देश में आजकल मौसम विभाग की चेतावनियाँ कम और समस्याओं की चेतावनियाँ ज़्यादा सुनाई देती हैं। कभी महँगाई की सुनामी आती है, कभी बेरोज़गारी की आंधी, तो कभी सड़कों के गड्ढे ऐसे उभर आते हैं मानो धरती खुद अपनी तकलीफ़ बयान कर रही हो। इन सबके बीच एक आम आदमी खड़ा है—हाथ में खाली सिलेंडर, आँखों में उम्मीद, और दिल में एक ही सवाल—“नरेंदर, कब मिलेगा सिलेंडर?”
यह सवाल सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी से है, लेकिन जवाब शायद हवा में ही कहीं खो गया है—उसी हवा में, जो कभी चुनावी वादों से भारी रहती है और कभी गैस की महक के लिए तरसती है।
महँगाई की सुनामी – जेब का सुनामी अलर्ट
सबसे पहले बात करते हैं उस सुनामी की, जिसने आम आदमी की जेब को समंदर बना दिया—खाली समंदर। दाल, चावल, तेल, सब्ज़ी—हर चीज़ की कीमत ऐसे बढ़ रही है जैसे किसी ने रॉकेट में बैठाकर भेज दी हो।
पहले लोग पूछते थे—“आज क्या बनेगा?”
अब पूछते हैं—“आज क्या बन सकता है?”
रसोई में अब गैस सिलेंडर नहीं, बल्कि एक ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है। जिसे मिल गया, वो VIP; जिसे नहीं मिला, वो आम जनता।
बेरोज़गारी की आंधी – डिग्रियों की धूल
दूसरी मार बेरोज़गारी की आंधी ने दी। डिग्रियाँ अब घर की दीवारों पर टंगी तस्वीरों की तरह हो गई हैं—सिर्फ सजावट के लिए।
इंजीनियर चाय बेच रहा है, MBA वाला ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, और BA वाला अपने BA का मतलब खोज रहा है—“बस आशा।”
सरकार कहती है—“स्टार्टअप करो।”
युवा सोचता है—“पेट में कुछ होगा तभी तो स्टार्टअप होगा!”
गड्ढों और घोटालों की बरसात
तीसरी मार आई गड्ढों और घोटालों की। सड़कों पर इतने गड्ढे हैं कि अब लोग Google Maps नहीं, बल्कि ‘गड्ढा मैप’ बनाने की सोच रहे हैं।
बारिश आते ही सड़कें नहीं, तालाब बन जाते हैं। और इन तालाबों में विकास की नाव कहीं डूब जाती है।
उधर घोटाले ऐसे होते हैं जैसे कोई सीरियल चल रहा हो—हर हफ्ते नया एपिसोड। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ TRP नहीं, जनता की सहनशीलता बढ़ती है।
नफ़रत की सियासत – दिलों में दूरी
चौथी मार सबसे खतरनाक है—नफ़रत की सियासत। अब मुद्दे कम, मजहब ज़्यादा हो गया है।
पहले लोग पूछते थे—“आप क्या काम करते हैं?”
अब पूछते हैं—“आप कौन हैं?”
सोशल मीडिया पर युद्ध चल रहा है, और असली ज़िंदगी में रिश्ते टूट रहे हैं।
राजनीति अब विकास की नहीं, भावनाओं की इंजीनियरिंग बन गई है—जहाँ दिलों को जोड़ने की बजाय तोड़ने का ठेका लिया गया है।
सिलेंडर की किल्लत – रसोई की त्रासदी
और अंत में, जब सब कुछ झेल लिया, तो सिलेंडर की किल्लत ने आखिरी चोट मार दी।
रसोई में खाली सिलेंडर ऐसे पड़ा है जैसे कोई बुज़ुर्ग, जिसे अब कोई पूछता नहीं।
महिलाएँ अब चूल्हे की तरफ देखती हैं, और सोचती हैं—“क्या फिर से लकड़ी जलाने का जमाना आ गया?”
बच्चे पूछते हैं—“मम्मी, खाना कब बनेगा?”
माँ के पास जवाब नहीं होता, सिर्फ एक लंबी साँस होती है।
आम आदमी की हालत – जिंदा है, लेकिन कैसे?
आज आम आदमी जिंदा है, लेकिन कैसे—यह एक बड़ा सवाल है।
वो हँसता है, लेकिन उसकी हँसी में दर्द है।
वो चलता है, लेकिन उसके कदमों में थकान है।
वो उम्मीद करता है, लेकिन उम्मीद भी अब थकी हुई लगती है।
व्यंग्य का सच – हँसी के पीछे छुपा दर्द!
यह लेख भले ही व्यंग्य हो, लेकिन इसमें छुपा दर्द असली है।
जब महँगाई बढ़ती है, तो सिर्फ कीमतें नहीं बढ़तीं—लोगों की मुश्किलें बढ़ती हैं।
जब बेरोज़गारी बढ़ती है, तो सिर्फ आंकड़े नहीं बढ़ते—सपने टूटते हैं।
जब नफ़रत फैलती है, तो सिर्फ बयान नहीं बढ़ते—रिश्ते खत्म होते हैं।
अंतिम सवाल – जवाब कब मिलेगा?
और अंत में वही सवाल, जो हर घर से उठ रहा है—
“नरेंदर, कब मिलेगा सिलेंडर?”
यह सवाल सिर्फ गैस का नहीं है, यह सवाल व्यवस्था का है।
यह सवाल सिर्फ रसोई का नहीं है, यह सवाल पूरे देश की हालत का है।
निष्कर्ष – उम्मीद अभी बाकी है
हालांकि हालात कठिन हैं, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी है।
क्योंकि आम आदमी हारता नहीं, बस थोड़ा थक जाता है।
शायद एक दिन ऐसा आएगा जब—
न महँगाई की सुनामी होगी,
न बेरोज़गारी की आंधी,
न गड्ढों की बरसात,
न नफ़रत की सियासत,
और हर रसोई में सिलेंडर होगा।
तब तक, आम आदमी यही कहता रहेगा—
“साहब, बस इतना कर दो…
चूल्हा जलता रहे, और घर चलता रहे।”

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत और संदर्भ: थ्रेड पर प्रकाश आंबेडकर की पोस्ट से प्रेरित एवं समकालीन भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ, महँगाई, बेरोज़गारी, जनचर्चाएँ, मीडिया रिपोर्ट्स तथा आम जनजीवन के अनुभवों से प्रेरित व्यंग्य लेखन।
