लेखक
शोध, संकलन एवं आलेख प्रस्तुति
सोहन लाल सिंगारिया

प्रस्तावना इतिहास के क्षितिज पर वैचारिक महाविस्फोट

मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज की चेतना गहरी निद्रा में सो जाती है, जब विषमता, जातिगत दंभ और शोषक व्यवस्थाएँ अंतिम पंक्ति के मनुष्य को कुचलने लगती हैं, तब किसी न किसी महापुरुष का प्रादुर्भाव उस जड़ता को तोड़ने के लिए होता है।

वे केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि स्वयंकाल
चक्र की गति को बदलकर एक नया युग निर्मित करते हैं।

भारतीय सामाजिक क्रांति और जन-साहित्य के पटल पर लोकशाहीर अन्ना भाऊ साठे एक ऐसा ही देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी वैचारिक आभा समय बीतने के साथ और अधिक प्रखर होती जा रही है।

अन्ना भाऊ साठे मात्र एक नाम नहीं, अपितु शोषितों, पीड़ितों, कामगारों और बहुजन समाज की स्वाभिमानी चेतना का एक महासमुद्र हैं।

उन्होंने किसी शाही दरबार की छत्रछाया में बैठकर या अभिजात वर्ग की वाहवाही लूटने के लिए साहित्य सृजन नहीं किया; उनकी लेखनी तो भट्टी में तपते हुए मिल-मजदूरों की पसीने से भीगी छटपटाहट, खेत-खलिहानों में हाड़ गलाते किसानों के मौन क्रंदन और झुग्गी-झोपड़ियों में सुलगती हुई सामाजिक क्रांति की ज्वाला से स्याही लेकर चलती थी।

वे एक ऐसे महान युगद्रष्टा थे, जिन्होंने ‘तमाशा’ जैसी पारंपरिक लोककला की शास्त्रीयता को तोड़कर उसे सामाजिक पुनर्जागरण और शोषकों के विरुद्ध एक मारक हथियार बना दिया।

  1. जन्म-स्थान, सामाजिक पृष्ठभूमि और बाल्यकाल का विषैला दंश वाटेगांव की माटी और शोषण का बीजारोपण

महाराष्ट्र के सांगली जिले की वाळवा तहसील में बसा वाटेगांव केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि वह भूमि है जिसने भारत की सामाजिक क्रांति को उसका सबसे बुलंद स्वर दिया।

1 अगस्त 1920 को इसी पावन धरा पर लोकशाहीर अन्ना भाऊ साठे का जन्म हुआ।

पिता: श्री भाऊराव साठे — एक अत्यंत परिश्रमी, हाड़-तोड़ मजदूरी करने वाले व्यक्ति, जिनकी रीढ़ की हड्डी सामाजिक विषमता के भारी बोझ के नीचे कभी झुकी तो सही, परंतु टूटी नहीं।

माता: श्रीमती वालूबाई साठे — वात्सल्य, धैर्य और अदम्य स्वाभिमान की प्रतिमा, जिन्होंने अपने बालक के भीतर आत्मसम्मान के वे संस्कार बोए जो आगे चलकर सामाजिक बगावत का वटवृक्ष बने।

अन्ना भाऊ का जन्म अत्यंत निर्धन ‘मांग’ (मातंग) समाज में हुआ था।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों का भारत जातिवादी जंजीरों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। अस्पृश्यता अपने सबसे विभत्स और नग्न रूप में तांडव कर रही थी। दलितों के लिए गाँव के सार्वजनिक कुएँ से जल की एक बूँद लेना अपराध था; गाँव की पक्की सड़कों पर चलने के लिए पाबंदियाँ थीं और इंसान को इंसान न समझकर उसे पशु से भी बदतर दर्जा दिया जाता था।

सूखे की विभीषिका और बाल-मन पर अंकित अमिट घाव अन्ना भाऊ के बाल्यकाल का एक अत्यंत मार्मिक और हृदयविदारक संस्मरण उनके संपूर्ण जीवन-दर्शन की नींव बनता है।

ऐतिहासिक संस्मरण
जब वाटेगांव और आसपास के पूरे इलाके में भीषण अकाल पड़ा, तो धरती फट गई और कुएँ सूख गए। फसलों के नाम पर धूल उड़ रही थी।

अन्ना भाऊ के घर में अन्न का एक दाना तक शेष न रहा। उनके पिता रोजगार और एक निवाले की तलाश में मीलों भटकते रहते।

उस बाल्यकाल में बालक अन्ना ने अपनी सजल आँखों से देखा कि कैसे भुखमरी के उस भयानक दौर में भी समाज की जातिवादी व्यवस्था निष्ठुर बनी रही।

ऊँची जाति के लोगों के अनाज गोदाम भरे पड़े थे, परंतु निचली जाति के बच्चों को तड़प-तड़पकर बिलखने के लिए छोड़ दिया गया था। बालक अन्ना ने देखा कि शोषक वर्ग अपनी जातिगत श्रेष्ठता के मद में इतना अंधा था कि वह भूखे बहुजनों को इंसान मानने तक को तैयार न था।

इस दारुण दरिद्रता और निर्मम सामाजिक बहिष्कार ने बालक अन्ना के हृदय में यह विचार बीज के रूप में रोप दिया कि—”यह सामाजिक विषमता, निर्धनता और पीड़ा किसी ईश्वर या ईश्वर निर्मित विधान का परिणाम नहीं है, बल्कि यह इंसानों द्वारा दूसरे इंसानों का शोषण करने के लिए बनाई गई एक क्रूर और कपटी व्यवस्था है I

इसी बोध ने उन्हें भविष्य का महान क्रांतिक्षेत्र का नायक बनाया।

  1. शिक्षा की अनूठी गाथा, ‘डेढ़ दिन’ का औपचारिक स्कूल बनाम जीवन का अनंत विश्वविद्यालय

विद्यालय से जातिगत निष्कासन का दंश

आज के दौर में जब डिग्रियों और डिप्लॉमाओं के आधार पर विद्वत्ता का मापन किया जाता है, अन्ना भाऊ साठे का जीवन इस अभिजात अवधारणा को पूरी तरह खारिज करता है। उनकी शिक्षा की गाथा विश्व इतिहास में स्वाध्याय और जिजीविषा का सबसे महान उदाहरण है।

जब बालक अन्ना को गाँव के एक स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में दाखिला दिलाया गया, तो उन्हें लगा कि वे भी ज्ञान के प्रकाश से जगमगाएंगे। परंतु जातिवाद का भयानक विष विद्यालय के प्रांगण में भी व्याप्त था:

प्रथम दिवस
बालक अन्ना जब उत्साह से भरे स्कूल पहुँचे, तो उन्हें अन्य बच्चों के साथ टाट-पट्टी पर बैठने की अनुमति नहीं मिली। सवर्ण शिक्षक ने उन्हें कक्षा के बाहर, धूल और गंदगी से भरी देहरी पर बैठने का हुक्म सुनाया।

द्वितीय दिवस
भारी मन से दूसरे दिन भी वे गए। दोपहर की कड़कड़ाती धूप में जब बालक अन्ना को तीव्र प्यास लगी, तो उन्होंने प्यास से व्याकुल होकर पीने के पानी के मटके को छूने का प्रयास किया। बस फिर क्या था! तथाकथित सवर्ण शिक्षक का जातिगत दंभ उबल पड़ा। उन्होंने बालक अन्ना को अत्यंत अशोभनीय और जातिसूचक गालियाँ देते हुए, बेंत से बेदर्दी से पीटा और धक्के देकर स्कूल के परिसर से बाहर फेंक दिया।

यह अपमानजनक घटना अन्ना भाऊ के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। वे अपने जीवन में मात्र डेढ़ दिन ही औपचारिक स्कूल जा सके। उस दिन के बाद औपचारिक शिक्षा के द्वार उनके लिए सदा-सदा के लिए बंद कर दिए गए।

मुंबई की ओर पैदल महाप्रवास
1930 के दशक के मध्य में, जब वाटेगांव में भुखमरी की विभीषिका असहनीय हो गई, तो साठे परिवार ने अपने गाँव को अलविदा कहा और रोजगार की तलाश में मुंबई की ओर प्रस्थान किया।

यह केवल एक प्रवास नहीं था, बल्कि अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ा गया एक महासंग्राम था। साठे परिवार ने सांगली से मुंबई तक की सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पैदल तय की।

रास्ते में जंगलों, पहाड़ियों और धूल भरे मार्गों से गुजरते हुए, माँगकर खाते हुए, महीनों की कठिन यात्रा के बाद यह परिवार मुंबई की बहुचर्चित श्रमिक बस्ती—भायखला और चिंचपोकली की ‘चालों’ (Chawls) में पहुँचा।

सड़कों के होर्डिंग्स और साइनबोर्डों से अक्षर-ज्ञान मुंबई की तंग चालों में जहाँ एक कमरे में दस-दस लोग रहते थे, अन्ना भाऊ ने अपने ज्ञान-अर्जन की वास्तविक यात्रा शुरू की,सड़कों को बनाया पाठ्यपुस्तक: दिनभर कुलीगिरी और बूट-पॉलिश करने के बाद, जब अन्ना भाऊ मुंबई की सड़कों पर घूमते, तो दुकानों के ऊपर लगे साइनबोर्ड, सिनेमा के पोस्टर, होर्डिंग्स और रास्तों पर पड़े समाचार पत्रों के फटे पन्नों को घंटों निहारते थे। वे अक्षरों की आकृतियों को अपने दिमाग में छाप लेते थे।

मजदूरों का रात्रि-स्कूल
रात के समय जब कपड़ा मिलों के कामगार थके-हारे लौटते, तो अन्ना भाऊ उनके पास बैठते। अपने पढ़े-लिखे मजदूर साथियों से पूछ-पूछकर वे अक्षरों को जोड़ना सीखते। “यह कौन सा अक्षर है?”, “इसे मराठी में क्या पढ़ते हैं?”—इन प्रश्नों की निरंतर झड़ी लगाकर उन्होंने कुछ ही महीनों में मराठी भाषा में पढ़ने और लिखने की अद्भुत दक्षता हासिल कर ली।

अतुलनीय कीर्तिमान
जिस बालक को समाज ने ‘योग्य’ न मानकर डेढ़ दिन में स्कूल से खदेड़ दिया था, उसी स्व-शिक्षित व्यक्ति ने आगे चलकर अपनी कुशाग्र बुद्धि और अनुभव के बल पर 35 से अधिक कालजयी उपन्यास, 100 से अधिक मर्मस्पर्शी कहानियाँ, 12 नाटक, 10 ऐतिहासिक पोवाड़े, 14 लोकनाट्य (वगनाट्य) और अनगिनत यात्रा वृत्तांत रचकर मराठी साहित्य को समृद्धता के उस शिखर पर पहुँचा दिया जहाँ पहुँचना बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले साहित्यकारों के लिए भी स्वप्न समान था।

  1. श्रमिक जीवन, वर्ग-संघर्ष और वैचारिक परिपक्वता मार्क्स से बाबासाहेब की ओर
    श्रम की भट्टी में तपा कंचन
    मुंबई पहुँचकर पेट की आग बुझाने के लिए अन्ना भाऊ ने हर वह काम किया जो एक आम मजदूर करता है। उन्होंने भायखला स्टेशन पर कुली के रूप में बोरियाँ ढोईं, फुटपाथों पर बैठकर लोगों के बूट पॉलिश किए, कोयले की खदानों जैसे कारखानों में कोयला ढोया, तांगा चलाया और अंततः मुंबई की प्रसिद्ध कपड़ा मिल ‘कोहिनूर मिल्स’ में एक मजदूर के रूप में भर्ती हो गए।

मिलों की कालिख, मशीनों का गगनभेदी शोर और चौबीसों घंटे पसीना बहाने वाले मजदूरों का भयावह शोषण—यह अन्ना भाऊ की वास्तविक पाठशाला बनी। यहाँ उन्होंने देखा कि पूँजीपति वर्ग किस प्रकार कामगारों की हड्डियों का निचोड़ निकालकर अपनी तिजोरियाँ भर रहा था।

कम्युनिस्ट आंदोलन और ‘लाल बावटा कला पथक’
मजदूरों की दुर्दशा से द्रवित होकर वे साम्यवादी (कम्युनिस्ट) आंदोलन के संपर्क में आए। उन्होंने समझा कि जब तक मजदूर संगठित नहीं होंगे, तब तक उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा। इसी दौरान उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों—अमर शेख और दत्ता गव्हाणकर के साथ मिलकर ‘लाल बावटा कला पथक’ का गठन किया।

इस कला पथक के माध्यम से अन्ना भाऊ साठे ने अपनी बुलंद आवाज, ढोलक की थाप और क्रांतिकारी गीतों के बल पर मुंबई के लाखों मिल-मजदूरों को हड़तालों और आंदोलनों में ला खड़ा किया। जब अन्ना भाऊ मंच पर उतरकर गाते थे, तो मजदूरों का खून उबाल मारने लगता था।

जाति-व्यवस्था का बोध और बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर का प्रभाव
मार्क्सवादी विचारधारा के साथ काम करते-करते अन्ना भाऊ की सूक्ष्म दृष्टि ने एक बहुत बड़ी भारतीय सच्चाई को भांप लिया।

वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत में केवल ‘वर्ग-संघर्ष’ की थ्योरी पूरी तरह खरी नहीं उतरती, क्योंकि यहाँ मजदूर का शोषण केवल उसकी आर्थिक स्थिति के कारण नहीं हो रहा है, बल्कि उसकी ‘जाति’ (Caste) उसके शोषण का सबसे मुख्य और क्रूर कारण है।

उन्हें अहसास हुआ कि एक सवर्ण मजदूर और एक दलित मजदूर में भी आकाश-पाताल का अंतर है। दलित मजदूर को दोहरी मार झेलनी पड़ती है—एक आर्थिक शोषण की और दूसरी सामाजिक अस्पृश्यता की।

जब अन्ना भाऊ परमपूज्य बोधिसत्व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों और आंदोलनों के प्रत्यक्ष संपर्क में आए, तो उनकी वैचारिक दिशा पूरी तरह परिपक्व और स्पष्ट हो गई। वे समझ गए कि बहुजन समाज की वास्तविक मुक्ति केवल आर्थिक अधिकारों से नहीं, बल्कि सामाजिक समता, जाति-उन्मूलन और आत्मसम्मान के जरिए ही संभव है।

वे डॉ. आंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ के महामंत्र को अपना जीवन-आदर्श बना चुके थे।

  1. अन्ना भाऊ साठे का साहित्य: शोषितों का क्रांति-घोषणापत्र
    अन्ना भाऊ साठे का साहित्य किसी बंद कमरे में बैठकर काल्पनिक रोमानियत के लिए नहीं रचा गया था। उनका साहित्य समाज के शोषित वर्ग का अधिकार-पत्र था।

उन्होंने मराठी साहित्य के उस पारंपरिक ढर्रे को उखाड़ फेंका जिसमें केवल राजा-महाराजाओं, काल्पनिक देवी-देवताओं या उच्च वर्ग के सुख-दुख का चित्रण होता था।

अन्ना भाऊ ने अपने साहित्य के केंद्र में खेत-मजदूर, कुली, डोम, महार, मांग, वेश्याओं, भटकती जनजातियों और कारखानों के कामगारों को स्थापित किया।
कालजयी महा-उपन्यास: ‘फकीरा’
1959 में प्रकाशित उपन्यास ‘फकीरा’ केवल अन्ना भाऊ साठे की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य की एक अनमोल धरोहर है।

उपन्यास का कथानक
फकीरा’ मातंग समाज के एक ऐसे निडर, स्वाभिमानी और परोपकारी युवा नायक की गाथा है, जो ब्रिटिश हुकूमत और स्थानीय शोषक महाजनों के अत्याचारों के खिलाफ बगावत का परचम बुलंद करता है। जब क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ता है और ब्रिटिश सरकार तथा शोषक महाजन अनाज के गोदामों पर ताले लगाकर गरीबों को मरने के लिए छोड़ देते हैं, तब फकीरा अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों के सरकारी खजाने और अनाज के गोदामों को लूटता है और उस अनाज को भूखे, नंगे, गरीब देहातियों में बाँट देता है। फकीरा का जीवन यह दर्शाता है कि बहुजन समाज का व्यक्ति कोई अपराधी नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाला प्राकृतिक योद्धा है।

महाराष्ट्र सरकार का सर्वोच्च सम्मान: इस ऐतिहासिक उपन्यास के लिए 1961 में अन्ना भाऊ साठे को महाराष्ट्र सरकार द्वारा सर्वश्रेष्ठ उपन्यास के पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इस उपन्यास पर आगे चलकर एक अत्यंत सफल मराठी फिल्म का निर्माण भी हुआ।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के चरणों में अमर समर्पण
अन्ना भाऊ साठे ने अपने इस सबसे प्रिय और महान उपन्यास ‘फकीरा’ को महामानव डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के चरणों में समर्पित करते हुए जो शब्द लिखे थे, वे इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हैं

“जिन्होंने अपनी विद्वत्ता, त्याग और अतुलनीय संघर्ष से भारत के करोड़ों दलितों, पीड़ितों और शोषितों को गुलामी के नरक से निकालकर आत्मसम्मान के साथ जीने का मार्ग दिखाया; उस युगपुरुष परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के श्रीचरणों में यह ‘फकीरा’ उपन्यास अत्यंत श्रद्धा और सप्रेम समर्पित है।

यह समर्पण इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है कि अन्ना भाऊ साठे के हृदय में बाबासाहेब के प्रति कितनी अगाध निष्ठा और वैचारिक समरसता थी।

साहित्य के अन्य अनमोल रत्न

  1. नारी-सशक्तीकरण का अनूठा चित्रण (‘वैजयंता’, ‘आवडी’, ‘माकडीचा माळ’)
    अन्ना भाऊ साठे के उपन्यासों की सबसे बड़ी विशिष्टता उनका स्त्री-दृष्टिकोण था। उन्होंने अपने उपन्यासों—’वैजयंता’, ‘आवडी’, ‘माकडीचा माळ’ और ‘चित्रा’ में बहुजन समाज की महिलाओं को केवल अबला या पीड़ित के रूप में नहीं दिखाया। उनकी महिला पात्र अत्यंत साहसी, निर्णय लेने में सक्षम, स्वाभिमानी और आवश्यकता पड़ने पर अन्याय के खिलाफ हथियार उठा लेने वाली वीरांगनाएँ हैं।

उन्होंने दिखाया कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला के भीतर भी आत्मसम्मान की कितनी प्रचंड ज्वाला जलती है।

  1. ‘स्मशानातली एक रात्र’ (श्मशान की एक रात)
    यह कहानी भारतीय समाज की उस वीभत्स और कड़वी सच्चाई का नग्न दस्तावेज है जिसे अभिजात वर्ग अक्सर कालीन के नीचे छुपा देता है। इस कहानी में अन्ना भाऊ ने दिखाया है कि कैसे एक भूखा दलित व्यक्ति पेट की आग बुझाने के लिए रात के सन्नाटे में श्मशान घाट जाता है ताकि मृत शरीर पर चढ़ाया गया कफन का कपड़ा चुराकर उसे बेच सके और अपने बच्चों के लिए दो सूखी रोटियाँ ला सके।

यह कहानी पाठक की आत्मा को झकझोर कर रख देती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिस समाज में जिंदा इंसान को रोटी न मिले और मरे हुए के कफन पर नजर रखनी पड़े, वह समाज कितना बीमार है!

  1. सांस्कृतिक क्रांति: ‘लोककला’ का राजनीतिक उपयोग और ‘पोवाड़े’ का जादू ,लोककला का कायाकल्प: तमाशा से ‘वगनाट्य’ की ओर
    अन्ना भाऊ साठे इस बात को भली-भांति समझते थे कि भारत का बहुजन समाज सदियों की सामाजिक गुलामी के कारण अक्षरों से दूर रखा गया था। केवल पुस्तकें लिखकर उन तक क्रांति का संदेश नहीं पहुँचाया जा सकता था। इसलिए उन्होंने संस्कृति और लोककला को जन-जागृति का माध्यम बनाया।

उन्होंने महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककला ‘तमाशा’—जो उस समय तक केवल फूहड़ मनोरंजन और कामुकता का साधन मानी जाती थी—उसका पूरी तरह कायाकल्प कर दिया। उन्होंने उसमें से अश्लीलता को निकालकर उसमें सामाजिक चेतना, वर्ग-संघर्ष और जाति-उन्मूलन के विषयों को पिरोया। इसे उन्होंने वगनाट्य’ (सामाजिक लोकनाटक) का नाम दिया।

शाहिरी और पोवाड़े
स्वाभिमान का महा-गर्जन
अन्ना भाऊ साठे जब हाथ में कँजरी (एक प्रकार का वाद्य) और गले में ढोलक लटकाकर मंच पर उतरते थे, तो उनकी शाहिरी (लोक-गायन) में ऐसा जादू था कि हजारों की भीड़ मंत्रमुग्ध हो जाती थी। उनके पोवाड़े (वीरगाथा गीत) सीधे जनता के दिलों पर प्रहार करते थे।

उनकी यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ आज भी बहुजन समाज के प्रत्येक युवा की नसों में बिजली का प्रवाह कर देती हैं

जग बदल घालूनी घाव, सांगून गेले मज भीमराव!
(अर्थात्: परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मुझे यह अमर संदेश देकर गए हैं कि इस अन्यायकारी, विषमतावादी और शोषक दुनिया पर अपने विचारों और संघर्ष की करारी चोट करो और इसे समतामूलक दुनिया में बदल डालो!)

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका
1950 के दशक में जब केंद्र सरकार और पूंजीपतियों की लॉबी मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करके एक केंद्रशासित प्रदेश या अलग राज्य बनाने की साजिश रच रही थी, तब महाराष्ट्र के अस्तित्व को बचाने के लिए ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ की शुरुआत हुई।

इस आंदोलन को जन-आंदोलन बनाने का पूरा श्रेय अन्ना भाऊ साठे, शाहिर अमर शेख और शाहिर दत्ता गव्हाणकर की तिकड़ी को जाता है। अन्ना भाऊ ने “माझी मायना पुरव” (मेरी मुंबई का दर्द) जैसे ऐसे ओजस्वी पोवाड़े लिखे और गाए कि महाराष्ट्र का देहात-देहात जाग उठा।

गाँव-गाँव से किसान और मुंबई की मिलों से लाखों मजदूर सड़कों पर उतर आए। अन्ना भाऊ की शाहिरी की गूँज ने तत्कालीन हुक्मरानों को हिलाकर रख दिया और अंततः मुंबई को महाराष्ट्र का अभिन्न अंग बनाना ही पड़ा।

  1. अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चमकता बहुजन सितारा मास्को यात्रा (1961)
    जिस बालक को जातिवादी मानसिकता के कारण गाँव के प्राथमिक स्कूल की देहरी से खदेड़ दिया गया था, उसी अन्ना भाऊ साठे की अद्भुत साहित्यिक प्रतिभा का डंका आगे चलकर संपूर्ण विश्व में बजा।

सोवियत संघ (रूस) में राजकीय स्वागत 1961 में अन्ना भाऊ साठे को सोवियत संघ (रूस) की सरकार द्वारा ‘इंडो-सोवियत कल्चरल सोसाइटी’ के तत्वावधान में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए मास्को आमंत्रित किया गया।

रूस के पाठकों में लोकप्रियता: अन्ना भाऊ साठे के उपन्यास ‘फकीरा’ और उनकी कई लघु कहानियों का रूसी भाषा में अनुवाद हुआ। सोवियत संघ के साहित्यकारों और आम पाठकों ने अन्ना भाऊ की कृतियों को सिर-आँखों पर लिया।

रूसी जनता यह देखकर आश्चर्यचकित थी कि भारत की तंग चालों में रहने वाला एक अनपढ़ मजदूर इतने उच्च कोटि का साहित्य कैसे रच सकता है!

मास्को विश्वविद्यालय में ऐतिहासिक भाषण: मास्को के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में विद्वानों और विचारकों की अंतरराष्ट्रीय सभा को संबोधित करते हुए अन्ना भाऊ साठे ने भारत के दलितों, मजदूरों, भटके हुए समाजों और शोषितों के जीवन पर एक अत्यंत ओजस्वी और ऐतिहासिक भाषण दिया।

उन्होंने विश्व पटल पर भारत के बहुजन समाज की वास्तविक पीड़ा और उसकी सामर्थ्य को प्रखरता से रखा।

यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण थी कि यदि अवसर और स्वाभिमान मिले, तो बहुजन समाज का व्यक्ति विश्व के किसी भी मंच पर अपनी प्रतिभा का परचम लहरा सकता है।

  1. जीवन के अंतिम वर्ष: अपार सादगी, तंगहाली और अमर शहादत
    इतना महान साहित्यकार, जिसकी रचनाओं पर फिल्में बनीं, जिनके नाटकों के हजारों शो हुए, जिनकी पुस्तकें लाखों की संख्या में बिकीं और जिन्हें विदेश में राजकीय सम्मान मिला—उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा था? यह जानकर आज आँखों में आँसू आ जाते हैं।
    ईमानदारी और निर्लोभता का अप्रतिम उदाहरण अन्ना भाऊ साठे ने कभी अपने साहित्य को धन कमाने का जरिया नहीं बनाया। उन्होंने कभी अपने लिए बड़ा मकान, कार या संपत्ति जमा नहीं की। वे जीवन भर मुंबई की उसी बदबूदार, छोटी सी झुग्गी-झोपड़ी में रहे।

उन्हें अपनी किताबों से जो भी रॉयल्टी या धन प्राप्त होता, वे उसे अपने पास रखने की बजाय सामाजिक कार्यों में, गरीब मिल-मजदूरों की हड़तालों में, किसी अनाथ बच्चे की पढ़ाई में या बीमार साथी के इलाज में सहर्ष दान कर देते थे। उन्होंने सदैव बुद्ध, कबीर, फुले और आंबेडकर के ‘अपरिग्रह’ और ‘त्याग’ के सिद्धांत को अपने व्यक्तिगत जीवन में जिया।

अंतिम सांस और महापरिनिर्वाण
जीवन के अंतिम दिनों में अत्यधिक शारीरिक श्रम, गरीबी और सामाजिक उपेक्षा के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। परंतु उनकी वैचारिक प्रखरता अंतिम सांस तक बनी रही।

18 जुलाई 1969 को मात्र 49 वर्ष की अल्पायु में यह महान लोकशाहीर, क्रांति का मशालची और बहुजनों का महान साहित्यकार इस भौतिक संसार को अलविदा कह गया।

वे भले ही शरीर रूप में चले गए, परंतु उनका साहित्य, उनकी शाहिरी और उनके विचार आज भी अमर हैं और युगों-युगों तक रहेंगे।

  1. बहुजन समाज के लिए प्रेरणादायी संस्मरण, संदेश एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन

अन्ना भाऊ साठे का संपूर्ण जीवन बहुजन समाज के लिए केवल अतीत का इतिहास नहीं है, बल्कि वर्तमान की समस्याओं से निपटने और भविष्य के निर्माण का एक जीवंत रोडमैप है। उनके जीवन से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ और मार्गदर्शन मिलते हैं

  1. शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना
    (अभावों से न डरना)
    अन्ना भाऊ साठे का जीवन यह सिद्ध करता है कि यदि मन में दृढ़ इच्छाशक्ति और ज्ञान की प्यास हो, तो परिस्थितियां कभी बाधा नहीं बन सकतीं।

संदेश: आज जब बहुजन समाज के पास स्कूल, कॉलेज और तकनीक के साधन उपलब्ध हैं, तब बहुजन युवाओं को अपनी संपूर्ण ऊर्जा उच्च शिक्षा, शोध, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सिविल सेवाओं को प्राप्त करने में लगानी चाहिए। अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करना ही अन्ना भाऊ को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

  1. आत्मसम्मान से कोई समझौता नहीं
    अन्ना भाऊ ने जीवन भर भीषण गरीबी झेली, लेकिन कभी किसी शोषक या सत्ताधीश के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने अपने स्वाभिमान को हमेशा सर्वोपरि रखा।

संदेश: बहुजन समाज को किसी भी परिस्थिति में अपने सामाजिक और राजनीतिक स्वाभिमान से समझौता नहीं करना चाहिए। चाटुकारिता और मानसिक गुलामी को त्यागकर अपने पैरों पर खड़े होना ही बहुजन आंदोलन का मूल आधार है।

  1. लेखनी और बौद्धिक क्षमता को क्रांति का माध्यम बनाना
    अन्ना भाऊ ने दिखाया कि तलवार या हिंसा से अधिक ताकतवर ‘कलम’ और ‘विचार’ होते हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया।

संदेश: आज के बहुजन युवाओं को सोशल मीडिया, साहित्य, पत्रकारिता, कला और डिजिटल माध्यमों का उपयोग समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वास, पाखंड और जातिवादी मानसिकता का पर्दाफाश करने के लिए करना चाहिए।

  1. महिलाओं का पूर्ण सम्मान और नेतृत्व निर्माण
    अन्ना भाऊ साठे ने अपने साहित्य में महिलाओं को सदैव शक्ति, साहस और स्वाभिमान के रूप में चित्रित किया।

संदेश: बहुजन समाज तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक वह अपनी बेटियों और महिलाओं को शिक्षा, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व में बराबरी का हक नहीं देता।

उपसंहार: क्रांति का अनबुझा दीया और हमारा संकल्प
लोकशाहीर अन्ना भाऊ साठे एक ऐसे वैचारिक महासूर्य थे, जिनकी किरणों ने बहुजन समाज के सदियों पुराने अंधेरे को छिन्न-भिन्न कर दिया। वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे; वे एक आंदोलन थे।

वे एक ही समय में विचारक, लेखक, कवि, गायक, अभिनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, मिल-मजदूर और महान क्रान्तिकारी थे।

आज जब देश और समाज एक बार फिर नव-सामंतवाद, आर्थिक विषमता और सामाजिक भेदभाव की नई चुनौतियों से जूझ रहा है, तब अन्ना भाऊ साठे का साहित्य और उनके विचार हमारे लिए एक मजबूत ढाल और प्रखर तलवार की तरह काम कर सकते हैं।

बहुजन समाज की आने वाली पीढ़ियों का यह परम कर्तव्य है कि वे अन्ना भाऊ साठे के साहित्य का अध्ययन करें, उनके जीवन-संघर्ष से प्रेरणा लें और बुद्ध, कबीर, जोतीराव फुले, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अन्ना भाऊ साठे के सपनों के समतामूलक, शोषणमुक्त और प्रबुद्ध भारत के निर्माण के लिए एकजुट होकर संघर्ष करें।

लेखक
(आलेख संकलन, शोध एवं प्रस्तुति सोहन लाल सिंगारिया सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर राजस्थान-94622-60179

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