
पुण्यतिथि 27 मई 2026 पर माता रमाबाई को सादर समर्पित
प्रस्तावना: चेतना की पृष्ठभूमि और मूक क्रांति का उद्घोष
किसी भी युगांतरकारी सामाजिक क्रांति की नींव केवल तात्कालिक और दृश्य संघर्षों पर नहीं, बल्कि उन अदृश्य, मूक और अटूट बलिदानों पर टिकी होती है जो इतिहास के पृष्ठों में अक्सर हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।
भारत के शोषित, वंचित और शूद्रातिशूद्र समाज को हज़ारों वर्षों की धार्मिक, सामाजिक और मानसिक ग़ुलामी से मुक्त कराकर एक स्वाभिमानी जीवन देने वाले युगपुरुष बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अद्वितीय अवदान से संपूर्ण विश्व परिचित है।
किंतु, उन्हें ‘भीमराव’ से ‘बाबा साहेब’ बनाने वाली, उनके संघर्षों की सुदृढ़ रीढ़ और उनके संकल्पों को पंख देने वाली महानायिका त्यागमूर्ति माता रमाबाई अम्बेडकर का जीवन त्याग, निष्ठा और मूक क्रांति की एक ऐसी अनूठी दास्तान है, जिसके बिना भारत का सामाजिक न्याय का इतिहास अधूरा है।
आज बहुजन समाज जिस सामाजिक प्रतिष्ठा, उच्च शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों का उपभोग कर रहा है, वह बाबा साहेब और आईं रमाई के अथाह दुखों, अश्रुओं और आहुतियों का प्रतिफल है।
माता रमाई केवल एक आदर्श जीवनसंगिनी नहीं थीं, बल्कि वे बहुजन मुक्ति आंदोलन की वह मूक जड़ थीं, जिसने आँधी-तूफानों के बीच इस विशाल आंदोलन रूपी वट वृक्ष को अविचल थामे रखा।
- अभावों का तिमिर और अदम्य संकल्प का प्रकाश
माता रमाई का जन्म एक अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण उन्होंने केवल कठोर परिश्रम का सामना किया। बाबा साहेब के साथ विवाह के समय वे पूर्णतः निरक्षर थीं।
परंतु, ज्ञान की पिपासा से दीप्त बाबा साहेब ने उन्हें अत्यंत शालीनता से पढ़ाया और माता रमाई ने भी अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से अल्पकाल में ही पढ़ना-लिखना सीख लिया।
यह शिक्षा आने वाले समय में एक महान वैचारिक क्रांति का प्रवेश द्वार बनने वाली थी।
जब बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ ने बाबा साहेब को विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्ति स्वीकृत की, तब भीमराव के समक्ष एक अत्यंत विकट धर्मसंकट उपस्थित था।
घर में 5 नन्हे बच्चे, आय का कोई निश्चित साधन नहीं, और विदेश जाने पर परिवार के भरण-पोषण के लिए कोई धन छोड़कर जाने की असमर्थता। जब बाबा साहेब ने व्यथित मन से यह परिस्थिति रमाई के समक्ष रखी, तब उस महान नारी ने व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर जो ऐतिहासिक शब्द कहे, वे आज भी बहुजन चेतना के लिए अनुकरणीय हैं।
उन्होंने कहा:
“बाबा साहेब, यह सत्य है कि हमारे पास 5 बच्चे हैं और आजीविका का कोई साधन नहीं है। आप भी हमारे लिए कोई धन छोड़कर नहीं जा रहे हैं, परंतु मैं आपको पूर्ण विश्वास दिलाती हूँ कि आप अपने ज्ञानार्जन की इच्छा को पूरा करके आइए, अपनी शिक्षा पूर्ण कीजिए, इन बच्चों का पेट पालने का दायित्व मेरा है।
यही वह ऐतिहासिक क्षण था जिसने बाबा साहेब को वैश्विक पटल पर ‘ज्ञान के प्रतीक’ के रूप में स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त किया।
यदि उस समय रमाई ने अपने पारिवारिक संकटों को आगे रखकर बाबा साहेब को रोक लिया होता, तो शायद आज करोड़ों वंचितों का भाग्य अंधकार में ही लीन रहता।
- पांच संतानों की आहुति और ममत्व का मूक बलिदान
माता रमाई ने अपने दिए गए वचन को केवल शब्दों में नहीं निभाया, बल्कि उसे अपने रक्त और आंसुओं से सींचा। बाबा साहेब की विदेश यात्रा के उपरांत, मुंबई की निर्दयी गलियों में माता रमाई ने जो जीवन जिया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। एक उच्च शिक्षित विद्वान की पत्नी होने के बावजूद, उन्होंने तनिक भी लोक-लाज या अहंकार नहीं किया। वे सुबह-सुबह मुंबई की सड़कों और अस्तबलों से गाय-भैंसों का गोबर बीनकर लाती थीं, उनके उपले बनाती थीं और उन्हें बेचकर जो नाममात्र का पैसा मिलता था, उससे अपने बच्चों की क्षुधा शांत करती थीं।
आर्थिक विपन्नता इस सीमा तक थी कि बच्चों की सामान्य परवरिश और चिकित्सा भी संभव नहीं थी।
इसी भीषण अभाव की वेदी पर एक-एक करके उनकी 4 मासूम संतानों—दामोदर, इंदु, रमेश और राजरतन ने दम तोड़ दिया।
दामोदर का अवसान
जब ज्येष्ठ पुत्र दामोदर गंभीर रूप से बीमार हुआ, तो माता रमाई के पास उसके इलाज के लिए वैधुकीय परामर्श और औषधि खरीदने के पैसे नहीं थे। उपचार के अभाव में दामोदर शांत हो गया, किंतु स्वाभिमानी रमाई ने विदेश में अध्ययनरत बाबा साहेब की एकाग्रता भंग न हो, इसलिए उन्हें पत्र में इस महान दुख की भनक तक नहीं लगने दी।
इंदु का बलिदान और कर्तव्य का संकट: वह दौर ऐसा था जब बाबा साहेब स्वयं लंदन में घनघोर अभाव का सामना कर रहे थे। वे दिन में केवल 1 बार रूखा-सूखा भोजन करते थे और शाम को केवल पानी पीकर रातें गुज़ारते थे।
बाबा साहेब ने अत्यंत हताशा में पत्र लिखकर कुछ पैसों की मांग की।
उधर मुम्बई में उनकी पुत्री इंदु मृत्युशैया पर पड़ी थी और माता रमाई ने अत्यंत कठिनाई से कुछ पैसे जोड़े थे।
एक मां के सामने ब्रह्मांड का सबसे बड़ा धर्मसंकट था: उस धन से अपनी मरती हुई बेटी का इलाज कराए या अपने पति को दिया वचन निभाए?
अंततः, एक महान सामाजिक क्रांति की जननी ने अपने ममत्व पर पत्थर रखकर वह पैसा बाबा साहेब को भेज दिया।
परिणामतः, इंदु ने भी दम तोड़ दिया, और यह दारुण दुख भी उन्होंने साहेब से छुपाए रखा।
राजरतन का कफ़न और बाबा
साहेब का राष्ट्रधर्म
चौथे पुत्र राजरतन की मृत्यु का दृश्य तो मानवीय संवेदनाओं की पराकाष्ठा है। जब राजरतन अंतिम सांसें ले रहा था, बाबा साहेब घर पहुँचे और उनकी गोदी में ही उसने प्राण त्याग दिए। अपने 4-4 बच्चों को दफ़नाने के बाद टूट चुकी रमाई ने विलाप करते हुए कहा कि ‘बाबा साहेब, आपकी इस ज्ञान और समाज सुधार की लालसा ने मेरा पूरा घर उजाड़ दिया’।
तब बाबा साहेब ने व्यथित होकर कहा था, ‘रमा, तुम तो रोकर अपना दुख प्रकट कर पा रही हो, मैं तो समाज के करोड़ों बच्चों की मृत्यु देखकर अपने आंसुओं को भी भीतर ही पीने के लिए विवश हूँ’।
अत्यंत हृदयविदारक तथ्य यह है कि राजरतन के पार्थिव शरीर को ढकने के लिए कफ़न तक खरीदने के पैसे बाबा साहेब की जेब में नहीं थे। तब माता रमाई ने अपनी पहनी हुई साड़ी का आंचल फाड़कर अपने पुत्र का कफ़न बनाया।
उसी समय बाबा साहेब को शोषितों के अधिकारों की रक्षा के लिए लन्दन में आयोजित होने वाले ‘गोलमेज सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए प्रस्थान करना था। जब समाज और परिवार के लोगों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो बाबा साहेब ने राष्ट्रधर्म और कोटि-कोटि वंचितों के अधिकारों को सर्वोपरि रखते हुए
कहा:
“मैं अपने एक पुत्र की खातिर अपने करोड़ों-करोड़ों मूक और शोषित पुत्रों की बलि चढ़ते हुए नहीं देख सकता।
यदि आज मैं लंदन नहीं गया, तो गांधी और तथाकथित उच्च वर्ण कहे जाने वाले नेता हमारे लोगों के सारे मानवाधिकार छीन लेंगे और उन्हें सदैव के लिए ग़ुलाम बना देंगे।
- बड़ौदा का अपमान और मनुस्मृति दहन का संकल्प
बाबा साहेब जब उच्च शिक्षा प्राप्त कर बड़ौदा रियासत में नौकरी करने आए, तो माता रमाई के मन में यह आशा जागी थी कि अब उनके जीवन के कष्ट समाप्त हो जाएंगे।
किंतु, भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद का विषैला दंश कितना गहरा था, इसका प्रमाण बड़ौदा के दफ़्तर में मिला।
एक अछूत समाज से आने के कारण, दफ़्तर के तथाकथित उच्च वर्ण के चपरासी ने बाबा साहेब के बैठने वाली चटाई को खींच लिया, पानी के घड़े को अलग रख दिया ताकि वे उसे छू न सकें, और सरकारी फ़ाइलें भी उन्हें दूर से फेंककर दी जाने लगीं।
जब बाबा साहेब ने इस दुर्व्यवहार का विरोध किया, तो चपरासी ने अत्यंत अहंकार से कहा कि ‘तुम चाहे जितने पढ़-लिख जाओ, रहोगे तो नीच ही, तुम्हारे साथ काम करने से हमारा धर्म भ्रष्ट होता है’।
इस घोर मानसिक उत्पीड़न और अपमान के कारण बाबा साहेब ने मात्र 11वें दिन ही अपनी उच्च पद की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर जब उनकी ट्रेन 4 घंटे विलंब से थी, तब एक वृक्ष के नीचे बैठकर बाबा साहेब फूट-फूटकर रोए।
उन्होंने आत्मचिंतन किया:
“जब मुझ जैसे बैरिस्टर, जो अमेरिका और इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों से शिक्षित होकर आया है, के साथ यह समाज ऐसा अमानवीय व्यवहार कर सकता है, तो मेरे समाज के उन अनपढ़, निर्धन और असहाय भाई-बहनों का जीवन कैसा नर्क बना रखा होगा जो मरे पशु उठाते हैं और मैला ढोते हैं!
वहीं उन्होंने प्रतिज्ञा की
कि ‘यदि मैं अपने समाज को इस ज़िल्लत, ग़ुलामी और मानसिक जकड़न से मुक्त नहीं करा पाया, तो मैं स्वयं को गोली मार लूंगा, किंतु वापस इस अपमान को स्वीकार नहीं करूँगा’।
जब वे घर लौटे और माता रमाई को यह वृत्तांत सुनाया, तो उस वीरांगना ने तनिक भी रोष प्रकट नहीं किया, बल्कि अटूट संबल प्रदान करते हुए कहा: “बाबा साहेब, आपको जैसा उचित लगे वैसा कीजिए, सम्मान से समझौता मत कीजिए, मैं हर परिस्थिति में आपके साथ हूँ।
इसी संकल्प की परिणति 25 दिसम्बर 1927 को हुई, जब बाबा साहेब ने हज़ारों अनुयायियों की उपस्थिति में अमानवीयता, असमानता और शूद्रों-महिलाओं की ग़ुलामी के धार्मिक विधान ‘मनुस्मृति’ को सार्वजनिक रूप से अग्नि के हवाले कर दिया। यह भारत के इतिहास में मानवीय गरिमा और वैचारिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा उद्घोष था।
- केवल गृहप्रबंधक नहीं, बहुजन आंदोलन की सह-क्रांतिकारिणी
अक्सर पारंपरिक इतिहासकारों ने माता रमाई को केवल एक पतिव्रता, कुशल गृहप्रबंधक या आज्ञाकारी स्त्री के रूप में चित्रित करने की भूल की है। परंतु ऐतिहासिक तथ्य साक्षी हैं, कि वे बाबा साहेब के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली एक सजग वैचारिक सहयात्री थीं।
वैचारिक विमर्श और परामर्श
बाबा साहेब अपने द्वारा किए जाने वाले सामाजिक कार्यों, आंदोलनों और लेखन पर अक्सर आई रमाई से गंभीर चर्चा करते थे और माता रमाई उन्हें अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी सलाह दिया करती थीं।
महिला चेतना का नेतृत्व
बाबा साहेब भली-भांति जानते थे कि किसी भी समाज का उत्थान तब तक संभव नहीं है जब तक कि उस समाज की महिलाएं जागरूक न हों।
वे माता रमाई को बहुजन समाज की सभाओं और विशेष रूप से शोषित-पीड़ित महिलाओं की बैठकों में अनिवार्य रूप से साथ ले जाते थे।
रमाई की उपस्थिति मात्र से वंचित समाज की महिलाओं में चेतना और उत्साह का संचार दोगुना हो जाता था।
ऐतिहासिक नेतृत्व
29 जनवरी 1928
मुंबई में आयोजित ‘वंचित समाज महिला परिषद’ के ऐतिहासिक सम्मेलन में माता रमाबाई को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया।
उन्होंने इस पद का दायित्व अत्यंत कुशलता और ओजस्विता के साथ निभाया, जो यह सिद्ध करता है कि वे नेतृत्व क्षमता से ओत-प्रोत थीं।
सांस्कृतिक और सामाजिक रूपांतरण
‘चवदार तालाब’ (महाड़ सत्याग्रह) के ऐतिहासिक जल-आंदोलन के उपरांत, समाज में सांस्कृतिक समानता स्थापित करने के उद्देश्य से माता रमाई और सहयोगी सामाजिक कार्यकर्ता सौभाग्य सहस्रबुद्धे ने वंचित समाज की महिलाओं को सवर्ण महिलाओं की भांति शालीनता से साड़ी बांधने और स्वच्छता से रहने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया।
उन्होंने शूद्रातिशूद्रों और नारी जाति के समग्र उत्थान के बाबा साहेब के अभियान में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
- लन्दन से बाबा साहेब का पत्र कृतज्ञता और आत्म-स्वीकृति
30 दिसंबर 1930 को लंदन में गोलमेज सम्मेलन के दौरान, जब बाबा साहेब को कुछ एकांत समय मिला, तो उन्होंने माता रमाई को एक अत्यंत भावुक और ऐतिहासिक पत्र लिखा। यह पत्र एक पति का अपनी पत्नी के प्रति केवल प्रेम पत्र नहीं है, बल्कि एक महान क्रांतिकारी का उस मूक शक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है जिसने उसे ‘क्रांति की आग’ बनने दिया।
बाबा साहेब लिखते हैं:
रमा! यदि तुम्हारी जगह कोई अन्य सामान्य स्त्री मेरे जीवन में आई होती, जो केवल भौतिक सुखों और ऐश्वर्य को ही जीवन का ध्येय मानती, तो वह मुझे कब का छोड़कर जा चुकी होती… मुंबई जैसे महानगर में भूखे पेट रहकर, सड़कों से गोबर बीनना, उपले थापना और उसे बेचकर परिवार चलाना, एक बैरिस्टर की पत्नी होकर भी फटे पुराने कपड़ों में जीवन जीना—यह केवल तुम्हारे ही अद्वितीय आत्मसम्मान और त्याग के कारण संभव हो सका। तुम्हारे इसी स्वाभिमान पर मुझे गर्व है।
बाबा साहेब ने स्वीकार किया कि वे सामाजिक न्याय की वैचारिक क्रांति की आग से लड़ते-लड़ते स्वयं ‘आग’ बन चुके हैं और इसी कारण कभी-कभी उनकी कठोरता और रूखापन उनके परिवार को झुलसा देता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि ‘रमा, मुझ पर तुम्हारे कभी न मिटने वाले अनगिनत एहसान और उपकार हैं, जिन्होंने मेरे सपनों को पंख दिए और मेरी उड़ान को निर्भय बनाया’।
- समकालीन बहुजन समाज का वैचारिक रूपांतरण और भावी दिशा
आज जब हम माता रमाई के 27 मई 1935 को हुए परिनिर्वाण और उनके महान स्मृति दिवस का सिंहावलोकन करते हैं, तो वर्तमान बहुजन समाज की दशा और दिशा पर गंभीर चिंतन करना अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। बाबा साहेब और माता रमाई ने अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर हमें ‘शिक्षित, संगठित और संघर्षशील’ होने का जो मूलमंत्र दिया था, उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सही अर्थों में लागू करने के लिए हमें अपने सामाजिक और संगठनात्मक ढांचे में बुनियादी सुधार करने होंगे।
संगठनों का एकीकरण और विखंडन पर रोक
वर्तमान दौर में बाबा साहेब के नाम पर हज़ारों-लाखों छोटे-छोटे स्थानीय संगठनों का निर्माण हो रहा है, जो समाज को जोड़ने के स्थान पर विखंडित करने का कार्य कर रहे हैं।
अपनी व्यक्तिगत पहचान या क्षणिक नेतृत्व चमकाने की गलतफहमी से बाहर निकलना आज के समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि पहचान नाम या पद से नहीं, बल्कि धरातल पर किए गए कार्यों से बनती है।
संत कबीर पूर्णतः निरक्षर थे और किसी संगठन के अध्यक्ष नहीं थे, परंतु अंधविश्वास के खिलाफ उनकी निडर और खरी वाणी ही उनकी अमर पहचान बन गई।
इसी प्रकार, बालक उधम सिंह ने जलियांवाला बाग के प्रतिशोध का संकल्प लिया और अपने शौर्य की बदौलत इतिहास में अमर हो गए।
अतः, वर्तमान समय की मांग है कि इन बिखरे हुए लाखों संगठनों का राष्ट्रीय स्तर पर विलय किया जाए ताकि बहुजन आंदोलन की शक्ति को एक सुदृढ़ और नीति-आधारित दिशा दी जा सके।
‘पे बैक टू सोसाइटी’ का वास्तविक क्रियान्वयन
मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने शोषित समाज के पढ़े-लिखे और सक्षम तबके को समाज के प्रति अपने ऋण को चुकाने के लिए ‘पे बैक टू सोसाइटी’ का अद्भुत सिद्धांत दिया था। इसका मूल उद्देश्य यह था कि सक्षम लोग अपनी बुद्धि, समय, श्रम और धन का कुछ अंश समाज के सबसे पिछड़े व्यक्ति के उत्थान में लगाएं।
परंतु वर्तमान में कई संगठनों ने रसीद बुक्स छपवाकर इसे मात्र एक वित्तीय माध्यम बना लिया है, जिससे आंदोलन की साख प्रभावित होती है।
जो संगठन समाज को वैचारिक जागृति, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और संबल प्रदान नहीं कर सकते, उन्हें समाज से कुछ भी लेने का नैतिक अधिकार नहीं है।
हमें इस सिद्धांत के वास्तविक और निस्वार्थ स्वरूप को पुनः जीवित करना होगा।
निष्कर्ष: माता रमाई के ऋण से उऋण होने का मार्ग
त्यागमूर्ति माता रमाबाई अम्बेडकर का जीवन हमें यह सीख देता है कि क्रांति केवल मंचों से उद्घोष करने या बड़े पद धारण करने से नहीं आती।
क्रांति आती है समर्पण से, त्याग से और विपरीत परिस्थितियों में अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने से।
माता रमाई ने अपने जीवन की सारी खुशियाँ, अपनी चारों संतानों की आहुति केवल इसलिए दे दी ताकि इस देश के करोड़ों शोषितों के बच्चे आत्मसम्मान के साथ जी सकें, अच्छी शिक्षा पा सकें और शासकीय कुर्सियों पर बैठकर देश का भाग्य विधाता बन सकें।
बाबा साहेब ने राजरतन के पार्थिव शरीर की सौगंध खाकर जो प्रतिज्ञा की थी कि, ‘मैं ऐसा कार्य करके जाऊंगा कि हर माँ की कोख से पैदा हुआ बेटा इस देश पर राज करेगा’,
वह प्रतिज्ञा उन्होंने भारत का सर्वोत्तम ‘संविधान’ लिखकर पूरी कर दी।
आज माता रमाई के स्मृति दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन, वंदन और सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अपने व्यक्तिगत अहंकार और संकीर्ण गुटों को त्यागकर संपूर्ण बहुजन समाज को वैचारिक रूप से एकसूत्र में पिरोएं। हमें अपनी भावी पीढ़ी को यह गौरवशाली इतिहास बताने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए कि हमारी आज की सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के पीछे किन महान आत्माओं के आंसुओं का समंदर बहा है।
आइए, हम सब मिलकर प्रतिज्ञा करें कि हम बाबा साहेब और माता रमाई के इस महान सामाजिक परिवर्तन के कारवां को निरंतर आगे बढ़ाएंगे।

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिंतक
एवं विचारक ब्यावर, राजस्थान-305901
