समाज की रिवायत (परंपरा) ने स्त्री के जीवन को एक अदृश्य घेरे में बाँध रखा है। यह घेरा किसी स्टैंडर्ड (मापदंड) की तरह काम करता है, जहाँ हर मुस्कान, हर कदम और हर निर्णय का मूल्यांकन होता है। यदि वह खुलकर हँस दे तो उसके चरित्र पर उँगलियाँ उठती हैं, और यदि चुप रहे तो उसकी खामोशी को अपराध समझा जाता है। उसकी सहजता भी चर्चा का विषय बन जाती है। मानो वह इंसान नहीं, बल्कि एक प्रतीक हो, जिसे हर पल परखा जाना है। उसके व्यक्तित्व की स्वतंत्र धड़कन भी सामाजिक अदालत की अनुमति पर निर्भर दिखाई देती है।

स्त्री के हिस्से का एहतराम (सम्मान) भी अक्सर शर्तों के साथ आता है। समाज का एक अदृश्य सिस्टम (व्यवस्था) उसे तयशुदा भूमिकाओं में देखना चाहता है। वह आगे बढ़े तो कहा जाता है कि सीमा लाँघ रही है, पीछे हटे तो उसे कमजोर ठहरा दिया जाता है। उसकी महत्वाकांक्षा को स्वार्थ और त्याग को कर्तव्य बताकर संतुलन बिगाड़ दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड उसकी पहचान को धुंधला करता है और उसे हर समय सावधान रहने को बाध्य करता है।

उसके जीवन में हर निर्णय एक इम्तिहान (परीक्षा) बन जाता है। परिवार और समाज का प्रेशर (दबाव) उसे अपने सपनों से समझौता करने को विवश करता है। यदि वह अपने हिस्से की धूप माँग ले, तो कहा जाता है कि वह अधिक चाहती है; और यदि संतोष कर ले, तो उसे महत्वाकांक्षा-विहीन बताया जाता है। उसके विकल्पों को सीमित कर दिया जाता है, जैसे जीवन की राहें पहले से तय हों। यह दबाव उसके भीतर आत्मसंशय पैदा करता है।

समाज का तसव्वुर (कल्पना) स्त्री को आदर्श के साँचे में ढालकर देखना चाहता है। एक तरह का इमेज (छवि) उसके लिए गढ़ दी जाती है—संकोची, सहनशील, त्यागमयी। यदि वह इस छवि से अलग हो जाए, तो आलोचना उसका पीछा नहीं छोड़ती। उसके व्यक्तित्व की विविधता को स्वीकार करने के बजाय उसे एक ही रंग में रंगने का प्रयास किया जाता है। यह एकतरफा सोच उसकी मौलिकता को दबाती है।

स्त्री के निर्णयों पर समाज की निगाहबानी (निरंतर निगरानी) रहती है। मानो उसका जीवन किसी सार्वजनिक रिपोर्ट (विवरण) की तरह हो, जिसे हर कोई पढ़ और परख सकता है। प्रेम चुने तो चरित्र पर प्रश्न, परिवार चुने तो भावनाओं पर संदेह। उसकी मित्रता, उसकी हँसी, उसके वस्त्र—सब चर्चा का विषय बन जाते हैं। यह निरंतर निगरानी उसकी स्वतंत्रता को सीमित कर देती है।

उसकी स्वतंत्रता को अक्सर साज़िश (षड्यंत्र) की दृष्टि से देखा जाता है। यदि वह अपने विचार प्रकट करे तो कहा जाता है कि वह परंपराओं के विरुद्ध रिवोल्यूशन (क्रांति) कर रही है। जबकि सच्चाई यह है कि वह केवल अपने अस्तित्व की स्वीकृति चाहती है। उसके सपने किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने पक्ष में होते हैं। परंतु बदलाव की हर कोशिश को खतरे की तरह देखा जाता है।

स्त्री के जीवन में कई बार मजबूरी (लाचारी) ऐसी दीवार बन जाती है, जिसे पार करना कठिन होता है। समाज की अपेक्षाओं का स्ट्रक्चर (ढांचा) इतना कठोर है कि उसमें व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए जगह कम रह जाती है। आर्थिक निर्भरता, पारिवारिक दबाव और सामाजिक भय उसे निर्णय लेने से रोकते हैं। वह अपने मन की आवाज़ को दबाकर परिस्थितियों से समझौता कर लेती है।

जब वह अपने अधिकारों की बात करती है तो उस पर तंज़ (व्यंग्य) कसा जाता है। उसे आधुनिकता का बहाना बनाकर मॉडर्न (आधुनिक) कहकर खारिज किया जाता है। मानो अधिकार माँगना कोई फैशन हो। जबकि यह उसकी बुनियादी आवश्यकता है—सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर। उसके प्रश्नों को विद्रोह कहकर टाल देना आसान है, पर समाधान ढूँढ़ना कठिन।

उसके भीतर भी एक गहरा जुनून (अटूट उत्साह) होता है, जो उसे अपने सपनों की ओर ले जाता है। वह आत्मनिर्भर बनने की मिशन (उद्देश्यपूर्ण प्रयास) में लगी रहती है। शिक्षा, रोजगार और आत्मसम्मान की दिशा में उठाया गया हर कदम उसके आत्मबल को मजबूत करता है। वह गिरती है, संभलती है, और फिर आगे बढ़ती है। उसकी यात्रा संघर्षपूर्ण होते हुए भी प्रेरणादायक है।

अंततः स्त्री का संघर्ष केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। वह सब्र (धैर्य) के साथ अपने जीवन की डेस्टिनी (नियति) को आकार देती है। उसे हर हाल में कोसे जाने की परंपरा बदलनी होगी। समाज को यह समझना होगा कि स्त्री कोई आरोपों की मूर्ति नहीं, बल्कि संवेदनाओं, सपनों और अधिकारों से भरी एक संपूर्ण मनुष्य है। जब वह खुलकर हँसती है तो जीवन का उत्सव मनाती है, जब खामोश रहती है तो आत्मचिंतन करती है। उसे कटघरे में खड़ा करने के बजाय उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना ही सच्चे विकास की पहचान है। तभी समाज संतुलित, संवेदनशील और न्यायपूर्ण बन सकेगा।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 230 966

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