(अनुसूचित जाति–जनजाति समाज के संदर्भ में)
“जमाना बड़ा अजीब है यहां धोखा देने वाला भी बड़े तहज़ीब से बात करता है…।”
अनुसूचित जाति और जनजाति समाज भारत की सबसे श्रमशील, सरल और विश्वास करने वाली सामाजिक शक्तियों में से एक रहा है। सदियों से इन समुदायों ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने श्रम, आत्मसम्मान और धैर्य से जीवन को आगे बढ़ाया है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि इसी सादगी और भरोसे का कई बार दूसरों ने लाभ उठाया। सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक असमानताओं के कारण यह समाज लंबे समय तक शोषण का शिकार रहा। कई बार छल करने वाले लोग बड़ी विनम्र भाषा, मधुर व्यवहार और नकली सहानुभूति के सहारे भरोसा जीत लेते हैं और फिर उसी विश्वास का दुरुपयोग कर लेते हैं।
आज का ठग केवल आर्थिक लाभ के लिए काम नहीं करता, बल्कि वह मनोवैज्ञानिक तरीके से सामने वाले की भावनाओं को समझकर उसे प्रभावित करता है। उसकी सबसे बड़ी स्ट्रेटजी (रणनीति) यही होती है कि वह सामने वाले को यह महसूस कराए कि वह उसका सच्चा शुभचिंतक है। उसकी भाषा में एक कृत्रिम लताफ़त (कोमलता) होती है जो सुनने वाले को आकर्षित करती है। विशेष रूप से वे लोग जो दिल से सरल और भरोसा करने वाले होते हैं, वे ऐसे लोगों की बातों में जल्दी आ जाते हैं। यही कारण है कि आज जागरूकता की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के इतिहास को देखें तो स्पष्ट होता है कि कई बार बाहरी ताकतों ने इस समाज की मेहनत और विश्वास का फायदा उठाया। सामाजिक व्यवस्था की कमजोरियों के कारण इस समाज को शिक्षा, संसाधन और अवसरों से दूर रखा गया। ऐसे वातावरण में जब कोई व्यक्ति मीठे शब्दों में बड़े-बड़े वादे करता है, तो वह जल्दी विश्वास प्राप्त कर लेता है। कई बार यही विश्वास बाद में फ़रेब (धोखा) साबित होता है।
समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने व्यवहार और भाषा के माध्यम से एक आदर्श छवि बनाने का प्रयास करते हैं। उनकी पर्सनालिटी (व्यक्तित्व) और बोलचाल इतनी प्रभावशाली होती है कि लोग उन्हें अपना हितैषी समझ लेते हैं। वे सामने वाले के दुख में सहानुभूति दिखाते हैं, उसकी समस्याओं को समझने का नाटक करते हैं और धीरे-धीरे भरोसे का रिश्ता बना लेते हैं। उनकी बातचीत में एक बनावटी हमदर्दी (सहानुभूति) दिखाई देती है, जो अंततः छल का माध्यम बन जाती है।
मधुर वाणी और अच्छा व्यवहार अपने आप में बुरी बात नहीं है। वास्तव में समाज में संवाद और सहयोग का आधार ही मधुर भाषा है। लेकिन जब शब्दों की कम्युनिकेशन (संवाद प्रक्रिया) के पीछे कोई छिपी हुई साज़िश (षड्यंत्र) हो, तब वही भाषा विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से किसी व्यक्ति की सच्चाई को परखें।
आज के समय में कई लोग अपनी इमेज (छवि) को बहुत सजाकर प्रस्तुत करते हैं। वे अपने व्यवहार में ऐसी कशिश (आकर्षण) पैदा करते हैं कि सामने वाला व्यक्ति प्रभावित हो जाता है। अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि वह किसी भी व्यक्ति के शब्दों या वादों से प्रभावित होने से पहले उसकी नीयत और कार्यों को समझे। क्योंकि सच्चाई का प्रमाण केवल वचन नहीं, बल्कि कर्म होते हैं।
अत्यधिक प्रशंसा और मीठी बातें अक्सर सावधानी का संकेत होती हैं। ठग अपनी प्लानिंग (योजना) पहले से बनाकर चलता है और सही अवसर का इंतजार करता है। उसकी भाषा में छिपी हुई मक्कारी (कपटपूर्ण चतुराई) धीरे-धीरे सामने आती है। जब तक लोग सच्चाई समझते हैं, तब तक नुकसान हो चुका होता है। इसलिए सजगता और विवेक समाज की सबसे बड़ी शक्ति है।
किसी भी व्यक्ति की रियलिटी (वास्तविकता) उसके कामों से समझी जा सकती है। ठग की भाषा में अक्सर एक झूठी नफ़ासत (सूक्ष्म शालीनता) दिखाई देती है, जो शुरुआत में आकर्षक लगती है। लेकिन समय के साथ उसकी असलियत सामने आ जाती है। अनुसूचित जाति और जनजाति समाज को अपने अनुभवों से यह सीखना होगा कि विश्वास करने से पहले परीक्षण करना भी जरूरी है।
विश्वास मानव संबंधों की आधारशिला है। जब यह टूटता है तो समाज में निराशा फैलती है। ठग लोगों की भावनाओं को समझकर अपनी साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) के आधार पर उन्हें प्रभावित करता है और अपनी चालाकी (धूर्त बुद्धिमत्ता) को सफल बनाता है। इसलिए यह जरूरी है कि समाज केवल शब्दों से प्रभावित न हो, बल्कि तथ्यों और अनुभवों को महत्व दे।
अंततः यही कहा जा सकता है कि अनुसूचित जाति और जनजाति समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सादगी, श्रम और एकता है। यदि इस समाज में अवेयरनेस (जागरूकता) बढ़ेगी तो कोई भी व्यक्ति उसके विश्वास का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा। सच्चाई और विवेक ही समाज की सबसे बड़ी हिफ़ाज़त (सुरक्षा) हैं।
जमाना चाहे कितना भी बदल जाए, लेकिन यदि हम सतर्क और जागरूक रहेंगे तो कोई भी मीठे शब्दों के माध्यम से हमें भ्रमित नहीं कर पाएगा। यही सामाजिक चेतना और आत्मसम्मान की असली पहचान है।

संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
