भूमिका
परिवारवाद – लोकतंत्र के भीतर पनपता हुआ लूटतंत्र,भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन इसकी चमकदार सतह के नीचे एक ऐसी सच्चाई भी छिपी है जो आम नागरिक के विश्वास को धीरे-धीरे खोखला करती जा रही है। राजनीति में परिवारवाद अब केवल एक प्रवृत्ति नहीं बल्कि एक मजबूत संरचना बन चुका है। यह संरचना लोकतंत्र की आत्मा को चुनौती देती है। जब सत्ता एक परिवार की सल्तनत (शासन) बन जाती है और राजनीति एक प्रकार का सिस्टम (व्यवस्था) बनकर केवल कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाती है, तब कार्यकर्ता और जनता दोनों ही दर्शक बन जाते हैं।

1.लोकतंत्र का मूल उद्देश्य था कि सामान्य नागरिक को सत्ता में भागीदारी का अवसर मिले। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज राजनीति कई जगहों पर कुछ परिवारों की हुकूमत (शासन) बन गई है। चुनाव केवल एक प्रोसेस (प्रक्रिया) रह गया है, जिसका परिणाम पहले से तय सा लगता है। जनता वोट देती है, लेकिन सत्ता उन्हीं घरों में लौट आती है जहाँ वह पीढ़ियों से सुरक्षित रखी गई है।

2.राजनीतिक दलों में कार्यकर्ता दिन-रात मेहनत करते हैं, रैलियाँ करते हैं, नारे लगाते हैं और संघर्ष करते हैं। मगर सत्ता के दरवाज़े अक्सर किसी नेता के बेटे-बेटी के लिए ही खुलते हैं। कार्यकर्ता के हिस्से में केवल वफादारी (निष्ठा) आती है, जबकि नेतृत्व का लीडरशिप (नेतृत्व) विरासत की तरह सौंप दिया जाता है। यही वह क्षण है जब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।

3.देश में जाति, भाषा, क्षेत्र और मजहब के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर भावनाएँ भड़काई जाती हैं, लेकिन असलियत में यह सब एक राजनीतिक फसाना (कहानी) बनकर रह जाता है। चुनावी मंचों पर न्याय और समानता का नैरेटिव (कथा-ढांचा) गढ़ा जाता है, जबकि सत्ता की असली पटकथा परिवारों के भीतर लिखी जाती है।

4.राजनीति में विचारधाराओं की लंबी सूची है—गांधीवाद, नेहरूवाद, अंबेडकरवाद, लोहियावाद, समाजवाद और साम्यवाद। इन विचारधाराओं का उद्देश्य समाज को दिशा देना था। लेकिन आज कई बार यह सब केवल भाषणों का जज्बा (भावना) बनकर रह गया है। राजनीतिक दल इन्हें अपने ब्रांड (पहचान) की तरह इस्तेमाल करते हैं, जबकि व्यवहार में सत्ता का असली उद्देश्य परिवार की निरंतरता बन जाता है।

5.राजनीति का सबसे खतरनाक सिद्धांत अब धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है—‘सत्ता से पैसा’ और ‘पैसे से सत्ता’। यह एक ऐसा दौर (समय) है जिसमें राजनीति कई जगह व्यापार जैसी दिखने लगी है। सत्ता का मॉडल (ढांचा) ऐसा बन गया है जिसमें संसाधन, ठेके और अवसर सीमित लोगों के बीच घूमते रहते हैं।

6.जब कोई नेता अपने परिवार को ही टिकट देता है, तो वह लोकतंत्र को निजी संपत्ति में बदल देता है। यह स्थिति किसी राजनीतिक इंतजाम (व्यवस्था) से अधिक एक पारिवारिक कारोबार जैसी लगती है। पार्टी का स्ट्रक्चर (संरचना) भी कई बार इस व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय उसी को मजबूत करता है।

7.इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान उस युवा पीढ़ी का होता है जो ईमानदारी से राजनीति में आना चाहती है। उन्हें लगता है कि राजनीति में मेहनत से ज्यादा जरूरी किसी बड़े नेता का बेटा-बेटी होना है। इस मानसिकता से समाज में एक गहरी मायूसी (निराशा) फैलती है और लोकतंत्र का मेरिट (योग्यता) कमजोर पड़ जाता है।

8.परिवारवाद केवल सत्ता की समस्या नहीं है, यह लोकतांत्रिक संस्कृति का भी संकट है। जब जनता बार-बार एक ही परिवार को चुनती है, तो वह अनजाने में उसी रिवायत (परंपरा) को मजबूत करती है। लोकतंत्र का असली पार्टिसिपेशन (भागीदारी) तभी संभव है जब जनता प्रश्न पूछने का साहस रखे।

9.मीडिया और समाज का एक बड़ा वर्ग भी इस स्थिति को सामान्य मानने लगा है। नेताओं के बच्चों को ‘युवा चेहरा’ कहकर प्रस्तुत किया जाता है, मानो राजनीति कोई निजी दास्तान (कहानी) हो। प्रचार का नैरेटिव (कथा-ढांचा) इतना मजबूत बना दिया जाता है कि आम कार्यकर्ता की आवाज़ पीछे छूट जाती है।

10.फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इतिहास बताता है कि जब समाज जागता है तो बड़े-बड़े सत्ता ढाँचे बदल जाते हैं। लोकतंत्र की असली ताकत जनता की ताक़त (शक्ति) में होती है। अगर नागरिक जागरूक होकर सही प्रतिनिधि चुनें, तो राजनीतिक सिस्टम (व्यवस्था) भी बदल सकती है।

समापन
परिवारवाद का संकट केवल किसी एक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं है; यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के सामने खड़ा प्रश्न है। जब राजनीति सेवा के बजाय वंश परंपरा का माध्यम बन जाती है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ती है। अब समय आ गया है कि समाज इस सच्चाई को समझे और राजनीति को फिर से जनता के हाथों में सौंपने का साहस करे। लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब नेतृत्व जन्म से नहीं बल्कि कर्म से तय होगा।

सकारात्मक शेर
उम्मीद की शमा बुझती नहीं अँधेरों से,
जब जागे लोग तो बदलते हैं तख़्त और ताज भी।

संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक 98292 30966

स्रोत और संदर्भ
भारतीय राजनीति के सार्वजनिक विमर्श, लेख, समाचार और ऐतिहासिक राजनीतिक अध्ययन।

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