त्याग, समता और सहभागिता का महाकाव्य: डॉ. बी.आर. अंबेडकर और माता रमाबाई के दांपत्य की प्रेरक गाथा

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक

भारतीय इतिहास के फलक पर जब हम डॉ. भीमराव अंबेडकर के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हैं, तो अक्सर हमारे सामने एक प्रखर विद्वान, संविधान निर्माता और करोड़ों शोषितों के मसीहा की छवि उभरती है।

लेकिन इस महामानव को गढ़ने वाली उस मौन शक्ति
का नाम है माता रमाबाई अंबेडकर।

बाबासाहेब और माता रमाबाई का दांपत्य केवल एक पारिवारिक बंधन नहीं था, बल्कि वह ‘समता’ और मैत्री की पहली प्रयोगशाला था, जहाँ बाबासाहेब ने उन सिद्धांतों को जिया, जिन्हें बाद में उन्होंने देश के संविधान में पिरोया।

1. सादगी और संघर्ष की नींव

4 अप्रैल 1906, मुंबई का भायखला मार्केट।
चारों ओर बाजार का शोर और धूल के बीच एक साधारण चबूतरे पर बाबासाहेब और रमाबाई का विवाह संपन्न हुआ।

4 अप्रैल 1906 को भीमराव की आयु 15 वर्ष और रमाबाई (रामी) की आयु मात्र 9 वर्ष थी।
गरीबी इतनी थी कि विवाह के लिए कोई भव्य मंडप नहीं था।

यह विवाह आज के उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है, जो विवाह में फिजूलखर्ची को ही प्रतिष्ठा मानते हैं।

बाबासाहेब और रमाबाई ने सिखाया कि सादगी ही सबसे बड़ा आभूषण है। विवाह के बाद वे मुंबई की ‘बी.आईटी. चाॅल’ की एक छोटी सी खोली में रहने आए, जो आने वाले दशकों तक उनके असीम संघर्षों की गवाह बनी।

2. एक ‘महानायक’ का मानवीय पक्ष
घरेलू कार्यों में सहभागिता
अक्सर पितृसत्तात्मक समाज में यह माना जाता है कि घर के कार्य केवल महिलाओं की जिम्मेदारी हैं।

लेकिन बाबासाहेब ने इस रूढ़ि को अपने घर के भीतर ही ध्वस्त कर दिया था। जब वे विदेश से अपनी शिक्षा पूरी कर लौटे, तब भी वे घर के कार्यों में माता रमाबाई का हाथ बंटाने से कभी पीछे नहीं हटे।

चाहे वह घर की साफ-सफाई हो, बर्तन व्यवस्थित करना
हो या रसोई के छोटे-मोटे काम, बाबासाहेब इन्हें अपनी ‘विद्वत्ता’ या ‘शान’ के खिलाफ नहीं समझते थे।

वे जानते थे कि रमाबाई सारा दिन कठिन शारीरिक श्रम करती हैं—उपले (कंडे) बीनना, मीलों पैदल चलकर पानी लाना और तंगी में घर चलाना।

ऐसे में साहेब अक्सर घरेलू कामों में सहयोग कर उनके शारीरिक बोझ को कम करने का प्रयास करते थे।

यह एक जागरूक पुरुष की पहचान है, कि वह अपनी जीवनसंगिनी को ‘दासी’ नहीं, बल्कि ‘सहयात्री’ समझे।

3. एक पति नहीं, एक सच्चे मित्र का व्यवहार
बाबासाहेब और रमाबाई का रिश्ता पारंपरिक ‘स्वामी और सेवक’ जैसा कभी नहीं रहा।

बाबासाहेब उनके साथ हमेशा एक मित्र की तरह व्यवहार करते थे।

वे अपनी पढ़ाई, अपने लेखों और समाज के प्रति अपनी भविष्य की योजनाओं पर रमाबाई से चर्चा करते थे।

यद्यपि माता रमाबाई औपचारिक रूप से बहुत शिक्षित नहीं थीं, लेकिन उनकी व्यावहारिक बुद्धि और त्याग की समझ को बाबासाहेब सर्वोच्च स्थान देते थे।

वे उनसे अपने मन की बातें साझा करते और उनकी राय का सम्मान करते। बाबासाहेब ने समाज को ‘समानता’ का पाठ पढ़ाने से पहले उसे अपने निजी जीवन में उतारकर दिखाया।

उनका यह मित्रवत व्यवहार ही था, जिसने रमाबाई को वह मानसिक शक्ति दी कि वे अकेले दम पर भीषण गरीबी और बच्चों के वियोग के दुख को सह सकें।

4. संवेदनशीलता और सेवा भाव
जब ‘विश्व रत्न’ अपनी पत्नी के पैर दबाते थे
डॉ. अंबेडकर का अपनी पत्नी के प्रति समर्पण कितना गहरा था,इसका प्रमाण उनके निजी जीवन के उन
पलों में मिलता है जब माता रमाबाई अस्वस्थ होती थीं।

दिन भर के हाड़-तोड़ काम के बाद जब रमाबाई थक कर चूर हो जातीं या उनके हाथ-पैरों में दर्द होता, तो बाबासाहेब स्वयं उनके हाथ-पैर दबाने या सिर की मालिश करने से
कभी संकोच नहीं करते थे।

जरा कल्पना कीजिए, वह महामानव जिसके पास कोलंबिया और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसी संस्थाओं की विश्वप्रसिद्ध डिग्रियां थीं, जो करोड़ों लोगों का नेतृत्व कर रहा था, वह अपनी पत्नी के शारीरिक कष्ट को कम करने के लिए एक साधारण सेवक की भूमिका में आ जाता था।

यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उस महान प्रेम और सम्मान की पराकाष्ठा थी, जिसे बाबासाहेब “रामू” के
प्रति महसूस करते थे।

आज के समाज के पुरुषों के लिए यह सबसे बड़ी सीख है—कि अपनी पत्नी की सेवा करने से कद छोटा नहीं होता, बल्कि व्यक्ति वास्तव में ‘महानायक’ बनता है।

5. पुत्रों का बलिदान और साझा दुख का सागर
उनके जीवन में सबसे हृदयविदारक समय वह था जब उनके बच्चे—गंगाधर, रमेश, इंदु और राजरत्न—
एक-एक करके उन्हें छोड़कर चले गए।

गरीबी और इलाज के अभाव में इन कलियों का मुरझाना किसी भी माता-पिता की कमर तोड़ सकता था। जब राजरत्न का निधन हुआ, तो बाबासाहेब विदेश में थे।

रमाबाई के पास कफन तक के पैसे नहीं थे, उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर कलेजे के टुकड़े को अंतिम विदा दी।

जब बाबासाहेब वापस लौटे, तो उन्होंने न केवल खुद को संभाला, बल्कि रमाबाई के लिए एक चट्टान की तरह खड़े रहे।

उन्होंने कभी रमाबाई को यह महसूस नहीं होने दिया कि वे इस असीम दुख में अकेली हैं। वे दोनों एक-दूसरे के आंसू पोंछते और फिर से समाज की सेवा के लिए संकल्पबद्ध होते।

बाबासाहेब का मानना था कि उनके बच्चों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, क्योंकि वे करोड़ों दलित बच्चों के
भविष्य के लिए लड़ रहे थे।

6. कृतज्ञता का ऐतिहासिक दस्तावेज
थॉट्स ऑन पाकिस्तान
बाबासाहेब अपनी विद्वत्ता के साथ-साथ अपनी कृतज्ञता
के लिए भी विख्यात थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ (Thoughts on Pakistan) माता रमाबाई को समर्पित की।

उन्होंने समर्पण में लिखा मैं यह पुस्तक रमा (रमाबाई) को उसकी उस अदम्य सहनशीलता और मेरे प्रति उसके उस प्रेम के लिए समर्पित करता हूँ, जो उसने तब भी बनाए रखा, जब मेरे पास उसे देने के लिए सिवाय दुखों और अभावों के कुछ न था।

यह समर्पण पत्र प्रमाणित करता है, कि बाबासाहेब की हर सफलता में माता रमाबाई का आधा हिस्सा था।
उनके बिना डॉ. अंबेडकर का पूर्ण होना असंभव था।

7. बहुजन समाज के लिए प्रेरणा और जागरूकता
हमारा कर्तव्य
आज जब हम बाबासाहेब के अनुयायी होने का दावा करते हैं, तो हमें उनके इस घरेलू आचरण से पांच
महत्वपूर्ण सबक सीखने की आवश्यकता है:

स्त्री का सम्मान
यदि बाबासाहेब अपनी पत्नी के पैर दबा सकते थे, और घर के काम कर सकते थे, तो हम क्यों नहीं? घर की महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना ही बाबासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि है।
घरेलू कार्यों में सहभागिता
काम कभी भी ‘लिंग’ (Gender) के आधार पर नहीं होने चाहिए।
घर संभालना पति और पत्नी दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

शिक्षा के प्रति समर्पण
माता रमाबाई ने उपले बेचकर भी बाबासाहेब की पढ़ाई जारी रखवाई।

हमें अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों की शिक्षा पर सबसे अधिक निवेश करना चाहिए।

संवेदनशीलता
अपनी पत्नी के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति के प्रति संवेदनशील होना एक जागरूक और शिक्षित पुरुष की पहली पहचान है।

प्रकृति के प्रति श्रद्धा
माता रमाबाई का जीवन प्रकृति के उस शांत वटवृक्ष की तरह था, जिसने स्वयं तपन झेली लेकिन दूसरों को शीतल छाया दी। हमें भी प्रकृति की तरह उदार और संघर्षशील बनना चाहिए।

8. निष्कर्ष
एक नई चेतना का उदय
माता रमाबाई का जीवन त्याग की पराकाष्ठा है, तो बाबासाहेब का व्यवहार समता का प्रतीक।

उनका दांपत्य हमें सिखाता है कि महान लक्ष्य केवल अकेले नहीं पाए जाते, उनके पीछे एक मजबूत
पारिवारिक आधार और आपसी सम्मान होता है।

27 मई 1935 को जब माता
रमाबाई का महापरिनिर्वाण हुआ,
तो बाबासाहेब ने कहा था कि, उन्होंने अपना सबसे बड़ा सहारा खो दिया है।
आज बहुजन समाज को जागरूक होने की जरूरत है।
हमें केवल जयकारे नहीं लगाने, बल्कि बाबासाहेब की तरह अपनी पत्नियों, बहनों और बेटियों का सम्मान करना सीखना होगा।

हमें एक ऐसा समाज बनाना है, जहाँ हर पति अपनी पत्नी का सबसे अच्छा मित्र हो, उसके संघर्षों में उसका सहभागी हो और उसके
स्वाभिमान का रक्षक हो।

माता रमाबाई के बलिदानों को याद रखते हुए, आइए हम संकल्प लें कि हम शिक्षा, समता और बंधुत्व के उस मार्ग पर चलेंगे, जिसके लिए इन दो महान आत्माओं ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक

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