
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य, चिन्तक एवं
प्रदेश उप सभा अध्यक्ष
राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर
प्रस्तावना
शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचनाएं देना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण और सामाजिक न्याय की स्थापना करना है।
आज 17 मार्च 2026, विश्व सामाजिक कार्य दिवस के अवसर पर जब हम समाज सेवा की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी दृष्टि बड़े-बड़े एनजीओ या दानदाताओं पर जाती है। लेकिन एक शिक्षाविद के नाते मेरा अटूट विश्वास है कि राजस्थान के सुदूर गांवों और ढाणियों में स्थित सरकारी विद्यालयों का ‘शिक्षक’ और ‘प्राचार्य’ दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक कार्यकर्ता है।
राजस्थान के सरकारी विद्यालयों की जमीनी हकीकत किसी से छुपी नहीं है। यहाँ पढ़ने वाला विद्यार्थी केवल एक ‘छात्र’ नहीं है, वह उन संघर्षों का प्रतिनिधि है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं। यदि एक शिक्षक स्वयं को केवल 10 से 4 बजे का ‘राजकीय कर्मचारी’ मान ले, तो वह केवल पाठ्यक्रम पूरा कर सकता है, लेकिन यदि वह अपनी भूमिका में ‘सामाजिक सेवा भाव’ को समाहित कर ले, तो वह एक पूरी पीढ़ी का भाग्य बदल सकता है।
1. दस्तावेजी विसंगतियां: पहचान की लड़ाई और शिक्षक की भूमिका
राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में एक विकट समस्या है—दस्तावेजों में भिन्नता। विद्यार्थी के आधार कार्ड में नाम कुछ और है, जन आधार में जन्मतिथि कुछ और, बैंक खाते में वर्तनी की अशुद्धि है और स्कूल रिकॉर्ड में कुछ और अंकित है।
यह केवल कागजी त्रुटि नहीं है, यह उस बच्चे के भविष्य का अवरोध है।
एक राजकीय कर्मचारी के तौर पर शिक्षक कह सकता है कि “कागज सही करवा कर लाओ”, लेकिन एक सामाजिक सेवक शिक्षक जानता है, कि उस बच्चे के अभिभावक इतने जागरूक या सक्षम नहीं हैं।
यहाँ प्राचार्य और शिक्षक को आगे बढ़कर अभिभावकों की काउंसलिंग करनी पड़ती है, ई-मित्रों के चक्कर काटने पड़ते हैं और कैंप लगवाकर इन त्रुटियों को सुधारना पड़ता है।
जब तक यह ‘पहचान का संकट’ दूर नहीं होता, वह बच्चा सरकार की किसी भी योजना का लाभ नहीं ले पाता। यहाँ शिक्षक की ‘सामाजिक सक्रियता’ ही उस बच्चे को उसका अधिकार दिलाती है।
2. प्रमाण पत्रों का अभाव छात्रवृत्ति और हक की राह में रोड़ा
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे वंचित वर्ग से आते हैं। विडंबना यह है कि जिन बच्चों को सरकारी सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता है, उन्हीं के पास जाति प्रमाण पत्र, मूल निवास या आय प्रमाण पत्र नहीं होते।
ग्रामीण परिवेश में माता-पिता अक्सर इन कागजी औपचारिकताओं में रुचि नहीं लेते या अपनी दैनिक मजदूरी छोड़कर कचहरी जाने का साहस नहीं जुटा पाते।
परिणामस्वरूप, जरूरतमंद, प्रतिभावान विद्यार्थी छात्रवृत्ति (Scholarship) से वंचित रह जाते हैं। यहाँ एक शिक्षक का ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ रूप जागृत होना अनिवार्य है। उसे स्वयं रुचि लेकर, फॉर्म भरवाकर और प्रशासन से समन्वय कर इन प्रमाण पत्रों को बनवाना होता है। यह कार्य किसी वेतन वृद्धि के लिए नहीं, बल्कि उस बच्चे के चेहरे पर आने वाली मुस्कान और उसकी शिक्षा जारी रखने के सम्बल के लिए किया जाता है।
3 हाशिए पर खड़े समाज की उपेक्षा और अभिभावकीय संवाद
हमारे सरकारी विद्यालयों में 90% से अधिक विद्यार्थी SC, ST और OBC वर्गों से आते हैं। इनके माता-पिता दिनभर हाड़-तोड़ मजदूरी करते हैं।
शाम को जब वे घर लौटते हैं, तो वे इतने थक चुके होते हैं, कि बच्चे की कॉपी खोलकर देखने की ऊर्जा उनमें नहीं बचती। इसी कारण सरकारी स्कूल का बच्चा निजी स्कूलों के बच्चों से पिछड़ने लगता है, क्योंकि उसे घर पर वह ‘शैक्षिक वातावरण’ नहीं मिल पाता।
एक संवेदनशील शिक्षक और प्राचार्य के रूप में हमें यह समझना होगा कि हमें केवल बच्चे को नहीं, बल्कि उसके परिवार को भी शिक्षित करना है। हमें उनके मोहल्लों में जाना होगा, उनकी मजदूरी की मजबूरियों को समझते हुए उन्हें शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करना होगा।
जब तक शिक्षक और अभिभावक के बीच एक ‘सामाजिक सेतु’ नहीं बनेगा, तब तक शिक्षा का स्तर ऊपर नहीं उठ सकता।
4. बुनियादी गरिमा: जूते, मोजे और गणवेश
शिक्षा केवल दिमाग का विकास नहीं है, यह आत्मविश्वास का सृजन भी है। जब कोई बच्चा फटी हुई ड्रेस या बिना जूतों के विद्यालय आता है, तो वह मानसिक रूप से हीन भावना का शिकार हो जाता है।
सरकारी बजट की अपनी सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन एक शिक्षक की ‘नेटवर्किंग’ की कोई सीमा नहीं है।
सरकारी विद्यालय क्षेत्रों में अनेक ‘भामाशाह’ (दानदाता) मौजूद हैं, जो मदद करना चाहते हैं, बस उन्हें एक सही माध्यम की तलाश है।
एक शिक्षक या प्राचार्य जब सामाजिक सरोकार निभाते हुए इन भामाशाहों से संपर्क करता है, तो विद्यालय की कायापलट हो जाती है।
बच्चों को जूते, मोजे, स्वेटर और स्टेशनरी उपलब्ध कराना केवल दान नहीं, बल्कि उन बच्चों को यह अहसास कराना है, कि समाज उनके साथ खड़ा है।
यह कार्य एक ‘कर्मचारी’ की ड्यूटी लिस्ट में नहीं है, यह ‘सेवा भाव’ की पराकाष्ठा है।
5. शिक्षा में अरुचि: नवाचार और अपनत्व की आवश्यकता
आज के दौर में बच्चों को मोबाइल और अन्य आकर्षणों से दूर कर शिक्षा के प्रति आकर्षित करना सबसे बड़ी चुनौती है। यदि शिक्षक केवल नीरस व्याख्यान देगा, तो बच्चा स्कूल आने से कतराएगा।
लेकिन यदि शिक्षक अपनी भूमिका में ‘सामाजिक संवेदनशीलता’ लाता है, बच्चों के साथ खेलता है, उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुनता है और एक मार्गदर्शक की तरह व्यवहार करता है, तो बच्चा शिक्षा में
रुचि लेने लगता है।
शिक्षा को ‘रुचिपूर्ण’ बनाना एक कला है, और यह कला केवल उन्हीं के पास होती है जो अपने काम को ‘नौकरी’ नहीं, बल्कि ‘इबादत’ मानते हैं।
समस्त शिक्षक समुदाय से मेरा आह्वान
मेरे प्रिय साथियों और शिक्षा विभाग के ऊर्जावान सदस्यों, हम उस पेशे में हैं, जिसे ‘राष्ट्र निर्माता’ कहा गया है।
याद रखिए, राजस्थान के भविष्य की तस्वीर हमारे विद्यालयों के उन कमरों में लिखी जा रही है, जहाँ छत से पानी टपकता है या जहाँ संसाधनों की कमी है।
मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है:
स्वयं को केवल एक राजकीय कर्मचारी की सीमाओं में न बांधें।
नियम अपनी जगह हैं, लेकिन मानवता और सेवा सर्वोपरि है।
जब आप किसी बच्चे का आधार कार्ड सही करवाते हैं, तो आप उसका भविष्य सुरक्षित करते हैं।
जब आप किसी गरीब बच्चे को भामाशाह के माध्यम से जूते दिलवाते हैं, तो आप उसके आत्मसम्मान की रक्षा करते हैं।
बिना सामाजिक सेवा भावना रखे आप केवल साक्षरता बढ़ा सकते हैं, लेकिन विद्यार्थी का सर्वांगीण कल्याण और उद्धार कभी नहीं कर सकते।
*आइए, आज विश्व सामाजिक कार्य दिवस पर हम संकल्प लें कि, हम अपने विद्यालयों को केवल ‘सरकारी दफ्तर’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक चेतना के केंद्र’ बनाएंगे।
हम शिक्षक भी होंगे, मार्गदर्शक भी होंगे और सबसे बढ़कर, एक समर्पित सामाजिक सेवक भी होंगे।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
“इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार, अनुभव और चिंतन हैं। इनका उद्देश्य सामाजिक जागरूकता बढ़ाना और शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक सुधार हेतु प्रेरित करना है। इन विचारों का लेखक के राजकीय पद या विभाग की आधिकारिक नीतियों से सीधा संबंध होना अनिवार्य नहीं है। यह लेख पूर्णतः सामाजिक सरोकार और जनहित की भावना से प्रेरित होकर लिखा गया है।”
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
प्राचार्य, चिन्तक एवम
प्रदेश उपसभा अध्यक्ष
राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर
