भारतीय समाज एक विराट वृक्ष की तरह है—जड़ों में परंपरा, तने में संस्कार और शाखाओं में संबंधों की हरियाली। किंतु इसी वृक्ष के भीतर कहीं-कहीं दीमक भी लग जाती है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, पर भीतर से खोखला करती रहती है। चुगली, निंदा, दुराग्रह और स्वार्थ—ये वही अदृश्य दीमक हैं। कोई सीधे आकर वार नहीं करता; वह कानों में धीरे-धीरे शब्दों का विष घोलता है। सुनने वाला यदि विवेकहीन हो, तो वह उसी क्षण निर्णय सुना देता है। इसलिए सत्य और असत्य को परखने की क्षमता आज केवल नैतिक गुण नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व का कवच है।

हमारी सामाजिक संरचना में परिवार केंद्र में रहा है। संयुक्त परिवारों की परंपरा ने सहयोग और सहिष्णुता सिखाई, परंतु उसी व्यवस्था में चुगली ने भी जगह बनाई। “मैंने तो अपने कर्तव्य से बताया” कहने वाले लोग अक्सर संबंधों की जड़ों में संदेह बोते हैं। एक वाक्य, एक संकेत, एक आधा-सच—और विश्वास की दीवार में दरार पड़ जाती है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े घराने बाहरी शत्रु से नहीं, भीतर की फुसफुसाहट से टूटे हैं। शब्दों का यह धीमा प्रहार तलवार से अधिक गहरा होता है।

ठगने का भाव केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन का प्रतीक है। जब व्यक्ति का चरित्र स्वार्थ से संचालित होता है, तब वह दूसरे की सरलता को अवसर समझता है। भारतीय समाज में भोलापन, निष्कपटता और विश्वास को सद्गुण माना गया है; किंतु यही सद्गुण तब संकट बन जाते हैं जब सामने वाला कपटी हो। मीठे शब्दों के आवरण में छिपी बदनियत धीरे-धीरे अपना जाल बुनती है। परिणाम यह होता है कि ठगा गया व्यक्ति केवल धन ही नहीं, विश्वास भी खो देता है।

दबंग प्रवृत्ति भारतीय सामाजिक जीवन का एक जटिल पक्ष है। शक्ति, संपत्ति या पद का अहंकार व्यक्ति को यह भ्रम दे देता है कि वही अंतिम सत्य है। ऐसे लोग अक्सर परिवार के भीतर भी भय और विभाजन का वातावरण बनाते हैं। किसी के कान भरकर, किसी को भड़का कर, वे अपना प्रभाव बनाए रखते हैं। विडंबना यह है कि जो स्वयं को निर्णायक समझता है, वह वास्तव में दूसरों के शब्दों का खिलौना बन जाता है। शक्ति का यह दुरुपयोग परिवारों को भीतर से तोड़ देता है।

निंदा की प्रवृत्ति आत्महीनता की उपज है। जो स्वयं से संतुष्ट नहीं, वह दूसरों के दोष गिनाने में संतोष खोजता है। भारतीय लोकजीवन में कहा गया है कि “परनिंदा से बड़ा पाप नहीं।” फिर भी हम देखते हैं कि चाय की बैठकों से लेकर सामाजिक समारोहों तक, चर्चा का केंद्र अक्सर अनुपस्थित व्यक्ति होता है। किसी की सफलता को संदेह से देखना, उसकी छवि को धूमिल करना—यह मानसिकता समाज को विषाक्त बनाती है। निंदा का आनंद क्षणिक है, पर उसका दुष्परिणाम दीर्घकालिक।

दुराग्रह और पूर्वाग्रह सत्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। जब मन पहले से ही किसी के प्रति नकारात्मक धारणा से भरा हो, तो हर सूचना उसी रंग में रंगी दिखाई देती है। जाति, वर्ग, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर बने पूर्वनिर्णय व्यक्ति की निष्पक्षता को नष्ट कर देते हैं। ऐसे में झूठ भी सच प्रतीत होता है, क्योंकि वह हमारी धारणा को पुष्ट करता है। यह मानसिकता समाज को न्याय से दूर ले जाती है और निर्दोषों को दोषी ठहरा देती है।

दोगलापन सामाजिक चरित्र का वह अंधेरा कोना है जहाँ कथनी और करनी का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। सार्वजनिक मंचों पर आदर्शों की बातें करना और निजी जीवन में विपरीत आचरण करना—यह दोहरा व्यवहार विश्वास की नींव हिला देता है। जब व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार अपने सिद्धांत बदलता है, तब वह केवल दूसरों को नहीं, स्वयं को भी धोखा देता है। समाज में नैतिक भ्रम की स्थिति इसी दोहरेपन से जन्म लेती है। आने वाली पीढ़ियाँ जब यह विरोधाभास देखती हैं, तो उनके भीतर मूल्यबोध कमजोर पड़ जाता है।

स्वार्थी स्वभाव आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में और तीखा हो गया है। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में व्यक्ति संबंधों को भी साधन की तरह देखने लगता है। उपयोगिता समाप्त होते ही अपनापन भी समाप्त हो जाता है। ऐसे वातावरण में भोलापन और विश्वास उपहास का विषय बन जाते हैं। किंतु यह स्मरण रखना होगा कि सरलता कमजोरी नहीं, शक्ति है—बशर्ते वह विवेक से जुड़ी हो। विवेकहीन सरलता शोषण को आमंत्रित करती है, पर विवेकयुक्त सरलता सम्मान अर्जित करती है।

अविश्वास का वातावरण समाज को भीतर से तोड़ देता है। जब हर व्यक्ति दूसरे की नीयत पर संदेह करने लगे, तो संवाद समाप्त हो जाता है। कानों में घोला गया ज़हर धीरे-धीरे हृदय तक पहुँच जाता है और संबंधों की ऊष्मा को ठंडा कर देता है। इस स्थिति से बचने का एक ही उपाय है—सुनने से पहले ठहरना, मानने से पहले परखना और प्रतिक्रिया देने से पहले संवाद करना। सत्य की खोज धैर्य मांगती है; झूठ तुरंत उत्तेजना देता है। विवेक उसी का साथ देता है जो धैर्यवान हो।

अंततः प्रश्न समाज का नहीं, व्यक्ति का है। यदि हम स्वयं चुगली से दूर रहें, निंदा में भाग न लें, स्वार्थ के स्थान पर सद्भाव को चुनें और कथनी-करनी में एकरूपता रखें, तो परिवर्तन संभव है। सच और झूठ को परखने का हुनर पुस्तकों से नहीं, चरित्र से विकसित होता है। जब हम अपने कानों को ज़हर से बचाना सीख लेंगे, तब परिवारों में विश्वास लौटेगा, संबंधों में गरिमा बचेगी और समाज अधिक नैतिक, अधिक मानवीय और अधिक सजग बन सकेगा। यही इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

संकलन कर्ता

हगामी लाल मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

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