भूमिका
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक पुरानी कहावत है—“मित्रता स्थायी नहीं होती, केवल हित स्थायी होते हैं।” लेकिन भारत की विदेश नीति को देखकर कई बार लगता है कि हम इस सच्चाई को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। हाल ही में रणनीतिक मामलों के प्रसिद्ध विश्लेषक ब्रह्म चेलानी ने ऐसी टिप्पणी की है जिसने भारत की ऊर्जा नीति पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आम तौर पर उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार का कड़ा आलोचक नहीं माना जाता, बल्कि कई लोग उन्हें समर्थक मानते रहे हैं।
लेकिन जब वही व्यक्ति यह कहने लगे कि वाशिंगटन के नियमों का बार-बार पालन करना भारत के लिए घाटे का सौदा बन रहा है, तो इस पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय सियासत (राजनीति) में अक्सर मसले (समस्याएँ) अचानक बदल जाते हैं और देशों को अपने मफ़ाद (हित) को ध्यान में रखकर निर्णय लेना पड़ता है। आज ऊर्जा सुरक्षा भी एक बड़ा सिस्टम (व्यवस्था) का सवाल बन चुकी है, जिसमें हर देश अपनी पॉलिसी (नीति) और प्लान (योजना) के आधार पर आगे बढ़ता है।
- पश्चिम एशिया का बढ़ता संकट
पश्चिम एशिया में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव चरम पर पहुंच चुका है। दुनिया के बड़े हिस्से की ऊर्जा जरूरत इसी समुद्री रास्ते से गुजरने वाले तेल पर टिकी हुई है। अगर यहां से तेल टैंकरों का आना-जाना बाधित होता है, तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं।
आज वही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। ईरान और अमेरिका समर्थित देशों के बीच टकराव तेजी से बढ़ गया है। ईरान के मिसाइल हमलों के बाद पूरे इलाके में अफरातफरी (घबराहट) और खौफ (डर) का माहौल बन गया है। युद्ध को तीन सप्ताह से अधिक समय हो चुका है और फिलहाल इसके समाप्त होने की कोई इमकान (संभावना) स्पष्ट दिखाई नहीं दे रही।
तेल की बढ़ती कीमतों ने वैश्विक मार्केट (बाज़ार) को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इसका असर हर देश की इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) पर पड़ रहा है और ऊर्जा सप्लाई (आपूर्ति) को लेकर नई चिंताएँ पैदा हो गई हैं। आम आदमी की जेब पर इसका सीधा बोझ महसूस होने लगा है।
- भारत का इस युद्ध से सीधा संबंध नहीं
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस पूरे संघर्ष से भारत का कोई सीधा लेना-देना नहीं है। न भारत इस युद्ध का हिस्सा है और न ही यह लड़ाई भारत के कारण शुरू हुई है। फिर भी हालात ऐसे बन गए हैं कि इसका असर भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय सियासत में हलचल तेज हो गई है और कई नए मसले सामने आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में भारत सीधे शामिल नहीं है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों के कारण उसे भी कई तरह की दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।
भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। देश की बड़ी आबादी और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण तेल की मांग भी तेजी से बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय एनर्जी (ऊर्जा) व्यवस्था में होने वाला कोई भी बदलाव भारत को प्रभावित करता है। कई बार बड़े देशों के दबाव में लिए गए डिसीजन (निर्णय) भी भविष्य में कठिनाई खड़ी कर देते हैं। आज ऊर्जा की सिक्योरिटी (सुरक्षा) को लेकर वही चिंता भारत के सामने दिखाई दे रही है।
- अमेरिका के दबाव में उठाए गए कदम
हाल ही में अमेरिका के साथ एक व्यापारिक समझौते के तुरंत बाद भारत ने तीन ऐसे तेल टैंकर जब्त कर लिए जो अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में थे। इन टैंकरों पर ईरान और रूस का तेल लदा हुआ था। भारत ने यह कदम अमेरिका के दबाव में उठाया। उस समय यह माना गया कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना जरूरी है, लेकिन बाद की घटनाओं ने इस फैसले पर सवाल खड़े कर दिए।
कुछ ही समय बाद अमेरिका ने चुपचाप अपने नियमों में ढील दे दी। बढ़ती तेल कीमतों और युद्ध के असर को कम करने के लिए वाशिंगटन ने कुछ टैंकरों पर लगे प्रतिबंध हल्के कर दिए। इससे यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या भारत ने जल्दबाजी में फैसला कर लिया। अंतरराष्ट्रीय सियासत में अक्सर बड़े देश अपने मफ़ाद (हित) के अनुसार फैसले बदल लेते हैं, जबकि दूसरे देशों को उसके नुक्सान का सामना करना पड़ता है। इस पूरे मामले ने वैश्विक ट्रेड (व्यापार) व्यवस्था, ऊर्जा सिस्टम और समुद्री रूट (मार्ग) से जुड़ी नई चिंताओं को भी सामने ला दिया।
- 2019 का फैसला और उसका असर
यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ है। वर्ष 2019 में अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। उस समय ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर था। भारत को वहां से अपेक्षाकृत सस्ता तेल मिलता था और भुगतान की व्यवस्था भी काफी हद तक सुविधाजनक थी।
लेकिन जैसे ही प्रतिबंध लागू हुए, भारत ने तुरंत अमेरिकी दबाव मान लिया और ईरानी तेल का आयात लगभग शून्य कर दिया। इसके विपरीत चीन ने इन प्रतिबंधों की ज्यादा परवाह नहीं की और सस्ते दामों पर ईरान से तेल खरीदता रहा। अंतरराष्ट्रीय सियासत में अक्सर देशों का रवैया (व्यवहार) उनके अपने हित से तय होता है।
नतीजा साफ था—भारत ने एक बड़ा और सस्ता सप्लायर खो दिया, जबकि चीन को लगातार सस्ता तेल मिलता रहा। इससे भारत की ऊर्जा लागत बढ़ गई। वैश्विक एनर्जी मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ी और भारत की इम्पोर्ट (आयात) लागत पर भी इसका सीधा असर दिखाई देने लगा।
- आज स्थिति फिर पलट गई
अब तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और दुनिया को फिर से सस्ते तेल की जरूरत महसूस होने लगी है। इसी कारण अमेरिका ने ईरान के तेल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील देना शुरू कर दिया है। भारत भी करीब सात साल बाद दोबारा ईरानी तेल खरीदने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हालात उतने आसान नहीं हैं। ईरान का कहना है कि समुद्र में अतिरिक्त तेल उपलब्ध नहीं है और घरेलू भंडार भी सीमित है। पहले की तरह भारी छूट देना भी संभव नहीं। अंतरराष्ट्रीय मार्केट (बाज़ार) की स्थिति बदल चुकी है। इस पूरे मामले में कई तरह की पॉलिसी और समझौतों की पेचीदगी (जटिलता) सामने आ रही है। साफ है कि अब हालात में पहले जैसी गुंजाइश (संभावना) नहीं बची है।
- रूसी तेल के मामले में भी वही कहानी
रूसी तेल के मामले में भी स्थिति लगभग वैसी ही रही। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर कई पश्चिमी प्रतिबंध लगाए गए। शुरुआत में भारत ने सस्ते रूसी तेल का लाभ उठाया और इससे देश को काफी आर्थिक राहत भी मिली। लेकिन पिछले कई महीनों से अमेरिका के दबाव में भारत अपनी खरीद धीरे-धीरे कम करता जा रहा था।
अब अचानक वाशिंगटन ने भारत को 30 दिन की छूट दे दी है कि समुद्र में मौजूद रूसी तेल खरीदा जा सकता है। यानी नियम पहले कड़े किए गए और बाद में ढीले कर दिए गए। अंतरराष्ट्रीय सियासत में बड़े देश अक्सर अपने हित को ध्यान में रखकर फैसले बदल लेते हैं। इसी कारण वैश्विक ट्रेड (व्यापार) व्यवस्था और तेल मार्केट में लगातार अनिश्चितता बनी रहती है।
- भारत की बढ़ती रणनीतिक कमजोरी
इन घटनाओं का सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा धीरे-धीरे कमजोर होती दिखाई दे रही है। आज भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए फिर से हारमोंस की खाड़ी पर ज्यादा निर्भर होता जा रहा है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में गिना जाता है, जहां जरा सा तनाव भी पूरे वैश्विक तेल व्यापार को प्रभावित कर सकता है।
अगर इस क्षेत्र में युद्ध और फैलता है या समुद्री रास्ता बाधित होता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय सियासत में बढ़ती अनिश्चितता और क्षेत्रीय तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऊर्जा की सप्लाई रुकने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे हालात में देश की आर्थिक सिक्योरिटी (सुरक्षा) और स्थिरता दोनों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं।
- चीन का अलग रास्ता
यहाँ एक तुलना करना जरूरी हो जाता है। चीन ने कई मौकों पर अमेरिकी प्रतिबंधों की ज्यादा परवाह नहीं की और अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी। उसकी नीति साफ रही कि पहले देश की जरूरतें पूरी हों। इसी कारण उसे लगातार सस्ता तेल मिलता रहा और उसकी ऊर्जा लागत भी अपेक्षाकृत कम बनी रही। इससे उसकी औद्योगिक ताकत और उत्पादन क्षमता मजबूत होती गई।
दूसरी ओर भारत कई बार अंतरराष्ट्रीय दबाव में अपनी नीति बदलता रहा। वैश्विक ट्रेड (व्यापार) और तेल मार्केट में यह फर्क साफ दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय सियासत
में हर देश अपने हित को सामने रखकर फैसले करता है। चीन ने भी यही रास्ता अपनाया, जबकि भारत कई बार संतुलन बनाने की कोशिश में अलग-अलग दिशाओं में कदम बढ़ाता रहा।
- क्या भारत को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए?
अब यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या भारत को अपनी ऊर्जा नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय नहीं करनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ तेजी से बदलती रहती हैं और बड़े देश अक्सर अपने हित को देखते हुए फैसले बदल देते हैं। ऐसे में किसी भी देश के लिए जरूरी होता है कि वह अपने दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता दे। विदेश नीति में संतुलन जरूरी होता है, लेकिन अंधानुकरण से कई बार नुकसान भी उठाना पड़ता है।
अगर हर बार नियम बदलते रहें और भारत हर बार उनका पालन करता रहे, तो अंततः नुकसान किसका होगा, यह सवाल स्वाभाविक है। आज वैश्विक एनर्जी की स्थिति भी तेजी से बदल रही है। तेल के अंतरराष्ट्रीय मार्केट में उतार-चढ़ाव लगातार बना हुआ है। ऐसे में भारत को अपने फैसले सोच-समझकर लेने होंगे ताकि भविष्य में आर्थिक और रणनीतिक स्थिरता बनी रह सके।
समापन
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। लेकिन इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था को मजबूत ऊर्जा सुरक्षा की भी जरूरत होती है। तेल और गैस जैसे संसाधन केवल व्यापार की वस्तु नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति भी बन चुके हैं। अगर भारत बार-बार बाहरी दबाव में अपनी नीति बदलता रहेगा, तो भविष्य में ऐसी स्थितियाँ फिर सामने आ सकती हैं।
यही वजह है कि रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी अब खुलकर यह कह रहे हैं कि वाशिंगटन के नियमों का आँख मूँदकर पालन करना हमेशा लाभदायक नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय सियासत में हर देश अपने हित को प्राथमिकता देता है। इसलिए भारत को भी अपनी ऊर्जा पॉलिसी (नीति) और आर्थिक स्ट्रैटेजी (रणनीति) को अधिक स्वतंत्र और व्यावहारिक बनाने की जरूरत है।
अब असली सवाल यही है कि आने वाले समय में भारत कौन सा रास्ता चुनता है। क्या वह बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार फैसले करेगा या फिर पुरानी सोच पर ही चलता रहेगा। इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
शेर:
फ़ैसलों में देर की तो राहें भी उलझती चली गईं,
क़दम बढ़े मगर मंज़िल हर बार दूर होती गई।
संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
स्रोत व संदर्भ :
शीतल पी सिंह की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं, समकालीन राजनीति और भारत की नीति-दुविधा संदर्भ।
