
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया
एक विचारशील और सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह घटनाओं को तर्क, विवेक और सत्य की कसौटी पर परखता है या भावुकता की चाशनी में लपेटकर अंधविश्वास की अफीम चाटने लगता है।
अत्यंत क्षोभ का विषय है कि इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक और डिजिटल युग में भी हमारा समाज ‘चमत्कारों’ की ऐसी काल्पनिक अंधी सुरंग में दौड़ रहा है,जहाँ मनुष्य का पुरुषार्थ, विज्ञान की शक्ति और कर्तव्यपरायणता को सिरे से नकार कर सारा श्रेय अंधभक्ति की झोली में डाल दिया जाता है।
हाल ही में मुंबई के बोरीवली पुलिस थाना क्षेत्र से लापता हुई एक 13 वर्षीय बालिका का मथुरा में मिलना और उसके बाद सोशल मीडिया पर परोसा गया यह दावा कि ‘स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बालिका के साथ चल रहे थे और उसे रास्ता दिखा रहे थे’, हमारी सामूहिक बौद्धिक चेतना के दिवालियापन का जीता-जागता उदाहरण है।
आइए, इस तिलिस्म की परतों को तार्किकता के हथौड़े से तोड़ें और कुछ सीधे, तीखे और चुभने वाले सवाल पूछें।
पहला तर्क: यदि भगवान साथ थे, तो क्या वे परिजनों का विलाप नहीं देख रहे थे?
जो लोग यह दावा कर रहे हैं कि भगवान श्रीकृष्ण उस 13 साल की अबोध बालिका को उंगली पकड़कर मुंबई से मथुरा ले गए, वे जरा अपनी बंद आँखों और सुप्त मस्तिष्क को झकझोर कर इन प्रश्नों का उत्तर दें
माता-पिता का संताप:
एक तेरह वर्ष की बच्ची जब घर से गायब होती है, तो उसके माता-पिता जिस मानसिक नर्क और असहनीय पीड़ा से गुजरते हैं, क्या त्रिकालदर्शी भगवान को उसका भान नहीं था?
क्या कोई करुणामय ईश्वर किसी परिवार को इस असहनीय संताप में धकेलकर अपनी भक्ति करवाएगा?
वापसी की जिम्मेदारी किसकी थी
यदि भगवान स्वयं उस बच्ची को रास्ता दिखाकर मथुरा लाए थे, तो दर्शन कराने के बाद सुरक्षित उसके घर वापस छोड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी?
भगवान ने उसे मंदिर परिसर में भटकने के लिए क्यों छोड़ दिया?
पुलिस का पसीना बनाम चमत्कार का पाखंड
मुंबई पुलिस की टीम अपने घर-परिवार को छोड़कर मथुरा की तपती गलियों, भीड़भाड़ वाले घाटों और धर्मशालाओं की खाक तीन दिन तक क्यों छानती रही?
पुलिसकर्मियों की उस अथक दौड़-धूप, सीसीटीवी विश्लेषण और तकनीकी सर्विलांस का क्या कोई मूल्य नहीं?
जैसे ही बच्ची मिली, अंधभक्तों ने एक झटके में पुलिस के पसीने को खारिज कर सारा श्रेय ‘दैवीय लीला’ को दे दिया!
क्या यह वर्दीधारी जवानों के कर्तव्य-बोध और निष्ठा का खुला अपमान नहीं है?
यदि उस अनजान सफर में बच्ची किसी असामाजिक तत्व या मानव तस्कर के हत्थे चढ़ जाती, तो क्या तब भी ये कथाकार कहते कि यह भगवान की इच्छा थी?
किसी गैर-जिम्मेदाराना कदम और गंभीर बाल-सुरक्षा चूक को ईश्वरीय चमत्कार का आवरण पहनाना समाज के लिए आत्मघाती है।
दूसरा तर्क:
डॉक्टर का पुरुषार्थ बनाम मंदिर का घंटा (एक आँख खोलने वाला दृष्टांत)
हमारे समाज की इस कृतघ्न और विकृत मानसिकता को समझने के लिए एक दैनिक उदाहरण ही पर्याप्त है:
एक व्यक्ति को अचानक दिल का गंभीर दौरा (हार्ट अटैक) पड़ता है। वह जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा होता है।
परिजन उसे आनन-फानन में अस्पताल ले जाते हैं।
डॉक्टर तुरंत जांच करते हैं, स्थिति की गंभीरता को भांपते हैं और कई घंटों तक चले जटिल ऑपरेशन में अपनी पूरी चिकित्सीय विद्या, एकाग्रता और पसीने की एक-एक बूंद झोंक देते हैं। ऑपरेशन सफल होता है, मरीज़ की नब्ज लौट आती है और वह मौत के मुंह से बाहर निकल आता है।
लेकिन इसके बाद क्या होता है? अस्पताल से छुट्टी मिलते ही वह व्यक्ति सीधे मंदिर की ओर दौड़ता है, दानपात्र में पैसे डालता है और हाथ जोड़कर कहता है— “हे भगवान! आपकी कृपा से मेरी जान बच गई।”
सोचिए, उस डॉक्टर के समर्पण और दशकों की वैज्ञानिक तपस्या का क्या हुआ? जिस डॉक्टर ने अपनी रातों की नींद गंवाकर, अत्याधुनिक तकनीक और दवाइयों के बल पर उसे नई ज़िंदगी दी, उसे किनारे कर सारा श्रेय पत्थर की मूरत या अदृश्य शक्ति के खाते में जमा कर दिया गया।
जब व्यक्ति ठीक हो जाए तो ‘भगवान की कृपा’, और यदि ऑपरेशन असफल हो जाए तो सारा दोष डॉक्टर के सिर मढ़कर अस्पताल में तोड़फोड़!
यह दोगलापन और मानसिक दिवालियापन नहीं तो और क्या है?
अंधश्रद्धा: समाज को पंगु बनाने वाला धीमा जहर
अंधभक्ति व्यक्ति से प्रश्न पूछने की क्षमता छीन लेती है।
जब कोई समाज हर प्रशासनिक विफलता, मानवीय भूल या पुलिस की मेहनत को चमत्कार और भाग्य से जोड़ने लगता है, तो वह बौद्धिक रूप से मृतप्राय हो जाता है।
परिश्रम का तिरस्कार:
यह प्रवृत्ति आने वाली पीढ़ी को यह गलत संदेश देती है कि मेहनत, तकनीक, विज्ञान और कर्तव्य की कोई आवश्यकता नहीं है, सब कुछ ऊपर वाले के ‘चमत्कार’ से ही होना है।
सोशल मीडिया का मानसिक प्रदूषण:
आज ‘व्यूज’ और ‘फॉलोअर्स’ के भूखे डिजिटल गिरोह धर्म की आड़ में मनगढ़ंत कहानियां गढ़ रहे हैं।
वे जानते हैं कि समाज को तार्किक बातें समझाने में मेहनत लगती है, लेकिन धार्मिक अंधविश्वास की अफीम चटाकर किसी भी झूठ को वायरल करना बेहद आसान है।
संविधान का आह्वान: जागो और विवेक को पहचानो
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सदैव चेताया था कि धर्म जब अंधविश्वास और तर्कहीनता का रूप ले ले, तो वह मनुष्य की गरिमा और स्वतंत्रता को नष्ट कर देता है।
हमारे भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A (h) देश के प्रत्येक नागरिक को यह स्पष्ट आदेश देता है कि वह, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जांच और
सुधार की भावना का विकास करे।
ईश्वर की सच्ची साधना किसी अलौकिक चमत्कार की कपोल-कल्पनाओं में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, कर्तव्यनिष्ठा और पुरुषार्थ के सम्मान में निहित है।
बच्ची का मिलना पुलिस की मुस्तैदी और तकनीक का परिणाम था, किसी तिलिस्म का नहीं।
समय आ गया है कि हम चमत्कारों की अफीम से बाहर निकलें।
उन हाथों का सम्मान करना सीखें जो कर्म करते हैं,न कि केवल उनका जो आंख मूंदकर अंधविश्वास की जय-जयकार करते हैं।
लेखक का डिस्क्लेमर
“प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य किसी भी धर्म, ईश्वर, व्यक्तिगत आस्था अथवा आध्यात्मिक भावना को ठेस पहुँचाना बिल्कुल नहीं है।
यह आलेख समाज में तेज़ी से पैर पसार रहे अंधविश्वास, वैज्ञानिक सोच के अभाव, बाल-सुरक्षा से जुड़े गंभीर विषयों की अनदेखी और सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले अतार्किक पाखंड के विरुद्ध एक वैचारिक विमर्श है।
लेखक भारतीय संविधान की मूल भावना—वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper), मानवीय श्रम के सम्मान और सामाजिक यथार्थवाद का पूरी निष्ठा से समर्थन करता है।
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक एवं आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर-94622-60179
