जन्म जयंती 11 अप्रैल 2026 के पावन अवसर पर सादर समर्पित

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक
भारत का इतिहास केवल उन राजाओं की गाथा नहीं है जिन्होंने तलवारों के दम पर साम्राज्य जीते, बल्कि यह उन महापुरुषों का ऋणी है, जिन्होंने ‘विचारों’ के प्रहार से सदियों पुरानी मानसिक दासता के किले ढहाए।
महात्मा ज्योतिबा फुले भारतीय पुनर्जागरण के वह देदीप्यमान सूर्य हैं, जिनकी किरणों ने न केवल वर्ण व्यवस्था के अंधकार को चीरा, बल्कि उस आधुनिक भारत की नींव रखी जहाँ ‘इंसान’ की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके ‘मानव’ होने से है।
1. पृष्ठभूमि और अपमान की अग्नि से उपजा संकल्प
ज्योतिबा का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे के एक माली’ परिवार में हुआ था।
उनके पूर्वज पेशवाओं के यहाँ फूलों की आपूर्ति करते थे, इसलिए वे ‘फुले’ कहलाए।
यद्यपि उनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था,लेकिन सामाजिक पदानुक्रम में उन्हें ‘शूद्र’ का दर्जा प्राप्त था।
ज्योतिबा के जीवन की वह घटना, जिसने उनके भीतर के क्रांतिकारी को जगाया, वह थी उनके एक ब्राह्मण
मित्र की शादी।
जब ज्योतिबा उस बारात में शामिल हुए, तो दूल्हे के रिश्तेदारों ने उन्हें ‘नीच’ कहकर अपमानित किया और
बारात से बाहर निकाल दिया।
उस रात ज्योतिबा सो नहीं सके। उन्होंने अपने पिता ‘गोविंदराव’ से पूछा कि “क्या ईश्वर ने इंसान को अलग-अलग बनाया है?” पिता के पास कोई उत्तर नहीं था, लेकिन ज्योतिबा ने उत्तर खोजने की ठान ली।
उन्होंने थॉमस पेन की ‘राइट्स ऑफ मैन’ पढ़ी और यह निष्कर्ष निकाला कि गुलामी की जड़ें शस्त्रों में
नहीं, शास्त्रों में हैं।
यदि बहुजन समाज को अपनी बेड़ियाँ काटनी हैं, तो उसे उन ‘पवित्र’ कहे जाने वाले ग्रंथों के पाखंड को समझना होगा जिन्होंने उसे मानसिक रूप से अपंग बना दिया है।
2. 1848 की महाक्रांति: जब अविद्या का किला ढहा
भारत के इतिहास में वर्ष 1848 किसी युद्ध की विजय से कम नहीं है। पुणे के भिड़े वाडा में जब ज्योतिबा ने पहली कन्या पाठशाला खोली, तो वह मनुस्मृति के उन विधानों को सीधी चुनौती थी जो महिलाओं और शूद्रों को ज्ञान से वंचित रखते थे।
इस यात्रा का सबसे क्रांतिकारी अध्याय था,सावित्रीबाई फुले का निर्माण। जब कट्टरपंथियों ने ज्योतिबा को डराया कि स्त्री को पढ़ाना पाप है, तब ज्योतिबा ने अपनी पत्नी को ही अपनी पहली शिष्या बनाया।
सावित्रीबाई जब स्कूल जाती थीं, तो उन पर गोबर, पत्थर और कीचड़ फेंका जाता था।
ज्योतिबा ने उन्हें दो साड़ियां रखने को कहा,एक मैली होने के लिए और एक स्कूल में सम्मान से खड़े होने के लिए।
यह उस महान दंपत्ति का बलिदान ही था कि आज भारत की हर शिक्षित महिला, चाहे वह किसी भी पद पर हो, वह सावित्रीबाई और ज्योतिबा की ऋणी है।
3. अनछुआ प्रसंग: हत्यारों का हृदय परिवर्तन
और ‘ढोडीबा’ का जन्म महात्मा फुले की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर पुणे के कुछ सनातनी कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या की साजिश रची।
उन्होंने दो भाड़े के हत्यारों, ढोडीबा कुंभार और रोडे को सुपारी दी। आधी रात को जब ये दोनों नंगी तलवारें लेकर ज्योतिबा के घर में घुसे, तो ज्योतिबा ने उन्हें बड़ी शांति से देखा और पूछा, भाइयों, मुझे मारकर तुम्हें क्या मिलेगा?
हत्यारों ने कहा, हमें एक हजार रुपये का इनाम मिलेगा।ज्योतिबा ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरा शरीर
तो वैसे भी समाज का है।
यदि मेरी मृत्यु से तुम्हारे बच्चों का पेट भरता है और तुम्हें धन मिलता है, तो मैं सहर्ष अपनी गर्दन कटाने को तैयार हूँ। ज्योतिबा की उस अलौकिक निडरता और करुणा ने उन पेशेवर हत्यारों को झकझोर दिया।
वे उनके चरणों में गिर पड़े। यह ज्योतिबा के व्यक्तित्व का जादू था कि हत्या के लिए आया ढोडीबा बाद में उनका सबसे वफादार शिष्य और अंगरक्षक बना।
यह घटना सिद्ध करती है कि सत्य का तेज लोहे की तलवारों से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।
4. सत्यशोधक समाज
बौद्धिक दासता के विरुद्ध मोर्चा
24 सितंबर 1873 को ज्योतिबा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की।
यह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि ‘मानव गरिमा’ की बहाली का आंदोलन था। इसका मूल मंत्र था, ईश्वर की प्रार्थना के लिए किसी मध्यस्थ (पुरोहित) की आवश्यकता नहीं है।
सत्यशोधक समाज के क्रांतिकारी लक्ष्य
पुरोहितवाद का अंत
ज्योतिबा ने पुरोहितों के बिना
शादियां करवानी शुरू कीं।
उन्होंने मंगलाष्टक के मंत्रों को मराठी भाषा में बदलकर यह स्पष्ट किया कि विवाह एक सामाजिक अनुबंध है,न
कि कोई दैवीय चमत्कार जिसमें दान-दक्षिणा अनिवार्य हो।
शूद्रों में स्वाभिमान
उन्होंने ‘गुलामगिरी’ नामक पुस्तक लिखकर यह सिद्ध किया कि कैसे काल्पनिक अवतारों और मिथकों के माध्यम से मूलनिवासियों को ‘शूद्र’ बनाकर उनका शोषण किया गया।
बौद्धिक क्रांति
उन्होंने मध्यस्थ पंडितों के पाखंड को उजागर किया और लोगों को ‘सत्य’ की खोज के लिए प्रेरित किया।
5. अछूतों के लिए अपने घर का कुआं खोलना
मानवीय संवेदना का शिखर उस समय छुआछूत की बीमारी इतनी भयंकर थी कि अछूतों को सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने का
अधिकार नहीं था।
गर्मी के दिनों में जब अछूत बच्चे प्यास से तड़पते थे, तो समाज के ‘कर्णधार’ मूकदर्शक बने रहते थे।
ज्योतिबा फुले ने किसी सरकार या कानून का इंतजार नहीं किया। उन्होंने अपने स्वयं के घर का पानी का कुआं अछूतों के लिए खोल दिया।
यह उस समय का सबसे बड़ा सामाजिक विद्रोह था।
सवर्ण समाज ने उन पर दबाव बनाया, उनका सामाजिक बहिष्कार किया, लेकिन ज्योतिबा ने स्पष्ट कहा,जो प्यासे को पानी नहीं दे सकता, वह धर्म कैसा?
6. विधवाओं के रक्षक और ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह
समाज का सबसे क्रूर चेहरा तब दिखता था जब विधवा महिलाओं का मुंडन किया जाता था।
ज्योतिबा ने इसके खिलाफ नाइयों की हड़ताल करवाई।
उन्होंने विधवाओं के शोषण से जन्मे बच्चों के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ खोला।
यहाँ एक अद्भुत प्रसंग आता है। एक ब्राह्मण विधवा ने जब आत्महत्या की कोशिश की, तो ज्योतिबा ने उसे बचाया।
उसके पुत्र को उन्होंने गोद लिया और उसका नाम ‘यशवंत’ रखा। उन्होंने यशवंत को डॉक्टर बनाया और अपनी समस्त संपत्ति उसे सौंप दी।
यह उनकी जातिविहीन सोच का सबसे बड़ा प्रमाण था कि एक शूद्र ने ब्राह्मण बच्चे को अपना वारिस बनाया।
7. हंटर कमीशन और शिक्षा का अधिकार (1882)
जब शिक्षा पर विचार के लिए हंटर कमीशन भारत आया,तो ज्योतिबा फुले अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने
यह मांग रखी कि “प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य किया जाना चाहिए।
उन्होंने अंग्रेजों को चेतावनी दी कि सरकार का पैसा ऊंची जातियों’ की उच्च शिक्षा पर खर्च होने के बजाय
आम गरीब किसानों और मजदूरों की बुनियादी शिक्षा पर खर्च होना चाहिए।
उनकी इसी दूरदर्शिता ने आगे चलकर भारतीय संविधान में शिक्षा के अधिकार की नींव रखी।
8. किसान और मजदूर आंदोलन के आदि-जनक
अक्सर भारत में मजदूर आंदोलन का श्रेय विदेशी विचारधाराओं को दिया जाता है, लेकिन ज्योतिबा फुले इसके वास्तविक प्रणेता थे।
रविवार की छुट्टी
उनके शिष्य नारायण मेघाजी लोखंडे के माध्यम से ज्योतिबा ने ही ब्रिटिश सरकार से लड़कर मजदूरों के लिए रविवार की साप्ताहिक छुट्टी और काम के निश्चित घंटों का कानून बनवाया।
किसानों का कोड़ा
अपनी पुस्तक ‘किसानों का आसुड़’ में उन्होंने किसानों की बदहाली का जो विवरण दिया, वह आज भी हमें
सोचने पर मजबूर करता है।
उन्होंने खेती में तकनीक, सिंचाई के लिए बांध और साहूकारों के चंगुल से मुक्ति की वकालत की।
9. छत्रपति शिवाजी महाराज की पहचान की खोज
ज्योतिबा फुले ने ही रायगढ़ के किले में उपेक्षित पड़ी छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि को खोजा और
पहली बार ‘शिव जयंती’ मनानी शुरू की।
उन्होंने शिवाजी महाराज को ‘कुलवाड़ी भूषण’ (किसानों का गहना) कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि
शिवाजी किसी एक धर्म के नहीं, बल्कि उन रैयत (किसानों) के रक्षक थे, जिन्हें दबाया गया था।
10. सती प्रथा और देवदासी प्रथा के विरुद्ध युद्ध
ज्योतिबा फुले ने केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि उन सामाजिक कुरूतियों पर भी प्रहार किया जो महिलाओं को ‘वस्तु’ मानती थीं। उन्होंने सती प्रथा को ‘कानूनी हत्या’ करार दिया।
मंदिरों के नाम पर लड़कियों के शोषण (देवदासी प्रथा) के खिलाफ उन्होंने आवाज़ उठाई। उन्होंने दहेज मुक्त विवाहों का समर्थन किया।
11. अकाल राहत और जनसेवा
जब महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा, तब ज्योतिबा फुले और उनके सहयोगियों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए प्रभावित क्षेत्रों में भोजन और पानी की व्यवस्था की।
उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि वह लगान माफ करे और किसानों को बीज उपलब्ध कराए।
उन्होंने बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ से संपर्क कर अकाल राहत के लिए बड़ी राशि जुटाई।
उनकी सेवा का दायरा जाति और धर्म की सीमाओं से बहुत ऊपर था।
12. हास्य पर रखे गए मूलनिवासी और आदिवासी
ज्योतिबा फुले शायद पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने ‘आदिवासियों’ को भारत का मूलनिवासी माना।
उन्होंने उनके जंगलों पर अधिकार की वकालत की और उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास किए। उन्होंने महारानी विक्टोरिया के पुत्र ‘ड्यूक ऑफ
कनॉट’ के सामने एक फटे-पुराने किसान के वेश में जाकर ब्रिटिश शासन की नीतियों की धज्जियां उड़ाई थीं।
13. एक राष्ट्रव्यापी विनम्र निवेदन
भारत रत्न’ की मांग
आज जब हम राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ की बात करते हैं, तो वह सम्मान स्वयं धन्य हो जाएगा यदि वह महात्मा ज्योतिबा फुले जैसे महामानव को अर्पित किया जाए।
एक शिक्षाविद,और सामाजिक विचारक के नाते, हम भारत सरकार से पूर्ण विनम्रता के साथ यह निवेदन करते हैं कि, ज्योतिबा फुले के बहुजन समाज, शिक्षा, महिला अधिकार और श्रमिक कल्याण के प्रति उनके अद्वितीय और अतुलनीय योगदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया जाए।
यह मांग किसी राजनीति से प्रेरित नहीं है, न ही इसका किसी दल विशेष से संबंध है।
यह केवल एक कृतज्ञ राष्ट्र का अपने ‘मसीहा’ के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है।
ज्योतिबा फुले ने जो बीज 19वीं सदी में बोए थे, उसी की छाया में आज का आधुनिक भारत सांस ले रहा है।
उन्हें यह सम्मान देना करोड़ों शोषितों, पिछड़ों, दलितों और महिलाओं के संघर्षों को सम्मान देना होगा।
भारत सरकार से हमारा यह करबद्ध निवेदन है कि वे करोड़ों भारतीयों की इस जायज और भावनात्मक
मांग को स्वीकार करें।
14. वर्तमान समय का आह्वान और वैचारिक स्पष्टता
आज देश में जो भी प्रगति दिख रही है, उसके पीछे ज्योतिबा फुले का संघर्ष है।
ज्योतिबा फुले ब्राह्मण जाति के व्यक्तिगत विरोधी नहीं थे, बल्कि उस ‘ब्राह्मणवाद’ और ‘मनुवाद’ के कट्टर विरोधी थे जो ऊंच-नीच सिखाता था।
वे उस पाखंड के विरोधी थे जो धर्म के नाम पर शोषण करता था। उन्होंने ‘देवदासी प्रथा’ और ‘सती प्रथा’ जैसी बुराइयों के खिलाफ जो जंग शुरू की थी, उसे आज हमें अपने तार्किक विचारों से आगे बढ़ाना है।
आज 2026 में, भारत का हर नागरिक जो शिक्षा प्राप्त कर रहा है, वह महात्मा फुले का ऋणी है।
उन्होंने अकाल के समय भूखों को भोजन दिया, आदिवासियों के हक की बात की और मेहनत करने
वाले वर्ग को ‘इंसान’ होने का बोध कराया।
ऐसे निडर महापुरुष को जानना और उनके पथ पर चलना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
निष्कर्ष: विचारों की अमरता
महात्मा ज्योतिबा फुले एक ऐसे प्रकाशपुंज हैं जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
उन्होंने अपना पूरा जीवन, अपनी संपत्ति और अपना परिवार समाज के लिए होम कर दिया।
यदि हम वास्तव में उनके अनुयाई हैं, तो हमें उनकी मूर्तियों को पूजने के साथ-साथ उनके ‘तर्क’ और ‘विज्ञान’ आधारित विचारों को अपने जीवन में उतारना होगा।
हमें अंधविश्वास की बेड़ियों को काटकर शिक्षा के मार्ग पर चलना होगा। जिस दिन भारत का हर बच्चा शिक्षित होगा और हर नागरिक स्वाभिमानी होगा, उसी दिन ज्योतिबा फुले का मिशन पूरा होगा।
जय ज्योति! जय क्रांति!
विशेष डिस्क्लेमर (Disclaimer)
प्रस्तुत लेख लेखक के निजी सामाजिक शोध, ऐतिहासिक विश्लेषण और क्रांतिकारी वैचारिक पृष्ठभूमि पर आधारित है।
लेखक केवल ऐतिहासिक तथ्यों और समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले के दर्शन को प्रस्तुत कर रहे हैं।
इस लेख में भारत सरकार से महात्मा ज्योतिबा फुले के लिए ‘भारत रत्न’ की जो मांग की गई है, वह विशुद्ध रूप से एक सामाजिक और अकादमिक निवेदन है।
इसका किसी भी राजनीतिक दल, चुनाव या विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। यह मांग केवल उनके ऐतिहासिक योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के उद्देश्य से की गई है।
लेखक इस विषय में किसी भी प्रकार की राजनीति का हिस्सा नहीं हैं और पूर्ण विनम्रता के साथ यह विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। लेख में वर्णित विचार लेखक के स्वतंत्र सामाजिक और विश्लेषणात्मक चिंतन का परिणाम हैं।
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक
