सरकार पहले से कहती रही है कि देश में रसोई गैस की कोई कमी नहीं है और कमी की बात केवल अफ़वाह है। लेकिन यदि ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जहाँ कुछ लोग ईंधन के लिए वैकल्पिक और अमानवीय तरीकों का सहारा लेते दिखाई देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि ज़मीनी स्तर पर कहीं न कहीं समस्या तो है। ऐसे में यदि कांग्रेस या कोई अन्य विपक्षी दल गैस की उपलब्धता, कीमत और वितरण व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है, तो उसे पूरी तरह गलत कहना भी उचित नहीं लगता। लोकतंत्र में सरकार के दावों और वास्तविक हालात के बीच अंतर की जाँच और बहस होना आवश्यक है।
1:भारत जैसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक देश में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि आस्था और संस्कार का प्रतीक माना जाता है। परन्तु जब समाज में नैतिकता का पतन होने लगता है तो इंसान की ज़मीर (अंतरात्मा) भी जैसे सो जाती है। आज जब दैनिक भास्कर की रिपोर्ट सामने आई कि गैस की कमी और महँगाई के कारण कुछ होटल वाले चिता के कोयले का उपयोग कर रहे हैं, तो यह सुनकर मन सिहर उठता है। आधुनिकता के इस दौर में जिसे हम सिस्टम (व्यवस्था) कहते हैं, वही व्यवस्था कभी-कभी इतनी विकृत हो जाती है कि इंसानियत कहीं खो जाती है।
2:मानव सभ्यता की पहचान उसकी संवेदनाओं से होती है। किसी मृत व्यक्ति की चिता से बचा हुआ कोयला यदि रोटी और चिकन पकाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है तो यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि समाज के इख़लाक़ (नैतिक आचरण) पर गंभीर प्रश्नचिन्ह है। गैस सिलेंडर की कमी ने कुछ लोगों को इतना मजबूर या लालची बना दिया कि उन्होंने मानव अस्थियों से जुड़े स्थान को भी व्यापार का साधन बना लिया। आज का यह तथाकथित मार्केट (बाज़ार) हर चीज को मुनाफे के तराजू में तौलने लगा है।
3:दुनिया परिवर्तनशील है—यह दर्शन हम सबने पढ़ा और समझा है। लेकिन परिवर्तन का अर्थ यह नहीं कि इंसान अपनी संवेदनाओं को ही बेच दे। जब किसी श्मशान घाट से कोयला उठाकर होटल की भट्टी में झोंक दिया जाता है तो यह केवल व्यापार नहीं बल्कि मानवता की रुसवाई (अपमान) है। आज का उपभोक्ता जिस भोजन को स्वाद समझकर खा रहा है, वह कहीं न कहीं एक भयावह रियलिटी (वास्तविकता) को छिपाए बैठा है।
4:सोचिए उस परिवार की पीड़ा, जिसने अपने प्रियजन का अंतिम संस्कार किया। उनके लिए वह चिता अंतिम विदाई और श्रद्धा का प्रतीक होती है। लेकिन जब वही चिता किसी होटल की भट्टी में ईंधन बन जाए तो यह इंसानियत की सबसे बड़ी बेहुरमती (असम्मान) है। आधुनिकता की दौड़ में कुछ लोगों ने केवल मुनाफा कमाने को ही अपना बिज़नेस (व्यापार) बना लिया है, चाहे उसके लिए उन्हें किसी की भावनाओं को क्यों न कुचलना पड़े।
5:यह घटना हमें उस दर्शन की याद दिलाती है कि जब समाज में नैतिक मूल्यों का पतन होता है तो मनुष्य केवल लाभ-हानि का गणित देखने लगता है। ऐसे लोग अपनी नफ़्स (स्वार्थी प्रवृत्ति) के आगे सब कुछ भूल जाते हैं। गैस की कमी या महँगाई एक समस्या हो सकती है, पर उसका समाधान यह नहीं कि मानवता की सीमाएँ तोड़ दी जाएँ। यह वह क्राइसिस (संकट) है जो केवल संसाधनों का नहीं बल्कि नैतिकता का भी है।
6:भारतीय संस्कृति में भोजन को “अन्न देवता” कहा गया है। जब कोई व्यक्ति किसी होटल में रोटी खाता है तो वह विश्वास करता है कि उसे पवित्र और स्वच्छ भोजन मिल रहा है। पर यदि उस भोजन के पीछे ऐसी साज़िश (षड्यंत्र) छिपी हो तो यह विश्वास टूट जाता है। आज के समय में कुछ लोग केवल अपने प्रॉफिट (लाभ) के लिए हर मर्यादा लांघने को तैयार दिखाई देते हैं।
7:समाज का हर वर्ग इस खबर से स्तब्ध है। यह केवल एक क्षेत्र या राज्य का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे देश के नैतिक ढाँचे का आईना है। जब लालच बढ़ता है तो इंसान की हवस (अतृप्त लालच) उसे ऐसे रास्तों पर ले जाती है जहाँ संवेदना का कोई स्थान नहीं रहता। यही कारण है कि आधुनिक डेवलपमेंट (विकास) के बावजूद मनुष्य के भीतर का चरित्र कमजोर पड़ता जा रहा है।
8:हमें यह भी समझना होगा कि दुनिया सचमुच परिवर्तनशील है। जो चीजें कभी पवित्र मानी जाती थीं, आज वही व्यापार का साधन बनती जा रही हैं। यह बदलाव केवल तकनीक या अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि मानवीय अख़लाक़ियत (नैतिकता) में भी दिखाई दे रहा है। आज का ट्रेंड (प्रवृत्ति) यह बनता जा रहा है कि पैसा सबसे बड़ा सत्य है।
9:लेकिन इस अंधेरे में उम्मीद की किरण भी है। समाज में अभी भी ऐसे लोग हैं जिनकी रूह (आत्मा) जागृत है और जो इस प्रकार की घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं। मीडिया की खोजी रिपोर्टें इसी जागरूकता का उदाहरण हैं। यदि समाज सतर्क रहेगा तो यह अनैतिक नेटवर्क (जाल) ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगा।
10:अंततः यह घटना हमें एक गहरा दार्शनिक संदेश देती है—दुनिया बदलती रहती है, परिस्थितियाँ भी बदलती हैं, पर मनुष्य को अपनी इंसानियत (मानवीयता) नहीं खोनी चाहिए। यदि भोजन बनाने वाला ही संवेदनहीन हो जाए तो समाज का भविष्य कैसा होगा? आज जरूरत है कि हम अपने मोरल (नैतिक) मूल्यों को फिर से जीवित करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी की अंतिम चिता की राख हमारे भोजन का ईंधन न बने।
शेर:
मजबूरी ने ज़मीर को बाज़ार में उतार दिया,
रोटी की आग ने इंसान से संस्कार उतार दिया।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
स्रोत व संदर्भ :
दैनिक भास्कर रिपोर्ट, गैस संकट, सामाजिक पतन, बदलती मानवीय मूल्य व्यवस्था।
