भूमिका
आधुनिक भारत में प्रशासनिक सेवा पाने का सपना एक ऐसा ख़्वाब (सपना) बन गया है जिसने लाखों परिवारों को अपनी ओर आकर्षित किया है। माता-पिता अपने बच्चों को अधिकारी बनते देखने की आकांक्षा रखते हैं और यही आकांक्षा धीरे-धीरे एक विशाल इंडस्ट्री (उद्योग) में बदल गई है। देश के लगभग हर बड़े शहर—दिल्ली, प्रयागराज, पटना, जयपुर, भोपाल, हैदराबाद—में UPSC कोचिंग संस्थानों की भरमार हो गई है। इन संस्थानों के बड़े-बड़े विज्ञापन, सफल छात्रों के पोस्टर और सोशल मीडिया पर प्रचार यह विश्वास दिलाते हैं कि सफलता का रास्ता इन्हीं से होकर गुजरता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस चमकदार दुनिया के पीछे एक जटिल सामाजिक और आर्थिक खेल छिपा हुआ है, जिसमें छात्रों के सपने और परिवारों की उम्मीदें अक्सर एक साज़िश (छल) जैसे सिस्टम (प्रणाली) में उलझ जाती हैं।
1*भारत में हर वर्ष लगभग 15 लाख विद्यार्थी UPSC की परीक्षा में बैठते हैं। लेकिन पूरे देश में कोचिंग लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 50 लाख से अधिक बताई जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि कई छात्र वर्षों तक तैयारी करते रहते हैं और बार-बार परीक्षा देते हैं। इस पूरी व्यवस्था में उम्मीद और फ़रेब (धोखा) का मिश्रण दिखाई देता है। कोचिंग संस्थान अपनी सफलता का रिकॉर्ड (अभिलेख) दिखाकर छात्रों को आकर्षित करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि उनके यहाँ पढ़ने वाले लाखों छात्रों में से कितने असफल हुए।
2:सबसे बड़ा खेल चयनित उम्मीदवारों को अपना छात्र बताने की दावेदारी (दावा) का है। हाल ही में Rubi Kumari जिनकी रैंक 954 आई, उन्हें लेकर कई संस्थानों ने दावा किया कि वे उनकी छात्रा थीं। यह एक तरह की हिकमत (चालाकी) है, जिससे वे अपने ब्रांड (पहचान) को मजबूत करना चाहते हैं। वास्तविकता यह है कि अधिकांश विद्यार्थी कई जगहों से सामग्री लेते हैं—कभी ऑनलाइन क्लास, कभी टेस्ट सीरीज़, कभी किताबें—लेकिन सफलता का श्रेय हर संस्थान अपने नाम करना चाहता है।
3:सबसे पहले Drishti IAS ने कहा कि Rubi Kumari उनकी छात्रा थीं। इसके बाद Next IAS ने भी यही दावा किया। फिर प्रसिद्ध शिक्षक Khan Sir से जुड़े मंच ने भी उन्हें अपना विद्यार्थी बताया। यह स्थिति बताती है कि कोचिंग संस्थानों के बीच किस प्रकार की सियासत (चाल) चल रही है। इस पूरी प्रतिस्पर्धा को शिक्षा का मार्केट (बाज़ार) कहना गलत नहीं होगा
4:कोचिंग संस्थान अपने प्रचार के लिए बड़े-बड़े पोस्टर और सोशल मीडिया अभियान चलाते हैं। उनमें सफल छात्रों की तस्वीरें लगाई जाती हैं, लेकिन असफल छात्रों का कहीं जिक्र नहीं होता। यह एक प्रकार की चालबाज़ी (धोखा) है जिसे आधुनिक मार्केटिंग (प्रचार-प्रबंधन) कहा जाता है। हजारों छात्रों की असफलता को छिपाकर कुछ सफल चेहरों को आगे कर दिया जाता है।
5:इस व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय परिवारों पर पड़ता है। माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के अरमान (इच्छा) में लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। दिल्ली के मुखर्जी नगर या प्रयागराज के कटरा जैसे क्षेत्रों में एक छात्र का सालाना खर्च दो से तीन लाख रुपये तक पहुँच जाता है। कोचिंग संस्थान इस भावनात्मक स्थिति को समझते हैं और इसे एक बिज़नेस (व्यापार) में बदल देते हैं। यह शिक्षा से अधिक उम्मीदों का कारोबार है.
6:इसका मनोवैज्ञानिक असर भी गहरा होता है। कई छात्र चार-पाँच साल तक तैयारी करते हैं और जब सफलता नहीं मिलती तो उनमें मायूसी (निराशा) पैदा होती है। प्रतियोगिता इतनी कठिन है कि अंतिम चयन केवल लगभग 900-1000 उम्मीदवारों का ही होता है। फिर भी लाखों छात्रों पर लगातार पढ़ाई और परिणाम का प्रेशर (दबाव) बना रहता है, जिससे कई बार मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ भी पैदा हो जाती हैं।
7:सामाजिक दृष्टि से यह स्थिति एक प्रकार की नाइंसाफी (अन्याय) है। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि जीवन में सम्मान और सफलता केवल प्रशासनिक सेवा से ही मिल सकती है। जबकि भारत जैसे विशाल देश में विज्ञान, तकनीक, उद्यमिता और सामाजिक सेवा जैसे अनेक क्षेत्र हैं। लेकिन कोचिंग संस्थानों का मॉडल (ढाँचा) इस विचार को मजबूत करता है कि IAS ही सर्वोच्च उपलब्धि है।
8:इस समस्या का समाधान खोजने की आवश्यकता है। सबसे पहले कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों और दावों की हकीकत (सच्चाई) की जाँच होनी चाहिए। सरकार को इस क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए स्पष्ट पॉलिसी (नीति) बनानी चाहिए। यदि कोई संस्थान झूठे दावे करके छात्रों को भ्रमित करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.
9:दूसरा उपाय यह है कि माता-पिता और छात्र दोनों जागरूक बनें। उन्हें यह समझना होगा कि सफलता केवल कोचिंग से नहीं बल्कि आत्मअनुशासन और स्वाध्याय से मिलती है। अंधविश्वास या गुमराही (भ्रम) में आकर किसी भी इंस्टिट्यूट (संस्थान) पर आँख बंद करके भरोसा करना उचित नहीं है। शिक्षा को व्यापार बनने से रोकना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
10:भारत को ऐसे शिक्षा तंत्र की आवश्यकता है जहाँ प्रतिभा को प्रोत्साहन मिले, न कि उम्मीदों का शोषण हो। यदि समाज इस समस्या को गंभीरता से समझे तो यह पूरा तंत्र बदल सकता है। युवाओं को यह संदेश देना आवश्यक है कि जीवन की सफलता केवल एक परीक्षा से तय नहीं होती। यह विचार ही इस तहरीक (आंदोलन) को जन्म दे सकता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं बल्कि ज्ञान और समाज निर्माण है। यह सोच ही एक स्वस्थ फ्यूचर (भविष्य) का रास्ता खोल सकती है।
समापन
अंततः यह स्पष्ट है कि UPSC कोचिंग का यह तंत्र उम्मीदों की एक बड़ी दास्तान (कहानी) बन चुका है। कुछ संस्थान ईमानदारी से काम करते हैं, लेकिन अनेक जगह यह व्यवस्था केवल लाभ कमाने का इंडस्ट्री (उद्योग) बन गई है। यदि समाज, सरकार और छात्र मिलकर जागरूकता पैदा करें तो इस भ्रम के जाल को तोड़ा जा सकता है। तभी शिक्षा वास्तव में ज्ञान, चरित्र और सामाजिक परिवर्तन का साधन बन सकेगी।
शेर:
औलाद की कामयाबी का ख़्वाब (सपना) देखो मगर आँख मूँदकर हर इंस्टिट्यूट (संस्थान) पर भरोसा मत करो।

संकलन कर्ता हगामीलाल मेघवंशी , रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।98292 30966
स्रोत व संदर्भ :
स्रोत: प्राध्यापकों के सामाजिक अनुभव, विद्यार्थियों-अभिभावकों से संवाद और सार्वजनिक चर्चाएँ। संदर्भ: UPSC कोचिंग व्यवस्था के सामाजिक व मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।
अस्वीकरण:
यह लेख समाज में जागरूकता और विचार-विमर्श के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी संस्था विशेष को लक्ष्य बनाना या अपमान करना उद्देश्य नहीं है।
