वो ज़माना सचमुच किसी दास्तान (कहानी) की तरह लगता है, जहाँ रिश्तों की नींव विश्वास और अपनापन हुआ करता था। तब जीवन में ग्लैमर (चमक-दमक) नहीं, बल्कि सादगी की महक थी। लड़कियाँ जब किसी जीवनसाथी को चुनती थीं, तो उसकी संपत्ति नहीं, बल्कि उसके संस्कारों की संपन्नता को परखती थीं। घर-परिवार की प्रतिष्ठा और व्यक्ति का चरित्र सबसे बड़ा पैमाना होता था। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि हमने तरक्की तो बहुत कर ली, लेकिन कहीं न कहीं अपने मूल्यों को पीछे छोड़ दिया।
आज का समाज तेजी से बदल रहा है, और इस बदलाव में एक अजीब सी बेचैनी भी छिपी है। हर तरफ एक दौड़ है, एक रेस (दौड़) है, जिसमें हर कोई आगे निकलना चाहता है। इस दौड़ में रिश्तों की अहमियत कहीं खोती जा रही है। मोहब्बत (प्रेम) अब दिल की गहराइयों से नहीं, बल्कि बाहरी दिखावे से मापी जाने लगी है। यह बदलाव सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को भी प्रभावित कर रहा है।
अब रिश्तों की शुरुआत अक्सर दिल से होती है, लेकिन उनका अंत अकाउंट (खाता) के बैलेंस पर आकर ठहर जाता है। वफ़ा (निष्ठा) जैसे शब्द अब पुराने लगने लगे हैं। लोग अब यह नहीं देखते कि सामने वाला इंसान कितना सच्चा है, बल्कि यह देखते हैं कि वह कितना सफल और संपन्न है। यह सोच धीरे-धीरे हमारी भावनाओं को खोखला कर रही है, और हमें एक ऐसी दुनिया की ओर ले जा रही है जहाँ सब कुछ मशीनी हो गया है।
आज की दुनिया में सुकून से ज्यादा स्टेटस (प्रतिष्ठा) की अहमियत हो गई है। रिश्तों में भी अब एक तरह की शर्तें जुड़ गई हैं। इज़्ज़त (सम्मान) अब दिल से नहीं, बल्कि दिखावे से कमाई जाती है। यह बदलाव हमारे समाज को एक ऐसे मोड़ पर ले आया है जहाँ इंसान खुद को साबित करने के लिए अपने असली रूप को छिपाने लगा है। यह दिखावे की संस्कृति धीरे-धीरे हमारे अंदर के इंसान को खत्म कर रही है।
आज लोग किसी की नीयत नहीं, बल्कि उसकी सैलरी और ब्रांड (पहचान-चिन्ह) देखते हैं। सच्चाई (ईमानदारी) जैसे गुण अब पीछे छूटते जा रहे हैं। गाड़ी, घर और महंगे कपड़े अब इंसान की पहचान बन गए हैं। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि इससे समाज में असमानता और असंतोष बढ़ता है। जो लोग इन मानकों पर खरे नहीं उतरते, वे खुद को कमतर समझने लगते हैं।
दोष सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि पूरी सिस्टम (प्रणाली) का है, जिसने हमें ऐसा बना दिया है। तन्हाई (अकेलापन) आज के समाज की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुकी है। हम लोगों के बीच रहते हुए भी अकेले हैं, क्योंकि हमारे रिश्ते अब दिल से नहीं, बल्कि स्वार्थ से जुड़े हुए हैं। यह स्थिति हमें अंदर से तोड़ रही है, लेकिन हम इसे स्वीकार करने से डरते हैं।
आज प्यार को एक इन्वेस्टमेंट (निवेश) की तरह देखा जाने लगा है। लोग सोचते हैं कि इस रिश्ते से उन्हें क्या फायदा होगा। जज़्बा (भावना) अब गणित में बदल गया है। यह सोच रिश्तों की पवित्रता को खत्म कर रही है। जब प्यार में भी लाभ-हानि का हिसाब होने लगे, तो वह प्यार नहीं, बल्कि एक सौदा बन जाता है।
अब साथ निभाने की कसमें नहीं, बल्कि लोकेशन (स्थान) मायने रखती है। लोग यह दिखाने में ज्यादा रुचि रखते हैं कि वे कहाँ घूम रहे हैं, बजाय इसके कि वे किसके साथ हैं। रिश्तों में अब एहसास (अनुभूति) की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है, जहाँ हर कोई अपनी जिंदगी को एक शो की तरह पेश करता है।
हम आधुनिक तो हो गए हैं, लेकिन रिश्तों के मामले में गरीब हो गए हैं। प्रोग्रेस (उन्नति) के नाम पर हमने अपने मूल्यों को खो दिया है। ख्वाब (सपना) अब बड़े घर और महंगी गाड़ियों तक सीमित हो गए हैं। हमने यह भूल गए हैं कि असली खुशी रिश्तों में होती है, न कि भौतिक वस्तुओं में। यह सोच हमें एक ऐसी दुनिया में ले जा रही है जहाँ सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है।
जहाँ पैसा बोलता है, वहाँ जज्बात अक्सर खामोश हो जाते हैं। हक़ीक़त (सत्य) यह है कि हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ इंसानियत पीछे छूटती जा रही है। हमें इस ट्रेंड (प्रवृत्ति) को बदलने की जरूरत है। हमें फिर से रिश्तों की अहमियत को समझना होगा और दिल से जुड़ना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारे पास सब कुछ होगा, सिवाय सच्चे रिश्तों के।
शेर:
इस दौर में रिश्तों की कीमत भी मार्केट सी हो गई,
दिल तो सस्ता रह गया, दौलत ही क़ीमतदार हो गई।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
स्रोत व संदर्भ :
समकालीन समाज, उपभोक्तावाद, बदलते रिश्ते, सामाजिक अनुभव, आधुनिक जीवन निरीक्षण
