“सशक्तिकरण बनाम रैंक की दौड़: हाशिए के समुदायों की शिक्षा की वास्तविक चुनौती!”
हमारे देश में अब बच्चे केवल जन्म नहीं लेते, बल्कि एक परीक्षा का “अटेम्प्ट” बनकर दुनिया में आते हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के…
हमारे देश में अब बच्चे केवल जन्म नहीं लेते, बल्कि एक परीक्षा का “अटेम्प्ट” बनकर दुनिया में आते हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के…
भूमिका एक समाचारपत्र में उल्लेख है कि एआई समिट में हुए युवा कांग्रेस के प्रदर्शन की 160 शिक्षाविदों ने निंदा की। प्रश्न केवल एक घटना का नहीं, बल्कि व्यापक जिम्मेदारी…
जब साथ की चाह मिटे और आत्मबोध की ज्योति स्वयं प्रज्वलित हो जब कैसे महसूस होता है?अकेलापन और एकांत देखने में समान प्रतीत होते हैं, पर उनके अर्थ और प्रभाव…
कहते हैं कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होते हैं। पर हमारे कुछ महाशय ऐसे हैं जिनके लिए यह स्तंभ नहीं, “स्टूडियो का स्टंट” है। कल्पना कीजिए, अगर देश में…
समाज की रिवायत (परंपरा) ने स्त्री के जीवन को एक अदृश्य घेरे में बाँध रखा है। यह घेरा किसी स्टैंडर्ड (मापदंड) की तरह काम करता है, जहाँ हर मुस्कान, हर…
मैं पैंतीस वर्ष का एक साधारण युवक हूँ। जीवन की इस अवस्था में जब अधिकतर मित्र अपनी-अपनी गृहस्थी में रच-बस गए हैं, मैं अब भी प्रतीक्षा में खड़ा हूँ। कभी-कभी…
जब लफ्ज़ कागज़ पर उतरते हैं तो वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते, वे जीवन का वृतांत बन जाते हैं। हर रिश्ता भी एक जीवंत कहानी है, जिसे समय अपनी स्याही…
आँख नींद मांग रही है, दिमाग़ दौलत… दिल प्यार… और रूह सुकूनमनुष्य एक अद्भुत संगम है—शरीर, मन, दिल और आत्मा का। लेकिन जब ये चारों एक ही दिशा में न…
भारतीय समाज एक विराट वृक्ष की तरह है—जड़ों में परंपरा, तने में संस्कार और शाखाओं में संबंधों की हरियाली। किंतु इसी वृक्ष के भीतर कहीं-कहीं दीमक भी लग जाती है,…
कांटे तो बस यूँ ही बदनाम हैं, लोगों को चुभती तो ‘बातें’ ज़्यादा हैं ! प्रकृति के कांटे दिखाई देते हैं, इसलिए उनसे बचाव संभव है; पर मनुष्य की वाणी…