ब्लॉक नंबर के पीछे दब गई एक अधूरी प्रेम कहानी,
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी खरगपुरके विशाल और हरियाली से भरे परिसर में हर शाम कुछ कहानियाँ जन्म लेती थीं। कुछ किताबों में दर्ज हो जाती थीं और कुछ लोगों के दिलों में दफन। यह कहानी भी वहीं जन्मी थी—दो प्रथम वर्ष के छात्रों की कहानी, जिनके सपने बड़े थे, लेकिन दिल बहुत नाज़ुक।
लड़के का नाम था आरव मेहता। राजस्थान के छोटे शहर समदड़ी जिला बाड़मेर से आया हुआ एक होनहार लड़का, जिसकी आँखों में वैज्ञानिक बनने के सपने थे। वह पढ़ाई में तेज़ था, लेकिन स्वभाव से थोड़ा जिद्दी और आत्मसम्मानी।
लड़की थी सना फ़ातिमा। भोपाल की रहने वाली, बेहद संवेदनशील, हँसमुख और कविता लिखने वाली लड़की। उसकी मुस्कान में ऐसा सुकून था कि हॉस्टल की थकान भी कम लगने लगती थी।
दोनों की मुलाक़ात लाइब्रेरी में हुई थी। सना को “ इंजीनियरिंग मैकेनिक्स” की किताब चाहिए थी, जो आरव के पास थी। उसने मुस्कुराकर पूछा—
“अगर पढ़ चुके हो तो क्या मैं ले सकती हूँ?”
आरव ने पहली बार किसी लड़की की आँखों में इतनी मासूमियत देखी थी। उसने किताब बढ़ाते हुए कहा—
“अगर वापस करने का वादा करो तो।”
सना हँस पड़ी—
“किताबें और लोग… दोनों लौटाना मुझे आता है।”
यहीं से उनकी कहानी शुरू हुई।
धीरे-धीरे कैंपस की हर सड़क उनके कदम पहचानने लगी। कभी वे नेहरू म्यूज़ियम के पास बैठते, कभी रात में कैंटीन में चाय पीते। आरव को सना की शायरी पसंद थी और सना को आरव का सपनों के लिए पागलपन।
सना अक्सर कहती…
“तुम्हारे अंदर बहुत आग है आरव, लेकिन डरती हूँ कहीं यही आग तुम्हें अकेला न कर दे।”
आरव हँस देता। उसे लगता प्यार में सब ठीक हो जाता है।
लेकिन शायद प्यार केवल मोहब्बत से नहीं, धैर्य और समझ से भी चलता है।
पहले वर्ष की सर्दियाँ थीं। दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर बहस बढ़ने लगी। आरव पढ़ाई और प्रोजेक्ट्स में व्यस्त रहने लगा। सना को शिकायत होती कि वह पहले जैसा समय नहीं देता।
एक शाम कैंपस के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे दोनों का झगड़ा बहुत बढ़ गया।
“तुम्हें अब मेरी परवाह ही नहीं!” सना की आँखें भर आईं।
आरव गुस्से में बोला;
“हर चीज़ ड्रामा नहीं होती सना! मेरे ऊपर पहले ही बहुत प्रेशर है।”
“और मैं? मैं क्या हूँ तुम्हारी जिंदगी में?”
“अभी मुझे अकेला छोड़ दो!”
यह कहकर आरव वहाँ से चला गया।
उस रात सना ने कई बार कॉल किया। शुरुआत में आरव फोन देखता रहा, फिर उसका ईगो जाग गया।
उसने सोचा—
“जब तक इसे अपनी गलती का एहसास नहीं होगा, मैं बात नहीं करूँगा।”
उसने कॉल काट दिया।
फिर नंबर ब्लॉक कर दिया।
उधर सना अपने हॉस्टल के कमरे में रोती रही। उसकी रूममेट ने समझाया भी, लेकिन वह बार-बार सिर्फ यही कहती रही—
“बस एक बार बात हो जाए… मैं माफ़ी माँग लूँगी…”
अगले दिन आरव दोस्तों के साथ घूमता रहा, लेकिन भीतर कहीं बेचैनी थी। वह हर थोड़ी देर में मोबाइल देखता। उसे उम्मीद थी कि सना मेल करेगी, किसी दोस्त से कहलवाएगी, या फिर कोई लंबा मैसेज आएगा।
लेकिन कुछ नहीं आया।
दूसरा दिन बीत गया।
अब आरव के अंदर गुस्से की जगह चिंता आने लगी। रात को उसने कई बार सना की चैट खोली। ब्लॉक किया हुआ नंबर उसे खुद काटने लगा।
आख़िर उसने रात के दो बजे नंबर अनब्लॉक किया।
मोबाइल स्क्रीन पर जैसे ही नेटवर्क आया, एक मैसेज उभरा।
वह सना का नहीं था।
उसके भाई आदिल का मैसेज था—
“मेरी बहन अब नहीं रही। कल रात उसने सुसाइड कर लिया। मरने से पहले उसने तुम्हें 50 बार कॉल किया था… शायद वो सिर्फ एक बार माफ़ी माँगना चाहती थी।”
आरव के हाथ काँपने लगे।
उसने तुरंत कॉल लगाया।
लेकिन उधर से सिर्फ मशीन जैसी ठंडी आवाज़ आई—
“द नंबर यू आर कॉलिंग इस करेंटली स्विच ऑफ”!
उस रात पहली बार आरव फूट-फूट कर रोया।
उसे याद आया—
वही लड़की जो कहती थी “लोग लौटाना मुझे आता है”… आज खुद हमेशा के लिए चली गई थी।
अगले दिन कैंपस में सन्नाटा था। हॉस्टल की गलियों में फुसफुसाहट थी। कुछ लोग सना की तस्वीर देखकर रो रहे थे।
आरव दूर खड़ा था। उसके अंदर इतना अपराधबोध था कि वह जनाज़े के पास भी नहीं जा पाया।
सना की रूममेट ने उसे एक डायरी दी।
“मरने से पहले यह तुम्हारे लिए छोड़ी थी।”
काँपते हाथों से उसने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“आरव,
अगर कभी मैं तुमसे दूर चली जाऊँ, तो खुद को दोष मत देना।
तुम बुरे नहीं हो… बस तुम्हारा ईगो तुम्हारे प्यार से बड़ा हो गया।
और शायद मेरी कमजोरी मेरा इंतज़ार।”
आगे के पन्नों में उनकी यादें थीं—पहली चाय, पहली बारिश, लाइब्रेरी की पहली मुलाक़ात।
आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन थी ..
“काश तुम एक बार फोन उठा लेते…”
उस एक वाक्य ने आरव की पूरी जिंदगी बदल दी।
समय बीतता गया।
आईआईटी से लोग निकलकर बड़ी कंपनियों में चले गए।
किसी ने स्टार्टअप खोला, किसी ने विदेश में नौकरी पाई।
लेकिन आरव वहीं अटका रह गया—एक बंद नंबर और अधूरी आवाज़ के बीच।
वह आज एक सफल इंजीनियर है, लेकिन रात को सोने से पहले अब भी सना का नंबर डायल करता है।
उसे पता है कोई जवाब नहीं आएगा।
फिर भी हर बार वही आवाज़ सुनाई देती है,
“द नंबर यू आर कॉलिंग इस करेंटली स्विच ऑफ।”
और हर बार उसका दिल अंदर से टूट जाता है।
अब उसने अपने ऑफिस की टेबल पर एक छोटी सी पर्ची चिपका रखी है—
“रिश्तों में जीतने से ज्यादा ज़रूरी होता है उन्हें बचा लेना।
ब्लॉक नंबर तो खुल जाते हैं…
लेकिन खोए हुए इंसान कभी वापस नहीं आते।”
कई बार इंसान गुस्से में शब्द नहीं, पूरी ज़िंदगी खो देता है।
ईगो उस दीमक की तरह है जो रिश्तों को बाहर से नहीं, भीतर से खा जाती है।
मोहब्बत में आखिरी बात कभी आखिरी नहीं माननी चाहिए, क्योंकि कौन जानता है अगली सुबह किसके हिस्से आएगी… और किसके नहीं ?

हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक, अजमेर!
हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात। 98292 30966
