भारतीय समाज में मनुष्य की पहचान कई स्तरों पर बनती है, लेकिन सबसे दुखद यह है कि इन स्तरों में काबिलियत से पहले जाति को जगह दी जाती है। जब रिश्तों की बुनियाद समझ, सम्मान और संवाद पर होनी चाहिए, वहाँ अक्सर पहले से मौजूद पूर्वाग्रह अपना डेरा जमा लेता है। विशेषतः अनुसूचित जाति–जनजाति (SC/ST) समुदाय के संदर्भ में यह पूर्वाग्रह महज़ सोच नहीं, बल्कि सदियों से जमा हुआ सामाजिक ज़हर है।

रिश्तों में जब असमानता घुल जाती है, तो भले ही समाज मॉडर्न (आधुनिक) होने के दावे करता रहे, पर अंदर से वही पुराना माइंडसेट (मानसिक ढाँचा) ज़िंदा रहता है जो मनुष्य को मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि एक लेबल (चिह्न) की तरह देखता है। यही वजह है कि SC/ST समुदाय के लोग रिश्तों के मामले में सबसे अधिक पीड़ा झेलते हैं।

समाज में यह पूर्वाग्रह पीढ़ियों से चला आ रहा है। लोग यह समझे बिना कि समय बदल चुका है, वही सोच आगे बढ़ाते हैं जो उन्हें अपने परिवारों से मिली होती है। यह इन्हेरिटेड माइंडलोड (विरासत में मिला मानसिक बोझ) व्यक्ति की स्वतंत्र सोच को कुचल देता है। उधर SC/ST परिवारों के युवाओं के लिए यह समस्या दोहरी हो जाती है—पहली लड़ाई अपनी प्रतिभा सिद्ध करने की और दूसरी लड़ाई समाज को यह समझाने की कि उनकी पहचान सिर्फ जाति नहीं है। समाज की यह ग़लत फ़हमियाँ (मिसकांसेप्सन्स) रिश्तों में दूरी बढ़ाती हैं। जब किसी युवा को इस आधार पर ठुकरा दिया जाता है कि वह जिस समुदाय में जन्मा है, वही उसकी कीमत तय करेगा, तो यह सिर्फ सामाजिक गलती नहीं बल्कि एथिकल क्राइम (नैतिक अपराध) है।

पूर्वाग्रह का सबसे बड़ा नुक़सान यह है कि यह इंसान के पोटेंशियल (क्षमता) को देखने ही नहीं देता। “गुमान” (अहंकार/पूर्वधारणा)—जो दिखाता है कि बिना जाने, बिना समझे कोई राय बना लेना कितना खतरनाक है। SC/ST समुदाय के सैकड़ों उदाहरण ऐसे मिलते हैं जहाँ रिश्ते बनने से पहले ही टूट जाते हैं, क्योंकि समाज ने उनके बारे में फ़ैसला (निर्णय) पहले से ही कर रखा होता है। यही वजह है कि प्रेम संबंध, मित्रता, विवाह—तीनों पर सबसे ज़्यादा असर इसी पूर्वाग्रह का पड़ता है। ज़रा सोचिए, अगर कोई युवक या युवती अपने मन की बात कहे और जवाब यह मिले कि—“समाज क्या कहेगा”—तो उस समाज की मैच्योरिटी (परिपक्वता) पर कैसा भरोसा किया जाए?

पूर्वाग्रह का दूसरा रूप है—वह खौफ़ जो लोगों के मन में बैठा होता है कि जातिगत रेखाएँ पार करते ही समाज का विरोध झेलना पड़ेगा। इस डर को समाज ने इतनी गहराई से बोया है कि सच्चे रिश्ते बनने से पहले ही मर जाते हैं। SC/ST समुदाय के युवाओं को अक्सर बताया जाता है कि उनके लिए “सीमा” तय है। यह सीमा किसने तय की? किस आधार पर? यह सवाल कोई नहीं पूछता। और यही समस्या है—सवाल पूछने से बचना।

कन्फर्मिटी (भीड़ का अनुसरण)—यही कन्फर्मिटी हमें पिछड़ा रखती है। जड़ता —सदियों से जमी यह जड़ता ही समाज को आगे बढ़ने नहीं देती।
जब हम रिश्तों की बात करते हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि रिश्ते परंपरा से नहीं, मन की
स्वीकारशीलता से बनते हैं। परंपरा का सम्मान तभी अर्थपूर्ण है जब वह इंसाफ़ करे। परंपरा अगर असमानता को पोषित करे, तो वह परंपरा नहीं, अत्याचार बन जाती है। SC/ST समुदाय के युवाओं को “हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता” जैसा वाक्य सुनना पड़ता है। यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि सदियों की नफ़रत का सार है।

यह नफ़रत रिश्तों और समाज दोनों को खोखला कर देती है। आज भी कई परिवारों में यह मानसिकता है कि “अपनी जाति से बाहर रिश्ता मत करना।” यह कैसी नैरो माइंडेडनेस (संकीर्णता) है जहाँ इंसान को इंसान के मिज़ाज से नहीं, जाति से परखा जाता है?
अगर समाज वास्तव में आधुनिक होता, तो SC/ST समुदाय के लोग इतने डिस्क्रिमिनेशन (भेदभाव) का सामना न करते।

प्रेम और विवाह पर जाति का नियंत्रण होना किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं है। “सदाक़त” (सच्चाई)—रिश्तों की सदाक़त वही है जहाँ व्यक्ति को उसके दिल और कर्म से देखा जाए। लेकिन हमारे समाज में रिश्तों की सदाक़त अक्सर जाति के मापदंड पर परखी जाती है। यह विडंबना नहीं तो क्या है? एक तरफ हम दुनिया को बताते हैं कि भारत विविधताओं का देश है, दूसरी तरफ हम विविधता को अपनाने से डरते हैं। यह कॉन्ट्राडिक्शन (विरोधाभास) आधुनिक भारत की सबसे बड़ी चुनौती है।

जब SC/ST समुदाय का कोई युवा समाज की परंपराओं से अलग चलने की कोशिश करता है, तो उसका रास्ता फूलों से नहीं, पत्थरों से भरा होता है। वह खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है, पर समाज उसकी जाति को पीछे से पकड़कर खींचता रहता है। यह मेंटल ब्लॉकेज (मानसिक अवरोध) रिश्तों को तोड़ता है। “रसवाई” (अपमान)—जो SC/ST समुदाय ने समाज से सबसे अधिक झेला है।

आज भी अगर कोई दलित या आदिवासी युवक किसी ऊँची जाति के घर रिश्ता लेकर जाए, तो उसके साथ होने वाला व्यवहार इस देश के सोशल फ़ैब्रिक (सामाजिक ताना-बाना) की सच्चाई खोल देता है।
समाज में एक अधिक खतरनाक धारणा यह भी है कि SC/ST समुदाय के लोग “सभ्य” नहीं होते। यह स्टीरियोटाइप (पूर्वनिर्धारित छवि) सिर्फ अज्ञानता ही नहीं, बल्कि ज़ुल्म भी है। इस स्टीरियोटाइप को तोड़ने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि सभ्यता जाति से नहीं, संवेदनशीलता से मापी जाती है। “नफ़ासत” (सूक्ष्मता/संवेदनशीलता)—और इस नफ़ासत को सीखना हर उस समाज के लिए ज़रूरी है जो रिश्तों में समानता चाहता है। लेकिन हम अक्सर इस नफ़ासत को जातिगत सोच के नीचे दबा देते हैं।
यदि रिश्ते जीवित रखने हैं, तो सबसे पहले पूर्वाग्रहों की दीवारें गिरानी होंगी।

पूर्वाग्रह रिश्तों का टॉक्सिक एलिमेंट (विषाक्त तत्व) है। यह इंसान के दिल को बाँध लेता है और सोच को सीमित कर देता है। “फ़ितरत” (स्वभाव)—और मनुष्य की फ़ितरत स्वतंत्र है। उसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। SC/ST युवाओं की यही फ़ितरत है कि वे भी प्रेम करना चाहते हैं, सम्मान चाहते हैं, अच्छे रिश्ते चाहते हैं। लेकिन समाज उनके इस सरल स्वभाव को अपनी जटिल जातिगत राजनीति में फँसा देता है। यही वह बिंदु है जहाँ रिश्तों की पूरी संरचना टूट जाती है।

समाज को यह समझना होगा कि इंसान की कीमत उसके एथिक्स (नैतिकता) से होती है, न कि उसकी जाति से। रिश्ता तब पनपता है जब दो लोग एक-दूसरे को समझें, संवाद करें, और एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहें। “वफ़ा” (निष्ठा)—रिश्तों की नींव वफ़ा से बनती है, न कि जातिगत पवित्रता के खोखले दावों से। यह विडंबना है कि जिन बातों से रिश्तों को सुंदर होना चाहिए, उन बातों को समाज ने पीछे धकेल दिया और जाति को आगे रख दिया।
अगर हम सच में आधुनिक समाज बनना चाहते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि जाति पर आधारित पूर्वाग्रह रिश्तों के सबसे बड़े दुश्मन हैं। अंग्रेज़ी में कहा जाता है—”ह्यूमन कनेक्शन (मानवीय जुड़ाव)”—और यह ह्यूमन कनेक्शन तभी पैदा होता है जब इंसान दूसरे इंसान को बिना किसी सामाजिक चश्मे के देख सके। उर्दू में इसी भाव को कहते हैं—“दिलनवाज़ी” (दिल से अपनाना)—और यह दिलनवाज़ी ही वह गुण है जो रिश्तों को स्थाई बनाती है। यदि हम हर संबंध को जाति की नज़र से देखेंगे, तो दिलनवाज़ी मर जाएगी और समाज खोखला हो जाएगा।

पूर्वाग्रह इंसान को सुरक्षा का भ्रम देता है, पर उसी भ्रम में वह रिश्तों की सच्चाई खो देता है। SC/ST समुदाय के संदर्भ में यह भ्रम और भी खतरनाक है क्योंकि इससे न केवल रिश्ते टूटते हैं बल्कि एक संपूर्ण समुदाय की आत्मा आहत होती है। अगर हम बदलाव चाहते हैं, तो हमें पहले अपने भीतर पर्सपेक्टिव शिफ्ट (दृष्टिकोण परिवर्तन) लाना होगा। उर्दू में एक शब्द है—“इंक़िलाब” (बदलाव/क्रांति)—और यही इंक़िलाब विचारों में चाहिए। रिश्तों को बचाना है तो जाति की दीवारें गिरानी होंगी। परंपरा का सम्मान करना ज़रूरी है, पर अंधानुकरण करना आत्महत्या है।

समाज के ताने-बाने में जो नज़ाकत (कोमलता) छिपी होती है, वह तब सबसे ज़्यादा उभर कर दिखाई देती है जब उत्पीड़न के साए में जीने वाले लोग अपनी आवाज़ उठाते हैं। इसी दौर में कई बुद्धिजीवी अक्सर फिलॉसफी (दर्शन) के नाम पर ऐसे कंसेप्ट (धारणा) गढ़ते हैं जिनमें बराबरी का नारा तो होता है, मगर ज़मीन पर उतरते ही वह झूठी तसल्ली साबित होती है। इस पूरे परिदृश्य में कुछ लोगों की आईडेंटिटी (पहचान) हमेशा संदिग्ध बना दी जाती है, और यही संदिग्धता सामाजिक ढांचे को भेदती हुई हम जैसे कई लोगों के दिलों तक पहुँचती है। इसी संदर्भ में उर्दू का एक लफ़्ज़ साज़िश (षड्यन्त्र) बड़ा मुफ़ीद लगता है, क्योंकि सदियों से सत्ता के गलियारों में अल्पसंख्यक व दलित तबकों के खिलाफ़ यही साज़िशें बुनी जाती रही हैं।

यही वजह है कि दलित-बहुजन समाज अपनी राजनीतिक नेगोशिएशन (बातचीत) को लेकर हमेशा चौकन्ना रहता है।
इस संदर्भ में यह भी देखना ज़रूरी है कि जब लोकतंत्र की बयार बहती है, तब स्थिरता का वास्तविक पैमाना यही होता है कि सबसे निचले तबके को कितनी इज़्ज़त और जगह मिलती है। लेकिन हमारे लोकतंत्र का यह पहलू अक्सर कमजोर नज़र आता है, क्योंकि जो लोग सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते हैं, उन्हें ही इल़्ज़ाम का सामना करना पड़ता है। इस पूरे विमर्श में कई बार अंग्रेज़ी के सिस्टम (प्रणाली) और स्ट्रक्चर (ढांचा) जैसे शब्द बार-बार दिमाग़ में दस्तक देते हैं, क्योंकि मौजूदा सिस्टम स्वयं अपने भीतर ऐसी खामियाँ छिपाए बैठा है, जिनसे असमानता मज़बूत होती है।
नीचे की परतों में रहने वाला समुदाय जब अपने हक़ की बात करता है, तो उस पर बग़ावत का तमगा लगा दिया जाता है। यह तमगा इसलिए भी लगाया जाता है ताकि उसकी आवाज़ कमज़ोर हो जाए। लेकिन इस आवाज़ का अपना इम्पैक्ट (प्रभाव) होता है, जो समय के साथ और मज़बूत होता जाता है। इसी आवाज़ को कुचलने के लिए सत्ता के केंद्र में बैठे लोग अक्सर जासूसी का सहारा लेते हैं। यह जासूसी सिर्फ़ राजनीतिक नहीं होती, बल्कि सामाजिक भी होती है, ताकि किसी भी तरह से निचला वर्ग आगे न बढ़ सके।

अंग्रेज़ी का डिस्कोर्स (विमर्श) और उर्दू का बहस (तर्क-वितर्क) दोनों मिलकर इस पीड़ा को व्यक्त करने के लिए ज़रूरी शब्द प्रदान करते हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि समाज में बराबरी पर आधारित मोड़र्निटी (आधुनिकता) का ढांचा तभी टिक सकता है जब वह किसी एक वर्ग के लिए नहीं बल्कि सबके लिए समान अवसर पैदा करे। लेकिन यह अवसर प्रभावशाली लोगों के हाथों छिपा दिया जाना नहीं होना चाहिए। बेशक, अंग्रेजी का डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) शब्द जितना आकर्षक लगता है, उसकी हकीकत उतनी ही पेचीदा है। आज भी कई संस्थानों में भेदभाव स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि जाति केवल गाँवों में नहीं, बल्कि शहरों के दफ्तरों में भी अपनी पूरी सरपरस्ती (संरक्षण) के साथ मौजूद है।

हमारे समय का सबसे बड़ा इम्तिहान यही है कि क्या संविधान में लिखे आदर्श वास्तव में ज़मीन पर उतरे हैं। दलित-बहुजन समुदाय की स्थिति देखकर लगता है कि कन्स्टीट्यूशन (संविधान) और वास्तविक न्याय के बीच दूरी अभी भी बहुत है। कई बार यह दूरी इतनी बढ़ जाती है कि मनुष्य की हैसियत (स्थिति) ही संदिग्ध हो जाती है। यही वजह है कि दलित बुद्धिजीवियों की पीड़ा में रियलिटी (यथार्थ) और
हक़ीक़त (सच्चाई) का फर्क साफ दिखाई देता है।
जब कोई दलित छात्र उच्च संस्थान में प्रवेश लेता है, तब उसे न केवल पढ़ाई बल्कि इज़्ज़त के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। यह संघर्ष उसे अंदर तक तोड़ देता है। वह कई बार मोटिवेशन (प्रेरणा) और इंस्पिरेशन (प्रेरणास्रोत) के सहारे आगे बढ़ता है, लेकिन उसके सामने खड़ी नाकेबंदी (रोक) उसे हर समय चुनौती देती रहती है। यह नाकेबंदी किसी आदेश की तरह स्पष्ट नहीं होती, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी घटनाओं, तानों और व्यवहारों में नज़र आती है।
ऐसा समाज जहाँ बराबरी सिर्फ़ भाषा का टर्म (शब्द) बन जाए, और बराबरी (समानता) का वास्तविक अनुपालन खो जाए, वहाँ रोज़मर्रा का जीवन पीड़ादायक हो जाता है।

यह पीड़ा केवल भावनात्मक नहीं होती, बल्कि संरचनात्मक भी होती है।
इंस्टीट्यूशनल बायस (संस्थागत पक्षपात) और सियासत (राजनीति) दोनों एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। फिर सामाजिक न्याय केवल भाषणों की वस्तु बनकर रह जाता है।
सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ लोग दलितों की प्रगति को देखकर रश्क (ईर्ष्या) करते हैं। इसी रश्क को छिपाने के लिए वे अक्सर मिसइन्फॉर्मेशन (भ्रम) फैलाते हैं, ताकि दलितों के संघर्ष को बदनाम किया जा सके। लेकिन यह भ्रम हमेशा टिक नहीं पाता, क्योंकि सच की अपनी रोशनाई (प्रकाश) होती है। इस रोशनाई के आगे झूठा नैरेटिव (कथा) टिकता नहीं। यही वजह है कि हर युग में दलित-बहुजन समुदाय ने खुद को शिक्षा के माध्यम से फिर से स्थापित किया है।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि जाति-विरोधी आंदोलनों में जहाँ एक ओर जज़्बा (उत्साह) दिखता है, वहीं रेशनलिटी (तर्कशीलता) भी अपने खास अंदाज़ में उभर कर सामने आता है। यही जज़्बा और तर्कशीलता मिलकर दलित चेतना को मज़बूत करते हैं।

“मनुष्य की महानता उसकी जाति में नहीं, उसके चरित्र में होती है।”
— डॉ. भीमराव अंबेडकर।

संकलन कर्ता

हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।

“स्रोत और संदर्भ

राहुल कुमार झा की फेसबुक पोस्ट एवं
संवैधानिक बहसें, दलित आंदोलन साहित्य, सामाजिक न्याय अध्ययन, ऐतिहासिक दस्तावेज़, समकालीन शोध-पत्र और आलोचनात्मक विचार-विमर्श।”

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