यह एक अत्यंत गंभीर और बहुआयामी विषय है, भारतीय समाज का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह विचारों के टकराव, व्यवस्था के निर्माण और उस व्यवस्था के विरुद्ध उठी क्रांतियों का जीवंत दस्तावेज है।
भारतीय समाज विश्व की उन दुर्लभ सभ्यताओं में से एक है, जो हज़ारों वर्षों से अपनी निरंतरता बनाए हुए है। किंतु इस निरंतरता के भीतर संघर्ष और बदलाव की एक अंतहीन धारा प्रवाहित रही है।
भारतीय सामाजिक ताने-बाने को समझने के लिए हमें इसकी स्थापना, इसमें व्याप्त विसंगतियों और उनके विरुद्ध समय-समय पर उठी वैचारिक क्रांतियों का विश्लेषण करना होगा।
1. सामाजिक व्यवस्था का उद्भव और स्वरूप
भारतीय समाज की आधारशिला वर्णाश्रम धर्म पर रखी गई थी।
प्रारंभिक दौर में यह ‘गुण और कर्म’ पर आधारित एक श्रम विभाजन की प्रणाली प्रतीत होती थी, लेकिन समय के साथ यह ‘जन्म’ के आधार पर कठोर ‘जाति व्यवस्था’ में परिवर्तित हो गई।
सोपान क्रम (Hierarchy)
समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया, जिसमें ज्ञान और अनुष्ठान पर एकाधिकार रखने वाले वर्ग को शीर्ष पर रखा गया।
संसाधनों का वितरण: भूमि, शिक्षा और शस्त्रों पर अधिकार केवल उच्च वर्णों तक सीमित कर दिया गया,
जबकि समाज का एक बड़ा हिस्सा (शूद्र और अति-शूद्र) केवल सेवा और दासता के लिए अभिशप्त कर दिया गया।
स्त्री की स्थिति: पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने महिलाओं को ‘उपभोग की वस्तु’ या ‘आश्रित’ के रूप में सीमित कर दिया, उन्हें शिक्षा और संपत्ति के अधिकारों से वंचित रखा गया।
2. व्यवस्था के विरुद्ध प्रारंभिक विद्रोह: बुद्ध और जैन
जब वैदिक कर्मकांड और जातिगत श्रेष्ठता अपने चरम पर थी, तब पहली बड़ी वैचारिक क्रांति ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी के रूप में आई।
बुद्ध ने ‘धम्म’ के माध्यम से तर्क (Logic) और समानता (Equality) की बात की।
उन्होंने वर्ण व्यवस्था को चुनौती देते हुए कहा कि मनुष्य अपने कर्म से श्रेष्ठ होता है, जन्म से नहीं।
बौद्ध धम्म ने शोषित वर्गों और महिलाओं के लिए अपने द्वार खोले, जो उस समय की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति थी।
सम्राट अशोक महान के काल में यह विचार वैश्विक बने, जिसने भारत को ‘विश्व गुरु’ की पहचान दिलाई।
3. मध्यकालीन प्रतिरोध: भक्ति आंदोलन
मध्यकाल में जब समाज रूढ़िवादिता और विदेशी आक्रमणों के दोहरे दबाव में था, तब सन्त कबीर, संत शिरोमणि रैदास, गुरु नानक देव, तुकाराम और चोखामेला जैसे संतों ने भक्ति आंदोलन के जरिए वैचारिक मशाल जलाई।
सन्त कबीर ने पाखंड और मूर्तिपूजा पर कड़ा प्रहार किया।
सन्त रैदास
ने ‘बेगमपुरा’ (ऐसा शहर जहाँ कोई गम न हो) की परिकल्पना की, जो एक समतावादी
समाज का प्रतीक था।
इन संतों ने सिद्ध किया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी मध्यस्थ (पुरोहित) की आवश्यकता नहीं है।
4. आधुनिक भारत: ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले
19वीं सदी में आधुनिक वैचारिक क्रांति की नींव महात्मा ज्योतिबा राव फुले ने रखी। उन्होंने समझा कि दलितों और पिछड़ों की गुलामी की जड़ ‘अशिक्षा’ और ‘धार्मिक मानसिक दासता’ में है।
सत्यशोधक समाज
फुले ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के दावों को चुनौती दी और ‘गुलामगिरी’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से
शोषितों को जगाया।
महिला शिक्षा
सावित्री बाई फुले ने पत्थरों और कीचड़ की मार सहकर भी लड़कियों के लिए स्कूल खोले। यह भारत के इतिहास में ‘शिक्षा के लोकतंत्रीकरण’ का पहला बड़ा कदम था।
5. डॉ. बी.आर. अंबेडकर: चेतना का सूर्योदय
20 वीं सदी में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस वैचारिक संघर्ष को संवैधानिक और कानूनी आधार प्रदान किया।
उन्होंने केवल समाज को बदला नहीं, बल्कि उसे एक नई दिशा दी।
जाति का विनाश (Annihilation of Caste) अंबेडकर का मानना था कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए जाति का विनाश अनिवार्य है, अन्यथा यह समाज भीतर से खोखला होता रहेगा।
संविधान
भारत का संविधान केवल एक कानूनी किताब नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है,जो ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ के सिद्धांत पर आधारित है। संविधान ने हज़ारों साल पुरानी मनुवादी व्यवस्था को कानूनी रूप से ध्वस्त कर दिया।
धम्म परिवर्तन
1956 में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाना बाबा साहब का अंतिम वैचारिक विद्रोह था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्मान विहीन जीवन से बेहतर वैचारिक
स्वतंत्रता है।
6. वर्तमान चुनौतियाँ और राजनीतिक परिदृश्य
आज भी भारतीय समाज उसी पुराने द्वंद्व से जूझ रहा है। जहाँ एक ओर आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट जैसे सुरक्षा कवच हैं, वहीं दूसरी ओर मानसिक रूप से आज भी जातिगत श्रेष्ठता का दंभ
जीवित है।
सत्ता में प्रतिनिधित्व
देश के संसाधनों, न्यायपालिका और मीडिया पर आज भी एक विशेष वर्ग का वर्चस्व बहस का
विषय बना रहता है।
धार्मिक ध्रुवीकरण
राजनीति अक्सर धर्म और जाति के नाम पर समाज को बाँटने का काम करती है, जो विकास के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाता है।
7. निष्कर्ष
भविष्य की राह किसी भी राष्ट्र की बर्बादी और प्रगति की जड़ उसकी सामाजिक व्यवस्था में होती है।
यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा पिछड़े, दलित, आदिवासी और महिलाएँ खुद को उपेक्षित महसूस करेगा, तो वह राष्ट्र कभी
सशक्त नहीं हो सकता।
सच्ची वैचारिक क्रांति तभी सफल मानी जाएगी जब:
जन्म के आधार पर भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो।
संसाधनों और अवसरों का न्यायसंगत वितरण हो।
शिक्षा केवल डिग्री न रहकर
‘तार्किक सोच’ विकसित
करने का माध्यम बने।
बाबा साहब का नारा “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” आज भी उतना ही प्रासंगिक है। समाज को ‘पाखंड’ और ‘अंधविश्वास’ की बेड़ियों को तोड़कर विज्ञान और मानवतावाद की ओर बढ़ना होगा। तभी हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर पाएंगे जिसका सपना बुद्ध, फुले और बाबा साहब ने देखा था।

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य
सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिन्तक ब्यावर-94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com
