(1)एडमिशन का समय आते ही लगभग हर स्कूल खुद को सबसे अच्छा और सबसे सफल बताने लगता है। अखबारों, होर्डिंग्स और सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े विज्ञापन दिखाई देने लगते हैं। इन विज्ञापनों में स्कूल की उपलब्धियों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि अभिभावकों को लगे कि यही स्कूल उनके बच्चों का भविष्य बदल सकता है। लेकिन हर चमक सच्चाई नहीं होती। कई बार यह केवल एक फ़रेब (धोखा) होता है, जो केवल एडवरटाइजमेंट (विज्ञापन) के सहारे लोगों को आकर्षित करने के लिए तैयार किया जाता है। इसलिए बच्चों के भविष्य का निर्णय लेते समय केवल बाहरी प्रचार पर भरोसा करना समझदारी नहीं है।

(2)वंचित समाज का व्यक्ति अक्सर अपने जीवन में गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक अपमान का अनुभव करता है। इसलिए वह चाहता है कि उसके बच्चे वही कष्ट न झेलें जो उसने झेले हैं। यही कारण है कि वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए हर संभव प्रयास करता है। कई बार वह अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देता है। लेकिन इस प्रक्रिया में उसे सावधान रहना चाहिए, क्योंकि कई संस्थान शिक्षा के नाम पर केवल दिखावा (आडंबर) करते हैं और अपने स्कूल को एक बड़े ब्रांड (पहचान) के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग हो सकती है।

(3)आजकल कई स्कूल अपनी इमारत, एसी क्लासरूम, डिजिटल बोर्ड और चमकदार यूनिफॉर्म को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर प्रचार करते हैं। अभिभावक भी कई बार इन्हीं चीजों से प्रभावित होकर जल्दी निर्णय ले लेते हैं। लेकिन शिक्षा का असली आधार इन बाहरी सुविधाओं से नहीं बल्कि शिक्षक की गुणवत्ता और उनकी निष्ठा से तय होता है। कई साधारण भवनों में चलने वाले स्कूल भी बच्चों को उत्कृष्ट शिक्षा दे रहे हैं। इसलिए केवल इमारत देखकर प्रभावित होना एक तरह का गुमान (भ्रम) है, जो केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर (भौतिक ढाँचा) के आकर्षण से पैदा होता है।

(4)स्कूल चुनते समय सबसे पहले यह देखना चाहिए कि वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षक कितने अनुभवी और समर्पित हैं। अच्छे शिक्षक बच्चों के जीवन को दिशा देते हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान ही नहीं देते बल्कि बच्चों को सोचने और समझने की क्षमता भी विकसित करते हैं। शिक्षक का व्यवहार, धैर्य और विद्यार्थियों के प्रति सम्मान बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए अभिभावकों को स्कूल जाकर शिक्षकों से बातचीत करनी चाहिए। यही सच्ची तालीम (शिक्षा) होती है, जो केवल क्वालिटी (गुणवत्ता) के आधार पर पहचानी जाती है।

(5)दूसरी महत्वपूर्ण बात स्कूल का वातावरण है। क्या वहाँ बच्चों को सम्मान के साथ पढ़ाया जाता है? क्या गरीब और अमीर बच्चों के साथ समान व्यवहार किया जाता है? वंचित समाज के बच्चों को कई बार हीन भावना का सामना करना पड़ता है। इसलिए ऐसे स्कूल का चयन करना चाहिए जहाँ बच्चों को आत्मसम्मान और सुरक्षा का अनुभव हो। अगर स्कूल का माहौल अच्छा होगा तो बच्चा खुलकर सीख पाएगा और उसके मन में कोई खौफ (डर) नहीं रहेगा। यही एक स्वस्थ एनवायरनमेंट (वातावरण) की पहचान है।

(6)तीसरी बात यह देखनी चाहिए कि स्कूल बच्चों के सर्वांगीण विकास पर कितना ध्यान देता है। केवल किताबों की पढ़ाई ही शिक्षा नहीं होती। खेल, कला, संगीत, नैतिक शिक्षा और सामाजिक व्यवहार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे स्कूल जो बच्चों को केवल परीक्षा के अंकों तक सीमित रखते हैं, वे उनके व्यक्तित्व के विकास को सीमित कर देते हैं। इसलिए ऐसे स्कूल चुनिए जो बच्चों की सलाहियत (योग्यता) को पहचानें और उन्हें सही डेवलपमेंट (विकास) का अवसर दें।

(7)फीस का विषय भी बहुत महत्वपूर्ण है। कई स्कूल बहुत अधिक फीस लेते हैं और अभिभावकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि महंगी शिक्षा ही अच्छी शिक्षा है। लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। कई सरकारी और साधारण निजी स्कूल भी उत्कृष्ट शिक्षा दे रहे हैं। इसलिए अभिभावकों को यह देखना चाहिए कि फीस और सुविधाओं में संतुलन है या नहीं। केवल ऊँची फीस देखकर प्रभावित होना कई बार एक धोखा (छल) साबित हो सकता है, जो केवल मार्केटिंग (बाजारू प्रचार) के कारण पैदा किया जाता है।

(8)स्कूल का अनुशासन और संस्कार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं बल्कि एक अच्छा नागरिक बनाना भी होता है। जिन स्कूलों में नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती है, वहाँ से निकले बच्चे समाज के लिए उपयोगी साबित होते हैं। ऐसे स्कूल बच्चों में इंसानियत, सहयोग और जिम्मेदारी की भावना विकसित करते हैं। वहाँ बच्चों को अदब (सम्मान) और नैतिकता सिखाई जाती है, जिससे उनकी पूरी पर्सनैलिटी (व्यक्तित्व) मजबूत बनती है।

(9)अभिभावकों को दूसरों की देखा-देखी में निर्णय नहीं लेना चाहिए। कई बार लोग केवल इसलिए किसी स्कूल में एडमिशन करा देते हैं क्योंकि उनके रिश्तेदार या पड़ोसी ने भी वही स्कूल चुना होता है। लेकिन हर बच्चे की क्षमता और हर परिवार की परिस्थिति अलग होती है। इसलिए जल्दबाजी में लिया गया निर्णय कई बार बाद में पछतावे का कारण बन सकता है। इसलिए सोच-समझकर निर्णय लेना जरूरी है, ताकि कोई नुकसान (हानि) न हो और सही डिसीजन (निर्णय) लिया जा सके।

(10)एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अभिभावक स्वयं भी अपने बच्चों की पढ़ाई में रुचि लें। केवल स्कूल पर जिम्मेदारी छोड़ देना पर्याप्त नहीं होता। घर का वातावरण भी बच्चों की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि माता-पिता बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं, उनसे बातचीत करते हैं और उनके सवालों को समझते हैं, तो बच्चे अधिक आत्मविश्वासी बनते हैं। इस तरह अभिभावकों की भागीदारी बच्चों की हिम्मत (साहस) बढ़ाती है और उनके कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) को मजबूत करती है।

(11)अंत में यही कहा जा सकता है कि बच्चों का भविष्य केवल चमकदार इमारतों, आकर्षक विज्ञापनों और ऊँची फीस से नहीं बनता। सच्ची शिक्षा वही है जो बच्चों को ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, आत्मविश्वास और सही सोच भी दे। वंचित समाज के अभिभावकों को चाहिए कि वे स्कूल चुनते समय इन सभी बातों पर गंभीरता से विचार करें। अगर सही स्कूल का चयन किया गया तो वही शिक्षा बच्चों के जीवन को नई दिशा दे सकती है। यही असली कामयाबी (सफलता) है, जो सही एजुकेशन (शिक्षा) और सही मार्गदर्शन से मिलती है।

शेर
तालीम की शमा जलाओ तो बदल जाएगी तक़दीर,
जागता हुआ इंसान ही लिखता है अपनी तक़दीर।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
98292 30966

स्रोत और संदर्भ:
शिक्षा समाजशास्त्र के सिद्धांत, अभिभावक जागरूकता लेख, विद्यालय चयन मार्गदर्शिका, शिक्षक अनुभव, सामाजिक अध्ययन और शिक्षा नीति संबंधी सामान्य संदर्भ।

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