भूमिका
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत केवल बड़े नारों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए भाषणों से तय नहीं होती, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति, रोजगार, शिक्षा और आम नागरिक के जीवन स्तर से मापी जाती है। आज भारत में “विश्वगुरु” और “विकसित भारत” जैसे नारे लगातार सुनाई देते हैं, लेकिन दूसरी ओर बेरोजगारी, व्यापारिक संकट और बढ़ती आर्थिक असमानता भी चिंता का विषय बन चुकी है। ब्रिटिश पत्रिका” द इकोनॉमिस्ट “ने भारत की वैश्विक छवि और कूटनीतिक सक्रियता पर सवाल उठाते हुए इसे “शो-ऑफ” और ” बिज़ी डूइंग नथिंग ” जैसी आलोचनात्मक भाषा से जोड़ा। पत्रिका का संकेत था कि केवल “इमेज” (छवि) और “ब्रांडिंग” (प्रचार आधारित पहचान) से कोई राष्ट्र मजबूत नहीं बनता; उसके लिए ठोस “पॉलिसी” (नीतिगत व्यवस्था) और परिणाम भी आवश्यक हैं।

आज आम जनता के भीतर एक प्रकार की “बेचैनी” महसूस की जा रही है। युवा वर्ग रोज़गार के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि छोटे व्यापारी आर्थिक “मायूसी” (निराशा) से गुजर रहे हैं। सरकार की उपलब्धियों का “प्रचार” तेज़ है, लेकिन जनता महंगाई और असुरक्षा की “फ़िक्र” (चिंता) में दिखाई देती है। यही कारण है कि अब देश में आर्थिक विकास और वास्तविक उपलब्धियों पर गंभीर बहस की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

1 : “विश्वगुरु” : सभ्यता का गौरव या राजनीतिक मार्केटिंग?

“विश्वगुरु” शब्द भारतीय इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ एक गौरवपूर्ण विचार है। भारत ने संसार को बुद्ध की करुणा, गांधी की अहिंसा, योग और आयुर्वेद का संदेश दिया। लेकिन आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में किसी राष्ट्र को केवल सांस्कृतिक विरासत से “विश्वगुरु” नहीं माना जाता। आज विश्व नेतृत्व का आधार मजबूत अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीकी नवाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार क्षमता है। इसी कारण जब भारत स्वयं को “विश्वगुरु” कहता है, तो दुनिया यह जानना चाहती है कि भारत विश्व को कौन-सा नया आर्थिक या सामाजिक मॉडल दे रहा है।

द इकोनॉमिस्ट ने इसी विषय पर टिप्पणी करते हुए भारत की वैश्विक सक्रियता को “इमेज” (छवि), “ब्रांडिंग” (प्रचार आधारित पहचान), “डिप्लोमेसी” (कूटनीति), “स्ट्रेटेजी” (रणनीति) और “पॉलिसी” (नीतिगत व्यवस्था) के संदर्भ में परखा। पत्रिका का कहना था कि BRICS, Quad और G20 जैसी बैठकों से वास्तविक आर्थिक परिणाम स्पष्ट नहीं दिखते। भारत की विदेश नीति को “acrobatics” यानी “कलाबाजी” कहकर यह संकेत दिया गया कि देश हर शक्ति केंद्र से संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन उसकी दीर्घकालिक दिशा अभी स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि जनता के भीतर “बेचैनी” (अशांति), “मायूसी” (निराशा) और “फ़िक्र” (चिंता) जैसी भावनाएँ भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं।

2: “Busy Doing Nothing” : प्रचार और वास्तविकता का टकराव?

The Economist का सबसे कठोर वाक्य था — “Busy Doing Nothing।” यह टिप्पणी केवल भारत की विदेश नीति पर नहीं, बल्कि पूरे शासन मॉडल पर सवाल उठाने वाली मानी गई। आज देश में बड़े-बड़े उद्घाटन, विशाल सरकारी कार्यक्रम, हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय आयोजन और सोशल मीडिया आधारित “कैंपेन” (प्रचार अभियान), “इमेज बिल्डिंग” (छवि निर्माण), “इवेंट मैनेजमेंट” (आयोजन आधारित प्रस्तुति), “प्रोजेक्शन” (प्रभाव दिखाना) और “नैरेटिव” (विचारधारा आधारित कहानी) का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई देता है। हर योजना को भावनात्मक और दृश्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे ऐसा वातावरण बनाया जाता है मानो देश ऐतिहासिक आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा हो।

लेकिन दूसरी ओर वास्तविकता कहीं अधिक गंभीर दिखाई देती है। लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, सरकारी नौकरियाँ सीमित होती जा रही हैं और निजी क्षेत्र स्थायी अवसर देने से बच रहा है। छोटे उद्योग आर्थिक “मायूसी” (निराशा) में बंद हो रहे हैं, मध्यम वर्ग महंगाई और टैक्स की “फ़िक्र” (चिंता) से दबा हुआ है, जबकि किसानों के भीतर भविष्य को लेकर “बेचैनी” (अशांति) बढ़ती जा रही है। ऐसे में जनता का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगा है कि सरकार आर्थिक ढाँचे को मजबूत करने से अधिक राजनीतिक छवि निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

3: क्या भारत “इवेंट मैनेजमेंट मॉडल” पर चल रहा है?

पिछले कुछ वर्षों में भारत की शासन शैली एक प्रकार के “इवेंट मैनेजमेंट मॉडल” जैसी दिखाई देने लगी है। हर सरकारी योजना का “लॉन्च” (शुभारंभ) एक बड़े सार्वजनिक आयोजन में बदल जाता है। अंतरराष्ट्रीय दौरों को “विजुअल प्रेज़ेंटेशन” (दृश्यात्मक प्रस्तुति), “ग्लोबल इमेज” (वैश्विक छवि), “पब्लिसिटी” (प्रचार), “मीडिया स्ट्रेटेजी” (मीडिया रणनीति) और “पॉलिटिकल नैरेटिव” (राजनीतिक विचार प्रस्तुति) के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है मानो देश ऐतिहासिक आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा हो। हर भाषण को राष्ट्रवादी भावना से जोड़कर जनता के भीतर गौरव और भावनात्मक समर्थन उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल आयोजनों, मंचों और भाषणों से अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है? यदि देश की आर्थिक स्थिति वास्तव में सुदृढ़ होती, तो रोजगार दर बेहतर होती, निर्यात में तेज़ वृद्धि दिखाई देती, विनिर्माण क्षेत्र स्थायी विकास करता और ग्रामीण आय में उल्लेखनीय सुधार होता। इसके विपरीत आज बड़ी संख्या में युवा “परेशानी” (कठिन मानसिक स्थिति) का सामना कर रहे हैं, छोटे व्यापारी आर्थिक “नाकामी” (असफलता) का दबाव झेल रहे हैं और मध्यम वर्ग महंगाई की “उलझन” (चिंताजनक स्थिति) में फँसा हुआ दिखाई देता है। इसी कारण आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि कहीं सरकार वास्तविक आर्थिक सुधारों से अधिक छवि निर्माण और भावनात्मक राजनीति पर निर्भर तो नहीं हो गई है।

4: नोटबंदी : आर्थिक नीति या राजनीतिक प्रतीकवाद?

2016 में लागू की गई नोटबंदी को सरकार ने “देशहित” और “राष्ट्र निर्माण” का ऐतिहासिक कदम बताया था। इसे काले धन, भ्रष्टाचार और नकली मुद्रा के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन वर्षों बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इससे अवैध संपत्ति पर कितना प्रभाव पड़ा। इसके विपरीत छोटे व्यापारियों, दिहाड़ी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र को भारी आर्थिक झटका लगा। नकदी आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था अचानक रुक-सी गई और लाखों छोटे कारोबार प्रभावित हुए।

अमर्त्य सेन ने इस निर्णय को गरीबों और कमजोर वर्गों के लिए कठोर बताया था। इसके बावजूद सरकार ने नोटबंदी को “रिफॉर्म” (आर्थिक सुधार), “डिजिटल ट्रांज़िशन” (डिजिटल परिवर्तन प्रक्रिया), “कैशलेस सिस्टम” (नकदरहित व्यवस्था), “फाइनेंशियल क्लीनअप” (आर्थिक शुद्धिकरण) और “नेशनल मोबिलाइजेशन” (राष्ट्रीय जनसक्रियता) जैसे शब्दों के माध्यम से राष्ट्रवादी अभियान की तरह प्रस्तुत किया।

यहीं से यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार आर्थिक फैसलों को केवल वित्तीय नीति के रूप में नहीं, बल्कि जनभावनाओं से जुड़े राजनीतिक प्रतीकों में बदलने लगी है। इस प्रक्रिया में गरीब वर्गों की “तकलीफ़” (कष्ट), व्यापारियों की “घबराहट” (भययुक्त चिंता) और ग्रामीण समाज की “परेशानी” (मुश्किल स्थिति) को पर्याप्त गंभीरता से नहीं देखा गया।

5: जीएसटी और व्यापारी वर्ग की चुप्पी?

जीएसटी को “एक राष्ट्र, एक कर” के रूप में प्रस्तुत किया गया और इसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा कर सुधार बताया गया। सिद्धांत रूप से यह व्यवस्था व्यापार को सरल बनाने और कर प्रणाली को एकीकृत करने का प्रयास थी, लेकिन इसका क्रियान्वयन छोटे व्यापारियों और लघु उद्योगों के लिए अत्यधिक जटिल साबित हुआ। बार-बार नियमों में बदलाव, ऑनलाइन प्रक्रिया, तकनीकी दिक्कतें और बढ़ते अनुपालन दबाव ने छोटे व्यवसायों की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया।

सरकार ने जीएसटी को “टैक्स रिफॉर्म” (कर सुधार), “डिजिटल कम्प्लायंस” (ऑनलाइन अनुपालन व्यवस्था), “ई-गवर्नेंस” (डिजिटल प्रशासन), “रेवेन्यू सिस्टम” (राजस्व व्यवस्था) और “इकोनॉमिक इंटीग्रेशन” (आर्थिक एकीकरण) जैसे आधुनिक शब्दों के साथ प्रचारित किया। लेकिन जमीनी स्तर पर छोटे व्यापारियों को लगातार बदलती प्रक्रियाओं और कर दबाव से जूझना पड़ा।

आज व्यापारी वर्ग खुलकर विरोध कम करता दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर “खौफ़” (डर), “बेबसी” (लाचारी) और “नाराज़गी” (असंतोष) की भावना बढ़ती महसूस होती है। यही व्यापारी वर्ग कभी दक्षिणपंथी राजनीति का सबसे मजबूत सामाजिक आधार माना जाता था, लेकिन अब घटती बिक्री, आर्थिक दबाव और प्रशासनिक सख्ती के कारण भीतर ही भीतर असुरक्षा महसूस कर रहा है।

6: बेरोजगारी : “विश्वगुरु” के सपने का सबसे बड़ा विरोधाभास!

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन यही युवा शक्ति आज सबसे अधिक असुरक्षित और चिंतित दिखाई देती है। प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होना, सरकारी भर्तियों का वर्षों तक अटका रहना और निजी क्षेत्र में स्थायी रोजगार के अवसरों का लगातार कम होना युवाओं के भीतर गहरी निराशा पैदा कर रहा है। लाखों डिग्रीधारी युवा अस्थायी नौकरियों, कम वेतन और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों में जीवन बिताने को मजबूर हैं।

रघुराम राजन लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि केवल GDP वृद्धि दर को विकास नहीं माना जा सकता; वास्तविक प्रगति वही है जो व्यापक स्तर पर रोजगार पैदा करे। इसके बावजूद सरकार का ध्यान कई बार “इमेज पॉलिटिक्स” (छवि आधारित राजनीति), “इलेक्शन कैंपेन” (चुनावी प्रचार अभियान), “डेटा प्रेज़ेंटेशन” (आँकड़ों की प्रस्तुति), “स्किल नैरेटिव” (कौशल आधारित सरकारी विमर्श) और “इकोनॉमिक विज़न” (आर्थिक दृष्टिकोण) के प्रचार पर अधिक केंद्रित दिखाई देता है।

इस स्थिति ने युवाओं के भीतर “मलाल” (गहरा दुख), “बेचैनी” (अशांत मानसिक स्थिति) और “नाउम्मीदी” (आशा समाप्त होना) जैसी भावनाओं को जन्म दिया है। यही कारण है कि अब बड़ी संख्या में युवा यह प्रश्न पूछने लगे हैं कि क्या विकास केवल भाषणों और नारों तक सीमित रह गया है, या वास्तव में उनके भविष्य को सुरक्षित करने की कोई ठोस योजना भी मौजूद है।

7: जनता के भीतर बढ़ती नकारात्मक भावना!

जब आम नागरिक यह देखता है कि राजनीतिक भाषण लगातार बड़े होते जा रहे हैं लेकिन रोजगार के अवसर सीमित हैं, प्रचार तंत्र अत्यधिक शक्तिशाली दिखाई देता है लेकिन आमदनी स्थिर बनी हुई है, और वैश्विक मंचों पर देश की चमकदार तस्वीरें दिखाई जाती हैं जबकि घर का मासिक बजट लगातार बिगड़ रहा है, तब उसके भीतर अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर “विश्वगुरु” जैसे शब्दों का प्रयोग अब कई लोग व्यंग्यात्मक संदर्भों में करने लगे हैं।

जनता पूछ रही है कि यदि भारत वास्तव में विश्व नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तो शिक्षा इतनी महंगी क्यों होती जा रही है? स्वास्थ्य सेवाएँ आम नागरिक की पहुँच से बाहर क्यों हैं? किसान कर्ज और आर्थिक संकट में क्यों डूबे हुए हैं? युवा मानसिक तनाव और भविष्य की अनिश्चितता से क्यों जूझ रहे हैं? छोटे व्यापारी लगातार आर्थिक दबाव में क्यों टूट रहे हैं?

सरकार इन परिस्थितियों को समझाने के लिए “डेवलपमेंट मॉडल” (विकास मॉडल), “ग्लोबल पोजिशनिंग” (वैश्विक स्थिति निर्माण), “पब्लिक आउटरिच” (जनसंपर्क विस्तार), “डिजिटल विज़न” (डिजिटल भविष्य दृष्टि) और “नेशनल इमेज” (राष्ट्रीय छवि) जैसे शब्दों का उपयोग करती दिखाई देती है। लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों के भीतर “कशमकश” (आंतरिक द्वंद्व), “इज़्तिराब” (मानसिक व्याकुलता) और “रंज” (पीड़ा) की भावना लगातार गहराती महसूस हो रही है। यही संकेत बताते हैं कि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जनता के भीतर गंभीर असंतोष धीरे-धीरे आकार ले रहा है।

8: क्या भारत “इवेंट मैनेजमेंट मॉडल” पर चल रहा है?

पिछले कुछ वर्षों में भारत की शासन शैली एक प्रकार के “इवेंट मैनेजमेंट मॉडल” जैसी दिखाई देने लगी है। हर सरकारी योजना का “लॉन्च” (शुभारंभ) एक बड़े सार्वजनिक आयोजन में बदल जाता है। अंतरराष्ट्रीय दौरों को “विजुअल प्रेज़ेंटेशन” (दृश्यात्मक प्रस्तुति), “ग्लोबल इमेज” (वैश्विक छवि), “पब्लिसिटी” (प्रचार), “मीडिया स्ट्रेटेजी” (मीडिया रणनीति) और “पॉलिटिकल नैरेटिव” (राजनीतिक विचार प्रस्तुति) के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है मानो देश ऐतिहासिक आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा हो। हर भाषण को राष्ट्रवादी भावना से जोड़कर जनता के भीतर गौरव और भावनात्मक समर्थन उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल आयोजनों, मंचों और भाषणों से अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है? यदि देश की आर्थिक स्थिति वास्तव में सुदृढ़ होती, तो रोजगार दर बेहतर होती, निर्यात में तेज़ वृद्धि दिखाई देती, विनिर्माण क्षेत्र स्थायी विकास करता और ग्रामीण आय में उल्लेखनीय सुधार होता। इसके विपरीत आज बड़ी संख्या में युवा “परेशानी” (कठिन मानसिक स्थिति) का सामना कर रहे हैं, छोटे व्यापारी आर्थिक “नाकामी” (असफलता) का दबाव झेल रहे हैं और मध्यम वर्ग महंगाई की “उलझन” (चिंताजनक स्थिति) में फँसा हुआ दिखाई देता है। इसी कारण आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि कहीं सरकार वास्तविक आर्थिक सुधारों से अधिक छवि निर्माण और भावनात्मक राजनीति पर निर्भर तो नहीं हो गई है।

समापन
भारत एक महान सभ्यता और अपार संभावनाओं वाला देश है। इसकी सांस्कृतिक विरासत, युवा शक्ति और लोकतांत्रिक संरचना इसे विश्व में विशिष्ट पहचान देती है। लेकिन केवल भावनात्मक नारों, अंतरराष्ट्रीय आयोजनों और वैश्विक छवि निर्माण से कोई राष्ट्र महाशक्ति नहीं बनता। वास्तविक शक्ति मजबूत अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और व्यापक रोजगार अवसरों से निर्मित होती है।

यदि सरकार वास्तव में “विश्वगुरु” के विचार को सार्थक बनाना चाहती है, तो उसे “इकोनॉमिक प्लानिंग” (आर्थिक नियोजन), “पब्लिक अकाउंटेबिलिटी” (जन जवाबदेही), “सोशल डेवलपमेंट” (सामाजिक विकास), “गवर्नेंस मॉडल” (शासन व्यवस्था) और “लॉन्ग टर्म विज़न” (दीर्घकालिक दृष्टिकोण) को केवल भाषणों तक सीमित रखने के बजाय जमीनी स्तर पर लागू करना होगा। जनता अब केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि जीवन में वास्तविक परिवर्तन देखना चाहती है।

अन्यथा आने वाले वर्षों में “विश्वगुरु” का सपना जनता की नजर में केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह सकता है। तब समाज के भीतर “अफ़सोस” (पछतावा), “तशवीश” (गहरी चिंता) और “निराशगी” (हताशा) जैसी भावनाएँ और अधिक गहरी हो सकती हैं, क्योंकि भूखे, बेरोजगार और संघर्षरत नागरिक के लिए किसी भी नारे का महत्व तभी होता है जब उसका जीवन वास्तव में बेहतर बन सके।

शेर

“विश्वगुरु के ख़्वाब में हक़ीक़त कहीं खोती गई,
मंच सजते ही रहे, मगर अर्थव्यवस्था रोती गई।”

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। अजमेर, हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात।
98292 30966

स्रोत और संदर्भ:
The Economist के “Busy Doing Nothing” विश्लेषण तथा भारत की आर्थिक नीतियों पर समकालीन बहस से प्रेरित।भारतीय अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, प्रचार राजनीति और जनता की बढ़ती आर्थिक निराशा पर आधारित तय समकालीन सामाजिक-राजनीति बहस से प्रेरित।

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