गहरी समझ विकसित की।
उनका जीवन एक सामाजिक जद्दोजहद (संघर्ष) का प्रतीक रहा, जिसमें उन्होंने अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। सन् 1840 में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हुआ, जो आगे चलकर भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। उन्होंने मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन (शिक्षा) के माध्यम से समाज में परिवर्तन की नींव रखी और एक नए युग का आरंभ किया।
भारत में उनके क्रांतिकारी कार्य
महात्मा ज्योतिराव फुले ने भारतीय समाज में गहरे बदलाव की नींव रखी। 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोलना उस समय एक बड़ा रिवोल्यूशन (क्रांति) था। उन्होंने 1852 तक 18 स्कूल स्थापित कर शिक्षा को वंचित वर्गों तक पहुँचाया, जो एक सामाजिक मिशन (उद्देश्यपूर्ण कार्य) बन गया।
दलित और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए उन्होंने शूद्र-अतिशूद्र समाज को संगठित किया और आत्मसम्मान की भावना जगाई। उनके प्रयास केवल शिक्षा तक सीमित नहीं थे, बल्कि समाज में इक्वालिटी (समानता) और अधिकारों की चेतना फैलाने का कार्य भी था।
1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना कर उन्होंने जाति और पाखंड के विरुद्ध संगठित आंदोलन चलाया। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म (मंच) बना, जहाँ से सामाजिक न्याय की आवाज बुलंद हुई।
विधवा पुनर्विवाह का समर्थन और ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना उनके मानवीय दृष्टिकोण का परिचायक है। उनका जीवन निरंतर स्ट्रगल (संघर्ष) और सामाजिक इंकलाब (क्रांति) का प्रतीक रहा।
उनकी रचनाएँ—गुलामगिरी, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत—समाज में व्याप्त जुल्म (अत्याचार) और नाइंसाफी (अन्याय) के विरुद्ध सशक्त आवाज हैं, जो आज भी परिवर्तन की तहरीक (आंदोलन) को प्रेरित करती हैं।
अंग्रेजी शासन का दृष्टिकोण और सम्मान
महात्मा ज्योतिराव फुले के सामाजिक कार्यों को ब्रिटिश अधिकारियों ने समय रहते पहचाना और सराहा। 1852 में पुणे के विश्रामबाग वाड़ा में उनका सार्वजनिक सम्मान किया गया, जहाँ सर एर्स्किन पेरी ने उन्हें शॉल भेंट की। यह उनके कार्यों की आधिकारिक रिकग्निशन (मान्यता) थी।
फुले को 1876 से 1883 तक पुणे नगर निगम का सदस्य बनाया गया, जिससे उनके प्रशासनिक कौशल का भी प्रमाण मिलता है। हालांकि, उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों की आलोचना भी की, खासकर तब जब वे केवल उच्च वर्गों पर निर्भर रहते थे और वंचित समाज की उपेक्षा करते थे।
हंटर कमीशन (1882) में भूमिका
महात्मा ज्योतिराव फुले ने हंटर कमीशन के समक्ष शिक्षा व्यवस्था पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्राथमिक शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए और इसे निःशुल्क व अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, ताकि समाज में जागरूकता बढ़े।
उन्होंने यह भी जोर दिया कि शिक्षा केवल उच्च वर्गों तक सीमित न रहे, बल्कि दलितों और पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं। उनका यह दृष्टिकोण एक व्यापक रिफॉर्म (सुधार) और सामाजिक इस्लाह (सुधार) की दिशा में था, जिसने आगे चलकर भारत की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा दी और समानता की मजबूत नींव रखी।
