✍️ लेखक, संकलन एवं प्रस्तुति
सोहनलाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES) भादसी

“योग: कर्मसु कौशलम्” अर्थात कर्मों में कुशलता ही योग है। योग केवल शारीरिक आसनों की एक सतही श्रृंखला मात्र नहीं, बल्कि मन, विचार, बुद्धि और आत्मा के एकात्म भाव का वह अनुपम व्यावहारिक विज्ञान है, जो संपूर्ण मानवता को आरोग्यता, मानसिक स्थिरता और आंतरिक शांति के अटूट सूत्र में पिरोता है।

🏛️ भाग 1: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वैश्विक मान्यता

  1. भारत में योग की शुरुआत और प्रामाणिक इतिहास
    भारतीय वांग्मय और संस्कृति में योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव सभ्यता।

इसे किसी एक निश्चित वर्ष, शताब्दी या कालखंड की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता ।

यह एक सतत प्रवाहित होने वाली वैचारिक और व्यावहारिक जीवनधारा है।

वैदिक काल और सिंधु घाटी सभ्यता की कड़ियाँ: पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह अकाट्य रूप से प्रमाणित हो चुका है कि भारतीय उपमहाद्वीप में योग की जड़ें लगभग 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) की खुदाई में प्राप्त हुई ऐतिहासिक ‘पशुपति मोहर’ और ध्यान मुद्रा में बैठी हुई विभिन्न मूर्तियां इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि उस प्रागैतिहासिक काल में भी योग मानव जीवन की जीवन शैली का अभिन्न अंग था। वेदों, विशेषकर ऋग्वेद में भी योग के मूलभूत सिद्धांतों का बीजारोपण दिखाई देता है।

उपनिषदों (जैसे कठोपनिषद और श्वेताश्वतरोपनिषद) में मन और इंद्रियों के नियंत्रण को योग के रूप में परिभाषित किया गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता का योग दर्शन
महाभारत के कालखंड में योग को कर्म, ज्ञान और भक्ति के समन्वय के रूप में प्रस्तुत किया गया।

भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन को अवसाद से निकालने के लिए योग को ही सर्वोत्तम माध्यम बनाया और इसे जीवन जीने की उत्कृष्ट कला के रूप में स्थापित किया।

महर्षि पतंजलि का युगांतकारी योगदान

यद्यपि योग का व्यापक उल्लेख वेदों, उपनिषदों और पुराणों में बिखरा हुआ था, लेकिन इसे एक व्यवस्थित, वैज्ञानिक, तार्किक और क्रमबद्ध दार्शनिक रूप देने का अद्वितीय श्रेय महर्षि पतंजलि को जाता है। उन्होंने ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के आसपास ‘योगसूत्र’ की रचना की।

महर्षि पतंजलि ने योग को “योगश्चित्तवृत्तिनिरोध (अर्थात चित्त की वृत्तियों का रुक जाना ही योग है) कहकर परिभाषित किया।

उन्होंने मानव कल्याण के लिए अष्टांग योग का प्रतिपादन किया, जो आठ सोपानों का एक वैज्ञानिक मार्ग है

यम सामाजिक अनुशासन
(अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह)

नियम व्यक्तिगत अनुशासन
(शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान)

आसन स्थिर और सुखद शारीरिक मुद्राएं

प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की गति पर नियंत्रण

प्रत्याहार: इंद्रियों को अंतर्मुखी करना

धारणा: मन को एकाग्र करना

ध्यान: निरंतर एकाग्रता की स्थिति

समाधि: आत्मा का परमात्मा से पूर्ण मिलन

  1. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना और वैश्विक मान्यता

बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में योग ने जब भारत की भौगोलिक सीमाओं को लांघा, तो संपूर्ण विश्व इसके
चमत्कारी प्रभावों से अचंभित रह गया।

परिणामत
इसे वैश्विक स्तर पर एक आधिकारिक दिवस के रूप में मान्यता मिली।

ऐतिहासिक प्रस्ताव (2014)
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 69वें सत्र में अपने संबोधन के दौरान वैश्विक मंच पर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का एक ठोस प्रस्ताव रखा।

उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह मन और शरीर की एकता का प्रतीक है; विचार और कर्म, संयम और पूर्ति की सद्भावना है।

अभूतपूर्व वैश्विक मान्यता
(11 दिसंबर 2014) भारत के इस प्रस्ताव को वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व समर्थन मिला।

संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड 177 सदस्य देशों ने इस प्रस्ताव को सह-प्रायोजित किया।

यह संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतिहास में किसी भी संकल्प के लिए सह-प्रायोजकों की अब तक की सबसे बड़ी संख्या थी।

इसे बिना किसी मतदान के, सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।

संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिवर्ष 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की।

21 जून को चुनने का वैज्ञानिक व खगोलीय कारण: खगोलीय विज्ञान के दृष्टिकोण से 21 जून का दिन उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है, जिसे ‘ग्रीष्म संक्रांति’ कहा जाता है।

इस दिन सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर सबसे लंबे समय तक रहता है।

भारतीय संस्कृति और योग परंपरा में इस संक्रांति काल को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यह समय रूपांतरण, सूर्य की असीम ऊर्जा और प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठाने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

प्रथम आयोजन से वर्तमान (2015-2026) तक का सफर

संपूर्ण विश्व में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को भव्यता के साथ मनाया गया, जिसमें दिल्ली के राजपथ पर आयोजित मुख्य कार्यक्रम ने दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए।

वर्ष 2015 से शुरू हुआ यह कारवां आज वर्ष 2026 में अपने 12वें संस्करण तक पहुँच चुका है।

इन वर्षों में योग केवल एक दिवस विशेष का आयोजन न रहकर वैश्विक धरातल पर एक महान स्वास्थ्य जन-आंदोलन का रूप ले चुका है, जो नस्ल, देश, भाषा और भूगोल की सीमाओं से परे है।

⚖️ भाग 2: योग से जुड़े वैचारिक मतभेद और उनका तार्किक समाधान

जब कोई प्राचीन विद्या वैश्विक स्तर पर इतनी तीव्र गति से फैलती है, तो स्वाभाविक रूप से कुछ वैचारिक मतभेद, सांस्कृतिक हिचकिचाहट और भ्रांतियां भी जन्म लेती हैं।
एक सजग समाज के मार्गदर्शन के लिए इन मतभेदों का तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है।

  1. धार्मिक बनाम वैज्ञानिक विवाद
    विवाद का स्वरूप शुरुआती दौर में कुछ संकीर्ण विचारधाराओं और वैश्विक समुदायों ने योग को एक विशिष्ट धर्म
    (हिंदू धर्म) के कर्मकांड के रूप में देखने का प्रयास किया। विशेष रूप से ‘सूर्य नमस्कार’ की बारह मुद्राओं, मंत्रोच्चारण और ‘ॐ’ (Om) ध्वनि के गुंजन को लेकर कुछ देशों और धार्मिक समूहों में यह संशय था कि क्या इसे अपनाने से उनकी अपनी धार्मिक आस्था प्रभावित होगी।

तार्किक समाधान व वैश्विक जागरूकता

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, न्यूरोलॉजी और फिजियोलॉजी ने शोधों के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि योग पूरी तरह से एक धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक जीवन पद्धति है।

‘ॐ’ का उच्चारण किसी देवी-देवता का आह्वान नहीं, बल्कि एक ऐसी ध्वनि है जो वोकल कॉर्ड्स, थायराइड ग्रंथि और मस्तिष्क में विशेष प्रकार के कंपन पैदा करती है, जिससे अल्फ़ा तरंगों का उत्सर्जन बढ़ता है और मानसिक तनाव कम होता है।

इसी प्रकार, सूर्य नमस्कार किसी धार्मिक पूजा का हिस्सा न होकर मानव शरीर की सभी प्रमुख मांसपेशियों और जोड़ों को सक्रिय करने वाला एक संपूर्ण कार्डियो-वैस्कुलर व्यायाम है।

आज विश्व के सभी धर्मों, संस्कृतियों और देशों के लोग इसे बिना किसी मजहबी संकोच के अपना रहे हैं, क्योंकि आरोग्यता और निरोगी काया की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती।

  1. व्यावसायिकता बनाम मूल दर्शन का विवाद

विवाद का स्वरूप
योग के अभूतपूर्व वैश्विक प्रसार के कारण इसका बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण हुआ है।

पश्चिमी देशों में ‘हॉट योग’, ‘पावर योग’, ‘एक्रो योग’ और यहाँ तक कि ‘बियर योग’ जैसे विकृत रूप सामने आए। आलोचकों का मानना है कि इसे सिर्फ एक आधुनिक जिम-वर्कआउट या वजन घटाने के कॉस्मेटिक टूल की तरह पेश किया जा रहा है, जिससे इसकी आत्मा लुप्त हो रही है।

तार्किक समाधान व वैश्विक जागरूकता

इस वैचारिक द्वंद्व के बीच अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस जैसी वैश्विक और सरकारी स्तर की पहलें अत्यंत सराहनीय भूमिका निभा रही हैं।

ये आयोजन मूल भारतीय योग दर्शन, इसकी नैतिक नींव (यम और नियम) और इसकी आध्यात्मिक गहराई को पुनर्स्थापित करते हैं।

यह निरंतर संदेश दिया जा रहा है कि योग केवल कैलोरी बर्न करने का साधन नहीं, बल्कि चित्त को शांत कर आंतरिक चेतना को जगाने का मार्ग है।

🧘‍♂️ भाग 3: योग के मुख्य प्रकार, लाभ और व्यावहारिक नियम
आम आदमी के मार्गदर्शन और प्रेरणा के लिए यह जानना परम आवश्यक है कि योग विज्ञान का व्यावहारिक पक्ष क्या है, विभिन्न आसनों के क्या लाभ हैं और इन्हें करते समय किन नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।

  1. मुख्य योग क्रियाएं/आसन और उनके विशिष्ट स्वास्थ्य लाभ
    शारीरिक और मानसिक विकारों को दूर करने के लिए योग विज्ञान के अंतर्गत सैकड़ों आसनों और प्राणायामों का वर्णन है।

यहाँ प्रमुख क्रियाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत है

(क) ताड़ासन
विधि
सीधे खड़े होकर दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर सिर के ऊपर ले जाएं, सांस भरते हुए पूरे शरीर को ऊपर की ओर खींचें और पैरों की एड़ियों को हवा में उठाएं।

विशिष्ट लाभ
यह आसन पूरे शरीर की मांसपेशियों में खिंचाव पैदा कर रक्त संचार को सुचारू करता है। यह शारीरिक संतुलन विकसित करता है, रीढ़ की हड्डी को सीधा व मजबूत बनाता है और बढ़ते बच्चों की लंबाई बढ़ाने में अत्यधिक सहायक है।

(ख) भुजंगासन
विधि
पेट के बल लेटकर दोनों हाथों को छाती के पास रखें और सांस भरते हुए शरीर के अग्रभाग (नाभि तक) को ऊपर उठाएं तथा आकाश की ओर देखें।

विशिष्ट लाभ
यह आसन फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाता है और श्वसन तंत्र को मजबूत करता है।

यह रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन को बढ़ाकर पीठ, कमर और साइटिका के दर्द में अचूक लाभ प्रदान करता है। यह थकावट को दूर कर शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है।

(ग) वज्रासन
विधि
घुटनों को पीछे की ओर मोड़कर पैरों के पंजों पर बैठ जाएं, रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखें और दोनों हाथों को घुटनों पर रखें।

विशिष्ट लाभ
यह संपूर्ण योग विज्ञान का एकमात्र ऐसा आसन है जिसे भोजन करने के तुरंत बाद किया जा सकता है। यह हमारे पेल्विक क्षेत्र में रक्त के प्रवाह को बढ़ाता है, जिससे पाचन अग्नि तीव्र होती है।

यह गैस, एसिडिटी, कब्ज और अपच जैसी पेट की गंभीर समस्याओं को जड़ से समाप्त करता है।

(घ) अनुलोम-विलोम प्राणायाम
विधि
सुखासन में बैठकर दाएं हाथ के अंगूठे से दाईं नासिका को बंद कर बाईं नासिका से गहरी सांस लें, फिर बाईं नासिका को बंद कर दाईं नासिका से सांस छोड़ें। यही प्रक्रिया विपरीत क्रम में दोहराएं।

विशिष्ट लाभ
यह प्राणायाम हमारे शरीर की समस्त 72,000 नाड़ियों का शोधन करता है।

यह मानसिक तनाव, अत्यधिक चिंता और अवसाद को समूल नष्ट करता है।

यह उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने और मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों में संतुलन बिठाने के लिए सर्वोत्तम है।

(ङ) कपालभाति प्राणायाम
विधि
आरामदायक मुद्रा में बैठकर रीढ़ को सीधा रखें और पेट की मांसपेशियों के संकुचन के साथ सांस को तेजी से झटके के साथ बाहर छोड़ें।
सांस स्वतः ही अंदर आएगी।

विशिष्ट लाभ
इसे ‘प्राणायामों का राजा’ भी कहा जाता है। यह शरीर के भीतर संचित हानिकारक विषाक्त पदार्थों को तीव्रता से बाहर निकालता है।

यह पेट की अतिरिक्त चर्बी को कम कर वजन नियंत्रित करता है, मधुमेह को नियंत्रित रखने में मदद करता है और चेहरे पर एक अद्भुत प्राकृतिक चमक पैदा करता है।

  1. योग के अनिवार्य नियम: कब, कैसे और क्या सावधानियां बरतें?
    योग का पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होता है जब इसे सही पद्धति और अनुशासन के साथ किया जाए। अन्यथा, इसके विपरीत परिणाम भी हो सकते हैं।

विषय
प्रामाणिक नियम एवं वैज्ञानिक तरीका

सर्वोत्तम समय
योग के लिए सर्वश्रेष्ठ समय सूर्योदय काल (प्रातः काल/ब्राह्ममुहूर्त) है, क्योंकि इस समय वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर सर्वाधिक और प्रदूषण न्यूनतम होता है।

यदि किसी कारणवश सुबह समय न मिले, तो शाम को सूर्यास्त के समय भी अभ्यास किया जा सकता है, बशर्ते पेट खाली हो।

पेट की स्थिति
योग हमेशा पूर्णतः खाली पेट (भूखे पेट) ही किया जाना चाहिए।

भारी भोजन (Lunch/Dinner) करने के कम से कम 4 घंटे बाद और हल्का नाश्ता या चाय/पानी पीने के कम से कम 30 से 45 मिनट बाद ही योग का अभ्यास करना चाहिए।

अपवाद
केवल वज्रासन को भोजन के तुरंत बाद 5 से 10 मिनट करना चाहिए।

पहनावा व वस्त्र
योग करते समय शरीर का स्वतंत्र संचालन आवश्यक है।

इसलिए वस्त्र हमेशा ढीले-ढाले, अत्यंत सूती और आरामदायक होने चाहिए।

टाइट जींस, बेल्ट या सिंथेटिक कपड़े पहनने से बचना चाहिए, क्योंकि ये रक्त संचार और श्वसन क्रिया में बाधा डालते हैं।

स्थान व वातावरण
योग का स्थान पूरी तरह से हवादार, शांत, स्वच्छ और समतल होना चाहिए, जहाँ शुद्ध हवा का आवागमन हो।

कभी भी बंद, उमस भरे या दुर्गंध युक्त कमरे में योग न करें।

सीधे ठंडी या कंक्रीट की जमीन पर योग करने के बजाय एक अच्छी सूती दरी या योग मैट का अनिवार्य रूप से उपयोग करें।

  1. किसे कौन सा योग नहीं करना चाहिए?
    योग विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है – ‘जबरदस्ती न करना’ । अपनी शारीरिक सीमाओं को पहचानना और उसी अनुसार अभ्यास करना अनिवार्य है।

उच्च रक्तचाप (High BP) और गंभीर हृदय रोगी
ऐसे व्यक्तियों को भूलकर भी कपालभाति, भस्त्रिका जैसे तीव्र गति वाले प्राणायाम तेज गति से नहीं करने चाहिए।

इन्हें बहुत ही धीमी और नियंत्रित गति से योग्य मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, इन्हें शीर्षासन या सर्वांगासन जैसी विपरीत मुद्राएं कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे हृदय और मस्तिष्क पर रक्त का दबाव अत्यधिक बढ़ सकता है।

कमर दर्द, साइटिका और स्लिप डिस्क
जो लोग तीव्र कमर दर्द या स्लिप डिस्क की समस्या से ग्रसित हैं, उन्हें आगे झुकने वाले आसनों (जैसे – पश्चिमोत्तानासन, पादहस्तासन) से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। आगे झुकने से रीढ़ की गोटियों पर दबाव बढ़ता है और समस्या गंभीर हो सकती है।

इसके विपरीत, वे पीछे झुकने वाले आसनों (जैसे – मकरासन, शलभासन या भुजंगासन) का मंद अभ्यास कर सकते हैं।

गर्भवती महिलाएं
गर्भावस्था के दौरान किसी भी प्रकार के कठिन आसन, शरीर को मरोड़ने वाले आसन और पेट पर सीधा दबाव डालने वाले प्राणायाम (जैसे कपालभाति) सख्त वर्जित हैं।

वे केवल चिकित्सक और प्रमाणित योग थेरेपिस्ट की देखरेख में हल्के सूक्ष्म व्यायाम, अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास कर सकती हैं।

हाल ही में हुई सर्जरी/ऑपरेशन
यदि किसी व्यक्ति के पेट, रीढ़ या शरीर के किसी अन्य हिस्से का पिछले 6 महीनों के भीतर कोई छोटा या बड़ा ऑपरेशन हुआ हो, तो उन्हें योग क्रियाओं से पूरी तरह बचना चाहिए।

शरीर के आंतरिक घावों को पूरी तरह भरने का समय दिया जाना अनिवार्य है।

🌍 भाग 4: वैश्विक स्तर पर योग के प्रमुख प्रणेता

योग को भारत के जंगलों, कंदराओं और ऋषियों के आश्रमों से निकालकर आधुनिक वैश्विक पटल पर सम्मानजनक स्थान दिलाने में कई महान विभूतियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

स्वामी विवेकानंद (1863-1902)
आधुनिक युग में योग को वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाले वे पहले संवाहक थे।

उन्होंने 1893 में शिकागो (अमेरिका) के ऐतिहासिक ‘विश्व धर्म संसद’ में अपने भाषण के माध्यम से पश्चिमी जगत को भारतीय अध्यात्म, वेदांत और ‘राजयोग’ के व्यावहारिक दर्शन से पहली बार गहराई से परिचित कराया।

उनकी लिखी पुस्तकें आज भी वैश्विक बुद्धिजीवियों का मार्गदर्शन करती हैं।

तिरुमलाई कृष्णामाचार्य (1888-1989)
इन्हें ‘आधुनिक योग का जनक’ माना जाता है।

उन्होंने मैसूर राजघराने के संरक्षण में योगशाला की स्थापना की और हठयोग की प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित किया।

उनके द्वारा तैयार किए गए शिष्यों ने ही आगे चलकर पूरी दुनिया में योग का प्रचार-प्रसार किया।

बी.के.एस. अयंगर (1918-2014)
कृष्णामाचार्य के प्रख्यात शिष्य बेलूर कृष्णमशार सुंदरराजा अयंगर ने ‘अयंगर योग’ की स्थापना की।

उन्होंने विभिन्न प्रॉप्स (जैसे रस्सी, बेल्ट, लकड़ी के ब्लॉक) के माध्यम से शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए भी योग को सुलभ बनाया।

उनकी कालजयी पुस्तक “लाइट ऑन योग को आज भी योग का वैश्विक बाइबिल माना जाता है।

उन्होंने पश्चिमी देशों के प्रबुद्ध नागरिकों, कलाकारों और वैज्ञानिकों को योग का अनन्य प्रशंसक बनाया।

स्वामी रामदेव
इक्कीसवीं सदी में योग के इतिहास को एक नया मोड़ देने का श्रेय स्वामी रामदेव जी बाबा को जाता है।

उन्होंने योग को महलों, विशिष्ट आश्रमों और संभ्रांत वर्ग के घेरे से बाहर निकालकर भारत के आम गरीब, किसान और मध्यम वर्ग के घर-घर तक पहुँचाया।

टेलीविजन के माध्यम से उन्होंने प्राणायाम और सरल आसनों को जन-जन की दैनिक जीवन शैली का हिस्सा बना दिया, जिससे योग एक वैश्विक जन-आंदोलन में तब्दील हो गया।

👥 भाग 5: “योग संगम” महाअभियान: पात्रता एवं संगठन
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
(21 जून 2026 ) के पुनीत और गौरवमयी अवसर पर संपूर्ण समाज में आरोग्यता, मानसिक शांति और वैचारिक समरसता का दिव्य संदेश प्रसारित करने के लिए “योग संगम” का आयोजन एक युगांतकारी कदम है।

यह कोई एकल आयोजन नहीं है, बल्कि समाज के सभी अंगों को एक साथ जोड़ने वाला एक विराट अभियान है।

इस वैश्विक अभियान के तहत अपने क्षेत्र, परिसर या समुदाय में ‘योग संगम’ सत्र की सम्मानजनक मेजबानी के लिए निम्नलिखित सभी संगठन और समूह पूरी तरह से पात्र और आमंत्रित हैं

शैक्षणिक संस्थान
समस्त राजकीय एवं गैर-राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी व व्यावसायिक विश्वविद्यालय और निजी कोचिंग संस्थान।

सरकारी संगठन
सभी शासकीय विभाग, जिला कलेक्टरेट, प्रशासनिक कार्यालय, पुलिस लाइन, ब्लॉक मुख्यालय, ग्राम पंचायत स्तर के सार्वजनिक कार्यालय और सरकारी उपक्रम।

निजी एवं कॉर्पोरेट क्षेत्र
निजी कंपनियाँ, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कॉर्पोरेट ऑफिसेज, औद्योगिक इकाइयाँ, बैंक और व्यावसायिक प्रतिष्ठान।

निवासी कल्याण संघ
विभिन्न शहरी सोसायटियों, बहुमंजिला आवासीय परिसरों, कॉलोनियों और विकास समितियों के स्थानीय कल्याणकारी समूह।

गैर-सरकारी संगठन
समाज सेवा, मानव कल्याण, स्वास्थ्य जन-जागरूकता और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय सभी स्वयंसेवी संस्थाएँ।

सामुदायिक समूह
स्थानीय महिला मंडल, यूथ क्लब, सामाजिक मंडल, वरिष्ठ नागरिक कल्याण समूह एवं समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले अन्य सभी जागरूक दल।

📝 भाग 6: पंजीकरण की सरल एवं क्रमबद्ध प्रक्रिया

“योग संगम” सत्र का आधिकारिक आयोजन करने और विभाग से प्रामाणिक प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए डिजिटल पोर्टल पर पंजीकरण की प्रक्रिया को अत्यंत सरल, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाया गया है। आप नीचे दिए गए 17 सरल चरणों (5 मुख्य भागों में विभाजित) का अक्षरशः पालन करके अपना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन पूर्ण कर सकते हैं:

🔹 भाग 1 आधिकारिक शुरुआत
लिंक खोलें

सबसे पहले योग दिवस से संबंधित निर्धारित आधिकारिक पंजीकरण लिंक/वेबसाइट को अपने मोबाइल फोन या कंप्यूटर के वेब ब्राउज़र पर खोलें।

“Apply” पर क्लिक करें
आधिकारिक वेबसाइट का मुख्य पृष्ठ (Homepage) खुलते ही वहाँ पंजीकरण के लिए विशेष रूप से दिए गए “Apply” बटन पर क्लिक करें।

🔹 भाग 2: प्राथमिक जानकारी एवं सत्यापन
संगम की जानकारी
अपने प्रस्तावित योग संगम कार्यक्रम से संबंधित मांगी गई सभी प्रारंभिक बुनियादी जानकारियां (जैसे संस्था का नाम, संस्था का प्रकार आदि) ध्यानपूर्वक और त्रुटिहीन भरें।

Next बटन दबाएँ
संपूर्ण प्रारंभिक जानकारी भरने के बाद नीचे की तरफ दिए गए ‘अगला’ (Next) बटन पर क्लिक करें।

सत्यापन विवरण
सुरक्षा उद्देश्यों के लिए अपना स्वयं का सक्रिय मोबाइल नंबर या आधिकारिक मोबाइल ID दर्ज करें।

OTP प्रविष्टि
आपके द्वारा दर्ज किए गए मोबाइल नंबर पर तुरंत एक वन-टाइम पासवर्ड (OTP) प्राप्त होगा, उसे स्क्रीन पर निर्धारित बॉक्स में सावधानी से दर्ज करें।

Next पर क्लिक करें
OTP का सफल सत्यापन होने के बाद पुनः आगे बढ़ने के लिए ‘Next’ बटन पर क्लिक करें।

🔹 भाग 3: आयोजन स्थल का विवरण

स्थल की जानकारी
जहाँ आप वास्तविक रूप से योग संगम का सामूहिक सत्र आयोजित कर रहे हैं (जैसे – विद्यालय का खेल मैदान, सार्वजनिक पार्क, इनडोर कम्युनिटी हॉल, सोसाइटी कॉमन एरिया आदि), उस स्थल का स्पष्ट चयन या विवरण भरें।

पता लिखें
कार्यक्रम स्थल का पूरा, स्पष्ट और सुगम डाक पता (Landmark सहित) दर्ज करें ताकि प्रतिभागी और मार्गदर्शक आसानी से वहाँ पहुँच सकें।

Google Map लिंक (वैकल्पिक)
यदि तकनीकी रूप से संभव हो, तो आयोजन स्थल का गूगल मैप लोकेशन लिंक (Location Link) डालें। ध्यान दें: यह पूरी तरह से वैकल्पिक है, यह अनिवार्य नहीं है। यदि आपके पास लिंक नहीं है, तो आप इस चरण को छोड़ (Skip) भी सकते हैं।

Next पर क्लिक करें
आयोजन स्थल के विवरण को डेटाबेस में सुरक्षित करने के लिए नीचे दिए गए ‘Next’ बटन को दबाएँ।

🔹 भाग 4: कार्यक्रम का विवरण एवं सहमति
कार्यक्रम की जानकारी
योग सत्र के आयोजन का सही समय (जैसे निर्धारित प्रोटोकॉल समय प्रातः 06:00 से 08:00 बजे तक), अपेक्षित प्रतिभागियों/नागरिकों की संभावित संख्या और सत्र के स्वरूप की जानकारी भरें।

घोषणा/सहमति
स्क्रीन पर दिखाई दे रहे तीनों नियम व शर्तों वाले विकल्पों के सामने बने चौकोर डिब्बों (Checkboxes) पर टिक (✔) का निशान लगाएं।

फॉर्म सबमिट करें
भरे गए संपूर्ण विवरण की एक बार पुनः भली-भांति आत्म-जांच कर लें और पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद नीचे दिए गए ‘सबमिट’ (Submit) बटन पर क्लिक कर फॉर्म को फाइनल जमा करें।

🔹 भाग 5: पंजीकरण की पूर्णता एवं प्रमाणन
रजिस्ट्रेशन नंबर नोट करें
फॉर्म सफलतापूर्वक सबमिट होते ही आपकी कंप्यूटर या मोबाइल स्क्रीन पर एक यूनीक रेफरेंस/रजिस्ट्रेशन नंबर प्रदर्शित होगा।

इसे भविष्य के सभी पत्राचार के लिए अपनी डायरी में सुरक्षित लिख लें या इसका स्क्रीनशॉट लेकर रख लें।

नागरिकों को जोड़ना
इस महाअभियान को धरातल पर जीवंत और कीर्तिमान स्थापित करने वाला बनाने के लिए अपने पोर्टल इवेंट में कम से कम 21 नागरिकों (प्रतिभागियों) को सक्रिय रूप से जोड़ें तथा योग सत्र संपन्न होने पर योगाभ्यास करते हुए उनकी सुंदर सामूहिक तस्वीरें पोर्टल पर अपलोड करें।

सर्टिफिकेट की प्राप्ति
उक्त समस्त प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूर्ण होने पर विभाग द्वारा आपके पंजीकृत ई-मेल आईडी पर आयोजन का गरिमापूर्ण और आधिकारिक प्रमाण-पत्र स्वतः डिजिटल रूप से भेज दिया जाएगा।

🌟 भाग 7: एक वैचारिक एवं प्रेरणादायी अपील, आओ मिलकर रचें कीर्तिमान!
“स्वस्थ नागरिक, समृद्ध राष्ट्र”
एक सामाजिक-आर्थिक चिंतक और विचारक होने के नाते, मेरा यह दृढ़ और अकाट्य विश्वास है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक आर्थिक उन्नति, औद्योगिक प्रगति और ढांचागत विकास उसकी जीडीपी (GDP) के आंकड़ों से ज्यादा उसके नागरिकों की ‘शारीरिक और मानसिक पूंजी’ पर निर्भर करती है।

रोगग्रस्त, अवसादग्रस्त और अस्वस्थ आबादी कभी भी एक सशक्त, आत्मनिर्भर और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती।

स्वास्थ्य पर होने वाला अत्यधिक व्यक्तिगत और राष्ट्रीय खर्च अंततः देश की आर्थिक गति को ही धीमा करता है।

योग हमारी वह अनमोल, ऋषि-प्रणीत और वैज्ञानिक विरासत है जो आधुनिक मनुष्य को केवल एक आर्थिक मशीन बनने से रोकती है।

यह हमारे भीतर मानवीय संवेदनाओं, सहानुभूति, आंतरिक शांति और मानसिक संतुलन का सिंचन करती है।

यह व्यक्ति को स्वयं से, परिवार को समाज से और समाज को राष्ट्र के माध्यम से संपूर्ण ब्रह्मांड से जोड़ने का माध्यम है।

आइए, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून 2026 ) के इस पुनीत और पावन अवसर पर हम सभी अपनी संकीर्णताओं, आलस्य और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठें।

अपने-अपने कार्यस्थलों, विद्यालयों, कार्यालयों और आवासीय सोसायटियों में कड़ाई से नियमों का पालन करते हुए ‘योग संगम’ का भव्य आयोजन करें।

अधिक से अधिक संख्या में डिजिटल पंजीकरण कर इस राष्ट्रीय एवं वैश्विक चेतना के यज्ञ में अपनी सक्रिय आहुति दें।

पंजीकरण की निर्धारित समय सीमाओं का सम्मान करते हुए आज ही इस अभियान से जुड़ें।

आपका यह एक छोटा सा, अनुशासित प्रयास समाज को निरोगी, ऊर्जावान, अवसादमुक्त और वैचारिक रूप से अत्यंत समृद्ध बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।

उठो, जागो स्वयं योग अपनाओ, समाज को जागरूक करो और संपूर्ण मानवता को आरोग्यता के अटूट सूत्र में पिरोएं!

✍️ लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहनलाल सिंगारिया
प्रधानाचार्य एवं पीईईओ,भादसी सामाजिक-आर्थिक चिन्तक एवं विचारक, ब्यावर-94622-60179

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