
यदि हाँ, तो यह आलेख आप जरूर पढ़ें 👇🏻
हमारी बात हमारे मीडिया में
बहुजन समाज के विभिन्न समुदाय बाबा साहब डाॅ भीमराव आंबेडकर जी के दर्शन पर, सामाजिक विकास के विषयों पर, अपने महापुरुषों की जयंती पुण्यतिथि के अवसर पर, मनुवादियों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के विरोध में धरना प्रदर्शन पर, सम्मान समारोह, समसामयिक विषयों पर चर्चा परिचर्चा, उत्सव, महोत्सव, खेलकूद, प्रतिभाओं को प्रोत्साहन करने संबंधित आयोजन,आदि कार्यक्रम लगातार कर रहे हैं। आयोजक अपने कार्यक्रमों की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने के लिए मनुवादियों द्वारा संचालित समाचार पत्रों में प्रेस विज्ञप्तियां बना बना कर भेजते हैं। कहीं कहीं तो आयोजक अपने कार्यक्रम का समाचार इस तरह के अखबारों, न्यूज़ चैनल में प्रसारित कराने के लिए विशेष उपहार, विशेष लिफाफे भी पेश करते हैं। लेकिन स्थिति यह हो रही है कि कोई भी हमारी बात, समाचार को अपने यहाँ जगह ही नहीं देता है। यदि किसी ने किसी विशेष के संपर्क या लिफाफे की वजह से जगह दे भी दी तो पढने वाला ढूंढता है कि ‘कहाँ छपा है।’ कभी-कभी तो छ्पा समाचार पढने के लिए ‘लेंस’ खरीदने की नौबत आ जाती है।
न्यूज़ चैनल पर कभी न्यूज़ चलाई जाती है तो टीवी देखने वाले एक घंटा बैठे रहते हैं कि अब आयेगी हमारी न्यूज़। जब आती है हम देखने लगते है तो तुरंत यह शब्द निकलते हैं “अरे चली गई”।
सोचिए ऐसा कब तक चलेगा ?
आप लोग कब तक इन समाचार पत्रों (मेन स्ट्रीम मीडिया) के पत्रकारों के सामने रिरियाते रहोगे ?
क्या हम ऐसा कर सकते हैं –
“खुदी को तू कर बुलंद इतना कि ख़ुदा बंदे से पूंछे बता तेरी रज़ा क्या है ?”
क्यों नहीं हम हमारा अपना मीडिया तैयार करें। जो हमारे अपने मीडिया काम कर रहे हैं उन्हें सशक्त करें। हमारे कार्यक्रम की सूचना, प्रेस विज्ञप्ति केवल हमारे मीडिया, समाचार पत्रों को ही दें। लिफाफा भी हम हमारे अपने मीडिया को ही दें। हमारे अपने संपादक-पत्रकारों को सहयोग दें। क्यों नहीं हमारा अपना समाचार पत्र हमारे हर घर-घर आये ?
कब तक मनुवादी मीडिया की गुलामी, हाथाजोड़ी, सिफारिश करते रहोगे ?
आप कार्यक्रम करें किसी भी मनुवादी मीडिया/ गोदी मीडिया को सूचित नहीं करें ना ही प्रेस विज्ञप्ति दें। केवल अपने मीडिया को ही आमंत्रित करें उन्हें इज्जत दें। मनुवादी मीडिया को इग्नोर करें।
मेन स्ट्रीम मीडिया की गुलामी करने में शर्म नहीं आती ?
हम ‘घर का पूत कुंवारा डोले पाड़ोस्यां का फेरा’ वाली कहावत पर कब तक चलते रहोगे ?
हमारी बात को हमारा अपना मीडिया ही छापेगा, जन-जन तक पहुँचाएगा। मेरा आग्रह है कि जहाँ जहाँ भी बहुजन समाज के छात्रावास, संस्थान, मंदिर, पीठ-पीठाधीश, ट्रस्ट, भवन, विद्यालय, महाविद्यालय, प्रतिष्ठान आदि हों उन सभी में हमारे अपने सामाजिक समाचार पत्र अनिवार्यतः मंगवाये जायें। हमारे युवा पढ़ेंगे तो सामाजिक गतिविधियों को जानेंगे समझेंगे।
यदि हम सभी हमारे मीडिया को सपोर्ट करेंगे तो हमारे मीडिया के साथी भी अपना कार्य मन लगाकर पूरी जवाबदारी और दायित्व से करेंगे। जो हमारे कुछ तथाकथित पत्रकार संपादक हैं जो समाज से अखबार के नाम पर पैसों की उगाही करके गायब हो जाते हैं उनके कृत्यों पर भी रोक लगेगी।
क्यों नहीं हम हमारे अपनों के सामाजिक समारोह में (विवाह, आशीर्वाद समारोह, जन्म दिन उत्सव, सेवानिवृति समारोह में आदि) गिफ्ट में सामाजिक समाचार पत्र की एक वर्ष की सदस्यता उपहार में भेंट करें। मैं करता हूँ।
एक विशेष बात :
आपने अपना सामाजिक समाचार पत्र मंगवाना शुरू किया और वह समाचार पत्र डाक से आपके पास नहीं आता है तो आप बिना सोचे समझे सामाजिक समाचार पत्र के संपादक/पत्रकार को अनर्गल बोलना शुरू कर देते हैं। कुछ तो गालियां देते हैं उसमें उच्च शिक्षित उच्च पदस्थ समाज बंधु भी शामिल होते हैं। यह आपकी गलत धारणा है।
आप पोस्टमेन/पोस्ट मास्टर से कहें कि – मेरा अखबार क्यों नहीं आ रहा है ? यह दायित्व आपका है। मनुवादी लोगों ने अपने पंजे सब तरह फैला रखें हैं। इतना आसान नहीं है कि सामाजिक समाचार पत्र समय पर डाक विभाग से आपको मिल जाये। जागरूक हमें ही रहना होगा। अपने सामाजिक अखबार के संपादक को सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब उसका अखबार अधिक से अधिक पाठकों के पास पहुंचे। अपने मिशनरी अखबारों की तुलना मनुवादी धन्ना सेठों के दैनिक अखबारों से कभी नहीं करें।
हाँ अपने समाज के कुछ कथित फर्जी लोग अखबार के नाम पर सहयोग राशि एकत्र करके गायब हो जाते हैं लेकिन सभी ऐसे नहीं हैं। हमारे सामाजिक समाचार पत्रों के संपादक खूब मेहनत करते हैं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
सुझाव –
मेरा सुझाव है कि राजस्थान से निकलने वाले अपने सामाजिक अखबार/पत्र पत्रिकाओं के संपादक-पत्रकारों की किसी एक स्थान पर एक सेमिनार आयोजित की जाये जहां समाज के प्रतिष्ठित समाज बंधुओं के साथ खुली चर्चा हो। हमें हमारे पत्र-पत्रिकाओं के संपादक-पत्रकारों की भी बात सुननी चाहिए।
हकदार पाक्षिक, सीमांत रक्षक दैनिक, उदयमेघ साप्ताहिक, प्रभात पोस्ट साप्ताहिक, भीम प्रज्ञा दैनिक, जागो हुक्मरान पाक्षिक, महकता हिन्दुस्तान पाक्षिक, राजा बलि समाज मासिक, दलित दस्तक मासिक, बुद्ध ज्योति मासिक, आदि सामाजिक मिशनरी पत्र पत्रिकाओं में अपने कार्यक्रम की न्यूज़, आलेख, रचनाएं, कविताएं, प्रेस विज्ञप्ति, विज्ञापन, आर्थिक सहयोग एवं वार्षिक सदस्य बनकर, आदि सहयोग देकर इनको आगे बढ़ाएं।
अपने समाज के कई ऐसे समाज बंधु हैं जिनको यह भी नहीं मालूम कि अपना सामाजिक अखबार भी प्रकाशित होता है। आर्थिक सहयोग के बिना अखबार प्रकाशित नहीं होता। अखबार निकालना बहुत कठिन कार्य है इस कार्य को मिशनरी ही करते हैं। इनका सहयोग करें। आपके आलेख, विचार, रचनाएं, साक्षात्कार अपने अखबारों को प्रेषित करें। वर्तमान में सरकारें सामाजिक अखबारों को सहयोग नहीं कर रहीं हैं।
जिनके घरों में राजस्थान पत्रिका/दैनिक भास्कर/दैनिक नवज्योति/लोकमत/ दैनिक जागरण/राष्ट्रदूत/ नई दुनिया/TOI/IE/ET/HT आदि अखबार आते हैं उनसे आग्रह है कि कोई भी एक सामाजिक अखबार भी जरूर मंगवाएं एवं आर्थिक सहयोग भी करें।
हमें “अपना मीडिया अपनी आवाज़” पर अब सोचना ही होगा। अब यह कहना बंद करना ही होगा “अखबार वाले ने हमारी बात नहीं छापी”
सामाजिक पत्र आयेगा विकास का संदेशा लायेगा।।
अत्त दीपो भव 🪔

डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’
सामाजिक लेखक पत्रकार
मदार, अजमेर (राज.)
मोबाइल 9460180510
क्याक्या आपके पास आर्थिक सहयोग देने के बाद भी अपना सामाजिक अखबार (हकदार/दैनिक सीमांत रक्षक/ प्रभात पोस्ट/उदयमेघ/राजा बली समाज/जागो हुक्मरान/ भीम प्रज्ञा/महकता हिन्दुस्तान/बुद्ध ज्योति आदि) नहीं आ रहा है ?
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हमारी बात हमारे मीडिया में
बहुजन समाज के विभिन्न समुदाय बाबा साहब डाॅ भीमराव आंबेडकर जी के दर्शन पर, सामाजिक विकास के विषयों पर, अपने महापुरुषों की जयंती पुण्यतिथि के अवसर पर, मनुवादियों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के विरोध में धरना प्रदर्शन पर, सम्मान समारोह, समसामयिक विषयों पर चर्चा परिचर्चा, उत्सव, महोत्सव, खेलकूद, प्रतिभाओं को प्रोत्साहन करने संबंधित आयोजन,आदि कार्यक्रम लगातार कर रहे हैं। आयोजक अपने कार्यक्रमों की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने के लिए मनुवादियों द्वारा संचालित समाचार पत्रों में प्रेस विज्ञप्तियां बना बना कर भेजते हैं। कहीं कहीं तो आयोजक अपने कार्यक्रम का समाचार इस तरह के अखबारों, न्यूज़ चैनल में प्रसारित कराने के लिए विशेष उपहार, विशेष लिफाफे भी पेश करते हैं। लेकिन स्थिति यह हो रही है कि कोई भी हमारी बात, समाचार को अपने यहाँ जगह ही नहीं देता है। यदि किसी ने किसी विशेष के संपर्क या लिफाफे की वजह से जगह दे भी दी तो पढने वाला ढूंढता है कि ‘कहाँ छपा है।’ कभी-कभी तो छ्पा समाचार पढने के लिए ‘लेंस’ खरीदने की नौबत आ जाती है।
न्यूज़ चैनल पर कभी न्यूज़ चलाई जाती है तो टीवी देखने वाले एक घंटा बैठे रहते हैं कि अब आयेगी हमारी न्यूज़। जब आती है हम देखने लगते है तो तुरंत यह शब्द निकलते हैं “अरे चली गई”।
सोचिए ऐसा कब तक चलेगा ?
आप लोग कब तक इन समाचार पत्रों (मेन स्ट्रीम मीडिया) के पत्रकारों के सामने रिरियाते रहोगे ?
क्या हम ऐसा कर सकते हैं –
“खुदी को तू कर बुलंद इतना कि ख़ुदा बंदे से पूंछे बता तेरी रज़ा क्या है ?”
क्यों नहीं हम हमारा अपना मीडिया तैयार करें। जो हमारे अपने मीडिया काम कर रहे हैं उन्हें सशक्त करें। हमारे कार्यक्रम की सूचना, प्रेस विज्ञप्ति केवल हमारे मीडिया, समाचार पत्रों को ही दें। लिफाफा भी हम हमारे अपने मीडिया को ही दें। हमारे अपने संपादक-पत्रकारों को सहयोग दें। क्यों नहीं हमारा अपना समाचार पत्र हमारे हर घर-घर आये ?
कब तक मनुवादी मीडिया की गुलामी, हाथाजोड़ी, सिफारिश करते रहोगे ?
आप कार्यक्रम करें किसी भी मनुवादी मीडिया/ गोदी मीडिया को सूचित नहीं करें ना ही प्रेस विज्ञप्ति दें। केवल अपने मीडिया को ही आमंत्रित करें उन्हें इज्जत दें। मनुवादी मीडिया को इग्नोर करें।
मेन स्ट्रीम मीडिया की गुलामी करने में शर्म नहीं आती ?
हम ‘घर का पूत कुंवारा डोले पाड़ोस्यां का फेरा’ वाली कहावत पर कब तक चलते रहोगे ?
हमारी बात को हमारा अपना मीडिया ही छापेगा, जन-जन तक पहुँचाएगा। मेरा आग्रह है कि जहाँ जहाँ भी बहुजन समाज के छात्रावास, संस्थान, मंदिर, पीठ-पीठाधीश, ट्रस्ट, भवन, विद्यालय, महाविद्यालय, प्रतिष्ठान आदि हों उन सभी में हमारे अपने सामाजिक समाचार पत्र अनिवार्यतः मंगवाये जायें। हमारे युवा पढ़ेंगे तो सामाजिक गतिविधियों को जानेंगे समझेंगे।
यदि हम सभी हमारे मीडिया को सपोर्ट करेंगे तो हमारे मीडिया के साथी भी अपना कार्य मन लगाकर पूरी जवाबदारी और दायित्व से करेंगे। जो हमारे कुछ तथाकथित पत्रकार संपादक हैं जो समाज से अखबार के नाम पर पैसों की उगाही करके गायब हो जाते हैं उनके कृत्यों पर भी रोक लगेगी।
क्यों नहीं हम हमारे अपनों के सामाजिक समारोह में (विवाह, आशीर्वाद समारोह, जन्म दिन उत्सव, सेवानिवृति समारोह में आदि) गिफ्ट में सामाजिक समाचार पत्र की एक वर्ष की सदस्यता उपहार में भेंट करें। मैं करता हूँ।
एक विशेष बात :
आपने अपना सामाजिक समाचार पत्र मंगवाना शुरू किया और वह समाचार पत्र डाक से आपके पास नहीं आता है तो आप बिना सोचे समझे सामाजिक समाचार पत्र के संपादक/पत्रकार को अनर्गल बोलना शुरू कर देते हैं। कुछ तो गालियां देते हैं उसमें उच्च शिक्षित उच्च पदस्थ समाज बंधु भी शामिल होते हैं। यह आपकी गलत धारणा है।
आप पोस्टमेन/पोस्ट मास्टर से कहें कि – मेरा अखबार क्यों नहीं आ रहा है ? यह दायित्व आपका है। मनुवादी लोगों ने अपने पंजे सब तरह फैला रखें हैं। इतना आसान नहीं है कि सामाजिक समाचार पत्र समय पर डाक विभाग से आपको मिल जाये। जागरूक हमें ही रहना होगा। अपने सामाजिक अखबार के संपादक को सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब उसका अखबार अधिक से अधिक पाठकों के पास पहुंचे। अपने मिशनरी अखबारों की तुलना मनुवादी धन्ना सेठों के दैनिक अखबारों से कभी नहीं करें।
हाँ अपने समाज के कुछ कथित फर्जी लोग अखबार के नाम पर सहयोग राशि एकत्र करके गायब हो जाते हैं लेकिन सभी ऐसे नहीं हैं। हमारे सामाजिक समाचार पत्रों के संपादक खूब मेहनत करते हैं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
सुझाव –
मेरा सुझाव है कि राजस्थान से निकलने वाले अपने सामाजिक अखबार/पत्र पत्रिकाओं के संपादक-पत्रकारों की किसी एक स्थान पर एक सेमिनार आयोजित की जाये जहां समाज के प्रतिष्ठित समाज बंधुओं के साथ खुली चर्चा हो। हमें हमारे पत्र-पत्रिकाओं के संपादक-पत्रकारों की भी बात सुननी चाहिए।
हकदार पाक्षिक, सीमांत रक्षक दैनिक, उदयमेघ साप्ताहिक, प्रभात पोस्ट साप्ताहिक, भीम प्रज्ञा दैनिक, जागो हुक्मरान पाक्षिक, महकता हिन्दुस्तान पाक्षिक, राजा बलि समाज मासिक, दलित दस्तक मासिक, बुद्ध ज्योति मासिक, आदि सामाजिक मिशनरी पत्र पत्रिकाओं में अपने कार्यक्रम की न्यूज़, आलेख, रचनाएं, कविताएं, प्रेस विज्ञप्ति, विज्ञापन, आर्थिक सहयोग एवं वार्षिक सदस्य बनकर, आदि सहयोग देकर इनको आगे बढ़ाएं।
अपने समाज के कई ऐसे समाज बंधु हैं जिनको यह भी नहीं मालूम कि अपना सामाजिक अखबार भी प्रकाशित होता है। आर्थिक सहयोग के बिना अखबार प्रकाशित नहीं होता। अखबार निकालना बहुत कठिन कार्य है इस कार्य को मिशनरी ही करते हैं। इनका सहयोग करें। आपके आलेख, विचार, रचनाएं, साक्षात्कार अपने अखबारों को प्रेषित करें। वर्तमान में सरकारें सामाजिक अखबारों को सहयोग नहीं कर रहीं हैं।
जिनके घरों में राजस्थान पत्रिका/दैनिक भास्कर/दैनिक नवज्योति/लोकमत/ दैनिक जागरण/राष्ट्रदूत/ नई दुनिया/TOI/IE/ET/HT आदि अखबार आते हैं उनसे आग्रह है कि कोई भी एक सामाजिक अखबार भी जरूर मंगवाएं एवं आर्थिक सहयोग भी करें।
हमें “अपना मीडिया अपनी आवाज़” पर अब सोचना ही होगा। अब यह कहना बंद करना ही होगा “अखबार वाले ने हमारी बात नहीं छापी”
सामाजिक पत्र आयेगा विकास का संदेशा लायेगा।।
अत्त दीपो भव 🪔
डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’
सामाजिक लेखक पत्रकार
मदार, अजमेर (राज.)
मोबाइल 9460180510 आपके पास आर्थिक सहयोग देने के बाद भी अपना सामाजिक अखबार (हकदार/दैनिक सीमांत रक्षक/ प्रभात पोस्ट/उदयमेघ/राजा बली समाज/जागो हुक्मरान/ भीम प्रज्ञा/महकता हिन्दुस्तान/बुद्ध ज्योति आदि) नहीं आ रहा है ?
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बहुजन समाज के विभिन्न समुदाय बाबा साहब डाॅ भीमराव आंबेडकर जी के दर्शन पर, सामाजिक विकास के विषयों पर, अपने महापुरुषों की जयंती पुण्यतिथि के अवसर पर, मनुवादियों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के विरोध में धरना प्रदर्शन पर, सम्मान समारोह, समसामयिक विषयों पर चर्चा परिचर्चा, उत्सव, महोत्सव, खेलकूद, प्रतिभाओं को प्रोत्साहन करने संबंधित आयोजन,आदि कार्यक्रम लगातार कर रहे हैं। आयोजक अपने कार्यक्रमों की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने के लिए मनुवादियों द्वारा संचालित समाचार पत्रों में प्रेस विज्ञप्तियां बना बना कर भेजते हैं। कहीं कहीं तो आयोजक अपने कार्यक्रम का समाचार इस तरह के अखबारों, न्यूज़ चैनल में प्रसारित कराने के लिए विशेष उपहार, विशेष लिफाफे भी पेश करते हैं। लेकिन स्थिति यह हो रही है कि कोई भी हमारी बात, समाचार को अपने यहाँ जगह ही नहीं देता है। यदि किसी ने किसी विशेष के संपर्क या लिफाफे की वजह से जगह दे भी दी तो पढने वाला ढूंढता है कि ‘कहाँ छपा है।’ कभी-कभी तो छ्पा समाचार पढने के लिए ‘लेंस’ खरीदने की नौबत आ जाती है।
न्यूज़ चैनल पर कभी न्यूज़ चलाई जाती है तो टीवी देखने वाले एक घंटा बैठे रहते हैं कि अब आयेगी हमारी न्यूज़। जब आती है हम देखने लगते है तो तुरंत यह शब्द निकलते हैं “अरे चली गई”।
सोचिए ऐसा कब तक चलेगा ?
आप लोग कब तक इन समाचार पत्रों (मेन स्ट्रीम मीडिया) के पत्रकारों के सामने रिरियाते रहोगे ?
क्या हम ऐसा कर सकते हैं –
“खुदी को तू कर बुलंद इतना कि ख़ुदा बंदे से पूंछे बता तेरी रज़ा क्या है ?”
क्यों नहीं हम हमारा अपना मीडिया तैयार करें। जो हमारे अपने मीडिया काम कर रहे हैं उन्हें सशक्त करें। हमारे कार्यक्रम की सूचना, प्रेस विज्ञप्ति केवल हमारे मीडिया, समाचार पत्रों को ही दें। लिफाफा भी हम हमारे अपने मीडिया को ही दें। हमारे अपने संपादक-पत्रकारों को सहयोग दें। क्यों नहीं हमारा अपना समाचार पत्र हमारे हर घर-घर आये ?
कब तक मनुवादी मीडिया की गुलामी, हाथाजोड़ी, सिफारिश करते रहोगे ?
आप कार्यक्रम करें किसी भी मनुवादी मीडिया/ गोदी मीडिया को सूचित नहीं करें ना ही प्रेस विज्ञप्ति दें। केवल अपने मीडिया को ही आमंत्रित करें उन्हें इज्जत दें। मनुवादी मीडिया को इग्नोर करें।
मेन स्ट्रीम मीडिया की गुलामी करने में शर्म नहीं आती ?
हम ‘घर का पूत कुंवारा डोले पाड़ोस्यां का फेरा’ वाली कहावत पर कब तक चलते रहोगे ?
हमारी बात को हमारा अपना मीडिया ही छापेगा, जन-जन तक पहुँचाएगा। मेरा आग्रह है कि जहाँ जहाँ भी बहुजन समाज के छात्रावास, संस्थान, मंदिर, पीठ-पीठाधीश, ट्रस्ट, भवन, विद्यालय, महाविद्यालय, प्रतिष्ठान आदि हों उन सभी में हमारे अपने सामाजिक समाचार पत्र अनिवार्यतः मंगवाये जायें। हमारे युवा पढ़ेंगे तो सामाजिक गतिविधियों को जानेंगे समझेंगे।
यदि हम सभी हमारे मीडिया को सपोर्ट करेंगे तो हमारे मीडिया के साथी भी अपना कार्य मन लगाकर पूरी जवाबदारी और दायित्व से करेंगे। जो हमारे कुछ तथाकथित पत्रकार संपादक हैं जो समाज से अखबार के नाम पर पैसों की उगाही करके गायब हो जाते हैं उनके कृत्यों पर भी रोक लगेगी।
क्यों नहीं हम हमारे अपनों के सामाजिक समारोह में (विवाह, आशीर्वाद समारोह, जन्म दिन उत्सव, सेवानिवृति समारोह में आदि) गिफ्ट में सामाजिक समाचार पत्र की एक वर्ष की सदस्यता उपहार में भेंट करें। मैं करता हूँ।
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आपने अपना सामाजिक समाचार पत्र मंगवाना शुरू किया और वह समाचार पत्र डाक से आपके पास नहीं आता है तो आप बिना सोचे समझे सामाजिक समाचार पत्र के संपादक/पत्रकार को अनर्गल बोलना शुरू कर देते हैं। कुछ तो गालियां देते हैं उसमें उच्च शिक्षित उच्च पदस्थ समाज बंधु भी शामिल होते हैं। यह आपकी गलत धारणा है।
आप पोस्टमेन/पोस्ट मास्टर से कहें कि – मेरा अखबार क्यों नहीं आ रहा है ? यह दायित्व आपका है। मनुवादी लोगों ने अपने पंजे सब तरह फैला रखें हैं। इतना आसान नहीं है कि सामाजिक समाचार पत्र समय पर डाक विभाग से आपको मिल जाये। जागरूक हमें ही रहना होगा। अपने सामाजिक अखबार के संपादक को सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब उसका अखबार अधिक से अधिक पाठकों के पास पहुंचे। अपने मिशनरी अखबारों की तुलना मनुवादी धन्ना सेठों के दैनिक अखबारों से कभी नहीं करें।
हाँ अपने समाज के कुछ कथित फर्जी लोग अखबार के नाम पर सहयोग राशि एकत्र करके गायब हो जाते हैं लेकिन सभी ऐसे नहीं हैं। हमारे सामाजिक समाचार पत्रों के संपादक खूब मेहनत करते हैं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
सुझाव –
मेरा सुझाव है कि राजस्थान से निकलने वाले अपने सामाजिक अखबार/पत्र पत्रिकाओं के संपादक-पत्रकारों की किसी एक स्थान पर एक सेमिनार आयोजित की जाये जहां समाज के प्रतिष्ठित समाज बंधुओं के साथ खुली चर्चा हो। हमें हमारे पत्र-पत्रिकाओं के संपादक-पत्रकारों की भी बात सुननी चाहिए।
हकदार पाक्षिक, सीमांत रक्षक दैनिक, उदयमेघ साप्ताहिक, प्रभात पोस्ट साप्ताहिक, भीम प्रज्ञा दैनिक, जागो हुक्मरान पाक्षिक, महकता हिन्दुस्तान पाक्षिक, राजा बलि समाज मासिक, दलित दस्तक मासिक, बुद्ध ज्योति मासिक, आदि सामाजिक मिशनरी पत्र पत्रिकाओं में अपने कार्यक्रम की न्यूज़, आलेख, रचनाएं, कविताएं, प्रेस विज्ञप्ति, विज्ञापन, आर्थिक सहयोग एवं वार्षिक सदस्य बनकर, आदि सहयोग देकर इनको आगे बढ़ाएं।
अपने समाज के कई ऐसे समाज बंधु हैं जिनको यह भी नहीं मालूम कि अपना सामाजिक अखबार भी प्रकाशित होता है। आर्थिक सहयोग के बिना अखबार प्रकाशित नहीं होता। अखबार निकालना बहुत कठिन कार्य है इस कार्य को मिशनरी ही करते हैं। इनका सहयोग करें। आपके आलेख, विचार, रचनाएं, साक्षात्कार अपने अखबारों को प्रेषित करें। वर्तमान में सरकारें सामाजिक अखबारों को सहयोग नहीं कर रहीं हैं।
जिनके घरों में राजस्थान पत्रिका/दैनिक भास्कर/दैनिक नवज्योति/लोकमत/ दैनिक जागरण/राष्ट्रदूत/ नई दुनिया/TOI/IE/ET/HT आदि अखबार आते हैं उनसे आग्रह है कि कोई भी एक सामाजिक अखबार भी जरूर मंगवाएं एवं आर्थिक सहयोग भी करें।
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सामाजिक पत्र आयेगा विकास का संदेशा लायेगा।।
अत्त दीपो भव 🪔
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मदार, अजमेर (राज.)
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