महात्मा गांधी राजनीति को जनसेवा का सर्वोच्च माध्यम मानते थे। उनके लिए सत्ता कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने का साधन थी। वे मानते थे कि सियासत (राजनीति) में नैतिकता, त्याग और सत्य का होना अनिवार्य है। लेकिन आज का परिदृश्य बिल्कुल विपरीत दिखाई देता है, जहाँ राजनीति को करियर (जीवन-व्यवसाय) के रूप में देखा जा रहा है। सेवा की भावना धीरे-धीरे स्वार्थ में बदलती जा रही है और जनहित की जगह व्यक्तिगत उन्नति प्रमुख हो गई है। यह बदलाव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज के दृष्टिकोण में आए परिवर्तन का संकेत देता है।
राजनीति: सेवा या करियर — एक असहज सच का सामना
राजनीति को लंबे समय तक जनसेवा का माध्यम समझा गया, लेकिन बदलते समय ने इसके स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है। जब कोई शक्तिशाली नेता यह कहता है कि वह किसी दूसरे का कैरियर समाप्त कर सकता है, तो यह कथन केवल व्यक्तिगत चुनौती नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की मानसिकता को उजागर करता है। यहाँ “सियासत” (राजनीति) अब त्याग और सेवा का पर्याय नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पेशा बनती जा रही है। “कैरियर” (जीवन-व्यवसाय) की अवधारणा राजनीति में इतनी गहराई से समा चुकी है कि अब यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि क्या हम अब भी इसे सेवा मानें या पेशे के रूप में स्वीकार करें।
नेताओं के त्याग को हम अक्सर आदर्शवाद की दृष्टि से देखते हैं, लेकिन आज यह जरूरी हो गया है कि उस त्याग का विश्लेषण किया जाए। यदि कोई व्यक्ति अपने निजी जीवन, परिवार और संबंधों को पीछे छोड़ देता है, तो क्या वह केवल देश के लिए करता है या उसके पीछे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भी छिपी होती है? यहाँ “कुर्बानी” (बलिदान) शब्द का प्रयोग बहुत सहजता से किया जाता है, परंतु इसके अर्थ पर पुनर्विचार आवश्यक है। राजनीति में “प्रोफेशन” (पेशा) का स्वरूप स्पष्ट दिखता है, जहाँ निर्णय भावनाओं से नहीं, बल्कि रणनीति और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
आज के युवा नेता जब यह कहते हैं कि उन्होंने राजनीति के लिए अपना कैरियर छोड़ दिया, तो यह कथन सुनने में जितना भावुक लगता है, उतना ही जटिल भी है। क्या वास्तव में उन्होंने कुछ छोड़ा, या उन्होंने एक बेहतर विकल्प चुना? राजनीति आज “जुनून” (प्रबल इच्छा) का नहीं, बल्कि अवसरों का क्षेत्र बन चुकी है। यहाँ “ऑपर्च्युनिटी” (अवसर) की भरमार है, जहाँ सही संपर्क और समय के साथ व्यक्ति तेजी से ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है। ऐसे में त्याग की परिभाषा बदल जाती है और राजनीति एक सुनियोजित निर्णय प्रतीत होती है।
राजनीति में मिलने वाली सुविधाएँ इसे एक आकर्षक कैरियर बनाती हैं। एक सफल नेता को न केवल अच्छा वेतन मिलता है, बल्कि कई अन्य लाभ भी मिलते हैं, जो इसे अन्य पेशों से अलग बनाते हैं। यहाँ “रुतबा” (प्रतिष्ठा) का आकर्षण भी जुड़ा होता है, जो व्यक्ति को समाज में विशेष स्थान दिलाता है। इसके साथ ही “सैलरी” (वेतन) और अन्य भत्ते राजनीति को आर्थिक रूप से भी अत्यंत लाभकारी बना देते हैं। यही कारण है कि आज कई लोग इसे सेवा नहीं, बल्कि एक सुनहरा अवसर मानकर अपनाते हैं।
राजनीति में प्रवेश के लिए आवश्यक योग्यता का अभाव भी इसे एक आसान विकल्प बनाता है। जहाँ अन्य क्षेत्रों में उच्च शिक्षा और अनुभव की आवश्यकता होती है, वहीं राजनीति में यह अनिवार्यता कम दिखाई देती है। “काबिलियत” (योग्यता) का महत्व अक्सर पीछे छूट जाता है और “क्वालिफिकेशन” (शैक्षिक योग्यता) की उपेक्षा आम हो जाती है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है, क्योंकि निर्णय लेने वाले हमेशा सक्षम और प्रशिक्षित नहीं होते। इससे नीतियों की गुणवत्ता और समाज के विकास पर भी प्रभाव पड़ता है।
राजनीतिक दलों का स्वरूप भी समय के साथ बदल गया है। आज वे विचारधारा के बजाय कंपनियों की तरह कार्य करते हुए प्रतीत होते हैं। नेता एक दल से दूसरे दल में ऐसे जाते हैं जैसे कोई कर्मचारी बेहतर अवसर के लिए नौकरी बदलता है। यहाँ “वफादारी” (निष्ठा) का महत्व कम हो गया है और “मार्केटिंग” (विपणन) की भूमिका बढ़ गई है। विचारधारा अब केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है, जबकि वास्तविक ध्यान सत्ता प्राप्त करने और उसे बनाए रखने पर केंद्रित है।
एक सफल राजनीतिज्ञ अब वह माना जाता है जो अपनी बात को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सके और जनता को प्रभावित कर सके। चाहे वह विचार कितना भी विरोधाभासी क्यों न हो, उसे स्वीकार्य बनाना ही उसकी कला है। यहाँ “फरेब” (धोखा) भी एक रणनीति के रूप में इस्तेमाल होता है। “सेल्समैन” (विक्रेता) की तरह नेता भी अपने विचारों और वादों को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि लोग उन्हें सच मान लें। यह प्रवृत्ति राजनीति को नैतिकता से दूर ले जाती है।
राजनीति में आत्मविश्वास और प्रस्तुति की शक्ति का विशेष महत्व है। कई बार विरोधाभासी बातें भी इतनी दृढ़ता से कही जाती हैं कि वे सत्य प्रतीत होने लगती हैं। यह “दिखावा” (आडंबर) अब सामान्य हो गया है, जहाँ वास्तविकता और प्रस्तुति के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है। “कन्फिडेंस” (आत्मविश्वास) का प्रभाव इतना अधिक होता है कि वह तर्क और तथ्य को भी पीछे छोड़ देता है। यही कारण है कि आज राजनीति में शब्दों की शक्ति वास्तविकता से अधिक प्रभावी हो गई है।
जनता और नेताओं के बीच का संबंध भी बदल चुका है। पहले जहाँ यह संबंध विश्वास और सेवा पर आधारित था, वहीं अब यह लेन-देन जैसा प्रतीत होता है। हम नागरिक कम और “ग्राहक” अधिक बन गए हैं। यहाँ “मुआवज़ा” (प्रतिफल) की मानसिकता काम करती है, जहाँ हर निर्णय के पीछे व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा होती है। “कस्टमर” (ग्राहक) की तरह हम भी अपने हितों के अनुसार निर्णय लेते हैं, जिससे लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है।
राजनीति में लोग इतने अधिक क्यों आ रहे हैं इसका कारण यह स्वीकार करना कठिन होते हुए भी आवश्यक है कि राजनीति अब एक कैरियर बन चुकी है। इसे केवल जनसेवा मानना एक “ख्वाब” (सपना) हो सकता है, जो वास्तविकता से दूर है। “रियलिटी” (वास्तविकता) यही है कि आज राजनीति में वही सफल होता है जो इसे पेशे की तरह अपनाता है। ऐसे में समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी और राजनीति को भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझना होगा, ताकि सही निर्णय लिए जा सकें।
समापन
आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजनीति में सेवा का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है। यह भारत और वर्तमान समय का दुर्भाग्य है कि अधिकांश लोग राजनीति में समाज की भलाई के लिए नहीं, बल्कि कमाई और सत्ता के लिए आते हैं। इस प्रवृत्ति ने भ्रष्टाचार को गहराई तक जड़ें जमाने का अवसर दिया है। जब नीयत में खोट हो, तो व्यवस्था भी प्रभावित होती है। राजनीति का मूल उद्देश्य जनकल्याण था, लेकिन अब यह व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बनती जा रही है। यदि समय रहते इस दिशा को नहीं बदला गया, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर पड़ सकती है।
शेर:
सियासत थी कभी सेवा, अब सौदों की दुकान हो गई,
ज़मीर बिकता रहा चुपचाप, और जनता हैरान हो गई।
संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
स्रोत व संदर्भ :
कनुप्रिया की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं समकालीन राजनीतिक घटनाएँ, नेताओं के वक्तव्य, मीडिया रिपोर्ट्स, जनमानस के अनुभव और सामाजिक बदलावों के आधार पर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया।
