*इतराता रह गया वो अपनी “चालाकियों” पर। उसे लगता रहा कि उसने हर परिस्थिति को अपने पक्ष में मोड़ लिया है। परिवार में, कार्यालय में और समाज में उसने शब्दों और व्यवहार का ऐसा जाल बुना कि लोग कुछ समय तक प्रभावित होते रहे। उसकी यह पूरी स्ट्रेटेजी (रणनीति) उसे सफल प्रतीत होती थी। परंतु उसे यह आभास नहीं था कि इस दिखावे के पीछे उसकी असली अक़्लमंदी (वास्तविक बुद्धिमत्ता) कमजोर होती जा रही है। चतुराई और बुद्धिमत्ता में अंतर होता है—पहली क्षणिक लाभ देती है, दूसरी स्थायी सम्मान। वह क्षणिक लाभ के भ्रम में स्थायी हानि की ओर बढ़ रहा था।

*घर में उसने बातों का ऐसा संतुलन बनाया कि हर सदस्य को लगे वह उसी के पक्ष में है। परंतु यह संतुलन वास्तविक नहीं था, यह केवल मैनेजमेंट (प्रबंधन) का खेल था। धीरे-धीरे परिवार को उसकी फ़ितरत (स्वभाव) समझ आने लगी। जब बच्चों ने देखा कि पिता हर बात में लाभ-हानि का हिसाब रखते हैं, तो उनके मन से श्रद्धा कम होने लगी। पत्नी ने महसूस किया कि संवाद में सच्चाई की जगह गणना है। यही वह क्षण था जब उसने अनजाने में घर का विश्वास खो दिया।

*कार्यालय में वह अपनी छवि को चमकाने में लगा रहा। उसने हर उपलब्धि को अपनी मेहनत बताया और दूसरों के योगदान को दबा दिया। उसकी यह इमेज (छवि) कुछ समय तक चमकती रही। परंतु सहकर्मियों के मन में उसके प्रति रंजिश (मनमुटाव) पनपने लगी। जब टीम का भरोसा उठ जाता है, तो व्यक्ति अकेला रह जाता है। पद मिल सकता है, पर सहयोग नहीं। वह यह समझ नहीं पाया कि नेतृत्व छल से नहीं, विश्वास से जन्म लेता है।

*समाज में वह अपने व्यवहार से लोगों को प्रभावित करता रहा। उसकी बातों में मिठास थी, चाल में आत्मविश्वास। परंतु यह आत्मविश्वास केवल पर्सेप्शन (धारणा) पर आधारित था। भीतर कहीं एक हल्की सी बेचैनी (अंतर की अस्थिरता) उसे कचोटती थी। वह जानता था कि उसकी सफलता सच्चाई पर नहीं, कौशलपूर्ण भ्रम पर टिकी है। जब व्यक्ति अपनी वास्तविकता से दूर हो जाता है, तो उसकी आंतरिक शांति भी दूर हो जाती है।

*चालाकी का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि वह संबंधों को लेन-देन बना देती है। हर रिश्ता एक डील (सौदा) बन जाता है। जहां प्रेम होना चाहिए, वहां स्वार्थ आ जाता है। जहां सहयोग होना चाहिए, वहां गुरूर (अहंकार) जन्म लेता है। वह इतराता रहा कि उसने सबको अपने अनुसार ढाल लिया है, पर सच यह था कि उसने अपने चारों ओर अविश्वास की दीवार खड़ी कर ली थी। रिश्ते जितने पारदर्शी होते हैं, उतने ही स्थायी रहते हैं।

*उसने कभी यह नहीं सोचा कि चालाकी बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है। हर झूठ को याद रखना, हर कथन को संभालना—यह सब मानसिक दबाव पैदा करता है। उसकी जीवन-शैली एक प्रकार की कम्पटीशन (प्रतिस्पर्धा) बन गई थी, जहां हर कोई प्रतिद्वंद्वी था। इस वातावरण में सुकून (आंतरिक शांति) के लिए कोई स्थान नहीं बचा। वह बाहरी जीत में मग्न था, पर भीतर हार रहा था।

*समय के साथ उसकी वास्तविकता उजागर होने लगी। लोग उसके व्यवहार और शब्दों में अंतर पहचानने लगे। उसकी पूरी रिप्यूटेशन (प्रतिष्ठा) पर प्रश्नचिह्न लग गया। समाज में उसके प्रति शक (संदेह) बढ़ने लगा। एक बार जब संदेह जन्म ले ले, तो व्यक्ति की हर बात पर सवाल उठता है। यही वह क्षण था जब उसे समझ आना चाहिए था कि उसने क्या खोया है—परंतु अहंकार ने उसे सच देखने नहीं दिया।

*परिवार में संवाद कम होने लगा। बच्चे अपने निर्णय स्वयं लेने लगे, क्योंकि उन्हें मार्गदर्शन में पारदर्शिता नहीं दिखी। उसकी जीवन-यात्रा एक अनंत प्रोजेक्शन (प्रदर्शनात्मक प्रस्तुति) बनकर रह गई। परंतु भीतर एक गहरी ख़लिश (अंतर्मन की चुभन) जन्म लेने लगी। वह रात को अकेले सोचता, पर स्वीकार नहीं करता कि गलती उसी की थी। चालाकी से उसने दूसरों को तो भ्रमित किया, स्वयं को भी धोखा दिया।

“कार्यालय में अवसर घटने लगे। वरिष्ठों ने उसे जिम्मेदारी देने से पहले दो बार सोचना शुरू किया। उसकी सारी नेटवर्किंग (संपर्क निर्माण प्रक्रिया) निष्फल होने लगी, क्योंकि लोग जानते थे कि वह स्वार्थी है। समाज में उसकी बदनामी (कुख्याति) फैलने लगी। वह इतराता तो रहा, पर धीरे-धीरे उसका दायरा सिमटता गया। चालाकी ने उसे भीड़ में अकेला कर दिया।

*अंततः प्रश्न यही है—उसने खोया क्या? उसने विश्वास, सम्मान, स्नेह और मानसिक शांति खो दी। उसकी सारी उपलब्धियाँ केवल सक्सेस (सफलता) का मुखौटा बनकर रह गईं। भीतर से वह तन्हाई (एकाकीपन) का शिकार हो गया। इतराना आसान है, आत्ममंथन कठिन। यदि समय रहते वह समझ जाता कि सच्चाई ही स्थायी आधार है, तो शायद इतना कुछ न खोता। जीवन की सबसे बड़ी जीत दूसरों को मात देना नहीं, स्वयं को ईमानदार रखना है। वही व्यक्ति अंततः समृद्ध होता है जो चालाकी नहीं, चरित्र को अपना आधार बनाता है।

संकलन कर्ता

हगामी लाल मेघवंशी

रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

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