प्रतिवर्ष जब संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के परिणाम घोषित होते हैं, तो पूरा देश और विशेषकर हमारा बहुजन समाज एक नए उत्साह से भर जाता है। अखबारों की सुर्खियां और सोशल मीडिया के पोस्ट इस बात का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते कि, हमारी जाति या समाज के कितने ‘लाल’ इस बार ‘साहब’ बन गए हैं।
लेकिन इस शोर-शराबे के बीच एक गहरा सन्नाटा भी है—वह सन्नाटा जो उन उम्मीदों के टूटने से पैदा होता है, जब यही ‘साहब’ अपनी कुर्सी पर बैठने के बाद अपने ही समाज और अपनी जड़ों को पहचानने से इनकार कर देते हैं।
आगरा का वह ऐतिहासिक दर्द “मुझे मेरे पढ़े-लिखे लोगों ने ही धोखा दिया” 18 मार्च 1956 को आगरा के चक्कीपाट के मैदान में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने भारी मन से कहा था— “मुझे मेरे पढ़े-लिखे लोगों ने ही धोखा दिया है।
बाबासाहेब को उम्मीद थी कि जब समाज का युवा पढ़-लिखकर ऊंचे पदों पर जाएगा, तो वह पूरे समाज के लिए प्रकाश स्तंभ बनेगा।
उन्हें विश्वास था कि ये शिक्षित लोग ‘पे-बैक टू सोसाइटी’ (समाज को लौटाने) के सिद्धांत पर चलेंगे।
लेकिन आज की स्थिति को देखकर बाबासाहेब का वह दर्द और
भी गहरा हो जाता है।
आरक्षण के जिस संवैधानिक सुरक्षा कवच के कारण आज हमारे लोग बड़े-बड़े पदों पर बैठे हैं, वह केवल व्यक्तिगत प्रगति का
साधन नहीं था। वह ‘प्रतिनिधित्व’ (Representation) का माध्यम था।
जब कोई व्यक्ति समाज के कोटे से अधिकारी बनता है, तो वह केवल एक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं, बल्कि उस पूरे वंचित समाज का प्रतिनिधि होता है। ऐसे में समाज के प्रति उनका नैतिक कर्तव्य किसी भी कानूनी जिम्मेदारी से कहीं बड़ा है।
सफलता का नशा और अपनों से दूरी
बेहद दुखद स्थिति तो तब उत्पन्न होती है जब सिविल सेवा या किसी छोटी-मोटी सरकारी नौकरी में आने के बाद लोग न केवल समाज, बल्कि अपने माता-पिता और परिवार को भी पहचानने से इनकार कर देते हैं।
जैसे ही हाथ में पावर और पद की प्रतिष्ठा आती है, वे अपने ही पिछड़े भाइयों-बहनों से दूरी बना लेते हैं।
उनके मन में यह डर बैठ जाता है कि यदि वे अपनों से मिलेंगे, तो कोई उनसे सहायता मांग लेगा।
यह कैसी मानसिकता है? जो माता-पिता पेट काटकर, खुद अभावों में रहकर अपने बच्चों को इस काबिल बनाते हैं, अधिकारी बनते ही वे बच्चे उन्हें अपनी ‘स्टेटस’ के अनुकूल नहीं पाते। समाज के लिए काम करना तो दूर, वे अपने घर के आंगन को भी अपनी चकाचौंध
से दूर कर देते हैं।
युवाओं से आह्वान: परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र
मैं सरकारी सेवा में आने वाले हर युवा से यह आह्वान करता हूं कि सफलता का असली पैमाना आपकी ‘रैंक’ नहीं, बल्कि आपके द्वारा किए गए ‘कल्याणकारी कार्य’ हैं। आपकी सेवा का क्रम इस प्रकार होना चाहिए:
अपना परिवार
सबसे पहले अपने माता-पिता, भाई-बहनों का भला करें, जिन्होंने आपके संघर्ष में साथ दिया।
अपना समाज
अपने गांव और समाज के उन लोगों का हाथ थामें जो आज भी उसी दलदल में फंसे हैं जहाँ से
आप निकलकर आए हैं।
अपना देश
अंततः अपनी पूरी निष्ठा के साथ
राष्ट्र हित में कार्य करें।
यदि आप अपने परिवार और समाज का हित नहीं कर सकते, तो आपके द्वारा किए गए देशहित के दावे खोखले और बनावटी प्रतीत होते हैं।
बुद्ध की करुणा और मैत्री: प्रगति का वास्तविक मार्ग
हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बाबासाहेब ने हमें केवल संवैधानिक अधिकार नहीं दिए, बल्कि तथागत बुद्ध का मार्ग भी दिखाया। यदि हम महात्मा बुद्ध की करुणा (Compassion) और मैत्री (Loving-kindness) की भावना को दिल में रखकर काम करेंगे, तो हम कभी मार्ग से नहीं भटकेंगे।
जब हृदय में दया और मैत्री होती है, तो व्यक्ति अहंकार से मुक्त हो जाता है। यही वह भावना है जिससे बाबासाहेब का मिशन पूरा होगा।
प्रगति का अर्थ केवल ऊंचे पद पर बैठना नहीं है, बल्कि प्रगति का अर्थ है—अपने साथ-साथ अपने समाज को भी ऊपर उठाना। जब हम दूसरों के प्रति दया भाव रखते हैं, तो हमारी अपनी प्रगति भी निरंतर और स्थायी होती है।
हर पद की गरिमा, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर मुख्य सचिव तक
अक्सर लोग सोचते हैं कि केवल कलेक्टर या एसपी ही समाज का भला कर सकते हैं।
यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। किसी भी सरकारी कार्यालय में कार्यरत एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (Peon) भी यदि चाहे, तो वह अपने समाज के लिए बहुत कुछ कर सकता है। वह दफ्तर में आने वाले अपने समाज के अनपढ़ या सीधे-साधे व्यक्ति को सही रास्ता दिखा सकता है, उसकी फाइल कहाँ अटक रही है इसकी जानकारी दे सकता है, या कम से कम उसे सम्मान के साथ बैठने के लिए कहकर उसे संबल दे सकता है।
आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम पूरे मन से अपने माता-पिता, भाई-बहन, समाज, जाति, गांव और देश के लिए काम करने का संकल्प लें। आज आपके पास पद है, प्रतिष्ठा है और ताकत है—यही समय है
कुछ कर गुजरने का।
रिटायरमेंट के बाद का ढोंग और सामाजिक तिरस्कार
समाज में एक बहुत ही दुखदाई विडंबना देखी जाती है। जब अधिकारी सेवा में होते हैं और उनके पास असीमित शक्तियां होती हैं, तब वे समाज की ओर मुड़कर भी नहीं देखते। वे उन लोगों को ‘अवॉइड’ करते हैं जो मजबूरी में उनके पास मदद के लिए जाते हैं।
लेकिन जैसे ही 60 साल की उम्र में रिटायरमेंट होता है और सरकारी बंगला व गाड़ी छिन जाती है, तो अचानक उन्हें बाबासाहेब और अपने पिछड़े समाज की याद आने लगती है।
रिटायरमेंट के बाद वे बाबासाहेब के ‘परम भक्त’ बनकर ढिंढोरा पीटने लगते हैं और समाज के पास जाकर नेता बनने की कोशिश करते हैं। वे चाहते हैं कि समाज उन्हें अपना नेतृत्व सौंपे और उनके लिए वोट जुटाए। लेकिन समाज के लोग मूर्ख नहीं हैं। वे अच्छी तरह पहचानते हैं कि कौन उनके बुरे वक्त में साथ खड़ा था और कौन ‘असमर्थता’ का रोना रो रहा था। ऐसे अधिकारियों को समाज अक्सर ‘अवॉइड’ करता है और उन्हें वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी वे अपेक्षा करते हैं।
निष्कर्ष
समय रहते चेतने की आवश्यकता
ऐसी लज्जाजनक स्थिति किसी के साथ न बने, इसलिए यह आवश्यक है कि हम सेवा के पहले दिन से ही अपनी भावनाओं को शुद्ध रखें।
बाबासाहेब का मिशन ‘पे-बैक टू सोसाइटी’ कोई रिटायरमेंट के बाद का एजेंडा नहीं है, बल्कि यह आपके सक्रिय सेवाकाल की
जीवनशैली होनी चाहिए।
याद रखें, पद और प्रतिष्ठा अस्थायी हैं। एक दिन आपकी शक्ति समाप्त हो जाएगी और आपको अंततः अपने समाज के लोगों के बीच ही वापस जाना है। यदि आप चाहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद समाज आपको पलकों पर बिठाए, तो आज अपनी शक्ति का उपयोग समाज के हित में कीजिए।
जब तक आपकी कलम किसी गरीब के आंसू नहीं पोंछती तब तक आपकी मार्कशीट के नंबर और आपकी कुर्सी की ताकत सिर्फ एक सरकारी आंकड़ा है,सामाजिक क्रांति नहीं
आइए, हम बुद्ध की करुणा और बाबासाहेब के संघर्ष को आत्मसात करें और एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ ‘पढ़ा-लिखा वर्ग’ समाज की ‘धोखाधड़ी’ नहीं, बल्कि उसकी ‘ताकत’ बने।
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिन्तक ब्यावर-MO-94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com
