मैनें अध्ययन गोद योजना की प्रेरणा दा सिंबल ऑफ नॉलेज,संविधान निर्माता, शोषितों,
पीड़ितों,यतीमों,उपेक्षितों,पिछड़ों ओर मूलभूत सुविधाओं से महरूम तथा अधिकार विहीन करोड़ों लोगों का उद्धार करने वाले युग पुरुष मानवता के मशीहा डॉ. भीमराम अंबेडकर जी के मुख्य तीन मुख्य आदर्श वाक्य में से एक जो शिक्षित बनों हैं, उसको धरातल पर साकार रूप देने के लिए लागू कर उनके अधूरे सपनों के कारवां को थोड़ा सा ही सही लेकिन आगे ले जाने का प्रयास हैं जिसमें अनेका अनेक सामाजिक चिंतक एवं भामाशाहों की भागीदारी सुनिश्चित हैं।
बाबा साहब ने अपने जीवन में शिक्षा को भोजन से भी अधिक महत्व दिया शिक्षा को शेरनी का दूध भी बताया शिक्षा रूपी शेरनी का दूध पियेगा व दाहड़ेगा यह मैं नहीं कहता उनकी उच्च शिक्षा, उपाधियां व उनके द्वारा लिखित सैकड़ों किताबों में दर्शाया गया हैं।
शिक्षा कितनी प्रभावशाली व कारगर होती हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बाबा साहब का जीवन संघर्ष व उनकी कार्यशैली में सुमार हैं जो सम्पूर्ण जगत को दिखाई दे रहा हैं। क्योकि विश्व में ज्ञान के प्रतीक की उपाधि भी बाबा साहब के नाम हैं। जो करोड़ों लोगों का सर गर्व से ऊपर कर देती हैं।
इसलिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओमाबा जी ने कहाँ था कि “बाबा साहब हमारे देश में पैदा होते तो हम उन्हें सूर्य कहते।”
यह सन्देश तब विश्व के देशों में गया तो वैचारिक क्रांति आ गई विश्व विद्यालयों, अस्पतालों पुस्तकालयों, वाचनालयों, संग्रहालयों,पार्कों,चौराहों ,हवाईअड्डों, बड़ी बड़ी संस्थाओं एवं अध्ययन अध्ययपन शोध पाठ्यक्रमों उनके पुस्तकों को पढ़ाया जाने लगे जो अपने आप में अद्वितीय कही जा सकती हैं। इसलिए उन्होंने लिखा हैं हर समस्या का हल शिक्षा से ही निकलेगा *एक रोटी कम खाना लेकिन अपने बच्चों को जरूर पढ़ाओ उन्हें अशिक्षित नहीं रहने देना उन्हें अच्छी लालिमा जरूर दिलाना जिससे वे समाज,राष्ट्र का आदर्श नागरिक बन सके।
वर्तमान परिपेक्ष को देखते हैं तो ऐसा लगता हैं कि आज बाबा साहब का बेहतरीन संविधान,मौलिक अधिकार,वयस्क मताधिकार,मातृ शक्ति के लिए हिंदुकोड बिल, सम्मान, लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली फिर भी sc, st,obc के पास धन होते हुए भी निर्धन व कमजोर क्यों हैं। शिक्षित होते हुए प्रभावहीन व भयभीत हैं पाखण्ड में ग्रसित हैं, ऐसा क्यों…..? यह विचारणीय विषय हैं,जो हमें राष्ट्र के निर्माण में सोचने पर मजबूत करता हैं।
यह समय वैचारिक क्रांति का हैं ज्ञान को बांटने का हैं,वैज्ञानिक दृष्टिकोण हैं अंधभक्ति व पाखण्ड का नहीं हैं। सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन का युग हैं। सो जाओगे तो खोओगे जाग जाओगे तो पाओगे।
देश की,समाज की गांव की जन जन की तरक्की शिक्षा से ही सम्भव हैं तो ऐसे शिक्षा रूपी यज्ञ में आहुति देने में पिछड़ने का क्या औचित्य या गहन वजह क्या हो सकती हैं जो व्यक्ति की भावनाओं को धरातल पर लाने में बाध्य हैं।
मेरी स्वयं की कोई ख़्वारिश नहीं हैं लेकिन मैं भारतीय बहुजन समाज को सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक,वैचारिक रूप से समर्थ देखना चाहता हूं। बाबा साहब ने संविधान में शिक्षा अनिवार्य स्थान देकर मानव उन्नति मार्ग प्रशस्त किया हैं,भावी पीढ़ी का भविष्य शिक्षा में निहित हैं। यही अध्ययन गोद योजना का मूल उद्देश्य हैं। यही *पे बैक टू सोसायटी* ही हैं।
“पुरखों ने कहावत कही थी की” गरीबी में आटा गीला” देश का नगरिक सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक एवं वैचारिक क्षेत्रों में पिछड़ रहा हैं। क्योंकि सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन को समझा ही नही, कुरीतियों को बढ़ाचढ़ाकर करने से एक बड़ी कुरीति नशाप्रवृति पनप गई । लोग आर्थिक समृद्धि के लिए औद्योगिक क्षेत्र में निवेश करते लेकिन बहुजनों को शिक्षा में निवेश करना चाहिए था लेकिन कर नही पाए।
महापुरुषों ने जिन जिन खतरों से सावधान किया था कि सम्भलकर चलना लेकिन उनकी बातों को बहुजन समझ न सके। देश में 1950 में संविधान लागू किया गया था लेकिन गरीब और अमीर की खाई बढ़ती जा रही हैं। जो खेद का विषय हैं, देश में सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन को सबसे ज्यादा जाति ने प्रभावित किया हैं। “जाति कभी जाती ही नहीं” यह वाक्य चरितार्थ हैं।
आओ साथियों इस शिक्षा की ज्योति को प्रज्वलित करने में तन,मन,धन,समय और विचारों से धरातल पर लागू कर उस महामानव ज्ञान के प्रतीक को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए देश में शिक्षा, समानता, प्रेम,करुणा,मैत्री, भाईचारा,त्याग, अमन,शांति,बंधुत्व,कर्म एवं गरिमामय सद्भावना का गर्व के साथ अनुकरण करते हुए देश के प्रति अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
*मानव जीवन में आमूलचूल परिवर्तन शिक्षा से ही सम्भव हैं,शिक्षा से ही सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक व वैचारिक क्षेत्रों परिवर्तन सम्भव हैं। जिससे मानव जीवन में रचनात्मक व सृजनात्मक शक्तियां फलती फूलती हैं।
जय भारत,जय संविधान।
🙏
मास्टर वीराराम भुरटिया
अध्ययन गोद योजना
जनक एवं सामाजिक चिंतक एवं पे बैक टू सोसायटी प्रेरक।

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