यह लेख 5 अप्रैल 2026 को जन्म जयंती पर हार्दिक श्रद्धांजलि स्वरूप बाबू जगजीवन राम जी को समर्पित

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बाबू जगजीवन राम 5 अप्रैल 1908 से 6 जुलाई 1986 एक ऐसा नाम है,जिन्होंने अपनी मेधा और जीवटता से सदियों पुरानी सामाजिक जंजीरों को तोड़कर आधुनिक भारत की तस्वीर बदली। उन्हें प्यार से ‘बाबूजी’ कहा जाता है। वे न केवल एक सफल राजनेता थे,बल्कि एक महान समाज सुधारक, कुशल प्रशासक और शोषितों की बुलंद आवाज थे।
1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि संघर्ष की नींव
बाबू जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल, 1908 को बिहार के तत्कालीन शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले के चांदवा नामक गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे समय में
हुआ था जब ग्रामीण भारत में छुआछूत और जातिवाद अपने चरम पर था।
पिता
उनके पिता शोभी राम ब्रिटिश भारतीय सेना में थे, लेकिन बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और खेती के साथ-साथ संत मत’ (शिव नारायण संप्रदाय) के प्रचार-प्रसार में लग गए।
माता
उनकी माता वसंती देवी एक दृढ़ निश्चयी महिला थीं।
प्रारंभिक शोक
जब जगजीवन राम मात्र 6 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। पिता के साये के बिना बड़े होना और उस दौर में एक दलित बालक के रूप में समाज का सामना करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।
उनकी माता ने अभावों में भी हार नहीं मानी और उन्हें शिक्षित करने का संकल्प लिया।
2. शिक्षा-दीक्षा-अपमान को सम्मान में बदलने का सफर
बाबूजी की शिक्षा की यात्रा भारतीय सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध एक मौन विद्रोह की कहानी है।
स्कूली शिक्षा
उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला और फिर आरा जिला स्कूल में हुई। स्कूल के दिनों में ही उन्हें जातिगत भेदभाव का कड़वा अनुभव हुआ। स्कूल के पानी के घड़ों
को लेकर हुए भेदभाव के खिलाफ उन्होंने तब विद्रोह किया जब वे किशोर थे। उन्होंने ‘दलितों के लिए अलग घड़ा’ रखने की प्रथा का विरोध करते हुए उन घड़ों को तोड़ दिया,
जिससे अंततः स्कूल प्रशासन को सभी के लिए एक ही जल स्रोत की अनुमति देनी पड़ी।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
1927 में वे उच्च शिक्षा के लिए BHU पहुंचे। यहाँ भी रूढ़िवादिता ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। कहा जाता है कि छात्रावास में उन्हें भोजन परोसने और उनके बर्तन साफ
करने से मना कर दिया गया था।
इन अपमानजनक स्थितियों ने उनके भीतर के क्रांतिकारी’ को जन्म दिया।
कलकत्ता विश्वविद्यालय (B.Sc.)
BHU की विषम परिस्थितियों के कारण वे बाद में कलकत्ता चले गए।
वहाँ 1931 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक (B.Sc.) की डिग्री प्राप्त की।
कलकत्ता उस समय भारतीय राजनीति और मजदूर आंदोलनों का केंद्र था, जहाँ बाबूजी ने सामाजिक
न्याय की लड़ाई को व्यावहारिक रूप देना शुरू किया।
3. हरित क्रांति में विशेष योगदान भारत को ‘अन्नदाता’ बनाना
1960 के दशक के उत्तरार्ध में भारत खाद्यान्न के भीषण संकट से गुजर रहा था। देश ‘शिप-टू-माउथ’ (जहाज से सीधा मुंह तक) की स्थिति में था, यानी विदेशी मदद के बिना पेट भरना असंभव था। 1967 और 1974 के दौरान कृषि मंत्री के रूप में बाबूजी ने जो किया, वह विश्व इतिहास में दर्ज है।
वैज्ञानिक और प्रशासनिक तालमेल बाबूजी ने डॉ. एम.एस.स्वामीनाथन और अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ‘हाई यील्डिंग वैरायटी’ (HYV) बीजों के प्रयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने वैज्ञानिकों को प्रयोगशाला से निकालकर सीधे खेतों तक पहुँचाया।
किसानों का विश्वास जीतना
वे जानते थे कि केवल तकनीक से बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से राज्यों का दौरा किया और पारंपरिक किसानों को आधुनिक बीजों और उर्वरकों के उपयोग के लिए प्रेरित किया।
बम्पर पैदावार और आत्मनिर्भरता
उनके कार्यकाल में ही गेहूँ के उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हुई। उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के ढांचे को मजबूत किया
ताकि अनाज का भंडारण और वितरण सही ढंग से हो सके। आज भारत जो दुनिया को अनाज निर्यात कर रहा है,उसकी नींव बाबूजी की उसी दूरदर्शिता पर टिकी है।
4. एक कुशल प्रशासक के रूप में राष्ट्र को योगदान
बाबू जगजीवन राम का प्रशासनिक कौशल उनकी निर्णय लेने की क्षमता और दूरदर्शिता में झलकता था।
श्रम मंत्री के रूप में (1947-1952)
स्वतंत्र भारत के पहले श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने मजदूरों के लिए ‘ईश्वर’ की भूमिका निभाई।
उन्होंने न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम और कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) जैसे क्रांतिकारी कानून बनाए।
उनका मानना था कि जब तक मजदूर सुरक्षित नहीं होगा राष्ट्र का औद्योगिकीकरण संभव नहीं है।
रक्षा मंत्री और 1971 की विजय
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वे रक्षा मंत्री थे। उन्होंने सेना के मनोबल को ऊँचा रखा और रणनीति बनाने में जनरल मानेकशॉ के साथ मिलकर काम किया। बांग्लादेश का निर्माण उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी कूटनीतिक और सैन्य सफलता थी।
रेल और संचार मंत्री के रूप में
उन्होंने रेलवे का विस्तार किया और डाक-तार विभाग में सुधार करके संचार क्रांति की शुरुआती जमीन तैयार की।
5. बहुजन समाज के युवाओं को संदेश
बाबू जगजीवन राम का जीवन ‘बहुजन अस्मिता’ का गौरवपूर्ण प्रतीक है। आज के युवाओं के लिए उनके संदेश अत्यंत प्रासंगिक हैं
ज्ञान को अपनी शक्ति बनाएं
बाबूजी अक्सर कहते थे कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं,बल्कि समाज की जंजीरें काटने की आरी है।
बहुजन युवाओं को तकनीकी और उच्च शिक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
लोकतांत्रिक भागीदारी
उन्होंने सिखाया कि समाज को बदलने के लिए सत्ता के गलियारों में बैठना जरूरी है।
वे मानते थे कि केवल मांग करने से अधिकार नहीं मिलते, अधिकार छीनने के लिए योग्यता और पद की आवश्यकता होती है।
आत्मसम्मान से समझौता नहीं
उन्होंने BHU से लेकर संसद मैं आधी सदी तक के सफर में कभी अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। युवाओं को अपनी पहचान पर गर्व होना चाहिए, न कि हीन भावना।
बदलाव की राजनीति बदले की नहीं
बाबूजी ने कभी ‘बदले’ की राजनीति नहीं की। उन्होंने ‘बदलाव’ की राजनीति की। वे दलितों, पिछड़ों और
वंचितों के साथ-साथ राष्ट्र के हर नागरिक को जोड़कर चलने में विश्वास रखते थे।
6. अनछुए घटनाक्रम
व्यक्तित्व की गहराई
बाबूजी के जीवन के कुछ किस्से उनके धैर्य की गवाही देते हैं। 1977 में जब उन्होंने कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई, तो वह सत्ता के खिलाफ एक बहुत बड़ा नैतिक कदम था। उन्होंने दिखाया कि लोकतंत्र में ‘व्यक्ति’ से बड़ा ‘सिद्धांत’ होता है।
एक बार एक विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा था कि “क्या आपको कभी दुःख होता है कि आप एक दलित परिवार में जन्मे? बाबूजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “नहीं, मुझे गर्व है, क्योंकि मेरी परिस्थितियों ने मुझे लड़ना सिखाया जो महलों में रहने वाले कभी नहीं सीख सकते।
निष्कर्ष
बाबू जगजीवन राम एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था थे। उन्होंने शून्य से शिखर तक का सफर अपनी मेहनत और मेधा से तय किया। वे भारत के उन विरले राजनेताओं में से थे जिनका सम्मान पक्ष और विपक्ष, दोनों बराबर करते थे। एक राजकीय कर्मचारी के रूप में या एक सजग नागरिक के रूप में, हमें उनके प्रशासनिक अनुशासन और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से सीखना चाहिए।
उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि “इतिहास उन्हें याद नहीं रखता जो केवल अपने लिए जीते हैं, इतिहास उन्हें याद रखता है जो दूसरों के जीवन में प्रकाश लाने के लिए खुद को खपा देते हैं। बाबूजी आज भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में समता और न्याय की मशाल बनकर जीवित हैं।
प्रेरणा वाक्य
न्याय वह नहीं जो शक्तिशाली को संतुष्ट करे, न्याय वह है
जो निर्बल को सुरक्षा प्रदान करे।(बाबू जगजीवन राम)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
यह लेख पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों, सामाजिक न्याय की अवधारणा और बाबू जगजीवन राम के राष्ट्र निर्माण में योगदान पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल शैक्षणिक जागरूकता और प्रेरणा प्रदान करना है। इस लेख का किसी भी वर्तमान राजनीतिक दल या विचारधारा से कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष राजनीतिक संबंध नहीं है। यह एक महान स्वतंत्रता सेनानी और भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री के प्रति एक सामाजिक और ऐतिहासिक श्रद्धांजलि है।
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक
