भूमिका
यह लेख किसी उपदेश या नसीहत (सलाह) की शैली में नहीं, बल्कि एक दर्दभरी गवाही (साक्ष्य) के रूप में लिखा गया है। यह उन अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के बच्चों के नाम एक खुला ख़त है, जिन्होंने पीढ़ियों से ज़िल्लत (अपमान), जलालत (बेइज्जती) और बेगारी (बिना मज़दूरी के काम) का बोझ उठाया है। यह समाज शुरू से ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिये (किनारे) पर धकेला जाता रहा है। भारत का तथाकथित समृद्ध और मनुवादी ढाँचा इनके श्रम से फलता-फूलता रहा, पर इनके प्रति संवेदना कभी नहीं दिखाई। आज भी केंद्र और राज्य की सत्ता प्रायः राइट-विंग (दक्षिणपंथी) सोच से संचालित है, जहाँ यह वर्ग न तो नीति की प्राथमिकता है और न ही मानवीय चिंता का विषय, क्योंकि इन्हें मज़बूत वोट-बैंक (मतदाता आधार) नहीं माना जाता। ऐसे दौर में, जब शिक्षा एक प्रोडक्ट (उत्पाद) बन चुकी है और डिग्रियाँ महज़ एक इल्यूज़न (भ्रम) साबित हो रही हैं, एससी–एसटी समाज के बच्चों के लिए सच को समझना और समय रहते जागना बेहद ज़रूरी है।
सच जो डराता है, पर बचाता भी है !?
आज यह कहा जा रहा है कि आने वाले दस वर्षों में भारत के लगभग 80% कॉलेज बंद हो सकते हैं। यह कोई हाइपरबोली (अतिशयोक्ति) नहीं, बल्कि एक कड़वा रियलिटी-चेक (यथार्थ परीक्षण) है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आत्मघाती होगा। व्यवस्था आज भी डिग्रियों का भ्रम बेच रही है, जबकि बाज़ार को हुनर चाहिए। डिग्रीधारी युवा वर्षों तक वेटिंग-मोड (इंतज़ार की स्थिति) में फँसे रहते हैं—आवेदन, इंटरव्यू और अस्थायी काम का अंतहीन चक्र। दूसरी ओर, कुशल कामगार सीखते ही कमाना शुरू कर देते हैं और समय के साथ अपनी आय बढ़ाते हैं। यही वह बुनियादी फर्क है जिसे समझना हर युवा के लिए ज़रूरी है, लेकिन विशेष रूप से एससी–एसटी समाज के बच्चों के लिए यह फर्क जिंदगी और बर्बादी के बीच की महीन रेखा है। अगर समय रहते सही रास्ता नहीं चुना गया, तो आने वाला कल और अधिक बेरहम साबित हो सकता है।
यह 7 प्रकार की नौकरियाँ: जहाँ हुनर राजा है:–
1* प्लंबर
(जल-तकनीशियन)
प्लंबर या जल-तकनीशियन का काम आज के समय में केवल एक पेशा नहीं, बल्कि सम्मानजनक आजीविका का सशक्त साधन है। यह हुनर आईटीआई, अप्रेंटिसशिप और स्थानीय कारीगरों के साथ काम करके आसानी से सीखा जा सकता है। इसके लिए भारी डिग्रियों या महँगी पढ़ाई की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि निरंतर अभ्यास और सीखने की नियत (दृढ़ इच्छा) ही सबसे बड़ा साधन है। बढ़ती आबादी, शहरीकरण और निर्माण कार्यों के कारण यह काम पूरी तरह डिमांड-ड्रिवन (मांग आधारित) है और इसके खत्म होने की संभावना नहीं के बराबर है। एससी–एसटी समाज के बच्चों के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ जाति या पहचान नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता देखी जाती है। समय के साथ अनुभव बढ़ने पर आमदनी भी बढ़ती है और व्यक्ति दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर बनता है। यह पेशा आत्मसम्मान, स्थिर आय और सुरक्षित भविष्य की ठोस नींव रखता है।
2* इलेक्ट्रीशियन (विद्युत-तकनीशियन)
इलेक्ट्रीशियन का पेशा आज के युग में अत्यंत आवश्यक और सम्मानजनक माना जाता है। यह हुनर आईटीआई या अन्य तकनीकी संस्थानों से सर्टिफिकेट लेकर तथा निरंतर प्रैक्टिस के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। सर्टिफिकेट + प्रैक्टिस का यह संयोजन न केवल स्थायी आय देता है, बल्कि समाज में पहचान और आत्मविश्वास भी पैदा करता है। बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और घरेलू बिजली की बढ़ती खपत के कारण इस काम की मांग लगातार बनी रहती है। ऑटोमेशन (स्वचालन) के दौर में भी मशीनें, सोलर सिस्टम, स्मार्ट उपकरण और विद्युत संरचनाएँ इंसानी निगरानी और तकनीकी हस्तक्षेप की माँग करती रहेंगी। एससी–एसटी समाज के बच्चों के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि यहाँ मेहनत और कौशल का मूल्य है, न कि सामाजिक पृष्ठभूमि का। अनुभव बढ़ने के साथ आय में वृद्धि होती है और स्वरोज़गार के अवसर भी खुलते हैं। यह पेशा सुरक्षित भविष्य की मजबूत आधारशिला रखता है।
3* टाइल वर्कर / मिस्त्री
टाइल वर्कर या मिस्त्री का काम आने वाले समय में भी पूरी तरह डिमांड-ड्रिवन (मांग आधारित) रहेगा, क्योंकि निर्माण कभी रुकता नहीं। शहरों में इमारतें, गाँवों में घर और सड़कों का विस्तार लगातार हो रहा है। यह हुनर किसी महँगी डिग्री का इल्यूज़न (भ्रम) नहीं, बल्कि मेहनत से सीखा जाने वाला प्रैक्टिकल (व्यावहारिक) कौशल है। अनुभवी कारीगरों के साथ काम करते हुए तजुर्बा (अनुभव) बढ़ता है और आय भी। जिस समाज को सदियों तक ज़मीन से जोड़े रखा गया, जिस पर जुल्म (अत्याचार) और बेइंसाफी (अन्याय) की मार पड़ी, वही समाज अब इसी ज़मीन से सम्मानजनक कमाई कर सकता है। इस पेशे में जाति नहीं, क्वालिटी (गुणवत्ता) बोलती है। समय के साथ काम की एफ़िशिएंसी (दक्षता) बढ़ती है और व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है। यह पेशा एससी–एसटी समाज के बच्चों के लिए हौसला (साहस) और सुरक्षित भविष्य का रास्ता है।
4* डिलीवरी पार्टनर (जोमैटो/स्विगी)
डिलीवरी पार्टनर बनना किसी भी तरह की ज़िल्लत (अपमान) नहीं, बल्कि आज के दौर की एक ज़रूरी सर्वाइवल-स्किल (जीविका कौशल) है। बदलती अर्थव्यवस्था में यह काम तुरंत आय देने वाला और पूरी तरह डिमांड-ड्रिवन (मांग आधारित) है। इसके लिए भारी डिग्री या लंबी पढ़ाई की आवश्यकता नहीं, बल्कि समय की पाबंदी, मेहनत और समझदारी चाहिए। रूट-ऑप्टिमाइज़ेशन (मार्ग अनुकूलन) सीखकर, यानी सही रास्ते, सही समय और तेज़ डिलीवरी के तरीके अपनाकर कमाई को बढ़ाया जा सकता है। यह काम एससी–एसटी समाज के युवाओं के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यहाँ किसी की जाति नहीं, बल्कि उसकी परफॉर्मेंस (कार्य-क्षमता) देखी जाती है। शुरू में यह पेशा कठिन लग सकता है, लेकिन तजुर्बा (अनुभव) बढ़ने के साथ आत्मविश्वास और आय दोनों में इज़ाफ़ा होता है। यह काम आत्मनिर्भरता सिखाता है और यह एहसास देता है कि मेहनत कभी छोटी नहीं होती।
5* ई-कॉमर्स डिलीवरी (अमेज़न/फ्लिपकार्ट)
ई-कॉमर्स डिलीवरी का काम आज के समय में तेज़ी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है, जहाँ रोज़गार के अवसर लगातार बन रहे हैं। इस पेशे की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि यहाँ अनुशासन, समय और मेहनत—तीनों आपके अपने होते हैं, किसी बाबू के रहमोकरम (कृपा) या सिफ़ारिश पर निर्भर नहीं। यह काम पूरी तरह परफॉर्मेंस-बेस्ड (कार्य-क्षमता आधारित) है, जहाँ जितनी ईमानदारी और मेहनत, उतनी कमाई। समय पर डिलीवरी, सही व्यवहार और रास्तों की समझ से एफ़िशिएंसी (दक्षता) बढ़ती है। एससी–एसटी समाज के युवाओं के लिए यह पेशा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ जाति या पहचान नहीं, बल्कि काम का रिकॉर्ड (लेखा) देखा जाता है। धीरे-धीरे तजुर्बा बढ़ने पर आय स्थिर और बेहतर होती जाती है। यह काम आत्मनिर्भरता देता है और यह सिखाता है कि सम्मान मेहनत से मिलता है, सत्ता की दया से नहीं।
6*छोटा दुकानदार / स्वरोज़गार
छोटा दुकानदार या स्वरोज़गार अपनाना केवल कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि सेल्फ-रिलायंस (आत्मनिर्भरता) की मजबूत बुनियाद है। यह रास्ता उन लोगों के लिए खास है जो दूसरों की मेहरबानी पर नहीं, अपने श्रम और समझ पर भरोसा करना चाहते हैं। बाज़ार की नब्ज़ पहचानना, ग्राहक की ज़रूरत समझना और ईमानदार व्यवहार रखना—यही इस पेशे की असली पूँजी है। सही जगह, सही समय और सही सामान चुनना एक तरह की मार्केटिंग (बाज़ार-प्रबंधन) कला है, जो अनुभव से आती है। एससी–एसटी समाज के युवाओं के लिए यह पेशा इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें जाति नहीं, विश्वास बिकता है। धीरे-धीरे तजुर्बा बढ़ने पर आमदनी स्थिर होती है और पहचान बनती है। यह काम सिखाता है कि छोटा शुरुआत भी बड़े भविष्य की बुनियाद (आधार) बन सकती है, बशर्ते हौसला और समझ साथ हों।
7* स्किल-बेस्ड टेक्निशियन (एसी, मोबाइल, सोलर)
स्किल-बेस्ड टेक्निशियन बनना आज के दौर में सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की दिशा में बड़ा कदम है। एसी, मोबाइल और सोलर जैसे क्षेत्रों में काम करने के लिए भारी डिग्रियों की नहीं, बल्कि स्किल (कौशल), प्रशिक्षण और निरंतर अभ्यास की ज़रूरत होती है। यह पेशा पूरी तरह फ्यूचर-ओरिएंटेड (भविष्य उन्मुख) है, क्योंकि आने वाला समय ग्रीन-एनर्जी (हरित ऊर्जा) और आधुनिक टेक्नोलॉजी (तकनीक) का है। सोलर पैनल, इन्वर्टर, स्मार्ट डिवाइस और कूलिंग सिस्टम हर घर की ज़रूरत बनते जा रहे हैं। एससी–एसटी समाज के युवाओं के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ पहचान नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस (कार्य-क्षमता) और एफ़िशिएंसी (दक्षता) देखी जाती है। तजुर्बा बढ़ने के साथ आमदनी और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते हैं। यह पेशा न सिर्फ रोज़गार देता है, बल्कि बदलते दौर के साथ आगे बढ़ने का भरोसा भी देता है।
समाज और शिक्षित वर्ग की भूमिका !!
अब सवाल सिर्फ़ बच्चों या युवाओं का नहीं, बल्कि पूरे एससी–एसटी समाज की ज़िम्मेदारी (दायित्व) का है। यदि इस समाज का एजुकेटेड क्लास (शिक्षित वर्ग) केवल नौकरी पाकर ख़ामोश बैठ गया, तो वह भी व्यवस्था के अन्याय में शरीक (सहभागी) माना जाएगा। शिक्षित लोगों को चाहिए कि वे सिर्फ़ अपनी तरक़्क़ी तक सीमित न रहें, बल्कि मेंटॉर (मार्गदर्शक) बनकर अगली पीढ़ी का हाथ थामें। बच्चों को यह समझाना ज़रूरी है कि आज का दौर डिग्री के इल्यूज़न (भ्रम) का नहीं, बल्कि हुनर के रियल-वैल्यू (वास्तविक मूल्य) का है। समाज को सामूहिक रूप से यह सोच विकसित करनी होगी कि किताबों के साथ-साथ काम सीखना भी उतना ही ज़रूरी है। जब शिक्षित वर्ग अपने तजुर्बे और ज्ञान को बाँटेगा, तभी स्किल-कैपिटल (कौशल पूंजी) मज़बूत होगी और समाज आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ेगा।
चेतावनी: आने वाला वक्त और कठोर है !!
2040–45 में जब आज का बच्चा स्नातक बनेगा, तब दुनिया बिल्कुल बदली हुई होगी। हर क्षेत्र में ऑटोमेशन (स्वचालन) हावी होगा और मशीनें इंसानों के कई काम संभाल चुकी होंगी। ऐसे में हर दो साल में कौशल की एक्सपायरी (समाप्ति) होना सामान्य बात होगी, यानी जो आज सीखा है वह कल बेकार भी हो सकता है। इस दौर में हर इंसान से कॉग्निटिव-फ्लेक्सिबिलिटी (मानसिक लचीलापन) की माँग होगी—नई चीज़ें सीखने, बदलती परिस्थितियों को अपनाने और अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने की क्षमता। जो युवा खुद को लगातार अपडेट नहीं करेगा, वह पीछे छूट जाएगा। ऐसे समय में पुरानी शिक्षा, पुराना पाठ्यक्रम और जड़ हो चुका पुराना सिस्टम किसी को भी सुरक्षित भविष्य नहीं दे पाएगा। विशेषकर एससी–एसटी समाज के बच्चों के लिए यह चेतावनी बेहद गंभीर है, क्योंकि गलती की कीमत उनके लिए ज़्यादा भारी पड़ सकती है। अब सीखना, बदलना और आगे बढ़ना ही एकमात्र रास्ता है।
समापन !!
यह लेख किसी व्यक्ति, सरकार या व्यवस्था के खिलाफ़ चार्जशीट (आरोप-पत्र) नहीं है, बल्कि अपने समाज के लोगों के लिए एक ज़रूरी अलार्म (चेतावनी) है। जिस एससी–एसटी समाज को सदियों तक चुपचाप सहने, झुकने और इंतज़ार करने की शिक्षा दी गई, अब उसे चुनने, सोचने और बदलने की शिक्षा चाहिए। समय की सच्चाई यही है कि अधिकार सिर्फ़ माँगने से नहीं, क्षमता से मिलते हैं। अगर आज इस समाज का बच्चा डिग्री के भ्रम से बाहर निकलकर हुनर और स्किल (कौशल) को अपनाएगा, तो कल कोई सरकार, कोई सिस्टम और कोई सत्ता उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगी। यही हुनर उसका वजूद (अस्तित्व) बनेगा और यही उसकी ताक़त। अब भी समय हाथ से पूरी तरह फिसला नहीं है। इसलिए डरिए मत, हिम्मत रखिए, लेकिन हालात को समझते हुए सावधान ज़रूर हो जाइए—क्योंकि जागा हुआ समाज ही अपना भविष्य खुद लिखता है।
वक़्त के साथ जो न चले, वही हाशिये (किनारे) पर रहेगा,
मनुवादी और सिस्टम के कंट्रोल (नियंत्रण) में उसका वजूद (अस्तित्व) खो जाएगा।
संकलन करता
हगामी लाल
मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
9829230966
स्रोत और संदर्भ:
माइंड ट्रेनर राकेश की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं, सरकारी रिपोर्ट्स, एससी–एसटी समाज पर ऐतिहासिक अध्ययन, रोजगार और कौशल सर्वेक्षण।
